रविवार 18 जून, 2023



विषयक्या ब्रह्मांड, मनुष्य सहित, परमाणु बल द्वारा विकसित है?

SubjectIs The Universe, Including Man, Evolved By Atomic Force?

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: अय्यूब 37: 14

"चुपचाप खड़ा रह, और ईश्वर के आश्चर्यकर्मों का विचार कर।"



Golden Text: Job 37 : 14

Stand still, and consider the wondrous works of God.




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उत्तरदायी अध्ययन: अय्यूब 36: 22 • अय्यूब 37: 5, 6, 16, 17, 23


22     देख, ईश्वर अपने सामर्ध्य से बड़े बड़े काम करता है, उसके समान शिक्षक कौन है?

5     ईश्वर गरज कर अपना शब्द अद्भूत रीति से सुनाता है, और बड़े बड़े काम करता है जिन को हम नहीं समझते।

6     वह तो हिम से कहता है, पृथ्वी पर गिर, और इसी प्रकार मेंह को भी और मूसलाधार वर्षा को भी ऐसी ही आज्ञा देता है।

16     क्या तू घटाओं का तौलना, वा सर्वज्ञानी के आश्चर्यकर्म जानता है?

17     जब पृथ्वी पर दक्खिनी हवा ही के कारण से सन्नाटा रहता है तब तेरे वस्त्र क्यों गर्म हो जाते हैं?

23     सर्वशक्तिमान जो अति सामथीं है, और जिसका भेद हम पा नहीं सकते, वह न्याय और पूर्ण धर्म को छोड़ अत्याचार नहीं कर सकता।

Responsive Reading: Job 36 : 22Job 37 : 5, 6, 16, 17, 23

22.     Behold, God exalteth by his power: who teacheth like him?

5.     God thundereth marvellously with his voice; great things doeth he, which we cannot comprehend.

6.     For he saith to the snow, Be thou on the earth; likewise to the small rain, and to the great rain of his strength.

16.     Dost thou know the balancings of the clouds, the wondrous works of him which is perfect in knowledge?

17.     How thy garments are warm, when he quieteth the earth by the south wind?

23.     Touching the Almighty, we cannot find him out: he is excellent in power, and in judgment, and in plenty of justice: he will not afflict.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. अय्यूब 5: 8-13, 19-24 (से ;)

8     परन्तु मैं तो ईश्वर ही को खोजता रहूंगा और अपना मुक़द्दमा परमेश्वर पर छोड़ दूंगा।

9     वह तो एसे बड़े काम करता है जिनकी थाह नहीं लगती, और इतने आश्चर्यकर्म करता है, जो गिने नहीं जाते।

10     वही पृथ्वी के ऊपर वर्षा करता, और खेतों पर जल बरसाता है।

11     इसी रीति वह नम्र लोगों को ऊंचे स्थान पर बिठाता है, और शोक का पहिरावा पहिने हुए लोग ऊंचे पर पहुँचकर बचते हैं।

12     वह तो धूर्त्त लोगों की कल्पनाएं व्यर्थ कर देता है, और उनके हाथों से कुछ भी बन नहीं पड़ता।

13     वह बुद्धिमानों को उनकी धूर्त्तता ही में फंसाता है; और कुटिल लोगों की युक्ति दूर की जाती है।

19     वह तुझे छ: विपत्तियों से छुड़ाएगा; वरन सात से भी तेरी कुछ हानि न होने पाएगी।

20     अकाल में वह तुझे मुत्यु से, और युद्ध में तलवार की धार से बचा लेगा।

21     तू वचनरूपी कोड़े से बचा रहेगा और जब विनाश आए, तब भी तुझे भय न होगा।

22     तू उजाड़ और अकाल के दिनों में हँसमुख रहेगा, और तुझे बनैले जन्तुओं से डर न लगेगा।

23     वरन मैदान के पत्थर भी तुझ से वाचा बान्धे रहेंगे, और वनपशु तुझ से मेल रखेंगे।

24     और तुझे निश्चय होगा, कि तेरा डेरा कुशल से है।

1. Job 5 : 8-13, 19-24 (to ;)

8     I would seek unto God, and unto God would I commit my cause:

9     Which doeth great things and unsearchable; marvellous things without number:

10     Who giveth rain upon the earth, and sendeth waters upon the fields:

11     To set up on high those that be low; that those which mourn may be exalted to safety.

12     He disappointeth the devices of the crafty, so that their hands cannot perform their enterprise.

13     He taketh the wise in their own craftiness: and the counsel of the froward is carried headlong.

19     He shall deliver thee in six troubles: yea, in seven there shall no evil touch thee.

20     In famine he shall redeem thee from death: and in war from the power of the sword.

21     Thou shalt be hid from the scourge of the tongue: neither shalt thou be afraid of destruction when it cometh.

22     At destruction and famine thou shalt laugh: neither shalt thou be afraid of the beasts of the earth.

23     For thou shalt be in league with the stones of the field: and the beasts of the field shall be at peace with thee.

24     And thou shalt know that thy tabernacle shall be in peace;

2. 1 राजा 18: 1, 2, 41-46 (से ;)

1     बहुत दिनों के बाद, तीसरे वर्ष में यहोवा का यह वचन एलिय्याह के पास पहुंचा, कि जा कर अपने अपप को अहाब को दिखा, और मैं भूमि पर मेंह बरसा दूंगा।

2     तब एलिय्याह अपने आप को अहाब को दिखाने गया। उस समय शोमरोन में अकाल भारी था।

41     फिर एलिय्याह ने अहाब से कहा, उठ कर खा पी, क्योंकि भारी वर्षा की सनसनाहट सुन पडती है।

42     तब अहाब खाने पीने चला गया, और एलिय्याह कर्म्मेल की चोटी पर चढ़ गया, और भूमि पर गिर कर अपना मुंह घुटनों के बीच किया।

43     और उसने अपने सेवक से कहा, चढ़कर समुद्र की ओर दृष्टि कर देख, तब उसने चढ़ कर देखा और लौट कर कहा, कुछ नहीं दीखता। एलिय्याह ने कहा, फिर सात बार जा।

44     सातवीं बार उसने कहा, देख समुद्र में से मनुष्य का हाथ सा एक छोटा बादल उठ रहा है। एलिय्याह ने कहा, अहाब के पास जा कर कह, कि रथ जुतवा कर नीचे जा, कहीं ऐसा न हो कि तू वर्षा के कारण रुक जाए।

45     थोड़ी ही देर में आकाश वायु से उड़ाई हुई घटाओं, और आन्धी से काला हो गया और भारी वर्षा होने लगी; और अहाब सवार हो कर यिज्रेल को चला।

46     तब यहोवा की शक्ति एलिय्याह पर ऐसी हुई; कि वह कमर बान्धकर अहाब के आगे आगे यिज्रेल तक दौड़ता चला गया।

2. I Kings 18 : 1, 2, 41-46 (to ;)

1     And it came to pass after many days, that the word of the Lord came to Elijah in the third year, saying, Go, shew thyself unto Ahab; and I will send rain upon the earth.

2     And Elijah went to shew himself unto Ahab. And there was a sore famine in Samaria.

41     And Elijah said unto Ahab, Get thee up, eat and drink; for there is a sound of abundance of rain.

42     So Ahab went up to eat and to drink. And Elijah went up to the top of Carmel; and he cast himself down upon the earth, and put his face between his knees,

43     And said to his servant, Go up now, look toward the sea. And he went up, and looked, and said, There is nothing. And he said, Go again seven times.

44     And it came to pass at the seventh time, that he said, Behold, there ariseth a little cloud out of the sea, like a man’s hand. And he said, Go up, say unto Ahab, Prepare thy chariot, and get thee down, that the rain stop thee not.

45     And it came to pass in the mean while, that the heaven was black with clouds and wind, and there was a great rain. And Ahab rode, and went to Jezreel.

46     And the hand of the Lord was on Elijah;

3. 1 राजा 19 : 9-12

9     वहां वह एक गुफा में जा कर टिका और यहोवा का यह वचन उसके पास पहुंचा, कि हे एलिय्याह तेरा यहां क्या काम?

10     उन ने उत्तर दिया सेनाओं के परमेश्वर यहोवा के निमित्त मुझे बड़ी जलन हुई है, क्योकि इस्राएलियों ने तेरी वाचा टाल दी, तेरी वेदियों को गिरा दिया, और तेरे नबियों को तलवार से घात किया है, और मैं ही अकेला रह गया हूँ; और वे मेरे प्राणों के भी खोजी हैं।

11     उसने कहा, निकलकर यहोवा के सम्मुख पर्वत पर खड़ा हो। और यहोवा पास से हो कर चला, और यहोवा के साम्हने एक बड़ी प्रचण्ड आन्धी से पहाड़ फटने और चट्टानें टूटने लगीं, तौभी यहोवा उस आन्धी में न था; फिर आन्धी के बाद भूंईडोल हूआ, तौभी यहोवा उस भूंईडोल में न था।

12     फिर भूंईडोल के बाद आग दिखाई दी, तौभी यहोवा उस आग में न था; फिर आग के बाद एक दबा हुआ धीमा शब्द सुनाईं दिया।

3. I Kings 19 : 9-12

9     And he came thither unto a cave, and lodged there; and, behold, the word of the Lord came to him, and he said unto him, What doest thou here, Elijah?

10     And he said, I have been very jealous for the Lord God of hosts: for the children of Israel have forsaken thy covenant, thrown down thine altars, and slain thy prophets with the sword; and I, even I only, am left; and they seek my life, to take it away.

11     And he said, Go forth, and stand upon the mount before the Lord. And, behold, the Lord passed by, and a great and strong wind rent the mountains, and brake in pieces the rocks before the Lord; but the Lord was not in the wind: and after the wind an earth-quake; but the Lord was not in the earthquake:

12     And after the earthquake a fire; but the Lord was not in the fire: and after the fire a still small voice.

4. भजन संहिता 107: 1-6

1     यहोवा का धन्यवाद करो, क्योंकि वह भला है; और उसकी करूणा सदा की है!

2     यहोवा के छुड़ाए हुए ऐसा ही कहें, जिन्हें उसने द्रोही के हाथ से दाम दे कर छुड़ा लिया है,

3     और उन्हें देश देश से पूरब- पश्चिम, उत्तर और दक्खिन से इकट्ठा किया है॥

4     वे जंगल में मरूभूमि के मार्ग पर भटकते फिरे, और कोई बसा हुआ नगर न पाया;

5     भूख और प्यास के मारे, वे विकल हो गए।

6     तब उन्होंने संकट में यहोवा की दोहाई दी, और उसने उन को सकेती से छुड़ाया;

4. Psalm 107 : 1-6

1     O give thanks unto the Lord, for he is good: for his mercy endureth for ever.

2     Let the redeemed of the Lord say so, whom he hath redeemed from the hand of the enemy;

3     And gathered them out of the lands, from the east, and from the west, from the north, and from the south.

4     They wandered in the wilderness in a solitary way; they found no city to dwell in.

5     Hungry and thirsty, their soul fainted in them.

6     Then they cried unto the Lord in their trouble, and he delivered them out of their distresses.

5. मत्ती 14 : 14, 22-36

14     उस ने निकलकर बड़ी भीड़ देखी; और उन पर तरस खाया; और उस ने उन के बीमारों को चंगा किया।

22     और उस ने तुरन्त अपने चेलों को बरबस नाव पर चढ़ाया, कि वे उस से पहिले पार चले जाएं, जब तक कि वह लोगों को विदा करे।

23     वह लोगों को विदा करके, प्रार्थना करने को अलग पहाड़ पर चढ़ गया; और सांझ को वहां अकेला था।

24     उस समय नाव झील के बीच लहरों से डगमगा रही थी, क्योंकि हवा साम्हने की थी।

25     और वह रात के चौथे पहर झील पर चलते हुए उन के पास आया।

26     चेले उस को झील पर चलते हुए देखकर घबरा गए! और कहने लगे, वह भूत है; और डर के मारे चिल्ला उठे।

27     यीशु ने तुरन्त उन से बातें की, और कहा; ढाढ़स बान्धो; मैं हूं; डरो मत।

28     पतरस ने उस को उत्तर दिया, हे प्रभु, यदि तू ही है, तो मुझे अपने पास पानी पर चलकर आने की आज्ञा दे।

29     उस ने कहा, आ: तब पतरस नाव पर से उतरकर यीशु के पास जाने को पानी पर चलने लगा।

30     पर हवा को देखकर डर गया, और जब डूबने लगा, तो चिल्लाकर कहा; हे प्रभु, मुझे बचा।

31     यीशु ने तुरन्त हाथ बढ़ाकर उसे थाम लिया, और उस से कहा, हे अल्प-विश्वासी, तू ने क्यों सन्देह किया?

32     जब वे नाव पर चढ़ गए, तो हवा थम गई।

33     इस पर जो नाव पर थे, उन्होंने उसे दण्डवत करके कहा; सचमुच तू परमेश्वर का पुत्र है॥

34     वे पार उतरकर गन्नेसरत देश में पहुंचे।

35     और वहां के लोगों ने उसे पहचानकर आस पास के सारे देश में कहला भेजा, और सब बीमारों को उसके पास लाए।

36     और उस से बिनती करने लगे, कि वह उन्हें अपने वस्त्र के आंचल ही को छूने दे: और जितनों ने उसे छूआ, वे चंगे हो गए॥

5. Matthew 14 : 14, 22-36

14     And Jesus went forth, and saw a great multitude, and was moved with compassion toward them, and he healed their sick.

22     And straightway Jesus constrained his disciples to get into a ship, and to go before him unto the other side, while he sent the multitudes away.

23     And when he had sent the multitudes away, he went up into a mountain apart to pray: and when the evening was come, he was there alone.

24     But the ship was now in the midst of the sea, tossed with waves: for the wind was contrary.

25     And in the fourth watch of the night Jesus went unto them, walking on the sea.

26     And when the disciples saw him walking on the sea, they were troubled, saying, It is a spirit; and they cried out for fear.

27     But straightway Jesus spake unto them, saying, Be of good cheer; it is I; be not afraid.

28     And Peter answered him and said, Lord, if it be thou, bid me come unto thee on the water.

29     And he said, Come. And when Peter was come down out of the ship, he walked on the water, to go to Jesus.

30     But when he saw the wind boisterous, he was afraid; and beginning to sink, he cried, saying, Lord, save me.

31     And immediately Jesus stretched forth his hand, and caught him, and said unto him, O thou of little faith, wherefore didst thou doubt?

32     And when they were come into the ship, the wind ceased.

33     Then they that were in the ship came and worshipped him, saying, Of a truth thou art the Son of God.

34     And when they were gone over, they came into the land of Gennesaret.

35     And when the men of that place had knowledge of him, they sent out into all that country round about, and brought unto him all that were diseased;

36     And besought him that they might only touch the hem of his garment: and as many as touched were made perfectly whole.

6. आमोस 4: 13

13     देख, पहाड़ों का बनाने वाला और पवन का सिरजने वाला, और मनुष्य को उसके मन का विचार बताने वाला और भोर को अन्धकार करने वाला, और जो पृथ्वी के ऊंचे स्थानों पर चलने वाला है, उसी का नाम सेनाओं का परमेश्वर यहोवा है॥

6. Amos 4 : 13

13     For, lo, he that formeth the mountains, and createth the wind, and declareth unto man what is his thought, that maketh the morning darkness, and treadeth upon the high places of the earth, The Lord, The God of hosts, is his name.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 171 : 12-13

मनुष्य सहित ब्रह्मांड पर मन का नियंत्रण अब एक खुला प्रश्न नहीं है, बल्कि विज्ञान है।

1. 171 : 12-13

Mind's control over the universe, including man, is no longer an open question, but is demonstrable Science.

2. 331 : 11 (यह)-16 (से ;), 16-17

शास्त्रों का अर्थ है कि ईश्वर सब कुछ है। इससे यह पता चलता है कि ईश्वरीय मन और उनके विचारों के अलावा किसी भी चीज़ में वास्तविकता या अस्तित्व नहीं है। शास्त्र यह भी घोषणा करते हैं कि ईश्वर आत्मा है। इसलिए आत्मा में सब कुछ सामंजस्य है, और कोई मतभेद नहीं हो सकता; … भगवान के ब्रह्मांड में सब कुछ उसे व्यक्त करता है।

2. 331 : 11 (The)-16 (to ;), 16-17

The Scriptures imply that God is All-in-all. From this it follows that nothing possesses reality nor existence except the divine Mind and His ideas. The Scriptures also declare that God is Spirit. Therefore in Spirit all is harmony, and there can be no discord; … Everything in God's universe expresses Him.

3. 102 : 9-15

लेकिन आत्मा का एक वास्तविक आकर्षण है। ध्रुव को सुई की ओर इशारा करना इस सर्व-शक्तिमान या ईश्वर, दिव्य मन के आकर्षण का प्रतीक है।

क्योंकि परमेश्वर ब्रह्मांड को नियंत्रित करता है, ग्रहों का उसके निर्माता से अधिक मनुष्य पर कोई अधिकार नहीं है; परन्तु मनुष्य, जो परमेश्वर की सामर्थ को प्रतिबिम्बित करता है, सारी पृथ्वी और उसकी सेना पर प्रभुता करता है।

3. 102 : 9-15

There is but one real attraction, that of Spirit. The pointing of the needle to the pole symbolizes this all-embracing power or the attraction of God, divine Mind.

The planets have no more power over man than over his Maker, since God governs the universe; but man, reflecting God's power, has dominion over all the earth and its hosts.

4. 369 : 5-13

जिस अनुपात में मनुष्य को सभी वस्तुएं मनुष्य के रूप में खो देती हैं, उसी अनुपात में मनुष्य इसका स्वामी बन जाता है। वह तथ्यों की एक दिव्य भावना में प्रवेश करता है, और यीशु के धर्मशास्त्र को समझने के रूप में बीमारों को ठीक करने, मृतकों को ऊपर उठाने और लहर पर चलने के रूप में प्रदर्शित करता है। इन सभी कर्मों से यीशु का विश्वास इस बात पर है कि सामग्री भौतिक है, यह विश्वास है कि यह जीवन का मध्यस्थ या अस्तित्व के किसी भी रूप का निर्माणकर्ता हो सकता है।

4. 369 : 5-13

In proportion as matter loses to human sense all entity as man, in that proportion does man become its master. He enters into a diviner sense of the facts, and comprehends the theology of Jesus as demonstrated in healing the sick, raising the dead, and walking over the wave. All these deeds manifested Jesus' control over the belief that matter is substance, that it can be the arbiter of life or the constructor of any form of existence.

5. 67 : 20 (द्वारा)-24

... आध्यात्मिक महत्व के माध्यम से हमारे भगवान और गुरु ने बीमारों को चंगा किया, मृतकों को उठाया, और हवाओं और लहरों को भी उसे मानने की आज्ञा दी। अनुग्रह और सत्य अन्य सभी साधनों और विधियों से अधिक शक्तिशाली हैं।

5. 67 : 20 (through)-24

… through spiritual ascendency our Lord and Master healed the sick, raised the dead, and commanded even the winds and waves to obey him. Grace and Truth are potent beyond all other means and methods.

6. 192 : 11-26

श्रद्धा शक्ति एक भौतिक विश्वास है, एक अंधा गर्भित बल है, इच्छा की संतान है और ज्ञान की नहीं, नश्वर मन की है और न ही अमर की। यह सिर का लंबा मोतियाबिंद, भयावह लौ, टेम्परेस्ट की सांस है। यह बिजली और तूफान है, यह सब स्वार्थी, दुष्ट, बेईमान और अशुद्ध है।

नैतिक और आध्यात्मिक आत्मा से संबंधित हो सकते हैं, जो "मुट्ठी में हवा" रखता है; और यह शिक्षण विज्ञान और सद्भाव के साथ उच्चारण करता है। विज्ञान में, आपके पास भगवान के विपरीत कोई शक्ति नहीं हो सकती है, और शारीरिक इंद्रियों को अपनी झूठी गवाही देनी चाहिए। अच्छे के लिए आपका प्रभाव आपके द्वारा सही पैमाने पर फेंके गए वजन पर निर्भर करता है। आप जो अच्छा करते हैं और अवतार लेते हैं वह आपको एकमात्र शक्ति प्राप्त करने योग्य बनाता है। बुराई शक्ति नहीं है। यह ताकत का मजाक है, जो अपनी कमजोरी को मिटाता है और गिरता है, कभी नहीं उठता।

6. 192 : 11-26

Erring power is a material belief, a blind miscalled force, the offspring of will and not of wisdom, of the mortal mind and not of the immortal. It is the headlong cataract, the devouring flame, the tempest's breath. It is lightning and hurricane, all that is selfish, wicked, dishonest, and impure.

Moral and spiritual might belong to Spirit, who holds the "wind in His fists;" and this teaching accords with Science and harmony. In Science, you can have no power opposed to God, and the physical senses must give up their false testimony. Your influence for good depends upon the weight you throw into the right scale. The good you do and embody gives you the only power obtainable. Evil is not power. It is a mockery of strength, which erelong betrays its weakness and falls, never to rise.

7. 293 : 13-31

तथाकथित गैसें और बल, दिव्य मन की आध्यात्मिक शक्तियों के प्रतिरूप हैं, जिनकी सामर्थ्य सत्य है, जिनका आकर्षण प्रेम है, जिनका आसंजन और सामंजस्य जीवन है, होने के शाश्वत तथ्यों को नष्ट कर देता है। विद्युत भौतिकता का वह तीव्र अधिशेष है, जो अध्यात्म या सत्य के वास्तविक सार को उद्घाटित करता है, - महान अंतर यह है कि बिजली बुद्धिमान नहीं है, जबकि आध्यात्मिक सत्य मन है।

भूकंप, हवा, लहर, बिजली, अग्नि, सबसे अच्छा गति में व्यक्त - नश्वर मन का कोई वाष्पीभूत रोष नहीं है और यह तथाकथित मन स्व-नष्ट है। बुराई की अभिव्यक्ति, जो ईश्वरीय न्याय का प्रतिकार करती है, शास्त्रों में कहा गया है, "प्रभु का क्रोध।" वास्तव में, वे त्रुटि या पदार्थ के आत्म-विनाश को दर्शाते हैं और पदार्थ के विपरीत, आत्मा की ताकत और स्थायित्व को इंगित करते हैं। क्रिश्चियन साइंस सत्य और उसके वर्चस्व, सार्वभौमिक सद्भाव, ईश्वर की पवित्रता, अच्छाई और बुराई की बुराई को प्रकाश में लाता है।

7. 293 : 13-31

The material so-called gases and forces are counterfeits of the spiritual forces of divine Mind, whose potency is Truth, whose attraction is Love, whose adhesion and cohesion are Life, perpetuating the eternal facts of being. Electricity is the sharp surplus of materiality which counterfeits the true essence of spirituality or truth, — the great difference being that electricity is not intelligent, while spiritual truth is Mind.

There is no vapid fury of mortal mind — expressed in earthquake, wind, wave, lightning, fire, bestial ferocity — and this so-called mind is self-destroyed. The manifestations of evil, which counterfeit divine justice, are called in the Scriptures, "The anger of the Lord." In reality, they show the self-destruction of error or matter and point to matter's opposite, the strength and permanency of Spirit. Christian Science brings to light Truth and its supremacy, universal harmony, the entireness of God, good, and the nothingness of evil.

8. 124 : 14-2

ब्रह्मांड, मनुष्य की तरह, विज्ञान द्वारा अपने दिव्य सिद्धांत, ईश्वर से व्याख्या की जानी है, और फिर इसे समझा जा सकता है; लेकिन जब भौतिक अर्थों के आधार पर समझाया जाता है और विकास, परिपक्वता और क्षय के विषय के रूप में प्रतिनिधित्व किया जाता है, तो ब्रह्मांड, जैसे मनुष्य, है और होना चाहिए, एक रहस्य है।

आसंजन, सामंजस्य और आकर्षण मन के गुण हैं। वे दिव्य सिद्धांत से संबंधित हैं, और उस विचार-शक्ति के उपसंहार का समर्थन करते हैं, जिसने पृथ्वी को अपनी कक्षा में लॉन्च किया और गर्व की लहर से कहा, "यहां तक और इसके आगे नहीं।"

आत्मा सभी चीजों का जीवन, पदार्थ और निरंतरता है। हम ताकतों पर चलते हैं। उन्हें वापस ले लें, और सृजन को ढह जाना चाहिए। मानव ज्ञान उन्हें पदार्थ की ताकत कहता है; लेकिन दिव्य विज्ञान घोषित करता है कि वे पूर्ण रूप से दिव्य मन से संबंधित हैं, इस दिमाग में निहित हैं, और इसलिए उन्हें उनके सही घर और वर्गीकरण के लिए पुनर्स्थापित करता है।

भौतिक शरीर और भौतिक दुनिया के तत्व और कार्य बदल जाएंगे जैसे नश्वर मन अपनी मान्यताओं को बदल देता है।

8. 124 : 14-2

The universe, like man, is to be interpreted by Science from its divine Principle, God, and then it can be understood; but when explained on the basis of physical sense and represented as subject to growth, maturity, and decay, the universe, like man, is, and must continue to be, an enigma.

Adhesion, cohesion, and attraction are properties of Mind. They belong to divine Principle, and support the equipoise of that thought-force, which launched the earth in its orbit and said to the proud wave, "Thus far and no farther."

Spirit is the life, substance, and continuity of all things. We tread on forces. Withdraw them, and creation must collapse. Human knowledge calls them forces of matter; but divine Science declares that they belong wholly to divine Mind, are inherent in this Mind, and so restores them to their rightful home and classification.

The elements and functions of the physical body and of the physical world will change as mortal mind changes its beliefs.

9. 507 : 15-23

आत्मा का ब्रह्मांड ईश्वरीय सिद्धांत या जीवन की रचनात्मक शक्ति को दर्शाता है, जो मन के बहुसंख्यक रूपों को पुन: उत्पन्न करता है और यौगिक विचार मनुष्य के गुणन को नियंत्रित करता है। पेड़ और जड़ी-बूटी अपनी स्वयं की किसी प्रसार शक्ति के कारण फल नहीं देते हैं, बल्कि इसलिए कि वे उस मन को प्रतिबिंबित करते हैं जिसमें सभी शामिल हैं। एक भौतिक दुनिया का अर्थ है एक नश्वर मन और मनुष्य एक निर्माता। वैज्ञानिक ईश्वरीय रचना अमर मन और ईश्वर द्वारा निर्मित ब्रह्मांड की घोषणा करती है।

9. 507 : 15-23

The universe of Spirit reflects the creative power of the divine Principle, or Life, which reproduces the multitudinous forms of Mind and governs the multiplication of the compound idea man. The tree and herb do not yield fruit because of any propagating power of their own, but because they reflect the Mind which includes all. A material world implies a mortal mind and man a creator. The scientific divine creation declares immortal Mind and the universe created by God.

10. 510 : 18-20, 28-6

केवल प्रेम ही अनंत मन का असीम विचार प्रदान कर सकता है। भूविज्ञान ने कभी भी पृथ्वी की बनावट की व्याख्या नहीं की है; यह उन्हें समझा नहीं सकता।

विज्ञान केवल एक मन को प्रकट करता है, और यह अपने स्वयं के प्रकाश से चमकता है और ब्रह्मांड को नियंत्रित करता है, जिसमें मनुष्य भी शामिल है, पूर्ण सद्भाव में। यह मन विचारों, अपनी स्वयं की छवियों, उप-विभाजनों का निर्माण करता है और अपनी उधार ली गई रोशनी, बुद्धि को विकीर्ण करता है, और इसलिए पवित्रशास्त्र के वाक्यांश की व्याख्या करता है, "जिसका बीज अपने आप में है।" इस प्रकार भगवान अपने विचारों से कहते हैं "फूलो-फलो, और पृथ्वी में भर जाओ।" दिव्य मन आध्यात्मिक सृजन की उच्चता, विशालता और अनंतता का समर्थन करता है।

10. 510 : 18-20, 28-6

Love alone can impart the limitless idea of infinite Mind. Geology has never explained the earth's formations; it cannot explain them.

Science reveals only one Mind, and this one shining by its own light and governing the universe, including man, in perfect harmony. This Mind forms ideas, its own images, subdivides and radiates their borrowed light, intelligence, and so explains the Scripture phrase, "whose seed is in itself." Thus God's ideas "multiply and replenish the earth." The divine Mind supports the sublimity, magnitude, and infinitude of spiritual creation.

11. 509 : 20-28

तथाकथित खनिज, सब्जी, और पशु पदार्थ अब समय या सामग्री संरचना से अधिक आकस्मिक नहीं हैं, जब वे "सुबह के सितारे एक साथ गाते थे।" मन ने पृथ्वी में होने से पहले "खेत का पौधा" बनाया। आध्यात्मिक स्वर्गारोहण के काल मन की रचना के दिन और मौसम हैं, जिसमें सौंदर्य, उदात्तता, पवित्रता, और पवित्रता - हाँ, दैवीय प्रकृति - मनुष्य में प्रकट होती है और ब्रह्मांड कभी गायब नहीं होता है।

11. 509 : 20-28

So-called mineral, vegetable, and animal substances are no more contingent now on time or material structure than they were when "the morning stars sang together." Mind made the "plant of the field before it was in the earth." The periods of spiritual ascension are the days and seasons of Mind's creation, in which beauty, sublimity, purity, and holiness — yea, the divine nature — appear in man and the universe never to disappear.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6