रविवार 18 जुलाई, 2021



विषयजिंदगी

SubjectLife

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: रोमियो 6 : 23

"परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है॥"



Golden Text: Romans 6 : 23

The gift of God is eternal life through Jesus Christ our Lord.




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उत्तरदायी अध्ययन: उत्पत्ति 5 : 1, 2, 21-24


1     आदम की वंशावली यह है। जब परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की तब अपने ही स्वरूप में उसको बनाया;

2     उसने नर और नारी करके मनुष्यों की सृष्टि की और उन्हें आशीष दी, और उनकी सृष्टि के दिन उनका नाम आदम रखा।

21     जब हनोक पैंसठ वर्ष का हुआ, तब उसने मतूशेलह को जन्म दिया।

22     और मतूशेलह के जन्म के पश्चात हनोक तीन सौ वर्ष तक परमेश्वर के साथ साथ चलता रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुईं।

23     और हनोक की कुल अवस्था तीन सौ पैंसठ वर्ष की हुई।

24     और हनोक परमेश्वर के साथ साथ चलता था; फिर वह लोप हो गया क्योंकि परमेश्वर ने उसे उठा लिया।

Responsive Reading: Genesis 5 : 1, 2, 21-24

1.     In the day that God created man, in the likeness of God made he him;

2.     Male and female created he them; and blessed them,

21.     And Enoch lived sixty and five years, and begat Methuselah:

22.     And Enoch walked with God after he begat Methuselah three hundred years, and begat sons and daughters:

23.     And all the days of Enoch were three hundred sixty and five years:

24.     And Enoch walked with God: and he was not; for God took him.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. 2 राजा 2 : 1-12

1     जब यहोवा एलिय्याह को बवंडर के द्वारा स्वर्ग में उठा लेने को था, तब एलिय्याह और एलीशा दोनों संग संग गिलगाल से चले।

2     एलिय्याह ने एलीशा से कहा, यहोवा मुझे बेतेल तक भेजता है इसलिये तू यहीं ठहरा रह। एलीशा ने कहा, यहोवा के और तेरे जीवन की शपथ मैं तुझे नहीं छोड़ने का; इसलिये वे बेतेल को चले गए।

3     और बेतेलवासी भविष्यद्वक्ताओं के चेले एलीशा के पास आकर कहने लगे, क्या तुझे मालूम है कि आज यहोवा तेरे स्वामी को तेरे ऊपर से उठा लेने पर है? उसने कहा, हां, मुझे भी यह मालूम है, तुम चुप रहो।

4     और एलिय्याह ने उस से कहा, हे एलीशा, यहोवा मुझे यरीहो को भेजता है; इसलिये तू यहीं ठहरा रह: उसने कहा, यहोवा के और तेरे जीवन की शपथ मैं तुझे नहीं छोड़ने का; सो वे यरीहो को आए।

5     और यरीहोवासी भविष्यद्वक्ताओं के चेले एलीशा के पास आकर कहने लगे, क्या तुझे मालूम है कि आज यहोवा तेरे स्वामी को तेरे ऊपर से उठा लेने पर है? उसने उत्तर दिया, हां मुझे भी मालूम है, तुम चुप रहो।

6     फिर एलिय्याह ने उस से कहा, यहोवा मुझे यरदन तक भेजता है, सो तू यहीं ठहरा रह; उसने कहा, यहोवा के और तेरे जीवन की शपथ मैं तुझे नहीं छोड़ने का; सो वे दोनों आगे चले।

7     और भविष्यद्वक्ताओं के चेलों में से पचास जन जा कर उनके साम्हने दूर खड़े हुए, और वे दोनों यरदन के तीर खड़े हुए।

8     तब एलिय्याह ने अपनी चद्दर पकड़ कर ऐंठ ली, और जल पर मारा, तब वह इधर उधर दो भाग हो गया; और वे दोनों स्थल ही स्थल पार उतर गए।

9     उनके पार पहुंचने पर एलिय्याह ने एलीशा से कहा, उस से पहिले कि मैं तेरे पास से उठा लिये जाऊं जो कुछ तू चाहे कि मैं तेरे लिये करूं वह मांग; एलीशा ने कहा, तुझ में जो आत्मा है, उसका दूना भाग मुझे मिल जाए।

10     एलिय्याह ने कहा, तू ने कठिन बात मांगी है, तौभी यदि तू मुझे उठा लिये जाने के बाद देखने पाए तो तेरे लिये ऐसा ही होगा; नहीं तो न होगा।

11     वे चलते चलते बातें कर रहे थे, कि अचानक एक अग्नि मय रथ और अग्निमय घोड़ों ने उन को अलग अलग किया, और एलिय्याह बवंडर में हो कर स्वर्ग पर चढ़ गया।

12     और उसे एलीशा देखता और पुकारता रहा, हाय मेरे पिता! हाय मेरे पिता! हाय इस्राएल के रथ और सवारो! जब वह उसको फिर देख न पड़ा, तब उसने अपने वस्त्र पाड़े और फाड़कर दो भाग कर दिए।

1. II Kings 2 : 1-12

1     And it came to pass, when the Lord would take up Elijah into heaven by a whirlwind, that Elijah went with Elisha from Gilgal.

2     And Elijah said unto Elisha, Tarry here, I pray thee; for the Lord hath sent me to Beth-el. And Elisha said unto him, As the Lord liveth, and as thy soul liveth, I will not leave thee. So they went down to Beth-el.

3     And the sons of the prophets that were at Beth-el came forth to Elisha, and said unto him, Knowest thou that the Lord will take away thy master from thy head to day? And he said, Yea, I know it; hold ye your peace.

4     And Elijah said unto him, Elisha, tarry here, I pray thee; for the Lord hath sent me to Jericho. And he said, As the Lord liveth, and as thy soul liveth, I will not leave thee. So they came to Jericho.

5     And the sons of the prophets that were at Jericho came to Elisha, and said unto him, Knowest thou that the Lord will take away thy master from thy head to day? And he answered, Yea, I know it; hold ye your peace.

6     And Elijah said unto him, Tarry, I pray thee, here; for the Lord hath sent me to Jordan. And he said, As the Lord liveth, and as thy soul liveth, I will not leave thee. And they two went on.

7     And fifty men of the sons of the prophets went, and stood to view afar off: and they two stood by Jordan.

8     And Elijah took his mantle, and wrapped it together, and smote the waters, and they were divided hither and thither, so that they two went over on dry ground.

9     And it came to pass, when they were gone over, that Elijah said unto Elisha, Ask what I shall do for thee, before I be taken away from thee. And Elisha said, I pray thee, let a double portion of thy spirit be upon me.

10     And he said, Thou hast asked a hard thing: nevertheless, if thou see me when I am taken from thee, it shall be so unto thee; but if not, it shall not be so.

11     And it came to pass, as they still went on, and talked, that, behold, there appeared a chariot of fire, and horses of fire, and parted them both asunder; and Elijah went up by a whirlwind into heaven.

12     And Elisha saw it, and he cried, My father, my father, the chariot of Israel, and the horsemen thereof. And he saw him no more: and he took hold of his own clothes, and rent them in two pieces.

2. यूहन्ना 11 : 1, 4 (से 2nd ,), 11 (हमारी)-15, 17, 32-34, 38-44

1     मरियम और उस की बहिन मारथा के गांव बैतनिय्याह का लाजर नाम एक मनुष्य बीमार था।

4     यह सुनकर यीशु ने कहा।

11     कि हमारा मित्र लाजर सो गया है, परन्तु मैं उसे जगाने जाता हूं।

12     तब चेलों ने उस से कहा, हे प्रभु, यदि वह सो गया है, तो बच जाएगा।

13     यीशु ने तो उस की मृत्यु के विषय में कहा था: परन्तु वे समझे कि उस ने नींद से सो जाने के विषय में कहा।

14     तब यीशु ने उन से साफ कह दिया, कि लाजर मर गया है।

15     और मैं तुम्हारे कारण आनन्दित हूं कि मैं वहां न था जिस से तुम विश्वास करो, परन्तु अब आओ, हम उसके पास चलें।

17     सो यीशु को आकर यह मालूम हुआ कि उसे कब्र में रखे चार दिन हो चुके हैं।

32     जब मरियम वहां पहुंची जहां यीशु था, तो उसे देखते ही उसके पांवों पर गिर के कहा, हे प्रभु, यदि तू यहां होता तो मेरा भाई न मरता।

33     जब यीशु न उस को और उन यहूदियों को जो उसके साथ आए थे रोते हुए देखा, तो आत्मा में बहुत ही उदास हुआ, और घबरा कर कहा, तुम ने उसे कहां रखा है?

34     उन्होंने उस से कहा, हे प्रभु, चलकर देख ले।

38     यीशु मन में फिर बहुत ही उदास होकर कब्र पर आया, वह एक गुफा थी, और एक पत्थर उस पर धरा था।

39     यीशु ने कहा; पत्थर को उठाओ: उस मरे हुए की बहिन मारथा उस से कहने लगी, हे प्रभु, उस में से अब तो र्दुगंध आती है क्योंकि उसे मरे चार दिन हो गए।

40     यीशु ने उस से कहा, क्या मैं ने तुझ से न कहा था कि यदि तू विश्वास करेगी, तो परमेश्वर की महिमा को देखेगी।

41     तब उन्होंने उस पत्थर को हटाया, फिर यीशु ने आंखें उठाकर कहा, हे पिता, मैं तेरा धन्यवाद करता हूं कि तू ने मेरी सुन ली है।

42     और मै जानता था, कि तू सदा मेरी सुनता है, परन्तु जो भीड़ आस पास खड़ी है, उन के कारण मैं ने यह कहा, जिस से कि वे विश्वास करें, कि तू ने मुझे भेजा है।

43     यह कहकर उस ने बड़े शब्द से पुकारा, कि हे लाजर, निकल आ।

44     जो मर गया था, वह कफन से हाथ पांव बन्धे हुए निकल आया और उसका मुंह अंगोछे से लिपटा हुआ तें यीशु ने उन से कहा, उसे खोलकर जाने दो॥

2. John 11 : 1, 4 (to 2nd ,), 11 (Our)-15, 17, 32-34, 38-44

1     Now a certain man was sick, named Lazarus, of Bethany, the town of Mary and her sister Martha.

4     When Jesus heard that, he said,

11     Our friend Lazarus sleepeth; but I go, that I may awake him out of sleep.

12     Then said his disciples, Lord, if he sleep, he shall do well.

13     Howbeit Jesus spake of his death: but they thought that he had spoken of taking of rest in sleep.

14     Then said Jesus unto them plainly, Lazarus is dead.

15     And I am glad for your sakes that I was not there, to the intent ye may believe; nevertheless let us go unto him.

17     Then when Jesus came, he found that he had lain in the grave four days already.

32     Then when Mary was come where Jesus was, and saw him, she fell down at his feet, saying unto him, Lord, if thou hadst been here, my brother had not died.

33     When Jesus therefore saw her weeping, and the Jews also weeping which came with her, he groaned in the spirit, and was troubled,

34     And said, Where have ye laid him? They said unto him, Lord, come and see.

38     Jesus therefore again groaning in himself cometh to the grave. It was a cave, and a stone lay upon it.

39     Jesus said, Take ye away the stone. Martha, the sister of him that was dead, saith unto him, Lord, by this time he stinketh: for he hath been dead four days.

40     Jesus saith unto her, Said I not unto thee, that, if thou wouldest believe, thou shouldest see the glory of God?

41     Then they took away the stone from the place where the dead was laid. And Jesus lifted up his eyes, and said, Father, I thank thee that thou hast heard me.

42     And I knew that thou hearest me always: but because of the people which stand by I said it, that they may believe that thou hast sent me.

43     And when he thus had spoken, he cried with a loud voice, Lazarus, come forth.

44     And he that was dead came forth, bound hand and foot with graveclothes: and his face was bound about with a napkin. Jesus saith unto them, Loose him, and let him go.

3. यूहन्ना 3 : 16

16     क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।

3. John 3 : 16

16     For God so loved the world, that he gave his only begotten Son, that whosoever believeth in him should not perish, but have everlasting life.

4. यूहन्ना 17 : 1-3

1     यीशु ने ये बातें कहीं और अपनी आंखे आकाश की ओर उठाकर कहा, हे पिता, वह घड़ी आ पहुंची, अपने पुत्र की महिमा कर, कि पुत्र भी तेरी महिमा करे।

2     क्योंकि तू ने उस को सब प्राणियों पर अधिकार दिया, कि जिन्हें तू ने उस को दिया है, उन सब को वह अनन्त जीवन दे।

3     और अनन्त जीवन यह है, कि वे तुझ अद्वैत सच्चे परमेश्वर को और यीशु मसीह को, जिसे तू ने भेजा है, जाने।

4. John 17 : 1-3

1     These words spake Jesus, and lifted up his eyes to heaven, and said, Father, the hour is come; glorify thy Son, that thy Son also may glorify thee:

2     As thou hast given him power over all flesh, that he should give eternal life to as many as thou hast given him.

3     And this is life eternal, that they might know thee the only true God, and Jesus Christ, whom thou hast sent.

5. 2 कुरिन्थियों 9 : 15

15     परमेश्वर को उसके उस दान के लिये जो वर्णन से बाहर है, धन्यवाद हो॥

5. II Corinthians 9 : 15

15     Thanks be unto God for his unspeakable gift.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 246 : 27-31

जीवन शाश्वत है। हमें इसका पता लगाना चाहिए, और इसके बाद प्रदर्शन शुरू करना चाहिए। जीवन और अच्छाई अमर है। आइए फिर हम उम्र और तुषार के बजाय अपने अस्तित्व के विचारों को प्रेम, ताजगी और निरंतरता में आकार दें।

1. 246 : 27-31

Life is eternal. We should find this out, and begin the demonstration thereof. Life and goodness are immortal. Let us then shape our views of existence into loveliness, freshness, and continuity, rather than into age and blight.

2. 72 : 13-16

नश्वर विश्वास (जीवन की भौतिक भावना) और अमर सत्य (आध्यात्मिक भावना) तारे और गेहूं हैं, जो प्रगति से एकजुट नहीं हैं, बल्कि अलग हो गए हैं।

2. 72 : 13-16

Mortal belief (the material sense of life) and immortal Truth (the spiritual sense) are the tares and the wheat, which are not united by progress, but separated.

3. 14 : 25-30

भौतिक समझ के विश्वास और सपने से पूरी तरह से अलग, आध्यात्मिक समझ और पूरी पृथ्वी पर मनुष्य के प्रभुत्व की चेतना को प्रकट करके, जीवन दिव्य है। यह समझ त्रुटि निकालती है और बीमारों को चंगा करता है, और इसके साथ आप "धिकारी की नान" बोल सकते हैं।

3. 14 : 25-30

Entirely separate from the belief and dream of material living, is the Life divine, revealing spiritual understanding and the consciousness of man's dominion over the whole earth. This understanding casts out error and heals the sick, and with it you can speak "as one having authority."

4. 258 : 25-5

मनुष्यों में आध्यात्मिक व्यक्ति और उसके विचार की अनंत सीमा का बहुत ही अपूर्ण अर्थ है। अनन्त जीवन उसी का है। अनंत काल तक ईश्वर की सरकार के तहत, कभी पैदा नहीं हुआ और कभी नहीं मरना मनुष्य के लिए, उसकी उच्च संपत्ति से गिरना असंभव था।

आध्यात्मिक अर्थों के माध्यम से आप देवत्व के हृदय को समझ सकते हैं, और इस तरह विज्ञान में सामान्य शब्द आदमी को समझना शुरू कर सकते हैं। मनुष्य देवता में लीन नहीं है, और मनुष्य अपने व्यक्तित्व को नहीं खो सकता, क्योंकि वह शाश्वत जीवन को दर्शाता है; न ही वह एक पृथक, एकान्त विचार है, क्योंकि वह अनंत मन, सभी पदार्थों के योग का प्रतिनिधित्व करता है।

4. 258 : 25-5

Mortals have a very imperfect sense of the spiritual man and of the infinite range of his thought. To him belongs eternal Life. Never born and never dying, it were impossible for man, under the government of God in eternal Science, to fall from his high estate.

Through spiritual sense you can discern the heart of divinity, and thus begin to comprehend in Science the generic term man. Man is not absorbed in Deity, and man cannot lose his individuality, for he reflects eternal Life; nor is he an isolated, solitary idea, for he represents infinite Mind, the sum of all substance.

5. 245 : 32-26

अनंत न कभी शुरू हुआ और न कभी खत्म होगा। मन और उसके स्वरूपों का सत्यानाश कभी नहीं हो सकता। मनुष्य एक पेंडुलम नहीं है, जो बुराई और भलाई, खुशी और दुःख, बीमारी और स्वास्थ्य, जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहा है। जीवन और उसके संकायों को कैलेंडरों द्वारा मापा नहीं जाता है। सही और अमर उनके निर्माता की शाश्वत समानता है। मनुष्य किसी भी तरह से अपूर्णता से उठने वाले पदार्थ के कीटाणु से नहीं है और आत्मा को उसके मूल से ऊपर पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। धारा अपने स्रोत से ऊपर नहीं उठती है।

सौर वर्षों से जीवन का माप युवाओं को लूटता है और उम्र के लिए कुरूपता देता है। पुण्य का उज्ज्वल सूर्य और होने के साथ सत्य सह-अस्तित्व। घटता हुआ सूरज उसकी शाश्वत दोपहर है, जो एक गिरते सूरज से अनिच्छुक है। भौतिक और भौतिक के रूप में, सौंदर्य की क्षणिक भावना फीकी पड़ जाती है, आत्मा की चमक उज्ज्वल और अपूर्ण चमक के साथ उत्कीर्ण भावना पर भोर होनी चाहिए।

उम्र पर कभी ध्यान न दें। कालानुक्रमिक डेटा हमेशा के लिए विशाल का हिस्सा नहीं हैं। जन्म और मृत्यु के समय-सारणी मर्दानगी और नारीत्व के खिलाफ बहुत सारे षड्यंत्र हैं। उस अच्छे और सुंदर सभी को मापने और सीमित करने की त्रुटि को छोड़कर, आदमी थ्रीस्कोर वर्ष और दस से अधिक का आनंद ले सकता है और अभी भी अपनी ताक़त, ताजगी और वादे को बनाए रखेगा। अमर मन द्वारा शासित मनुष्य हमेशा सुंदर और भव्य होता है। प्रत्येक सफल वर्ष ज्ञान, सौंदर्य और पवित्रता को प्रकट करता है।

5. 245 : 32-26

The infinite never began nor will it ever end. Mind and its formations can never be annihilated. Man is not a pendulum, swinging between evil and good, joy and sorrow, sickness and health, life and death. Life and its faculties are not measured by calendars. The perfect and immortal are the eternal likeness of their Maker. Man is by no means a material germ rising from the imperfect and endeavoring to reach Spirit above his origin. The stream rises no higher than its source.

The measurement of life by solar years robs youth and gives ugliness to age. The radiant sun of virtue and truth coexists with being. Manhood is its eternal noon, undimmed by a declining sun. As the physical and material, the transient sense of beauty fades, the radiance of Spirit should dawn upon the enraptured sense with bright and imperishable glories.

Never record ages. Chronological data are no part of the vast forever. Time-tables of birth and death are so many conspiracies against manhood and womanhood. Except for the error of measuring and limiting all that is good and beautiful, man would enjoy more than threescore years and ten and still maintain his vigor, freshness, and promise. Man, governed by immortal Mind, is always beautiful and grand. Each succeeding year unfolds wisdom, beauty, and holiness.

6. 151 : 18-21

भय और उसके कार्यों को कभी रोका नहीं जा सकता। रक्त, हृदय, फेफड़े, मस्तिष्क का जीवन, ईश्वर से कोई लेना-देना नहीं है। वास्तविक मनुष्य का प्रत्येक कार्य ईश्वरीय मन द्वारा संचालित होता है।

6. 151 : 18-21

Fear never stopped being and its action. The blood, heart, lungs, brain, etc., have nothing to do with Life, God. Every function of the real man is governed by the divine Mind.

7. 264 : 15-19

जब हम महसूस करते हैं कि जीवन आत्मा है, तो कभी भी भौतिकता में नहीं, यह समझ ईश्वर में, अच्छी, और किसी अन्य चेतना की आवश्यकता को खोजने के द्वारा, आत्म-पूर्णता में विस्तारित हो जाएगी।

7. 264 : 15-19

When we realize that Life is Spirit, never in nor of matter, this understanding will expand into self-completeness, finding all in God, good, and needing no other consciousness.

8. 75 : 12-16

यीशु ने लाजर के बारे में कहा: "कि हमारा मित्र लाजर सो गया है, परन्तु मैं उसे जगाने जाता हूं।" यीशु ने लाजर को इस समझ के साथ बहाल किया कि लाजर की मृत्यु कभी नहीं हुई थी, न कि इस बात से कि उसका शरीर मर गया था और फिर दोबारा जीवित हो गया था।

8. 75 : 12-16

Jesus said of Lazarus: "Our friend Lazarus sleepeth; but I go, that I may awake him out of sleep." Jesus restored Lazarus by the understanding that Lazarus had never died, not by an admission that his body had died and then lived again.

9. 429 : 31-12

यीशु ने कहा (यूहन्ना 8: 51), "यदि कोई व्यक्ति मेरे वचन पर चलेगा, तो वह अनन्त काल तक मृत्यु को न देखेगा।" यह कथन आध्यात्मिक जीवन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें अस्तित्व की सभी घटनाएं शामिल हैं। यीशु ने यह प्रदर्शित किया, मरते हुए और मृतकों को ऊपर उठाते हुए। नश्वर मन को त्रुटि के साथ भाग लेना चाहिए, अपने कर्मों से खुद को दूर करना चाहिए, और अमर आदर्श मर्दानगी, मसीह आदर्श दिखाई देगा। विश्वास को अपनी सीमाओं को बढ़ाना चाहिए और पदार्थ के बजाय आत्मा पर आराम करके अपने आधार को मजबूत करना चाहिए। जब मनुष्य मृत्यु पर अपना विश्वास छोड़ देता है, तो वह ईश्वर, जीवन और प्रेम की ओर अधिक तेजी से आगे बढ़ेगा। बीमारी और मृत्यु में विश्वास, निश्चित रूप से पाप में विश्वास के रूप में, जीवन और स्वास्थ्य की सही भावना को बंद करने के लिए जाता है। मानव जाति विज्ञान के इस महान तथ्य को कब जगाएगी?

9. 429 : 31-12

Jesus said (John viii. 51), "If a man keep my saying, he shall never see death." That statement is not confined to spiritual life, but includes all the phenomena of existence. Jesus demonstrated this, healing the dying and raising the dead. Mortal mind must part with error, must put off itself with its deeds, and immortal manhood, the Christ ideal, will appear. Faith should enlarge its borders and strengthen its base by resting upon Spirit instead of matter. When man gives up his belief in death, he will advance more rapidly towards God, Life, and Love. Belief in sickness and death, as certainly as belief in sin, tends to shut out the true sense of Life and health. When will mankind wake to this great fact in Science?

10. 302 : 15 (सामंजस्यपूर्ण)-18

... सामंजस्यपूर्ण और अमर आदमी हमेशा के लिए अस्तित्व में है, और किसी भी जीवन, पदार्थ और बुद्धि के नश्वर भ्रम से परे और हमेशा मौजूद है।

10. 302 : 15 (harmonious)-18

…harmonious and immortal man has existed forever, and is always beyond and above the mortal illusion of any life, substance, and intelligence as existent in matter.

11. 426 : 11-32

यदि मृत्यु में विश्वास तिरोहित हो जाता है, और यह समझ प्राप्त हो जाती है कि मृत्यु नहीं है, तो यह "जीवन का वृक्ष" होगा, जो इसके फलों से जाना जाता है। मनुष्य को अपनी ऊर्जाओं और प्रयासों को नवीनीकृत करना चाहिए, और अपने स्वयं के उद्धार के लिए काम करने की आवश्यकता को सीखते हुए, पाखंड को भी देखना चाहिए। जब यह जान लिया जाता है कि बीमारी जीवन को नष्ट नहीं कर सकती है, और मृत्यु से पाप या बीमारी से मृत्यु को बचाया नहीं जाता है, तो यह समझ जीवन के नएपन में तब्दील हो जाएगी। यह या तो मरने या कब्र से डरने की इच्छा में महारत हासिल करेगा, और इस तरह नश्वर अस्तित्व को नष्ट करने वाले महान भय को नष्ट कर देगा।

मृत्यु में सभी विश्वासों का त्याग और इसके डंक के डर से स्वास्थ्य और नैतिकता के स्तर को अपने वर्तमान उत्थान से बहुत ऊपर उठाया जा सकता है, और हमें ईश्वर में जीवन के प्रति असीम विश्वास के साथ ईसाई धर्म के बैनर को धारण करने में सक्षम करेगा। पाप मौत लाया, और पाप के गायब होने के साथ मौत गायब हो जाएगी। मनुष्य अमर है, और शरीर मर नहीं सकता, क्योंकि पदार्थ के पास समर्पण करने के लिए कोई जीवन नहीं है। पदार्थ, मृत्यु, बीमारी, बीमारी और पाप नाम की मानवीय अवधारणाएँ सभी नष्ट की जा सकती हैं।

11. 426 : 11-32

If the belief in death were obliterated, and the understanding obtained that there is no death, this would be a "tree of life," known by its fruits. Man should renew his energies and endeavors, and see the folly of hypocrisy, while also learning the necessity of working out his own salvation. When it is learned that disease cannot destroy life, and that mortals are not saved from sin or sickness by death, this understanding will quicken into newness of life. It will master either a desire to die or a dread of the grave, and thus destroy the great fear that besets mortal existence.

The relinquishment of all faith in death and also of the fear of its sting would raise the standard of health and morals far beyond its present elevation, and would enable us to hold the banner of Christianity aloft with unflinching faith in God, in Life eternal. Sin brought death, and death will disappear with the disappearance of sin. Man is immortal, and the body cannot die, because matter has no life to surrender. The human concepts named matter, death, disease, sickness, and sin are all that can be destroyed.

12. 428 : 30-4

लेखक ने आशाहीन जैविक बीमारी को ठीक किया है, और जीवन और स्वास्थ्य को भगवान की समझ के माध्यम से उठाया है जो कि मर रहा था। यह मानना कि पाप सर्वशक्तिमान और अनन्त जीवन पर हावी हो सकता है, यह पाप है और इस जीवन को इस समझ के साथ प्रकाश में लाया जाना चाहिए कि कोई मृत्यु नहीं है, साथ ही साथ आत्मा के अन्य अनुग्रह द्वारा भी।

12. 428 : 30-4

The author has healed hopeless organic disease, and raised the dying to life and health through the understanding of God as the only Life. It is a sin to believe that aught can overpower omnipotent and eternal Life, and this Life must be brought to light by the understanding that there is no death, as well as by other graces of Spirit.

13. 249 : 6-10

आइए हम आत्मा की दिव्य ऊर्जा को महसूस करें, हमें जीवन के नएपन में लाएं और किसी भी नश्वर और भौतिक शक्ति को नष्ट करने में सक्षम न होने को पहचानें। आइए हम आनन्दित हों कि हम दैवीय शक्तियों के अधीन हैं। होने का सही विज्ञान ऐसा है।

13. 249 : 6-10

Let us feel the divine energy of Spirit, bringing us into newness of life and recognizing no mortal nor material power as able to destroy. Let us rejoice that we are subject to the divine "powers that be." Such is the true Science of being.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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