रविवार 18 अप्रैल, 2021



विषयप्रायश्चित का सिद्धांत

SubjectDoctrine of Atonement

वर्ण पाठ: भजन संहिता 34: 22

"यहोवा अपने दासों का प्राण मोल लेकर बचा लेता है; और जितने उसके शरणागत हैं उन में से कोई भी दोषी न ठहरेगा॥"



Golden Text: Psalm 34 : 22

The Lord redeemeth the soul of his servants: and none of them that trust in him shall be desolate.




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भजन संहिता 19 : 9-14


9     यहोवा का भय पवित्र है, वह अनन्तकाल तक स्थिर रहता है; यहोवा के नियम सत्य और पूरी रीति से धर्ममय हैं।

10     वे तो सोने से और बहुत कुन्दन से भी बढ़कर मनोहर हैं; वे मधु से और टपकने वाले छत्ते से भी बढ़कर मधुर हैं।

11     और उन्हीं से तेरा दास चिताया जाता है; उनके पालन करने से बड़ा ही प्रतिफल मिलता है।

12     अपनी भूलचूक को कौन समझ सकता है? मेरे गुप्त पापों से तू मुझे पवित्र कर।

13     तू अपने दास को ढिठाई के पापों से भी बचाए रख; वह मुझ पर प्रभुता करने न पाएं! तब मैं सिद्ध हो जाऊंगा, और बड़े अपराधों से बचा रहूंगा॥

14     मेरे मुंह के वचन और मेरे हृदय का ध्यान तेरे सम्मुख ग्रहण योग्य हों, हे यहोवा परमेश्वर, मेरी चट्टान और मेरे उद्धार करने वाले!

Responsive Reading: Psalm 19 : 9-14

9.     The fear of the Lord is clean, enduring for ever: the judgments of the Lord are true and righteous altogether.

10.     More to be desired are they than gold, yea, than much fine gold: sweeter also than honey and the honeycomb.

11.     Moreover by them is thy servant warned: and in keeping of them there is great reward.

12.     Who can understand his errors? cleanse thou me from secret faults.

13.     Keep back thy servant also from presumptuous sins; let them not have dominion over me: then shall I be upright, and I shall be innocent from the great transgression.

14.     Let the words of my mouth, and the meditation of my heart, be acceptable in thy sight, O Lord, my strength, and my redeemer.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 51 : 1-3, 9, 10, 15

1     हेपरमेश्वर, अपनी करूणा के अनुसार मुझ पर अनुग्रह कर; अपनी बड़ी दया के अनुसार मेरे अपराधों को मिटा दे।

2     मुझे भलीं भांति धोकर मेरा अधर्म दूर कर, और मेरा पाप छुड़ाकर मुझे शुद्ध कर!

3     मैं तो अपने अपराधों को जानता हूं, और मेरा पाप निरन्तर मेरी दृष्टि में रहता है।

9     अपना मुख मेरे पापों की ओर से फेर ले, और मेरे सारे अधर्म के कामों को मिटा डाल॥

10     हे परमेश्वर, मेरे अन्दर शुद्ध मन उत्पन्न कर, और मेरे भीतर स्थिर आत्मा नये सिरे से उत्पन्न कर।

15     हे प्रभु, मेरा मुंह खोल दे तब मैं तेरा गुणानुवाद कर सकूंगा।

1. Psalm 51 : 1-3, 9, 10, 15

1     Have mercy upon me, O God, according to thy lovingkindness: according unto the multitude of thy tender mercies blot out my transgressions.

2     Wash me throughly from mine iniquity, and cleanse me from my sin.

3     For I acknowledge my transgressions: and my sin is ever before me.

9     Hide thy face from my sins, and blot out all mine iniquities.

10     Create in me a clean heart, O God; and renew a right spirit within me.

15     O Lord, open thou my lips; and my mouth shall shew forth thy praise.

2. मत्ती 8 : 18

18     यीशु ने अपनी चारों ओर एक बड़ी भीड़ देखकर उस पार जाने की आज्ञा दी।

2. Matthew 8 : 18

18     Now when Jesus saw great multitudes about him, he gave commandment to depart unto the other side.

3. मत्ती 9 : 1-13

1     फिर वह नाव पर चढ़कर पार गया; और अपने नगर में आया।

2     और देखो, कई लोग एक झोले के मारे हुए को खाट पर रखकर उसके पास लाए; यीशु ने उन का विश्वास देखकर, उस झोले के मारे हुए से कहा; हे पुत्र, ढाढ़स बान्ध; तेरे पाप क्षमा हुए।

3     और देखो, कई शास्त्रियों ने सोचा, कि यह तो परमेश्वर की निन्दा करता है।

4     यीशु ने उन के मन की बातें मालूम करके कहा, कि तुम लोग अपने अपने मन में बुरा विचार क्यों कर रहे हो?

5     सहज क्या है, यह कहना, कि तेरे पाप क्षमा हुए; या यह कहना कि उठ और चल फिर।

6     परन्तु इसलिये कि तुम जान लो कि मनुष्य के पुत्र को पृथ्वी पर पाप क्षमा करने का अधिकार है (उस ने झोले के मारे हुए से कहा) उठ: अपनी खाट उठा, और अपने घर चला जा।

7     वह उठकर अपने घर चला गया।

8     लोग यह देखकर डर गए और परमेश्वर की महिमा करने लगे जिस ने मनुष्यों को ऐसा अधिकार दिया है॥

9     वहां से आगे बढ़कर यीशु ने मत्ती नाम एक मनुष्य को महसूल की चौकी पर बैठे देखा, और उस से कहा, मेरे पीछे हो ले। वह उठकर उसके पीछे हो लिया॥

10     और जब वह घर में भोजन करने के लिये बैठा तो बहुतेरे महसूल लेने वाले और पापी आकर यीशु और उसके चेलों के साथ खाने बैठे।

11     यह देखकर फरीसियों ने उसके चेलों से कहा; तुम्हारा गुरू महसूल लेने वालों और पापियों के साथ क्यों खाता है?

12     उस ने यह सुनकर उन से कहा, वैद्य भले चंगों को नहीं परन्तु बीमारों को अवश्य है।

13     सो तुम जाकर इस का अर्थ सीख लो, कि मैं बलिदान नहीं परन्तु दया चाहता हूं; क्योंकि मैं धमिर्यों को नहीं परन्तु पापियों को बुलाने आया हूं॥

3. Matthew 9 : 1-13

1     And he entered into a ship, and passed over, and came into his own city.

2     And, behold, they brought to him a man sick of the palsy, lying on a bed: and Jesus seeing their faith said unto the sick of the palsy; Son, be of good cheer; thy sins be forgiven thee.

3     And, behold, certain of the scribes said within themselves, This man blasphemeth.

4     And Jesus knowing their thoughts said, Wherefore think ye evil in your hearts?

5     For whether is easier, to say, Thy sins be forgiven thee; or to say, Arise, and walk?

6     But that ye may know that the Son of man hath power on earth to forgive sins, (then saith he to the sick of the palsy,) Arise, take up thy bed, and go unto thine house.

7     And he arose, and departed to his house.

8     But when the multitudes saw it, they marvelled, and glorified God, which had given such power unto men.

9     And as Jesus passed forth from thence, he saw a man, named Matthew, sitting at the receipt of custom: and he saith unto him, Follow me. And he arose, and followed him.

10     And it came to pass, as Jesus sat at meat in the house, behold, many publicans and sinners came and sat down with him and his disciples.

11     And when the Pharisees saw it, they said unto his disciples, Why eateth your Master with publicans and sinners?

12     But when Jesus heard that, he said unto them, They that be whole need not a physician, but they that are sick.

13     But go ye and learn what that meaneth, I will have mercy, and not sacrifice: for I am not come to call the righteous, but sinners to repentance.

4. मत्ती 26 : 17-20, 26, 27

17     अखमीरी रोटी के पर्व्व के पहिले दिन, चेले यीशु के पास आकर पूछने लगे; तू कहां चाहता है कि हम तेरे लिये फसह खाने की तैयारी करें?

18     उस ने कहा, नगर में फुलाने के पास जाकर उस से कहो, कि गुरू कहता है, कि मेरा समय निकट है, मैं अपने चेलों के साथ तेरे यहां पर्व्व मनाऊंगा।

19     सो चेलों ने यीशु की आज्ञा मानी, और फसह तैयार किया।

20     जब सांझ हुई, तो वह बारहों के साथ भोजन करने के लिये बैठा।

26     उस ने उस से कहा, तू कह चुका: जब वे खा रहे थे, तो यीशु ने रोटी ली, और आशीष मांग कर तोड़ी, और चेलों को देकर कहा, लो, खाओ; यह मेरी देह है।

27     फिर उस ने कटोरा लेकर, धन्यवाद किया, और उन्हें देकर कहा, तुम सब इस में से पीओ।

4. Matthew 26 : 17-20, 26, 27

17     Now the first day of the feast of unleavened bread the disciples came to Jesus, saying unto him, Where wilt thou that we prepare for thee to eat the passover?

18     And he said, Go into the city to such a man, and say unto him, The Master saith, My time is at hand; I will keep the passover at thy house with my disciples.

19     And the disciples did as Jesus had appointed them; and they made ready the passover.

20     Now when the even was come, he sat down with the twelve.

26     And as they were eating, Jesus took bread, and blessed it, and brake it, and gave it to the disciples, and said, Take, eat; this is my body.

27     And he took the cup, and gave thanks, and gave it to them, saying, Drink ye all of it;

5. यूहन्ना 17 : 1, 2, 4-9, 20-22, 26

1     यीशु ने ये बातें कहीं और अपनी आंखे आकाश की ओर उठाकर कहा, हे पिता, वह घड़ी आ पहुंची, अपने पुत्र की महिमा कर, कि पुत्र भी तेरी महिमा करे।

2     क्योंकि तू ने उस को सब प्राणियों पर अधिकार दिया, कि जिन्हें तू ने उस को दिया है, उन सब को वह अनन्त जीवन दे।

4     जो काम तू ने मुझे करने को दिया था, उसे पूरा करके मैं ने पृथ्वी पर तेरी महिमा की है।

5     और अब, हे पिता, तू अपने साथ मेरी महिमा उस महिमा से कर जो जगत के होने से पहिले, मेरी तेरे साथ थी।

6     मैं ने तेरा नाम उन मनुष्यों पर प्रगट किया जिन्हें तू ने जगत में से मुझे दिया: वे तेरे थे और तू ने उन्हें मुझे दिया और उन्होंने तेरे वचन को मान लिया है।

7     अब वे जान गए हैं, कि जो कुछ तू ने मुझे दिया है, सब तेरी ओर से है।

8     क्योंकि जो बातें तू ने मुझे पहुंचा दीं, मैं ने उन्हें उन को पहुंचा दिया और उन्होंने उन को ग्रहण किया: और सच सच जान लिया है, कि मैं तेरी ओर से निकला हूं, और प्रतीति कर ली है कि तू ही ने मुझे भेजा।

9     मैं उन के लिये बिनती करता हूं, संसार के लिये बिनती नहीं करता हूं परन्तु उन्हीं के लिये जिन्हें तू ने मुझे दिया है, क्योंकि वे तेरे हैं।

20     मैं केवल इन्हीं के लिये बिनती नहीं करता, परन्तु उन के लिये भी जो इन के वचन के द्वारा मुझ पर विश्वास करेंगे, कि वे सब एक हों।

21     जैसा तू हे पिता मुझ में हैं, और मैं तुझ में हूं, वैसे ही वे भी हम में हों, इसलिये कि जगत प्रतीति करे, कि तू ही ने मुझे भेजा।

22     और वह महिमा जो तू ने मुझे दी, मैं ने उन्हें दी है कि वे वैसे ही एक हों जैसे की हम एक हैं।

26     और मैं ने तेरा नाम उन को बताया और बताता रहूंगा कि जो प्रेम तुझ को मुझ से था, वह उन में रहे और मैं उन में रहूं॥

5. John 17 : 1, 2, 4-9, 20-22, 26

1     These words spake Jesus, and lifted up his eyes to heaven, and said, Father, the hour is come; glorify thy Son, that thy Son also may glorify thee:

2     As thou hast given him power over all flesh, that he should give eternal life to as many as thou hast given him.

4     I have glorified thee on the earth: I have finished the work which thou gavest me to do.

5     And now, O Father, glorify thou me with thine own self with the glory which I had with thee before the world was.

6     I have manifested thy name unto the men which thou gavest me out of the world: thine they were, and thou gavest them me; and they have kept thy word.

7     Now they have known that all things whatsoever thou hast given me are of thee.

8     For I have given unto them the words which thou gavest me; and they have received them, and have known surely that I came out from thee, and they have believed that thou didst send me.

9     I pray for them: I pray not for the world, but for them which thou hast given me; for they are thine.

20     Neither pray I for these alone, but for them also which shall believe on me through their word;

21     That they all may be one; as thou, Father, art in me, and I in thee, that they also may be one in us: that the world may believe that thou hast sent me.

22     And the glory which thou gavest me I have given them; that they may be one, even as we are one:

26     And I have declared unto them thy name, and will declare it: that the love wherewith thou hast loved me may be in them, and I in them.

6. 1 यूहन्ना 1 : 3, 5-9

3     जो कुछ हम ने देखा और सुना है उसका समाचार तुम्हें भी देते हैं, इसलिये कि तुम भी हमारे साथ सहभागी हो; और हमारी यह सहभागिता पिता के साथ, और उसके पुत्र यीशु मसीह के साथ है।

5     जो समाचार हम ने उस से सुना, और तुम्हें सुनाते हैं, वह यह है; कि परमेश्वर ज्योति है: और उस में कुछ भी अन्धकार नहीं।

6     यदि हम कहें, कि उसके साथ हमारी सहभागिता है, और फिर अन्धकार में चलें, तो हम झूठे हैं: और सत्य पर नहीं चलते।

7     पर यदि जैसा वह ज्योति में है, वैसे ही हम भी ज्योति में चलें, तो एक दूसरे से सहभागिता रखते हैं; और उसके पुत्र यीशु का लोहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है।

8     यदि हम कहें, कि हम में कुछ भी पाप नहीं, तो अपने आप को धोखा देते हैं: और हम में सत्य नहीं।

9     यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने, और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है।

6. I John 1 : 3, 5-9

3     That which we have seen and heard declare we unto you, that ye also may have fellowship with us: and truly our fellowship is with the Father, and with his Son Jesus Christ.

5     This then is the message which we have heard of him, and declare unto you, that God is light, and in him is no darkness at all.

6     If we say that we have fellowship with him, and walk in darkness, we lie, and do not the truth:

7     But if we walk in the light, as he is in the light, we have fellowship one with another, and the blood of Jesus Christ his Son cleanseth us from all sin.

8     If we say that we have no sin, we deceive ourselves, and the truth is not in us.

9     If we confess our sins, he is faithful and just to forgive us our sins, and to cleanse us from all unrighteousness.

7. रोमियो 5 : 8 (परमेश्वर), 10, 11

8     परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा।

10     क्योंकि बैरी होने की दशा में तो उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएंगे?

11     और केवल यही नहीं, परन्तु हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा जिस के द्वारा हमारा मेल हुआ है, परमेश्वर के विषय में घमण्ड भी करते हैं॥

7. Romans 5 : 8 (God), 10, 11

8     God commendeth his love toward us, in that, while we were yet sinners, Christ died for us.

10     For if, when we were enemies, we were reconciled to God by the death of his Son, much more, being reconciled, we shall be saved by his life.

11     And not only so, but we also joy in God through our Lord Jesus Christ, by whom we have now received the atonement.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 18 : 1-12

प्रायश्चित परमेश्वर के साथ मनुष्य की एकता का उदाहरण है, जिससे मनुष्य ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम को दर्शाता है। नासरत के यीशु ने पिता के साथ मनुष्य की एकता को सिखाया और प्रदर्शित किया, और इसके लिए हम उसे अंतहीन श्रद्धांजलि देते हैं। उनका मिशन व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों था। उन्होंने जीवन का काम न केवल स्वयं के प्रति न्याय में, बल्कि मनुष्यों पर दया करने में भी किया। यीशु ने निर्भीकता से, इंद्रियों के मान्यता प्राप्त सबूतों के खिलाफ, फरिसासिक पंथों और प्रथाओं के खिलाफ काम किया, और उन्होंने अपनी उपचार शक्ति के साथ सभी विरोधियों का खंडन किया।

1. 18 : 1-12

Atonement is the exemplification of man's unity with God, whereby man reflects divine Truth, Life, and Love. Jesus of Nazareth taught and demonstrated man's oneness with the Father, and for this we owe him endless homage. His mission was both individual and collective. He did life's work aright not only in justice to himself, but in mercy to mortals, — to show them how to do theirs, but not to do it for them nor to relieve them of a single responsibility. Jesus acted boldly, against the accredited evidence of the senses, against Pharisaical creeds and practices, and he refuted all opponents with his healing power.

2. 19 : 6-11, 17-28

यीशु ने मनुष्य को ईश्वर की शिक्षा, यीशु की शिक्षाओं के दिव्य सिद्धांत, और प्रेम के इस तुच्छ अर्थ को मनुष्य की आत्मा, के नियम, और मृत्यु के नियम से मनुष्य की मृत्यु के रूप में समझने की कोशिश की। ईश्वरीय प्रेम का नियम।

पश्चाताप और पीड़ा के हर दर्द, सुधार के लिए हर प्रयास, हर अच्छा विचार और काम, हमें पाप के लिए यीशु के प्रायश्चित को समझने और उसकी प्रभावकारिता की सहायता करने में मदद करेगा; लेकिन अगर पापी प्रार्थना और पश्चाताप करना, पाप करना और क्षमा करना जारी रखता है, तो उसके पास प्रायश्चित में बहुत कम हिस्सा है, — परमेश्वर के साथ एकता में, - क्योंकि उसके पास व्यावहारिक पश्चाताप का अभाव है, जो हृदय को सुधारता है और मनुष्य को ज्ञान की इच्छा करने में सक्षम बनाता है। जो लोग प्रदर्शन नहीं कर सकते, कम से कम भाग में, हमारे गुरु की शिक्षाओं और अभ्यास के दिव्य सिद्धांत का भगवान में कोई हिस्सा नहीं है। यदि उसके प्रति अवज्ञा में रहते हैं, तो हमें कोई सुरक्षा महसूस नहीं करनी चाहिए, हालांकि भगवान अच्छा है।

2. 19 : 6-11, 17-28

Jesus aided in reconciling man to God by giving man a truer sense of Love, the divine Principle of Jesus' teachings, and this truer sense of Love redeems man from the law of matter, sin, and death by the law of Spirit, — the law of divine Love.

Every pang of repentance and suffering, every effort for reform, every good thought and deed, will help us to understand Jesus' atonement for sin and aid its efficacy; but if the sinner continues to pray and repent, sin and be sorry, he has little part in the atonement, — in the at-one-ment with God, — for he lacks the practical repentance, which reforms the heart and enables man to do the will of wisdom. Those who cannot demonstrate, at least in part, the divine Principle of the teachings and practice of our Master have no part in God. If living in disobedience to Him, we ought to feel no security, although God is good.

3. 22 : 11-14, 23-27, 30-31

"अपने स्वयं के उद्धार का काम करें," यह जीवन और प्रेम की मांग है, इस अंत के लिए भगवान आपके साथ काम करते हैं। "जब तक मैं न आऊं तब तक दृढ़ रहना!" अपने इनाम की प्रतीक्षा करें, और "अच्छा करने में थके नहीं।"

त्रुटि से अंतिम उद्धार, जिससे हम अमरता, असीम स्वतंत्रता और पापहीन भावना में आनंदित होते हैं, फूलों के रास्तों से नहीं पहुँचा जा सकता है और न ही किसी के विश्वास के बिना किसी दूसरे के काम के प्रयासों पर विश्वास करके।

न्याय के लिए पापी के सुधार की आवश्यकता है दया ऋण को तभी रद्द करती है जब न्याय स्वीकृत होता है।

3. 22 : 11-14, 23-27, 30-31

"Work out your own salvation," is the demand of Life and Love, for to this end God worketh with you. "Occupy till I come!" Wait for your reward, and "be not weary in well doing."

Final deliverance from error, whereby we rejoice in immortality, boundless freedom, and sinless sense, is not reached through paths of flowers nor by pinning one's faith without works to another's vicarious effort.

Justice requires reformation of the sinner. Mercy cancels the debt only when justice approves.

4. 23 : 1-11

हमें पाप से बचाने के लिए बुद्धि और प्रेम के लिए स्वयं के कई बलिदानों की आवश्यकता हो सकती है। एक बलिदान, हालांकि, महान, पाप के ऋण का भुगतान करने के लिए अपर्याप्त है। प्रायश्चित के लिए पापी की ओर से निरंतर आत्म-विसर्जन की आवश्यकता होती है। भगवान के क्रोध को उनके प्यारे पुत्र पर व्रत किया जाना चाहिए, जो दिव्य अप्राकृतिक है। ऐसा सिद्धांत मानव निर्मित है। प्रायश्चित धर्मशास्त्र में एक कठिन समस्या है, लेकिन इसकी वैज्ञानिक व्याख्या है, कि दुख पाप भावना की त्रुटि है जिसे सत्य नष्ट कर देता है, और अंततः पाप और पीड़ा दोनों ही अनन्त प्रेम के चरणों में गिर जाएंगे।

4. 23 : 1-11

Wisdom and Love may require many sacrifices of self to save us from sin. One sacrifice, however great, is insufficient to pay the debt of sin. The atonement requires constant self-immolation on the sinner's part. That God's wrath should be vented upon His beloved Son, is divinely unnatural. Such a theory is man-made. The atonement is a hard problem in theology, but its scientific explanation is, that suffering is an error of sinful sense which Truth destroys, and that eventually both sin and suffering will fall at the feet of everlasting Love.

5. 48 : 10-16

गथेसेमेन की घास पर पवित्र पीड़ा में गिरे तड़प के पसीने को याद करते हुए, क्या विष्णुत या ताकतवर शिष्य बड़बड़ाहट करेगा जब वह एक ही कप से पीता है, और अपने विध्वंसक पर पाप का बदला लेने के दुष्परिणाम से बचने के लिए सोचता है, या इच्छा करता है? सत्य और प्रेम कुछ हथेलियों को एक जीवन-कार्य के उपभोग तक सर्वश्रेष्ठ बनाते हैं।

5. 48 : 10-16

Remembering the sweat of agony which fell in holy benediction on the grass of Gethsemane, shall the humblest or mightiest disciple murmur when he drinks from the same cup, and think, or even wish, to escape the exalting ordeal of sin's revenge on its destroyer? Truth and Love bestow few palms until the consummation of a life-work.

6. 29 : 1-6

ईसाईयों को देश और विदेश में त्रुटि के खिलाफ हथियार उठाने चाहिए उन्हें स्वयं में और दूसरों में पाप से जूझना चाहिए, और इस युद्ध को तब तक जारी रखें जब तक वे अपना कोर्स पूरा नहीं कर लेते। यदि वे विश्वास बनाए रखेंगे, तो उनके पास आनन्द का ताज होगा।

6. 29 : 1-6

Christians must take up arms against error at home and abroad. They must grapple with sin in themselves and in others, and continue this warfare until they have finished their course. If they keep the faith, they will have the crown of rejoicing.

7. 45 : 6-21

हमारे मास्टर ने पूरी तरह से मृत्यु और कब्र पर अपनी जीत में दिव्य विज्ञान का प्रदर्शन किया। यीशु का कर्म पुरुषों के ज्ञान और पाप, बीमारी और मृत्यु से पूरी दुनिया के उद्धार के लिए था। पॉल लिखते हैं: "क्योंकि बैरी होने की दशा में तो उसके पुत्र की मृत्यु [प्रतीयमान] के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएंगे" अपने शारीरिक दफन के तीन दिन बाद उन्होंने अपने शिष्यों के साथ बात की। अत्याचारी लोग अमर सत्य और प्रेम को एक कब्र में छिपाने में असफल रहे।

भगवान की जय हो, और संघर्षशील दिलों को शांति मिले! मसीह ने मानव आशा और विश्वास के द्वार से पत्थर को लुढ़का दिया, और ईश्वर में जीवन के रहस्योद्घाटन और प्रदर्शन के माध्यम से, उन्हें मनुष्य के आध्यात्मिक विचार और उनके दिव्य सिद्धांत, प्रेम के साथ संभवतया एक-मानसिक रूप से उन्नत किया।

7. 45 : 6-21

Our Master fully and finally demonstrated divine Science in his victory over death and the grave. Jesus' deed was for the enlightenment of men and for the salvation of the whole world from sin, sickness, and death. Paul writes: "For if, when we were enemies, we were reconciled to God by the [seeming] death of His Son, much more, being reconciled, we shall be saved by his life." Three days after his bodily burial he talked with his disciples. The persecutors had failed to hide immortal Truth and Love in a sepulchre.

Glory be to God, and peace to the struggling hearts! Christ hath rolled away the stone from the door of human hope and faith, and through the revelation and demonstration of life in God, hath elevated them to possible at-one-ment with the spiritual idea of man and his divine Principle, Love.

8. 228 : 25-32

ईश्वर से अलग कोई शक्ति नहीं है। सर्वव्यापी के पास सर्व-शक्ति है, और किसी अन्य शक्ति को स्वीकार करने के लिए भगवान को बेइज्जत करना है विनम्र नाज़रीन ने इस पाप को दूर कर दिया कि पाप, बीमारी और मृत्यु में शक्ति है। उन्होंने उन्हें शक्तिहीन साबित कर दिया। याजकों के गौरव को नम्र करना चाहिए, जब उन्होंने ईसाई धर्म के प्रदर्शन को उनके मृत विश्वास और समारोहों के प्रभाव में देखा।

8. 228 : 25-32

There is no power apart from God. Omnipotence has all-power, and to acknowledge any other power is to dishonor God. The humble Nazarene overthrew the supposition that sin, sickness, and death have power. He proved them powerless. It should have humbled the pride of the priests, when they saw the demonstration of Christianity excel the influence of their dead faith and ceremonies.

9. 8 : 20-30

अभिव्यक्ति की जो भी उत्कंठा है, उसके साथ विनम्रता के लिए प्रार्थना करने का मतलब हमेशा इसके लिए इच्छा नहीं है। यदि हम गरीबों से दूर हो जाते हैं, तो हम गरीबों को आशीर्वाद देने वाले से पुरस्कार प्राप्त करने के लिए तैयार नहीं हैं। हम बहुत दुष्ट दिल रखने के लिए कबूल करते हैं और पूछते हैं कि यह हमारे सामने नंगे रखा जा सकता है, लेकिन क्या हम इस दिल के बारे में पहले से ही नहीं जानते हैं कि हम अपने पड़ोसी को देखने के लिए तैयार हैं?

हमें खुद की जांच करनी चाहिए और सीखना चाहिए कि दिल का स्नेह और उद्देश्य क्या है, इस तरह से हम केवल वही सीख सकते हैं जो हम ईमानदारी से करते हैं।

9. 8 : 20-30

Praying for humility with whatever fervency of expression does not always mean a desire for it. If we turn away from the poor, we are not ready to receive the reward of Him who blesses the poor. We confess to having a very wicked heart and ask that it may be laid bare before us, but do we not already know more of this heart than we are willing to have our neighbor see?

We should examine ourselves and learn what is the affection and purpose of the heart, for in this way only can we learn what we honestly are.

10. 21 : 1-14

यदि सत्य आपके दैनिक चलने और वार्तालाप में त्रुटि पर काबू पा रहा है, तो आप अंततः कह सकते हैं, "मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूं …. मैं ने विश्वास की रखवाली की है।" क्योंकि आप एक बेहतर इंसान हैं। यह सत्य और प्रेम के साथ एक-में-भाग में हमारा हिस्सा है। ईसाई, श्रम और प्रार्थना करना जारी नहीं रखते हैं, क्योंकि दूसरे की भलाई, पीड़ा और जीत की उम्मीद है, कि वे उसके सद्भाव और इनाम तक पहुंचेंगे।

यदि शिष्य आध्यात्मिक रूप से आगे बढ़ रहा है, तो वह अंदर प्रवेश करने का प्रयास कर रहा है। वह भौतिक दृष्टि से लगातार दूर होता जाता है, और आत्मा की अपूर्ण चीजों की ओर देखता है यदि वह ईमानदार है, तो वह शुरू से ही सबसे अधिक लाभ में रहेगा, और जब तक वह खुशी के साथ अपना कोर्स पूरा नहीं कर लेता, तब तक वह हर दिन सही दिशा में थोड़ा-थोड़ा हासिल करेगा।

10. 21 : 1-14

If Truth is overcoming error in your daily walk and conversation, you can finally say, "I have fought a good fight ... I have kept the faith," because you are a better man. This is having our part in the at-one-ment with Truth and Love. Christians do not continue to labor and pray, expecting because of another's goodness, suffering, and triumph, that they shall reach his harmony and reward.

If the disciple is advancing spiritually, he is striving to enter in. He constantly turns away from material sense, and looks towards the imperishable things of Spirit. If honest, he will be in earnest from the start, and gain a little each day in the right direction, till at last he finishes his course with joy.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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