रविवार 18 अगस्त, 2019 |

रविवार 18 अगस्त, 2019



विषयआत्मा

SubjectSoul

वर्ण पाठ: भजन संहिता 34 : 22

यहोवा अपने दासों का प्राण मोल लेकर बचा लेता है; और जितने उसके शरणागत हैं उन में से कोई भी दोषी न ठहरेगा॥



Golden Text: Psalm 34 : 22

The Lord redeemeth the soul of his servants: and none of them that trust in him shall be desolate.




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भजन संहिता 33 : 18-21 • भजन संहिता 34 : 1, 2, 4


18     देखो, यहोवा की दृष्टि उसके डरवैयों पर और उन पर जो उसकी करूणा की आशा रखते हैं बनी रहती है,

19     कि वह उनके प्राण को मृत्यु से बचाए, और अकाल के समय उन को जीवित रखे॥

20     हम यहोवा का आसरा देखते आए हैं; वह हमारा सहायक और हमारी ढाल ठहरा है। 

21     हमारा हृदय उसके कारण आनन्दित होगा, क्योंकि हम ने उसके पवित्र नाम का भरोसा रखा है।

1     मैं हर समय यहोवा को धन्य कहा करूंगा; उसकी स्तुति निरन्तर मेरे मुख से होती रहेगी। 

2     मैं यहोवा पर घमण्ड करूंगा; नम्र लोग यह सुनकर आनन्दित होंगे। 

4     मैं यहोवा के पास गया, तब उसने मेरी सुन ली, और मुझे पूरी रीति से निर्भय किया।

Responsive Reading: Psalm 33 : 18-21; Psalm 34 : 1, 2, 4

18.     Behold, the eye of the Lord is upon them that fear him, upon them that hope in his mercy;

19.     To deliver their soul from death, and to keep them alive in famine.

20.     Our soul waiteth for the Lord: he is our help and our shield.

21.     For our heart shall rejoice in him, because we have trusted in his holy name.

1.     I will bless the Lord at all times: his praise shall continually be in my mouth.

2.     My soul shall make her boast in the Lord: the humble shall hear thereof, and be glad.

4.     I sought the Lord, and he heard me, and delivered me from all my fears.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 25 : 1, 2 (से :), 4-6, 10, 12, 13, 20, 21

1     हे यहोवा मैं अपने मन को तेरी ओर उठाता हूं।

2     हे मेरे परमेश्वर, मैं ने तुझी पर भरोसा रखा है, मुझे लज्जित होने न दे; मेरे शत्रु मुझ पर जयजयकार करने न पाएं।

4     हे यहोवा अपने मार्ग मुझ को दिखला; अपना पथ मुझे बता दे।

5     मुझे अपने सत्य पर चला और शिक्षा दे, क्योंकि तू मेरा उद्धार करने वाला परमेश्वर है; मैं दिन भर तेरी ही बाट जोहता रहता हूं।

6     हे यहोवा अपनी दया और करूणा के कामों को स्मरण कर; क्योंकि वे तो अनन्तकाल से होते आए हैं।

10     जो यहोवा की वाचा और चितौनियों को मानते हैं, उनके लिये उसके सब मार्ग करूणा और सच्चाई हैं॥

12     वह कौन है जो यहोवा का भय मानता है? यहोवा उसको उसी मार्ग पर जिस से वह प्रसन्न होता है चलाएगा।

13     वह कुशल से टिका रहेगा, और उसका वंश पृथ्वी पर अधिकारी होगा।

20     मेरे प्राण की रक्षा कर, और मुझे छुड़ा; मुझे लज्जित न होने दे, क्योंकि मैं तेरा शरणागत हूं।

21     खराई और सीधाई मुझे सुरक्षित रखें, क्योंकि मुझे तेरे ही आशा है॥

1. Psalm 25 : 1, 2 (to :), 4-6, 10, 12, 13, 20, 21

1     Unto thee, O Lord, do I lift up my soul.

2     O my God, I trust in thee:

4     Shew me thy ways, O Lord; teach me thy paths.

5     Lead me in thy truth, and teach me:

6     Remember, O Lord, thy tender mercies and thy lovingkindnesses; for they have been ever of old.

10     All the paths of the Lord are mercy and truth unto such as keep his covenant and his testimonies.

12     What man is he that feareth the Lord? him shall he teach in the way that he shall choose.

13     His soul shall dwell at ease; and his seed shall inherit the earth.

20     O keep my soul, and deliver me: let me not be ashamed; for I put my trust in thee.

21     Let integrity and uprightness preserve me; for I wait on thee.

2. भजन संहिता 42 : 8 (भगवान), 11

8     ... दिन को यहोवा अपनी शक्ति और करूणा प्रगट करेगा; और रात को भी मैं उसका गीत गाऊंगा, और अपने जीवन दाता ईश्वर से प्रार्थना करूंगा॥

11     हे मेरे प्राण तू क्यों गिरा जाता है? तू अन्दर ही अन्दर क्यों व्याकुल है? परमेश्वर पर भरोसा रख; क्योंकि वह मेरे मुख की चमक और मेरा परमेश्वर है, मैं फिर उसका धन्यवाद करूंगा॥

2. Psalm 42 : 8 (the Lord), 11

8     the Lord will command his lovingkindness in the daytime, and in the night his song shall be with me, and my prayer unto the God of my life.

11     Why art thou cast down, O my soul? and why art thou disquieted within me? hope thou in God: for I shall yet praise him, who is the health of my countenance, and my God.

3. रूत 1 : 1 (एक निश्चित), 2 (से 3rd ,), 3, 4 (से :), 5, 6 (से :), 8 (से 3rd ,), 16, 22

1     जिन दिनों में न्यायी लोग न्याय करते थे उन दिनों में देश में अकाल पड़ा, तब यहूदा के बेतलेहेम का एक पुरूष अपनी स्त्री और दोनों पुत्रों को संग ले कर मोआब के देश में परदेशी हो कर रहने के लिये चला।

2     उस पुरूष का नाम एलीमेलेक, और उसकी पत्नि का नाम नाओमी, और उसके दो बेटों के नाम महलोन और किल्योन थे; ये एप्राती अर्थात यहूदा के बेतलेहेम के रहने वाले थे। और मोआब के देश में आकर वहां रहे।

3     और नाओमी का पति एलीमेलेक मर गया, और नाओमी और उसके दोनों पुत्र रह गए।

4     और इन्होंने एक एक मोआबिन ब्याह ली; एक स्त्री का नाम ओर्पा और दूसरी का नाम रूत था। फिर वे वहां कोई दस वर्ष रहे।

5     जब महलोन और किल्योन दोनों मर गए, तब नाआमी अपने दोनों पुत्रों और पति से रहित हो गई।

6     तब वह मोआब के देश में यह सुनकर, कि यहोवा ने अपनी प्रजा के लोगों की सुधि लेके उन्हें भोजनवस्तु दी है, उस देश से अपनी दोनों बहुओं समेत लौट जाने को चली।

8     तब नाओमी ने अपनी दोनों बहुओं से कहा, तुम अपने अपने मैके लौट जाओ। और जैसे तुम ने उन से जो मर गए हैं और मुझ से भी प्रीति की है, वैसे ही यहोवा तुम्हारे ऊपर कृपा करे।

16     रूत बोली, तू मुझ से यह बिनती न कर, कि मुझे त्याग वा छोड़कर लौट जा; क्योंकि जिधर तू जाए उधर मैं भी जाऊंगी; जहां तू टिके वहां मैं भी टिकूंगी; तेरे लोग मेरे लोग होंगे, और तेरा परमेश्वर मेरा परमेश्वर होगा;

22     इस प्रकार नाओमी अपनी मोआबिन बहू रूत के साथ लौटी, जो मोआब के देश से आई थी। और वे जौ कटने के आरम्भ के समय बेतलेहेम में पहुंची॥

3. Ruth 1 : 1 (a certain), 2 (to 3rd ,), 3, 4 (to :), 5, 6 (to :), 8 (to 3rd ,), 16, 22

1     …a certain man of Beth-lehem-judah went to sojourn in the country of Moab, he, and his wife, and his two sons.

2     And the name of the man was Elimelech, and the name of his wife Naomi, and the name of his two sons Mahlon and Chilion,

3     And Elimelech Naomi’s husband died; and she was left, and her two sons.

4     And they took them wives of the women of Moab; the name of the one was Orpah, and the name of the other Ruth:

5     And Mahlon and Chilion died also both of them; and the woman was left of her two sons and her husband.

6     Then she arose with her daughters in law, that she might return from the country of Moab:

8     And Naomi said unto her two daughters in law, Go, return each to her mother’s house: the Lord deal kindly with you,

16     And Ruth said, Intreat me not to leave thee, or to return from following after thee: for whither thou goest, I will go; and where thou lodgest, I will lodge: thy people shall be my people, and thy God my God:

22     So Naomi returned, and Ruth the Moabitess, her daughter in law, with her, which returned out of the country of Moab: and they came to Beth-lehem in the beginning of barley harvest.

4. रूत 2 : 1, 2 (से 1st .), 8 (से 1st ,), 11 (यह), 12

1     नाओमी के पति एलीमेलेक के कुल में उसका एक बड़ा धनी कुटुम्बी था, जिसका नाम बोअज था।

2     और मोआबिन रूत ने नाओमी से कहा, मुझे किसी खेत में जाने दे, कि जो मुझ पर अनुग्रह की दृष्टि करे, उसके पीछे पीछे मैं सिला बीनती जाऊं। उसने कहा, चली जा, बेटी।

8     तब बोअज ने रूत से कहा,

11     जो कुछ तू ने पति मरने के पीछे अपनी सास से किया है, और तू किस रीति अपने माता पिता और जन्मभूमि को छोड़कर ऐसे लोगों में आई है जिन को पहिले तू ने जानती थी, यह सब मुझे विस्तार के साथ बताया गया है।

12     यहोवा तेरी करनी का फल दे, और इस्राएल का परमेश्वर यहोवा जिसके पंखों के तले तू शरण लेने आई है तुझे पूरा बदला दे

4. Ruth 2 : 1, 2 (to 1st .), 8 (to 1st ,), 11 (It), 12

1     And Naomi had a kinsman of her husband’s, a mighty man of wealth, of the family of Elimelech; and his name was Boaz.

2     And Ruth the Moabitess said unto Naomi, Let me now go to the field, and glean ears of corn after him in whose sight I shall find grace.

8     Then said Boaz unto Ruth,

11     It hath fully been shewed me, all that thou hast done unto thy mother in law since the death of thine husband: and how thou hast left thy father and thy mother, and the land of thy nativity, and art come unto a people which thou knewest not heretofore.

12     The Lord recompense thy work, and a full reward be given thee of the Lord God of Israel, under whose wings thou art come to trust.

5. रूत 4 : 13, 14, 17

13     तब बोअज ने रूत को ब्याह लिया, और वह उसकी पत्नी हो गई; और जब वह उसके पास गया तब यहोवा की दया से उसको गर्भ रहा, और उसके एक बेटा उत्पन्न हुआ।

14     तब स्त्रियों ने नाओमी से कहा, यहोवा धन्य है, जिसने तुझे आज छुड़ाने वाले कुटुम्बी के बिना नहीं छोड़ा; इस्राएल में इसका बड़ा नाम हो।

17     और उसकी पड़ोसिनों ने यह कहकर, कि नाओमी के एक बेटा उत्पन्न हुआ है, लड़के का नाम ओबेद रखा। यिशै का पिता और दाऊद का दादा वही हुआ॥

5. Ruth 4 : 13, 14, 17

13     So Boaz took Ruth, and she was his wife: and when he went in unto her, the Lord gave her conception, and she bare a son.

14     And the women said unto Naomi, Blessed be the Lord, which hath not left thee this day without a kinsman, that his name may be famous in Israel.

17     And the women her neighbours gave it a name, saying, There is a son born to Naomi; and they called his name Obed: he is the father of Jesse, the father of David.

6. रोमियो 8 : 28, 31, 35, 37-39

28     और हम जानते हैं, कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उन के लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती है; अर्थात उन्हीं के लिये जो उस की इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं।

31     सो हम इन बातों के विषय में क्या कहें? यदि परमेश्वर हमारी ओर है, तो हमारा विरोधी कौन हो सकता है?

35     कौन हम को मसीह के प्रेम से अलग करेगा? क्या क्लेश, या संकट, या उपद्रव, या अकाल, या नंगाई, या जोखिम, या तलवार?

37     परन्तु इन सब बातों में हम उसके द्वारा जिस ने हम से प्रेम किया है, जयवन्त से भी बढ़कर हैं।

38     क्योंकि मैं निश्चय जानता हूं, कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएं, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ, न ऊंचाई,

39     न गहिराई और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी॥

6. Romans 8 : 28, 31, 35, 37-39

28     And we know that all things work together for good to them that love God, to them who are the called according to his purpose.

31     What shall we then say to these things? If God be for us, who can be against us?

35     Who shall separate us from the love of Christ? shall tribulation, or distress, or persecution, or famine, or nakedness, or peril, or sword?

37     Nay, in all these things we are more than conquerors through him that loved us.

38     For I am persuaded, that neither death, nor life, nor angels, nor principalities, nor powers, nor things present, nor things to come,

39     Nor height, nor depth, nor any other creature, shall be able to separate us from the love of God, which is in Christ Jesus our Lord.

7. प्रकाशित वाक्य 1 : 1, 2

1     यीशु मसीह का प्रकाशितवाक्य जो उसे परमेश्वर ने इसलिये दिया, कि अपने दासों को वे बातें, जिन का शीघ्र होना अवश्य है, दिखाए: और उस ने अपने स्वर्गदूत को भेज कर उसके द्वारा अपने दास यूहन्ना को बताया।

2     जिस ने परमेश्वर के वचन और यीशु मसीह की गवाही, अर्थात जो कुछ उस ने देखा था उस की गवाही दी।

1. प्रकाशित वाक्य 21 : 1-4

1     फिर मैं ने नये आकाश और नयी पृथ्वी को देखा, क्योंकि पहिला आकाश और पहिली पृथ्वी जाती रही थी, और समुद्र भी न रहा।

2     फिर मैं ने पवित्र नगर नये यरूशलेम को स्वर्ग पर से परमेश्वर के पास से उतरते देखा, और वह उस दुल्हिन के समान थी, जो अपने पति के लिये सिंगार किए हो।

3     फिर मैं ने सिंहासन में से किसी को ऊंचे शब्द से यह कहते सुना, कि देख, परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है; वह उन के साथ डेरा करेगा, और वे उसके लोग होंगे, और परमेश्वर आप उन के साथ रहेगा; और उन का परमेश्वर होगा।

4     और वह उन की आंखोंसे सब आंसू पोंछ डालेगा; और इस के बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहिली बातें जाती रहीं।

7. Revelation 1 : 1, 2

1     The Revelation of Jesus Christ, which God gave unto him, to shew unto his servants things which must shortly come to pass; and he sent and signified it by his angel unto his servant John:

2     Who bare record of the word of God, and of the testimony of Jesus Christ, and of all things that he saw.

8. Revelation 21 : 1-4

1     And I saw a new heaven and a new earth: for the first heaven and the first earth were passed away; and there was no more sea.

2     And I John saw the holy city, new Jerusalem, coming down from God out of heaven, prepared as a bride adorned for her husband.

3     And I heard a great voice out of heaven saying, Behold, the tabernacle of God is with men, and he will dwell with them, and they shall be his people, and God himself shall be with them, and be their God.

4     And God shall wipe away all tears from their eyes; and there shall be no more death, neither sorrow, nor crying, neither shall there be any more pain: for the former things are passed away.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 307 : 25 (दिव्य)-30

दिव्य मन मनुष्य की आत्मा है, और यह मनुष्य को सभी चीजों पर प्रभुत्व प्रदान करता है। मनुष्य को भौतिक आधार से नहीं बनाया गया था, न ही उन भौतिक कानूनों का पालन करने पर प्रतिबंध लगाया गया है जो आत्मा ने कभी नहीं बनाए; उनका प्रांत मन की उच्च विधि में आध्यात्मिक विधियों में है।

1. 307 : 25 (The divine)-30

The divine Mind is the Soul of man, and gives man dominion over all things. Man was not created from a material basis, nor bidden to obey material laws which Spirit never made; his province is in spiritual statutes, in the higher law of Mind.

2. 249 : 31-5

मनुष्य आत्मा का प्रतिबिंब है। वह भौतिक अनुभूति का प्रत्यक्ष विपरीत है, और एक अहंकार है। जब हम आत्मा को आत्माओं में विभाजित करते हैं, तो हम त्रुटि में भाग लेते हैं, मन को मन में गुणा करते हैं और मन को त्रुटि मान लेते हैं, फिर मन को एक पदार्थ के रूप में होना चाहिए और बुद्धि के समान कार्य करने के लिए एक अनैतिकता, और अमरता के मैट्रिक्स बनने के लिए मृत्यु दर।

2. 249 : 31-5

Man is the reflection of Soul. He is the direct opposite of material sensation, and there is but one Ego. We run into error when we divide Soul into souls, multiply Mind into minds and suppose error to be mind, then mind to be in matter and matter to be a lawgiver, unintelligence to act like intelligence, and mortality to be the matrix of immortality.

3. 390 : 4-9

हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि जीवन आत्मनिर्भर है और हमें आत्मा के सदा के सामंजस्य से इनकार नहीं करना चाहिए, सिर्फ इसलिए कि, नश्वर इंद्रियों के लिए, प्रतीत होता है कलह। यह ईश्वर की हमारी अज्ञानता है, ईश्वरीय सिद्धांत, जो स्पष्ट कलह उत्पन्न करता है, और उसके सामंजस्य की सही समझ।

3. 390 : 4-9

We cannot deny that Life is self-sustained, and we should never deny the everlasting harmony of Soul, simply because, to the mortal senses, there is seeming discord. It is our ignorance of God, the divine Principle, which produces apparent discord, and the right understanding of Him restores harmony.

4. 444 : 2-6, 10-12

किसी तरह, जल्दी या बाद में, सभी को भौतिकता से श्रेष्ठ होना चाहिए, और दुख इस ऊंचाई में ईश्वरीय एजेंट है। "जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उन के लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती है," यह पवित्रशास्त्र का अधिनायक है।

जो लोग उस पर भरोसा करते हैं, उन्हें कदम से कदम पता होगा कि: "परमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है, संकट में अति सहज से मिलने वाला सहायक।"

4. 444 : 2-6, 10-12

In some way, sooner or later, all must rise superior to materiality, and suffering is oft the divine agent in this elevation. "All things work together for good to them that love God," is the dictum of Scripture.

Step by step will those who trust Him find that "God is our refuge and strength, a very present help in trouble."

5. 410 : 14-17

ईश्वर में हमारी आस्था का हर परीक्षण हमें मजबूत बनाता है। आत्मा से पार पाने के लिए भौतिक स्थिति जितनी कठिन लगती है, उतनी ही मजबूत हमारे विश्वास और हमारे प्रेम को शुद्ध करना चाहिए।

5. 410 : 14-17

Every trial of our faith in God makes us stronger. The more difficult seems the material condition to be overcome by Spirit, the stronger should be our faith and the purer our love.

6. 66 : 6-16, 30-3

परीक्षण नश्वर लोगों को एक भौतिक कर्मचारियों और एक टूटी हुई ईख पर झुकना नहीं सिखाते हैं, जो हृदय को छेदता है। हम आनंद और समृद्धि की धूप में इसे याद नहीं करते। दुःख लाभकारी है। महान क्लेश के माध्यम से हम राज्य में प्रवेश करते हैं। परीक्षण परमेश्वर की देखभाल के प्रमाण हैं। भौतिक विकास की उम्मीदों की मिट्टी में बोए गए बीज से आध्यात्मिक विकास अंकुरण नहीं करता है, लेकिन जब ये क्षय होता है, तो प्रेम आत्मा के ऊंचे उत्साह का प्रचार करता है, जिसमें पृथ्वी का कोई दाग नहीं होता है। अनुभव के प्रत्येक क्रमिक चरण में ईश्वरीय अच्छाई और प्रेम के नए विचार सामने आते हैं।

दुःख का ही प्रतिफल है। यह हमें कभी वहाँ नहीं छोड़ता, जहाँ यह हमें पाता है। भट्ठी सोने को उस सकल से अलग करती है जो कीमती धातु भगवान की छवि के साथ हो सकती है। हमारे पिता ने जो प्याला दिया है, क्या हम उसे नहीं पीयेंगे और जो पाठ पढ़ाते हैं, उसे सीखेंगे?

6. 66 : 6-16, 30-3

Trials teach mortals not to lean on a material staff, — a broken reed, which pierces the heart. We do not half remember this in the sunshine of joy and prosperity. Sorrow is salutary. Through great tribulation we enter the kingdom. Trials are proofs of God's care. Spiritual development germinates not from seed sown in the soil of material hopes, but when these decay, Love propagates anew the higher joys of Spirit, which have no taint of earth. Each successive stage of experience unfolds new views of divine goodness and love.

Sorrow has its reward. It never leaves us where it found us. The furnace separates the gold from the dross that the precious metal may be graven with the image of God. The cup our Father hath given, shall we not drink it and learn the lessons He teaches?

7. 265 : 23-5

किसने महसूस किया है कि मानवीय शांति का नुकसान आध्यात्मिकता के लिए मजबूत इच्छाओं को प्राप्त नहीं हुआ है? स्वर्गीय भलाई के बाद की आकांक्षा इससे पहले कि हमें पता चला कि ज्ञान और प्रेम का क्या संबंध है। सांसारिक आसनों और सुखों का नुकसान कई दिलों के आरोही मार्ग को उज्ज्वल करता है। भावना के दर्द हमें जल्दी से इंगित करते हैं कि भावना के सुख नेश्वर हैं और यह आनंद आध्यात्मिक है।

अर्थ की वेदनाओं नमस्कार हैं, यदि वे झूठे सुखदायक विश्वासों को मिटा देते हैं और भावनाओं को आत्मा से आत्मा तक जागते हैं, जहां ईश्वर की रचनाएं अच्छी हैं, "हृदय को आनन्दित करता है।" यह विज्ञान की प्रतिभा है, जिसके साथ सत्य कठिनाई को नष्ट करता है, भौतिकता मनुष्य के उच्च व्यक्तित्व और भाग्य को स्थान देती है।

7. 265 : 23-5

Who that has felt the loss of human peace has not gained stronger desires for spiritual joy? The aspiration after heavenly good comes even before we discover what belongs to wisdom and Love. The loss of earthly hopes and pleasures brightens the ascending path of many a heart. The pains of sense quickly inform us that the pleasures of sense are mortal and that joy is spiritual.

The pains of sense are salutary, if they wrench away false pleasurable beliefs and transplant the affections from sense to Soul, where the creations of God are good, "rejoicing the heart." Such is the sword of Science, with which Truth decapitates error, materiality giving place to man's higher individuality and destiny.

8. 60 : 29-11

आत्मा के पास आत्मा को प्राप्त करने के लिए अनंत संसाधन हैं, और खुशी अधिक आसानी से प्राप्त की जाएगी और हमारे रखने में अधिक सुरक्षित होगी, अगर आत्मा में मांग की जाए। अकेले उच्च आनंद अमर आदमी के cravings को संतुष्ट कर सकते हैं। हम व्यक्तिगत समझदारी की सीमा के भीतर खुशी का संचार नहीं कर सकते। इंद्रियां वास्तविक आनंद नहीं देती हैं।

मानव के हित में अच्छाई बुराई पर अध्यात्म और पशु पर आधिपत्य होना चाहिए, या सुख कभी नहीं जीता जाएगा। इस खगोलीय स्थिति की प्राप्ति हमारे पूर्वजन्म को कम करेगी, अपराध को कम करेगी, और महत्वाकांक्षा को उच्च लक्ष्य देगी। पाप की हर घाटी को ऊंचा किया जाना चाहिए, और स्वार्थ के हर पहाड़ को नीचे लाया जाना चाहिए, ताकि विज्ञान में हमारे भगवान का राजमार्ग तैयार हो सके।

8. 60 : 29-11

Soul has infinite resources with which to bless mankind, and happiness would be more readily attained and would be more secure in our keeping, if sought in Soul. Higher enjoyments alone can satisfy the cravings of immortal man. We cannot circumscribe happiness within the limits of personal sense. The senses confer no real enjoyment.

The good in human affections must have ascendency over the evil and the spiritual over the animal, or happiness will never be won. The attainment of this celestial condition would improve our progeny, diminish crime, and give higher aims to ambition. Every valley of sin must be exalted, and every mountain of selfishness be brought low, that the highway of our God may be prepared in Science.

9. 22 : 11-20

"अपने स्वयं के उद्धार का काम करें," यह जीवन और प्रेम की मांग है, इस अंत के लिए भगवान आपके साथ काम करते हैं। "जब तक मैं न आऊं तब तक दृढ़ रहना!" अपने इनाम की प्रतीक्षा करें, और "अच्छा करने में थके नहीं। यदि आपके प्रयास भयभीत बाधाओं से घिरे हुए हैं, और आपको कोई वर्तमान इनाम नहीं मिलता है, तो गलती पर वापस न जाएं, और न ही दौड़ में सुस्त बनें।

जब लड़ाई का धुआं दूर हो जाएगा, तो आप अपने द्वारा किए गए अच्छे को समझेंगे, और अपने योग्य के अनुसार प्राप्त करेंगे।

9. 22 : 11-20

"Work out your own salvation," is the demand of Life and Love, for to this end God worketh with you. "Occupy till I come!" Wait for your reward, and "be not weary in well doing." If your endeavors are beset by fearful odds, and you receive no present reward, go not back to error, nor become a sluggard in the race.

When the smoke of battle clears away, you will discern the good you have done, and receive according to your deserving.

10. 572 : 19-25

प्रकाशित वाक्य 21: 1 में हमने पढ़ा:

फिर मैं ने नये आकाश और नयी पृथ्वी को देखा, क्योंकि पहिला आकाश और पहिली पृथ्वी जाती रही थी, और समुद्र भी न रहा।

पुनरुत्थानवादी ने मृत्यु नामक मानव अनुभव में अभी तक संक्रमणकालीन चरण को पारित नहीं किया था, लेकिन उसने पहले ही एक नया स्वर्ग और एक नई पृथ्वी देखी।

10. 572 : 19-25

In Revelation xxi. 1 we read: —

And I saw a new heaven and a new earth: for the first heaven and the first earth were passed away; and there was no more sea.

The Revelator had not yet passed the transitional stage in human experience called death, but he already saw a new heaven and a new earth.

11. 573 : 13-2

इस वैज्ञानिकता के साथ एक और रहस्योद्घाटन किया गया था, यहाँ तक कि स्वर्ग से घोषणा, सर्वोच्च भाव, उस भगवान, भावभाव का दिव्य सिद्धांत, कभी पुरुषों के साथ है, और वे उनके लोग हैं। इस प्रकार मनुष्य अब एक दुखी पापी के रूप में नहीं, बल्कि ईश्वर के धन्य बच्चे के रूप में माना जाता था। क्यूं कर? क्योंकि स्वर्ग और पृथ्वी के सेंट जॉन के प्रति शत्रुता गायब हो गई थी, और इस झूठे अर्थ के स्थान पर आध्यात्मिक भावना थी, व्यक्तिपरक स्थिति जिसके द्वारा वह नए स्वर्ग और नई पृथ्वी को देख सकती थी, जिसमें आध्यात्मिक विचार और वास्तविकता की चेतना शामिल है। । यह निष्कर्ष निकालने के लिए शास्त्र सम्मत अधिकार है कि इस अस्तित्व की वर्तमान स्थिति में पुरुषों के लिए यह संभव है, और - यह कि हम यहां हैं, और अब, मृत्यु, दुःख और पीड़ा के निवारण के लिए दृढ़ता हो सकती हैं। यह वास्तव में पूर्ण क्रिश्चियन साइंस का पूर्वज है। दिल थाम लो, प्रीति, इस वास्तविकता के लिए निश्चित रूप से कुछ समय में और किसी तरह दिखाई देगा। अधिक दर्द नहीं होगा, और सभी आँसू हटा दिए जाएंगे। जब आप इसे पढ़ते हैं, तो यीशु के शब्दों को याद रखें, “का राज्य आपके बीच में। है” यह आध्यात्मिकता है इसलिए एक संभावना है।

11. 573 : 13-2

Accompanying this scientific consciousness was another revelation, even the declaration from heaven, supreme harmony, that God, the divine Principle of harmony, is ever with men, and they are His people. Thus man was no longer regarded as a miserable sinner, but as the blessed child of God. Why? Because St. John's corporeal sense of the heavens and earth had vanished, and in place of this false sense was the spiritual sense, the subjective state by which he could see the new heaven and new earth, which involve the spiritual idea and consciousness of reality. This is Scriptural authority for concluding that such a recognition of being is, and has been, possible to men in this present state of existence, — that we can become conscious, here and now, of a cessation of death, sorrow, and pain. This is indeed a foretaste of absolute Christian Science. Take heart, dear sufferer, for this reality of being will surely appear sometime and in some way. There will be no more pain, and all tears will be wiped away. When you read this, remember Jesus' words, "The kingdom of God is within you." This spiritual consciousness is therefore a present possibility.

12. 273 : 18 केवल

आत्मा द्वारा शासित होने पर मनुष्य सामंजस्यपूर्ण होता है।

12. 273 : 18 only

Man is harmonious when governed by Soul.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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