रविवार 17 सितंबर, 2023



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वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: यूहन्ना 6: 63

"आत्मा तो जीवनदायक है, शरीर से कुछ लाभ नहीं: जो बातें मैं ने तुम से कहीं हैं वे आत्मा है, और जीवन भी हैं।"



Golden Text: John 6 : 63

It is the spirit that quickeneth; the flesh profiteth nothing: the words that I speak unto you, they are spirit, and they are life.




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उत्तरदायी अध्ययन: व्यवस्थाविवरण 6: 4-6, 10, 12, 17, 18


4     हे इस्राएल, सुन, यहोवा हमारा परमेश्वर है, यहोवा एक ही है;

5     तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे मन, और सारे जीव, और सारी शक्ति के साथ प्रेम रखना।

6     और ये आज्ञाएं जो मैं आज तुझ को सुनाता हूं वे तेरे मन में बनी रहें;

10     और जब तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे उस देश में पहुंचाए जिसके विषय में उसने इब्राहीम, इसहाक, और याकूब नाम, तेरे पूर्वजों से तुझे देने की शपथ खाई, और जब वह तुझ को बड़े बड़े और अच्छे नगर, जो तू ने नहीं बनाए,

12     तब सावधान रहना, कहीं ऐसा न हो कि तू यहोवा को भूल जाए, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात मिस्र देश से निकाल लाया है।

17     अपने परमेश्वर यहोवा की आज्ञाओं, चितौनियों, और विधियों को, जो उसने तुझ को दी हैं, सावधानी से मानना।

18     और जो काम यहोवा की दृष्टि में ठीक और सुहावना है वही किया करना, जिस से कि तेरा भला हो, और जिस उत्तम देश के विषय में यहोवा ने तेरे पूर्वजों से शपथ खाई उस में तू प्रवेश करके उसका अधिकारी हो जाए।

Responsive Reading: Deuteronomy 6 : 4-6, 10, 12, 17, 18

4.     Hear, O Israel: the Lord our God is one Lord:

5.     And thou shalt love the Lord thy God with all thine heart, and with all thy soul, and with all thy might.

6.     And these words, which I command thee this day, shall be in thine heart:

10.     And it shall be, when the Lord thy God shall have brought thee into the land which he sware unto thy fathers, to Abraham, to Isaac, and to Jacob, to give thee great and goodly cities, which thou buildedst not,

12.     Then beware lest thou forget the Lord, which brought thee forth out of the land of Egypt, from the house of bondage.

17.     Ye shall diligently keep the commandments of the Lord your God, and his testimonies, and his statutes, which he hath commanded thee.

18.     And thou shalt do that which is right and good in the sight of the Lord: that it may be well with thee.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. निर्गमन 20: 1-6

1     तब परमेश्वर ने ये सब वचन कहे,

2     कि मैं तेरा परमेश्वर यहोवा हूं, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात मिस्र देश से निकाल लाया है॥

3     तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना॥

4     तू अपने लिये कोई मूर्ति खोदकर न बनाना, न किसी कि प्रतिमा बनाना, जो आकाश में, वा पृथ्वी पर, वा पृथ्वी के जल में है।

5     तू उन को दण्डवत न करना, और न उनकी उपासना करना; क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर यहोवा जलन रखने वाला ईश्वर हूं, और जो मुझ से बैर रखते है, उनके बेटों, पोतों, और परपोतों को भी पितरों का दण्ड दिया करता हूं,

6     और जो मुझ से प्रेम रखते और मेरी आज्ञाओं को मानते हैं, उन हजारों पर करूणा किया करता हूं॥

1. Exodus 20 : 1-6

1     And God spake all these words, saying,

2     I am the Lord thy God, which have brought thee out of the land of Egypt, out of the house of bondage.

3     Thou shalt have no other gods before me.

4     Thou shalt not make unto thee any graven image, or any likeness of any thing that is in heaven above, or that is in the earth beneath, or that is in the water under the earth:

5     Thou shalt not bow down thyself to them, nor serve them: for I the Lord thy God am a jealous God, visiting the iniquity of the fathers upon the children unto the third and fourth generation of them that hate me;

6     And shewing mercy unto thousands of them that love me, and keep my commandments.

2. सभोपदेशक 1: 1, 14, 15

1     यरूशलेम के राजा, दाऊद के पुत्र और उपदेशक के वचन।

14     मैं ने उन सब कामों को देखा जो सूर्य के नीचे किए जाते हैं; देखो वे सब व्यर्थ और मानो वायु को पकड़ना है।

15     जो टेढ़ा है, वह सीधा नहीं हो सकता, और जितनी वस्तुओं में घटी है, वे गिनी नहीं जातीं॥

2. Ecclesiastes 1 : 1, 14, 15

1     The words of the Preacher, the son of David, king in Jerusalem.

14     I have seen all the works that are done under the sun; and, behold, all is vanity and vexation of spirit.

15     That which is crooked cannot be made straight: and that which is wanting cannot be numbered.

3. सभोपदेशक 2: 4-10 (से,), 11

4     मैं ने बड़े बड़े काम किए; मैं ने अपने लिये घर बनवा लिए और अपने लिये दाख की बारियां लगवाईं;

5     मैं ने अपने लिये बारियां और बाग लगावा लिए, और उन में भांति भांति के फलदाई वृक्ष लगाए।

6     मैं ने अपने लिये कुण्ड खुदवा लिए कि उन से वह वन सींचा जाए जिस में पौधे लगाए जाते थे।

7     मैं ने दास और दासियां मोल लीं, और मेरे घर में दास भी उत्पन्न हुए; और जितने मुझ से पहिले यरूशलेम में थे उन से कहीं अधिक गाय-बैल और भेड़-बकरियों का मैं स्वामी था।

8     मैं ने चान्दी और सोना और राजाओं और प्रान्तों के बहुमूल्य पदार्थों का भी संग्रह किया; मैं ने अपने लिये गवैयों और गानेवालियों को रखा, और बहुत सी कामिनियां भी, जिन से मनुष्य सुख पाते हैं, अपनी कर लीं॥

9     इस प्रकार मैं अपने से पहिले के सब यरूशलेमवासियों अधिक महान और धनाढय हो गया; तौभी मेरी बुद्धि ठिकाने रही।

10     और जितनी वस्तुओं के देखने की मैं ने लालसा की, उन सभों को देखने से मैं न रूका; मैं ने अपना मन किसी प्रकार का आनन्द भोगने से न रोका क्योंकि मेरा मन मेरे सब परिश्रम के कारण आनन्दित हुआ; और मेरे सब परिश्रम से मुझे यही भाग मिला।

11     तब मैं ने फिर से अपने हाथों के सब कामों को, और अपने सब परिश्रम को देखा, तो क्या देखा कि सब कुछ व्यर्थ और वायु को पकड़ना है, और संसार में कोई लाभ नहीं॥

3. Ecclesiastes 2 : 4-10 (to ,), 11

4     I made me great works; I builded me houses; I planted me vineyards:

5     I made me gardens and orchards, and I planted trees in them of all kind of fruits:

6     I made me pools of water, to water therewith the wood that bringeth forth trees:

7     I got me servants and maidens, and had servants born in my house; also I had great possessions of great and small cattle above all that were in Jerusalem before me:

8     I gathered me also silver and gold, and the peculiar treasure of kings and of the provinces: I gat me men singers and women singers, and the delights of the sons of men, as musical instruments, and that of all sorts.

9     So I was great, and increased more than all that were before me in Jerusalem: also my wisdom remained with me.

10     And whatsoever mine eyes desired I kept not from them,

11     Then I looked on all the works that my hands had wrought, and on the labour that I had laboured to do: and, behold, all was vanity and vexation of spirit, and there was no profit under the sun.

4. सभोपदेशक 12: 13

13     सब कुछ सुना गया; अन्त की बात यह है कि परमेश्वर का भय मान और उसकी आज्ञाओं का पालन कर; क्योंकि मनुष्य का सम्पूर्ण कर्त्तव्य यही है।

4. Ecclesiastes 12 : 13

13     Let us hear the conclusion of the whole matter: Fear God, and keep his commandments: for this is the whole duty of man.

5. मरकुस 5: 21, 25-34

21     जब यीशु फिर नाव से पार गया, तो एक बड़ी भीड़ उसके पास इकट्ठी हो गई; और वह झील के किनारे था।

25     और एक स्त्री, जिस को बारह वर्ष से लोहू बहने का रोग था।

26     और जिस ने बहुत वैद्यों से बड़ा दुख उठाया और अपना सब माल व्यय करने पर भी कुछ लाभ न उठाया था, परन्तु और भी रोगी हो गई थी।

27     यीशु की चर्चा सुनकर, भीड़ में उसके पीछे से आई, और उसके वस्त्र को छू लिया।

28     क्योंकि वह कहती थी, यदि मैं उसके वस्त्र ही को छू लूंगी, तो चंगी हो जाऊंगी।

29     और तुरन्त उसका लोहू बहना बन्द हो गया; और उस ने अपनी देह में जान लिया, कि मैं उस बीमारी से अच्छी हो गई।

30     यीशु ने तुरन्त अपने में जान लिया, कि मुझ में से सामर्थ निकली है, और भीड़ में पीछे फिरकर पूछा; मेरा वस्त्र किस ने छूआ?

31     उसके चेलों ने उस से कहा; तू देखता है, कि भीड़ तुझ पर गिरी पड़ती है, और तू कहता है; कि किस ने मुझे छुआ?

32     तब उस ने उसे देखने के लिये जिस ने यह काम किया था, चारों ओर दृष्टि की।

33     तब वह स्त्री यह जानकर, कि मेरी कैसी भलाई हुई है, डरती और कांपती हुई आई, और उसके पांवों पर गिरकर, उस से सब हाल सच सच कह दिया।

34     उस ने उस से कहा; पुत्री तेरे विश्वास ने तुझे चंगा किया है: कुशल से जा, और अपनी इस बीमारी से बची रह॥

5. Mark 5 : 21, 25-34

21     And when Jesus was passed over again by ship unto the other side, much people gathered unto him: and he was nigh unto the sea.

25     And a certain woman, which had an issue of blood twelve years,

26     And had suffered many things of many physicians, and had spent all that she had, and was nothing bettered, but rather grew worse,

27     When she had heard of Jesus, came in the press behind, and touched his garment.

28     For she said, If I may touch but his clothes, I shall be whole.

29     And straightway the fountain of her blood was dried up; and she felt in her body that she was healed of that plague.

30     And Jesus, immediately knowing in himself that virtue had gone out of him, turned him about in the press, and said, Who touched my clothes?

31     And his disciples said unto him, Thou seest the multitude thronging thee, and sayest thou, Who touched me?

32     And he looked round about to see her that had done this thing.

33     But the woman fearing and trembling, knowing what was done in her, came and fell down before him, and told him all the truth.

34     And he said unto her, Daughter, thy faith hath made thee whole; go in peace, and be whole of thy plague.

6. गलातियों 5: 1, 5, 13, 16-18

1     मसीह ने स्वतंत्रता के लिये हमें स्वतंत्र किया है; सो इसी में स्थिर रहो, और दासत्व के जूए में फिर से न जुतो॥

5     क्योंकि आत्मा के कारण, हम विश्वास से, आशा की हुई धामिर्कता की बाट जोहते हैं।

13     हे भाइयों, तुम स्वतंत्र होने के लिये बुलाए गए हो परन्तु ऐसा न हो, कि यह स्वतंत्रता शारीरिक कामों के लिये अवसर बने, वरन प्रेम से एक दूसरे के दास बनो।

16     पर मैं कहता हूं, आत्मा के अनुसार चलो, तो तुम शरीर की लालसा किसी रीति से पूरी न करोगे।

17     क्योंकि शरीर आत्मा के विरोध में, और आत्मा शरीर के विरोध में लालसा करती है, और ये एक दूसरे के विरोधी हैं; इसलिये कि जो तुम करना चाहते हो वह न करने पाओ।

18     और यदि तुम आत्मा के चलाए चलते हो तो व्यवस्था के आधीन न रहे।

6. Galatians 5 : 1, 5, 13, 16-18

1     Stand fast therefore in the liberty wherewith Christ hath made us free, and be not entangled again with the yoke of bondage.

5     For we through the Spirit wait for the hope of righteousness by faith.

13     For, brethren, ye have been called unto liberty; only use not liberty for an occasion to the flesh, but by love serve one another.

16     This I say then, Walk in the Spirit, and ye shall not fulfil the lust of the flesh.

17     For the flesh lusteth against the Spirit, and the Spirit against the flesh: and these are contrary the one to the other: so that ye cannot do the things that ye would.

18     But if ye be led of the Spirit, ye are not under the law.

7. रोमियो 8: 1, 2, 5-9 (से 1st.), 15-17 (से 2nd;)

1     सोअब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं: क्योंकि वे शरीर के अनुसार नहीं वरन आत्माके अनुसार चलते हैं।

2     क्योंकि जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की, और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया।

5     क्योंकि शरीरिक व्यक्ति शरीर की बातों पर मन लगाते हैं; परन्तु आध्यात्मिक आत्मा की बातों पर मन लगाते हैं।

6     शरीर पर मन लगाना तो मृत्यु है, परन्तु आत्मा पर मन लगाना जीवन और शान्ति है।

7     क्योंकि शरीर पर मन लगाना तो परमेश्वर से बैर रखना है, क्योंकि न तो परमेश्वर की व्यवस्था के आधीन है, और न हो सकता है।

8     और जो शारीरिक दशा में है, वे परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते।

9     परन्तु जब कि परमेश्वर का आत्मा तुम में बसता है, तो तुम शारीरिक दशा में नहीं, परन्तु आत्मिक दशा में हो। यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका जन नहीं।

15     क्योंकि तुम को दासत्व की आत्मा नहीं मिली, कि फिर भयभीत हो परन्तु लेपालकपन की आत्मा मिली है, जिस से हम हे अब्बा, हे पिता कह कर पुकारते हैं।

16     आत्मा आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है, कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं।

17     और यदि सन्तान हैं, तो वारिस भी, वरन परमेश्वर के वारिस और मसीह के संगी वारिस हैं, जब कि हम उसके साथ दुख उठाएं कि उसके साथ महिमा भी पाएं॥

7. Romans 8 : 1, 2, 5-9 (to 1st .), 15-17 (to 2nd ;)

1     There is therefore now no condemnation to them which are in Christ Jesus, who walk not after the flesh, but after the Spirit.

2     For the law of the Spirit of life in Christ Jesus hath made me free from the law of sin and death.

5     For they that are after the flesh do mind the things of the flesh; but they that are after the Spirit the things of the Spirit.

6     For to be carnally minded is death; but to be spiritually minded is life and peace.

7     Because the carnal mind is enmity against God: for it is not subject to the law of God, neither indeed can be.

8     So then they that are in the flesh cannot please God.

9     But ye are not in the flesh, but in the Spirit, if so be that the Spirit of God dwell in you.

15     For ye have not received the spirit of bondage again to fear; but ye have received the Spirit of adoption, whereby we cry, Abba, Father.

16     The Spirit itself beareth witness with our spirit, that we are the children of God:

17     And if children, then heirs; heirs of God, and joint-heirs with Christ;



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 111: 24 (क्रिश्चियन)-25

ईसाई विज्ञान मानव जाति की आध्यात्मिकता की चाहत को पूरा करता है।

1. 111 : 24 (Christian)-25

Christian Science meets a yearning of the human race for spirituality.

2. 60: 31-1

अकेले उच्च आनंद अमर आदमी के लालसा को संतुष्ट कर सकते हैं।

2. 60 : 31-1

Higher enjoyments alone can satisfy the cravings of immortal man.

3. 239: 16-22, 29-32

अपनी प्रगति का पता लगाने के लिए, हमें यह सीखना चाहिए कि हमारे साथ हमारे संबंध किससे हैं और हम किसको स्वीकार करते हैं और ईश्वर के रूप में मानते हैं। यदि ईश्वरीय प्रेम निकट, प्रिय, और अधिक वास्तविक होता जा रहा है, तब पदार्थ आत्मा को सौंप रहा है। जिन वस्तुओं का हम अनुसरण करते हैं और जो आत्मा हम प्रकट करते हैं वह हमारे दृष्टिकोण को प्रकट करती है, और दिखाते हैं कि हम क्या जीत रहे हैं।

परफेक्ट माइंड आगे की पूर्णता भेजता है, क्योंकि गॉड इज माइंड। नश्वर मन अपने स्वयं के सदृशों को भेजता है, जिनमें से बुद्धिमान व्यक्ति ने कहा, "सभी गुमान है।"

3. 239 : 16-22, 29-32

To ascertain our progress, we must learn where our affections are placed and whom we acknowledge and obey as God. If divine Love is becoming nearer, dearer, and more real to us, matter is then submitting to Spirit. The objects we pursue and the spirit we manifest reveal our standpoint, and show what we are winning.

The perfect Mind sends forth perfection, for God is Mind. Imperfect mortal mind sends forth its own resemblances, of which the wise man said, "All is vanity."

4. 272: 19-27

यह भौतिक जीवन के भयावह रूप से परिणाम के विपरीत, दैनिक जीवन के विचार और ईसाईकरण का आध्यात्मिकीकरण है; यह शुद्धता और पवित्रता, कामुकता और अशुद्धता के नीचे की ओर झुकाव और सांसारिक गुरुत्वाकर्षण के विपरीत है, जो वास्तव में क्राइस्टियन साइंस के दिव्य उत्पत्ति और संचालन को प्रमाणित करता है। ईसाई विज्ञान की विजय त्रुटि और बुराई के विनाश में दर्ज की गई है, जिससे पाप, बीमारी और मृत्यु की निराशाजनक मान्यताओं का प्रचार होता है।

4. 272 : 19-27

It is the spiritualization of thought and Christianization of daily life, in contrast with the results of the ghastly farce of material existence; it is chastity and purity, in contrast with the downward tendencies and earthward gravitation of sensualism and impurity, which really attest the divine origin and operation of Christian Science. The triumphs of Christian Science are recorded in the destruction of error and evil, from which are propagated the dismal beliefs of sin, sickness, and death.

5. 262: 17-26

अय्यूब ने कहा: "मैं कानों से तेरा समाचार सुना था, परन्तु अब मेरी आंखें तुझे देखती हैं;" पुरुष अय्यूब के विचार को प्रतिध्वनित करेंगे, जब पदार्थ का दर्द और सुख पूर्वसूचक होना बंद हो जाएगा।

वे फिर जीवन और खुशी, खुशी और दुःख के झूठे अनुमान को छोड़ देंगे, और प्रेमपूर्वक आनंद प्राप्त करने, धैर्य से काम लेने और ईश्वर के विपरीत सभी को जीतने का आनंद प्राप्त करेंगे। एक उच्च दृष्टिकोण से शुरू, कोई अनायास उठता है, यहां तक कि प्रकाश बिना प्रयास के प्रकाश का उत्सर्जन करता है; इसलिये "क्योंकि जहां तेरा धन है वहां तेरा मन भी लगा रहेगा।"

5. 262 : 17-26

Job said: "I have heard of Thee by the hearing of the ear: but now mine eye seeth Thee." Mortals will echo Job's thought, when the supposed pain and pleasure of matter cease to predominate. They will then drop the false estimate of life and happiness, of joy and sorrow, and attain the bliss of loving unselfishly, working patiently, and conquering all that is unlike God. Starting from a higher standpoint, one rises spontaneously, even as light emits light without effort; for "where your treasure is, there will your heart be also."

6. 535: 10-18

दैवीय विज्ञान जीवन और बुद्धि की कथित भौतिक नींव पर अपना मुख्य प्रहार करता है। यह मूर्तिपूजा को नष्ट करता है। ईसाई विज्ञान से पहले अन्य देवताओं, अन्य रचनाकारों और अन्य रचनाओं में विश्वास होना चाहिए। यह पाप के परिणामों को उजागर करता है जैसा कि बीमारी और मृत्यु में दिखाया गया है। मनुष्य कब ईसाई विज्ञान के खुले द्वार से होकर आत्मा के स्वर्ग में, मनुष्यों में ज्येष्ठ पुत्र की विरासत में प्रवेश करेगा? सत्य वास्तव में "मार्ग" है।

6. 535 : 10-18

Divine Science deals its chief blow at the supposed material foundations of life and intelligence. It dooms idolatry. A belief in other gods, other creators, and other creations must go down before Christian Science. It unveils the results of sin as shown in sickness and death. When will man pass through the open gate of Christian Science into the heaven of Soul, into the heritage of the first born among men? Truth is indeed " the way."

7. 146: 2 (ह)-20

प्राचीन ईसाई चिकित्सक थे। ईसाई धर्म का यह तत्व क्यों खो गया है? क्योंकि हमारे धर्म की प्रणालियाँ चिकित्सा की हमारी प्रणालियों द्वारा कम या ज्यादा संचालित होती हैं। पहले मूर्तिपूजा सामग्री में विश्वास था। स्कूलों ने देवता में विश्वास के बजाय, ड्रग्स के फैशन पर विश्वास किया है। अपनी ही कलह को नष्ट करने के लिए मामले पर भरोसा करके, स्वास्थ्य और सद्भाव का त्याग किया गया है। ऐसी प्रणालियाँ आध्यात्मिक शक्ति की जीवन शक्ति के बंजर हैं, जिनके द्वारा भौतिक अर्थों को विज्ञान का सेवक बना दिया जाता है और धर्म क्रिस्टलाइज हो जाता है।

भौतिक चिकित्सा ईश्वर की शक्ति के लिए दवाओं का विकल्प बनाती है - यहां तक कि मन की शक्ति - शरीर को ठीक करने के लिए। विद्वतावाद मनुष्य यीशु के दैवीय सिद्धांत के बजाय व्यक्ति से मुक्ति के लिए चिपक जाता है; और उसका विज्ञान, ईश्वर का उपचारात्मक एजेंट, खामोश है। क्यों? क्योंकि सत्य उनकी काल्पनिक शक्ति के भौतिक मादक द्रव्यों को त्याग देता है, और आत्मा को सर्वोच्चता प्रदान करता है।

7. 146 : 2 (The)-20

The ancient Christians were healers. Why has this element of Christianity been lost? Because our systems of religion are governed more or less by our systems of medicine. The first idolatry was faith in matter. The schools have rendered faith in drugs the fashion, rather than faith in Deity. By trusting matter to destroy its own discord, health and harmony have been sacrificed. Such systems are barren of the vitality of spiritual power, by which material sense is made the servant of Science and religion becomes Christlike.

Material medicine substitutes drugs for the power of God — even the might of Mind — to heal the body. Scholasticism clings for salvation to the person, instead of to the divine Principle, of the man Jesus; and his Science, the curative agent of God, is silenced. Why? Because truth divests material drugs of their imaginary power, and clothes Spirit with supremacy.

8. 174: 4-14

क्या सभ्यता केवल मूर्तिपूजा का एक उच्च रूप है, कि मनुष्य को मांस-ब्रश, फलालैन, स्नान, आहार, व्यायाम और हवा के सामने झुकना चाहिए? ईश्वरीय शक्ति के अलावा कोई भी चीज़ मनुष्य के लिए इतना कुछ करने में सक्षम नहीं है जितना वह अपने लिए कर सकता है।

सामग्री के दृष्टिकोण से ऊपर उठते हुए, विचारों के नक्शेकदम धीमे हैं, और यात्री को एक लंबी रात को चित्रित करते हैं; लेकिन उनकी उपस्थिति के स्वर्गदूतों - आध्यात्मिक अंतर्ज्ञान जो हमें बताते हैं कि "रात बहुत दूर है, दिन निकट है" - संकट में हमारे संरक्षक हैं।

8. 174 : 4-14

Is civilization only a higher form of idolatry, that man should bow down to a flesh-brush, to flannels, to baths, diet, exercise, and air? Nothing save divine power is capable of doing so much for man as he can do for himself.

The footsteps of thought, rising above material standpoints, are slow, and portend a long night to the traveller; but the angels of His presence — the spiritual intuitions that tell us when "the night is far spent, the day is at hand" — are our guardians in the gloom.

9. 120: 7-24

विज्ञान भौतिक इंद्रियों की झूठी गवाही को उलट देता है, और इस उलट नश्वरता के मूल तथ्यों पर पहुंचता है। तब अनिवार्य रूप से प्रश्न उठता है: क्या कोई व्यक्ति बीमार है यदि भौतिक इंद्रियां इंगित करती हैं कि वह अच्छे स्वास्थ्य में है? नहीं! पदार्थ मनुष्य के लिए कोई शर्त नहीं बना सकता। और क्या वह ठीक है अगर इंद्रियां कहती हैं कि वह बीमार है? हाँ, वह विज्ञान में निपुण है, जिसमें स्वास्थ्य और रोग असामान्य हैं।

स्वास्थ्य पदार्थ की नहीं, मन की स्थिति है; न ही स्वास्थ्य के विषय पर सामग्री इंद्रियां विश्वसनीय गवाही दे सकती हैं। दिमागी चिकित्सा विज्ञान यह दिखाता है कि यह असंभव है लेकिन मन को सही मायने में गवाही देना या मनुष्य की वास्तविक स्थिति का प्रदर्शन करना है। इसलिए विज्ञान के दिव्य सिद्धांत, भौतिक इंद्रियों की गवाही को उलट कर, मनुष्य को सच्चाई में सामंजस्यपूर्ण रूप से अस्तित्व के रूप में प्रकट करता है, जो स्वास्थ्य का एकमात्र आधार है; और इस प्रकार विज्ञान सभी बीमारियों से इनकार करता है, बीमारों को चंगा करता है, झूठे सबूतों को उखाड़ फेंकता है और भौतिकवादी तर्क का खंडन करता है।

9. 120 : 7-24

Science reverses the false testimony of the physical senses, and by this reversal mortals arrive at the fundamental facts of being. Then the question inevitably arises: Is a man sick if the material senses indicate that he is in good health? No! for matter can make no conditions for man. And is he well if the senses say he is sick? Yes, he is well in Science in which health is normal and disease is abnormal.

Health is not a condition of matter, but of Mind; nor can the material senses bear reliable testimony on the subject of health. The Science of Mind-healing shows it to be impossible for aught but Mind to testify truly or to exhibit the real status of man. Therefore the divine Principle of Science, reversing the testimony of the physical senses, reveals man as harmoniously existent in Truth, which is the only basis of health; and thus Science denies all disease, heals the sick, overthrows false evidence, and refutes materialistic logic.

10. 180: 31-8

सूजन को कम करने के लिए, एक ट्यूमर को भंग करने या शारीरिक बीमारी को ठीक करने के लिए, मैंने सभी निचले उपायों की तुलना में दिव्य सत्य को अधिक शक्तिशाली पाया है। और क्यों नहीं, मन से, भगवान, सभी अस्तित्व का स्रोत और स्थिति है? यह निश्चय करने से पहले कि शरीर, पदार्थ, अव्यवस्थित है, यह पूछना चाहिए, "भला तू कौन है, जो परमेश्वर का साम्हना करता है? क्या पदार्थ अपने लिए बोल सकता है, या यह जीवन के मुद्दों को धारण करता है?" पदार्थ, जो न तो भोग सकता है और न ही आनंद ले सकता है, उसकी पीड़ा और सुख के साथ कोई साझेदारी नहीं है, लेकिन नश्वर विश्वास की ऐसी साझेदारी है।

10. 180 : 31-8

To reduce inflammation, dissolve a tumor, or cure organic disease, I have found divine Truth more potent than all lower remedies. And why not, since Mind, God, is the source and condition of all existence? Before deciding that the body, matter, is disordered, one should ask, "Who art thou that repliest to Spirit? Can matter speak for itself, or does it hold the issues of life?" Matter, which can neither suffer nor enjoy, has no partnership with pain and pleasure, but mortal belief has such a partnership.

11. 425: 15-28

नश्वर मनुष्य कम नश्वर हो जाएगा, जब उसे पता चलेगा कि पदार्थ का कभी अस्तित्व नहीं रहा और वह ईश्वर को, जो मनुष्य का जीवन है, कभी नष्ट नहीं कर सकता। जब यह समझ में आ जाएगा, तो मानवजाति अधिक आध्यात्मिक हो जाएगी और जान जाएगी कि उपभोग करने के लिए कुछ भी नहीं है, क्योंकि आत्मा, ईश्वर ही सर्वव्यापी है। यदि विश्वास उपभोग है तो क्या होगा? मनुष्य के लिए ईश्वर उसके विश्वास से कहीं अधिक है, और जितना कम हम पदार्थ या उसके नियमों को स्वीकार करते हैं, उतना अधिक अमरता हमारे पास होती है। चेतना एक बेहतर शरीर का निर्माण करती है जब सामग्री में विश्वास की जीत हुई है। आध्यात्मिक समझ से भौतिक विश्वास को ठीक करें, और आत्मा आपको नए सिरे से बनाएगी। आप फिर से ईश्वर को नाराज करने के अलावा कभी नहीं डरेंगे, और आप कभी भी यह विश्वास नहीं करेंगे कि हृदय या शरीर का कोई भी हिस्सा आपको नष्ट कर सकता है।

11. 425 : 15-28

Mortal man will be less mortal, when he learns that matter never sustained existence and can never destroy God, who is man's Life. When this is understood, mankind will be more spiritual and know that there is nothing to consume, since Spirit, God, is All-in-all. What if the belief is consumption? God is more to a man than his belief, and the less we acknowledge matter or its laws, the more immortality we possess. Consciousness constructs a better body when faith in matter has been conquered. Correct material belief by spiritual understanding, and Spirit will form you anew. You will never fear again except to offend God, and you will never believe that heart or any portion of the body can destroy you.

12. 468: 8-15

सवाल। होने का वैज्ञानिक कथन क्या है?

उत्तर। पदार्थ में कोई जीवन, सत्य, बुद्धिमत्ता नहीं है, न ही पदार्थ। सब अनंत मन और उसकी अनंत अभिव्यक्ति है, भगवान के लिए सभी में है। आत्मा अमर सत्य है; मामला नश्वर त्रुटि है। आत्मा ही वास्तविक और शाश्वत है; पदार्थ असत्य और लौकिक है। आत्मा ईश्वर है, और मनुष्य उसकी छवि और समानता है। इसलिए आदमी भौतिक नहीं है; वह आध्यात्मिक है।

12. 468 : 8-15

Question. — What is the scientific statement of being?

Answer. — There is no life, truth, intelligence, nor substance in matter. All is infinite Mind and its infinite manifestation, for God is All-in-all. Spirit is immortal Truth; matter is mortal error. Spirit is the real and eternal; matter is the unreal and temporal. Spirit is God, and man is His image and likeness. Therefore man is not material; he is spiritual.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6