रविवार 17 मार्च, 2024



विषयपदार्थ

SubjectSubstance

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: 1 कुरिन्थियों 15: 58

"सो हे मेरे प्रिय भाइयो, दृढ़ और अटल रहो, और प्रभु के काम में सर्वदा बढ़ते जाओ, क्योंकि यह जानते हो, कि तुम्हारा परिश्रम प्रभु में व्यर्थ नहीं है॥"



Golden Text: I Corinthians 15 : 58

Therefore, my beloved brethren, be ye stedfast, unmoveable, always abounding in the work of the Lord, forasmuch as ye know that your labour is not in vain in the Lord.




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उत्तरदायी अध्ययन: 2 तीमुथियुस 2: 15 • भजन संहिता 37: 3, 23 • 2 कुरिन्थियों 9: 8, 9, 15


15     अपने आप को परमेश्वर का ग्रहणयोग्य और ऐसा काम करने वाला ठहराने का प्रयत्न कर, जो लज्ज़ित होने न पाए, और जो सत्य के वचन को ठीक रीति से काम में लाता हो।

3     यहोवा पर भरोसा रख, और भला कर; देश में बसा रह, और सच्चाई में मन लगाए रह।

23     मनुष्य की गति यहोवा की ओर से दृढ़ होती है, और उसके चलन से वह प्रसन्न रहता है।

8     और परमेश्वर सब प्रकार का अनुग्रह तुम्हें बहुतायत से दे सकता है जिस से हर बात में और हर समय, सब कुछ, जो तुम्हें आवश्यक हो, तुम्हारे पास रहे, और हर एक भले काम के लिये तुम्हारे पास बहुत कुछ हो।

9     जेसा लिखा है, उस ने बिथराया, उस ने कंगालों को दान दिया, उसका धर्म सदा बना रहेगा।

15     परमेश्वर को उसके उस दान के लिये जो वर्णन से बाहर है, धन्यवाद हो॥

Responsive Reading: II Timothy 2 : 15Psalm 37 : 3, 23II Corinthians 9 : 8, 9, 15

15.     Study to shew thyself approved unto God, a workman that needeth not to be ashamed, rightly dividing the word of truth.

3.     Trust in the Lord, and do good; so shalt thou dwell in the land, and verily thou shalt be fed.

23.     The steps of a good man are ordered by the Lord: and he delighteth in his way.

8.     And God is able to make all grace abound toward you; that ye, always having all sufficiency in all things, may abound to every good work:

9.     As it is written, He hath dispersed abroad; he hath given to the poor: his righteousness remaineth for ever.

15.     Thanks be unto God for his unspeakable gift.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. यशायाह 55: 1-3, 6, 7

1     अहो सब प्यासे लोगो, पानी के पास आओ; और जिनके पास रूपया न हो, तुम भी आकर मोल लो और खाओ! दाखमधु और दूध बिन रूपए और बिना दाम ही आकर ले लो।

2     जो भोजनवस्तु नहीं है, उसके लिये तुम क्यों रूपया लगाते हो, और, जिस से पेट नहीं भरता उसके लिये क्यों परिश्रम करते हो? मेरी ओर मन लगाकर सुनो, तब उत्तम वस्तुएं खाने पाओगे और चिकनी चिकनी वस्तुएं खाकर सन्तुष्ट हो जाओगे।

3     कान लगाओ, और मेरे पास आओ; सुनो, तब तुम जीवित रहोगे; और मैं तुम्हारे साथ सदा की वाचा बान्धूंगा अर्थात दाऊद पर की अटल करूणा की वाचा।

6     जब तक यहोवा मिल सकता है तब तक उसकी खोज में रहो, जब तक वह निकट है तब तक उसे पुकारो।

7     दुष्ट अपनी चालचलन और अनर्थकारी अपने सोच विचार छोड़कर यहोवा ही की ओर फिरे, वह उस पर दया करेगा, वह हमारे परमेश्वर की ओर फिरे और वह पूरी रीति से उसको क्षमा करेगा।

1. Isaiah 55 : 1-3, 6, 7

1     Ho, every one that thirsteth, come ye to the waters, and he that hath no money; come ye, buy, and eat; yea, come, buy wine and milk without money and without price.

2     Wherefore do ye spend money for that which is not bread? and your labour for that which satisfieth not? hearken diligently unto me, and eat ye that which is good, and let your soul delight itself in fatness.

3     Incline your ear, and come unto me: hear, and your soul shall live; and I will make an everlasting covenant with you, even the sure mercies of David.

6     Seek ye the Lord while he may be found, call ye upon him while he is near:

7     Let the wicked forsake his way, and the unrighteous man his thoughts: and let him return unto the Lord, and he will have mercy upon him; and to our God, for he will abundantly pardon.

2. लूका 4: 1-4, 14 (से :)

1     फिर यीशु पवित्रआत्मा से भरा हुआ, यरदन से लैटा; और चालीस दिन तक आत्मा के सिखाने से जंगल में फिरता रहा; और शैतान उस की परीक्षा करता रहा।

2     उन दिनों में उस ने कुछ न खाया और जब वे दिन पूरे हो गए, तो उसे भूख लगी।

3     और शैतान ने उस से कहा; यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो इस पत्थर से कह, कि रोटी बन जाए।

4     यीशु ने उसे उत्तर दिया; कि लिखा है, मनुष्य केवल रोटी से जीवित न रहेगा।

14     फिर यीशु आत्मा की सामर्थ से भरा हुआ गलील को लौटा।

2. Luke 4 : 1-4, 14 (to :)

1     And Jesus being full of the Holy Ghost returned from Jordan, and was led by the Spirit into the wilderness,

2     Being forty days tempted of the devil. And in those days he did eat nothing: and when they were ended, he afterward hungered.

3     And the devil said unto him, If thou be the Son of God, command this stone that it be made bread.

4     And Jesus answered him, saying, It is written, That man shall not live by bread alone, but by every word of God.

14     And Jesus returned in the power of the Spirit into Galilee:

3. लूका 5: 1, 2 (से :), 3-7 (से 1st,), 7 (और वे आये) (से 2nd,), 8, 10 (और यीशु), 11

1     जब भीड़ उस पर गिरी पड़ती थी, और परमेश्वर का वचन सुनती थी, और वह गन्नेसरत की झील के किनारे पर खड़ा था, तो ऐसा हुआ।

2     कि उस ने झील के किनारे दो नावें लगी हुई देखीं।

3     उन नावों में से एक पर जो शमौन की थी, चढ़कर, उस ने उस से बिनती की, कि किनारे से थोड़ा हटा ले चले, तब वह बैठकर लोगों को नाव पर से उपदेश देने लगा।

4     जब वे बातें कर चुका, तो शमौन से कहा, गहिरे में ले चल, और मछिलयां पकड़ने के लिये अपने जाल डालो।

5     शमौन ने उसको उत्तर दिया, कि हे स्वामी, हम ने सारी रात मिहनत की और कुछ न पकड़ा; तौभी तेरे कहने से जाल डालूंगा।

6     जब उन्होंने ऐसा किया, तो बहुत मछिलयां घेर लाए, और उन के जाल फटने लगे।

7     इस पर उन्होंने अपने साथियों को जो दूसरी नाव पर थे, ... और उन्होंने आकर, दोनो नाव यहां तक भर लीं कि वे डूबने लगीं।

8     यह देखकर शमौन पतरस यीशु के पांवों पर गिरा, और कहा; हे प्रभु, मेरे पास से जा, क्योंकि मैं पापी मनुष्य हूं।

10     तब यीशु ने शमौन से कहा, मत डर: अब से तू मनुष्यों को जीवता पकड़ा करेगा।

11     और व नावों को किनारे पर ले आए और सब कुछ छोड़कर उसके पीछे हो लिए॥

3. Luke 5 : 1, 2 (to :), 3-7 (to 1st ,), 7 (And they came) (to 2nd ,), 8, 10 (And Jesus), 11

1     And it came to pass, that, as the people pressed upon him to hear the word of God, he stood by the lake of Gennesaret,

2     And saw two ships standing by the lake:

3     And he entered into one of the ships, which was Simon’s, and prayed him that he would thrust out a little from the land. And he sat down, and taught the people out of the ship.

4     Now when he had left speaking, he said unto Simon, Launch out into the deep, and let down your nets for a draught.

5     And Simon answering said unto him, Master, we have toiled all the night, and have taken nothing: nevertheless at thy word I will let down the net.

6     And when they had this done, they inclosed a great multitude of fishes: and their net brake.

7     And they beckoned unto their partners, ... And they came, and filled both the ships,

8     When Simon Peter saw it, he fell down at Jesus’ knees, saying, Depart from me; for I am a sinful man, O Lord.

10     And Jesus said unto Simon, Fear not; from henceforth thou shalt catch men.

11     And when they had brought their ships to land, they forsook all, and followed him.

4. मत्ती 4: 23

23     और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उन की सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बल्ता को दूर करता रहा।

4. Matthew 4 : 23

23     And Jesus went about all Galilee, teaching in their synagogues, and preaching the gospel of the kingdom, and healing all manner of sickness and all manner of disease among the people.

5. मत्ती 5: 2

2     और वह अपना मुंह खोलकर उन्हें यह उपदेश देने लगा।

5. Matthew 5 : 2

2     And he opened his mouth, and taught them, saying,

6. मत्ती 6: 19 (से 1st,), 20 (से 1st,), 24 (तु), 25, 31-33

19     अपने लिये पृथ्वी पर धन इकट्ठा न करो।

20     परन्तु अपने लिये स्वर्ग में धन इकट्ठा करो।

24     कोई मनुष्य दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता।

25     इसलिये मैं तुम से कहता हूं, कि अपने प्राण के लिये यह चिन्ता न करना कि हम क्या खाएंगे? और क्या पीएंगे? और न अपने शरीर के लिये कि क्या पहिनेंगे? क्या प्राण भोजन से, और शरीर वस्त्र से बढ़कर नहीं?

31     इसलिये तुम चिन्ता करके यह न कहना, कि हम क्या खाएंगे, या क्या पीएंगे, या क्या पहिनेंगे?

32     क्योंकि अन्यजाति इन सब वस्तुओं की खोज में रहते हैं, और तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है, कि तुम्हें ये सब वस्तुएं चाहिए।

33     इसलिये पहिले तुम उसे राज्य और धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएं भी तुम्हें मिल जाएंगी।

6. Matthew 6 : 19 (to 1st ,), 20 (to 1st ,), 24 (Ye), 25, 31-33

19     Lay not up for yourselves treasures upon earth,

20     But lay up for yourselves treasures in heaven,

24     Ye cannot serve God and mammon.

25     Therefore I say unto you, Take no thought for your life, what ye shall eat, or what ye shall drink; nor yet for your body, what ye shall put on. Is not the life more than meat, and the body than raiment?

31     Therefore take no thought, saying, What shall we eat? or, What shall we drink? or, Wherewithal shall we be clothed?

32     (For after all these things do the Gentiles seek:) for your heavenly Father knoweth that ye have need of all these things.

33     But seek ye first the kingdom of God, and his righteousness; and all these things shall be added unto you.

7. मत्ती 9: 37, 38

37     तब उस ने अपने चेलों से कहा, पक्के खेत तो बहुत हैं पर मजदूर थोड़े हैं।

38     इसलिये खेत के स्वामी से बिनती करो कि वह अपने खेत काटने के लिये मजदूर भेज दे॥

7. Matthew 9 : 37, 38

37     Then saith he unto his disciples, The harvest truly is plenteous, but the labourers are few;

38     Pray ye therefore the Lord of the harvest, that he will send forth labourers into his harvest.

8. मत्ती 10: 1, 5 (से 4th,), 6-14

1     फिर उस ने अपने बारह चेलों को पास बुलाकर, उन्हें अशुद्ध आत्माओं पर अधिकार दिया, कि उन्हें निकालें और सब प्रकार की बीमारियों और सब प्रकार की दुर्बलताओं को दूर करें॥

5     इन बारहों को यीशु ने यह आज्ञा देकर भेजा कि अन्यजातियों की ओर न जाना, और सामरियों के किसी नगर में प्रवेश न करना।

6     परन्तु इस्राएल के घराने ही की खोई हुई भेड़ों के पास जाना।

7     और चलते चलते प्रचार कर कहो कि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।

8     बीमारों को चंगा करो: मरे हुओं को जिलाओ: कोढिय़ों को शुद्ध करो: दुष्टात्माओं को निकालो: तुम ने सेंतमेंत पाया है, सेंतमेंत दो।

9     अपने पटुकों में न तो सोना, और न रूपा, और न तांबा रखना।

10     मार्ग के लिये न झोली रखो, न दो कुरते, न जूते और न लाठी लो, क्योंकि मजदूर को उसका भोजन मिलना चाहिए।

11     जिस किसी नगर या गांव में जाओ तो पता लगाओ कि वहां कौन योग्य है और जब तक वहां से न निकलो, उसी के यहां रहो।

12     और घर में प्रवेश करते हुए उस को आशीष देना।

13     यदि उस घर के लोग योग्य होंगे तो तुम्हारा कल्याण उन पर पहुंचेगा परन्तु यदि वे योग्य न हों तो तुम्हारा कल्याण तुम्हारे पास लौट आएगा।

14     और जो कोई तुम्हें ग्रहण न करे, और तुम्हारी बातें न सुने, उस घर या उस नगर से निकलते हुए अपने पांवों की धूल झाड़ डालो।

8. Matthew 10 : 1, 5 (to 4th ,), 6-14

1     And when he had called unto him his twelve disciples, he gave them power against unclean spirits, to cast them out, and to heal all manner of sickness and all manner of disease.

5     These twelve Jesus sent forth, and commanded them, saying, Go not into the way of the Gentiles,

6     But go rather to the lost sheep of the house of Israel.

7     And as ye go, preach, saying, The kingdom of heaven is at hand.

8     Heal the sick, cleanse the lepers, raise the dead, cast out devils: freely ye have received, freely give.

9     Provide neither gold, nor silver, nor brass in your purses,

10     Nor scrip for your journey, neither two coats, neither shoes, nor yet staves: for the workman is worthy of his meat.

11     And into whatsoever city or town ye shall enter, inquire who in it is worthy; and there abide till ye go thence.

12     And when ye come into an house, salute it.

13     And if the house be worthy, let your peace come upon it: but if it be not worthy, let your peace return to you.

14     And whosoever shall not receive you, nor hear your words, when ye depart out of that house or city, shake off the dust of your feet.

9. यशायाह 65: 13 (से 1st,), 18 (देखो), 22, 23 (से;)

13     इस कारण प्रभु यहोवा यों कहता है

18     ... देखो, मैं यरूशलेम को मगन और उसकी प्रजा को आनन्दित बनाऊंगा।

22     ऐसा नहीं होगा कि वे बनाएं और दूसरा बसे; वा वे लगाएं, और दूसरा खाए; क्योंकि मेरी प्रजा की आयु वृक्षों की सी होगी, और मेरे चुने हुए अपने कामों का पूरा लाभ उठाएंगे।

23     उनका परिश्रम व्यर्थ न होगा, न उनके बालक घबराहट के लिये उत्पन्न होंगे।

9. Isaiah 65 : 13 (to 1st ,), 18 (behold), 22, 23 (to ;)

13     Therefore thus saith the Lord God,

18     ...behold, I create Jerusalem a rejoicing, and her people a joy.

22     They shall not build, and another inhabit; they shall not plant, and another eat: for as the days of a tree are the days of my people, and mine elect shall long enjoy the work of their hands.

23     They shall not labour in vain, nor bring forth for trouble;

10. 1 कुरिन्थियों 3: 9

9     क्योंकि हम परमेश्वर के सहकर्मी हैं; तुम परमेश्वर की खेती और परमेश्वर की रचना हो।

10. I Corinthians 3 : 9

9     For we are labourers together with God: ye are God’s husbandry, ye are God’s building.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 468: 17 (पदार्थ)-24

पदार्थ वह है जो अनादि है और कलह और क्षय से असमर्थ है। सत्य, जीवन और प्रेम पदार्थ हैं, क्योंकि इब्रानियों में इस शब्द का उपयोग होता है: “विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है।" आत्मा, मन, आत्मा या ईश्वर का पर्यायवाची एकमात्र वास्तविक पदार्थ है। व्यक्ति सहित आध्यात्मिक ब्रह्मांड, एक यौगिक विचार है, वह आत्मा के दिव्य पदार्थ को दर्शाता है।

1. 468 : 17 (Substance)-24

Substance is that which is eternal and incapable of discord and decay. Truth, Life, and Love are substance, as the Scriptures use this word in Hebrews: "The substance of things hoped for, the evidence of things not seen." Spirit, the synonym of Mind, Soul, or God, is the only real substance. The spiritual universe, including individual man, is a compound idea, reflecting the divine substance of Spirit.

2. 301: 17-23

जैसा कि ईश्वर पदार्थ है और मनुष्य ईश्वरीय छवि और समानता है, मनुष्य को आत्मा के पदार्थ की इच्छा करनी चाहिए, केवल पदार्थ की, न कि पदार्थ की और वास्तव में उसने ऐसा किया है। यह विश्वास कि मनुष्य के पास कोई अन्य पदार्थ या मन है, आध्यात्मिक नहीं है और पहले आज्ञा को तोड़ता है, आप एक ईश्वर को, एक मन को स्वीकार करेंगे।

2. 301 : 17-23

As God is substance and man is the divine image and likeness, man should wish for, and in reality has, only the substance of good, the substance of Spirit, not matter. The belief that man has any other substance, or mind, is not spiritual and breaks the First Commandment, Thou shalt have one God, one Mind.

3. 507: 24-25, 28-31

अनंत मन मानसिक अणु से अनंत तक सभी को बनाता और नियंत्रित करता है। ... सृजन हमेशा दिखाई दे रहा है, और हमेशा अपने अटूट स्रोत की प्रकृति से प्रकट होता रहना चाहिए।

3. 507 : 24-25, 28-31

Infinite Mind creates and governs all, from the mental molecule to infinity. ... Creation is ever appearing, and must ever continue to appear from the nature of its inexhaustible source. Mortal sense inverts this appearing and calls ideas material.

4. 508: 2-6

लेकिन बीज अपने आप में है, केवल दिव्य मन ही सब कुछ है और सभी को पुन: उत्पन्न करता है — जैसा कि मन गुणक है, और मन का अनंत विचार, मनुष्य और ब्रह्मांड, उत्पाद है। एक विचार, एक बीज, या एक फूल की एकमात्र बुद्धि या पदार्थ ईश्वर है, जो इसका निर्माता है।

4. 508 : 2-6

But the seed is in itself, only as the divine Mind is All and reproduces all — as Mind is the multiplier, and Mind's infinite idea, man and the universe, is the product. The only intelligence or substance of a thought, a seed, or a flower is God, the creator of it.

5. 278: 30-5

यदि आत्मा पर्याप्त और शाश्वत है, तो पदार्थ, उसकी मृत्यु दर के साथ, पर्याप्त नहीं हो सकता। हमारे लिए कौन सा पदार्थ होना चाहिए, — ग़लती से, बदलते हुए, परिवर्तनशील और नश्वर, या बेरोकटोक, अपरिवर्तनीय और अमर चीज़? एक नए नियम का लेखक स्पष्ट रूप से विश्वास का वर्णन करता है, मन का एक गुण, "आशा की गई वस्तुओं का सार" के रूप में।

5. 278 : 30-5

Matter, with its mortality, cannot be substantial if Spirit is substantial and eternal. Which ought to be substance to us, — the erring, changing, and dying, the mutable and mortal, or the unerring, immutable, and immortal? A New Testament writer plainly describes faith, a quality of mind, as "the substance of things hoped for."

6. 12: 31-4

दिव्य विज्ञान में, जहां प्रार्थनाएं मानसिक होती हैं, वहां सभी ईश्वर का लाभ उठा सकते हैं जो "संकट में अति सहज से सहायक" है प्रेम अपने अनुकूलन और सर्वश्रेष्ठ में निष्पक्ष और सार्वभौमिक है। यह खुला फव्वारा है जो कहता है, "हो, हर एक कि प्यास, तुम पानी के करीब आओ।"

6. 12 : 31-4

In divine Science, where prayers are mental, all may avail themselves of God as "a very present help in trouble." Love is impartial and universal in its adaptation and bestowals. It is the open fount which cries, "Ho, every one that thirsteth, come ye to the waters."

7. 7: 23-26

ईश्वर मनुष्य से प्रभावित नहीं होता. "दिव्य कान" श्रवण तंत्रिका नहीं है। यह सर्व-श्रवण और सर्व-ज्ञान मन है, जिनके लिए मनुष्य की प्रत्येक आवश्यकता को हमेशा जाना जाता है और जिनके द्वारा इसकी आपूर्ति की जाएगी।

7. 7 : 23-26

God is not influenced by man. The "divine ear" is not an auditory nerve. It is the all-hearing and all-knowing Mind, to whom each need of man is always known and by whom it will be supplied.

8. 494: 10-19

ईश्वरीय प्रेम हमेशा से मिला है और हमेशा हर मानवीय आवश्यकता को पूरा करेगा। यह कल्पना करना ठीक नहीं है कि यीशु ने दिव्य शक्ति का चयन केवल संख्या के लिए या सीमित समय के लिए ठीक करने के लिए किया, क्योंकि सभी मानव जाति के लिए और सभी समयों में, दिव्य प्रेम सभी अच्छे की आपूर्ति करता है।

कृपा का चमत्कार प्रेम का कोई चमत्कार नहीं है। यीशु ने शारीरिक शक्ति के साथ-साथ आत्मा की असीम क्षमता की अक्षमता का प्रदर्शन किया, इस प्रकार मानव भावना को अपने स्वयं के दोषों से भागने में मदद करने और दिव्य विज्ञान में सुरक्षा की तलाश करने के लिए।

8. 494 : 10-19

Divine Love always has met and always will meet every human need. It is not well to imagine that Jesus demonstrated the divine power to heal only for a select number or for a limited period of time, since to all mankind and in every hour, divine Love supplies all good.

The miracle of grace is no miracle to Love. Jesus demonstrated the inability of corporeality, as well as the infinite ability of Spirit, thus helping erring human sense to flee from its own convictions and seek safety in divine Science.

9. 326: 3-11

यदि हम मसीह, सत्य का पालन करना चाहते हैं, तो यह भगवान की नियुक्ति के रास्ते में होना चाहिए। यीशु ने यह कहा: "कि जो मुझ पर विश्वास रखता है, ये काम जो मैं करता हूं वह भी करेगा।" वह, जो स्रोत तक पहुंच जाएगा और हर बीमार के लिए दिव्य उपाय ढूंढेगा, उसे किसी अन्य सड़क से विज्ञान की पहाड़ी पर चढ़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। सभी प्रकृति मनुष्य को ईश्वर का प्यार सिखाती है, लेकिन मनुष्य ईश्वर से प्रेम नहीं कर सकता है और आध्यात्मिक चीजों पर अपना पूरा प्यार कायम कर सकता है, जबकि सामग्री से प्रेम कर सकता है या आध्यात्मिक से अधिक उस पर भरोसा कर सकता है।

9. 326 : 3-11

If we wish to follow Christ, Truth, it must be in the way of God's appointing. Jesus said, "He that believeth on me, the works that I do shall he do also." He, who would reach the source and find the divine remedy for every ill, must not try to climb the hill of Science by some other road. All nature teaches God's love to man, but man cannot love God supremely and set his whole affections on spiritual things, while loving the material or trusting in it more than in the spiritual.

10. 454: 18-24

प्रेम प्रेरणा देता है, रोशनी करता है, नामित करता है और मार्ग प्रशस्त करता है। सही इरादों ने विचार, और ताकत और बोलने और कार्रवाई करने की स्वतंत्रता को चुटकी दी। सत्य की वेदी पर प्रेम पुरोहिती है। दिव्य प्रेम के लिए धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करें नश्वर मन के पानी पर आगे बढ़ने के लिए, और सही अवधारणा बनाएं। धीरज "को अपना पूरा काम करने दो॥"

10. 454 : 18-24

Love inspires, illumines, designates, and leads the way. Right motives give pinions to thought, and strength and freedom to speech and action. Love is priestess at the altar of Truth. Wait patiently for divine Love to move upon the waters of mortal mind, and form the perfect concept. Patience must "have her perfect work."

11. 170: 14-17

सत्य की मांगें आध्यात्मिक हैं, और मन के माध्यम से शरीर तक पहुंचती हैं। मनुष्य की आवश्यकताओं के सर्वोत्तम व्याख्याकार ने कहा: "कि अपने प्राण के लिये यह चिन्ता न करना कि हम क्या खाएंगे, और क्या पीएंगे।"

11. 170 : 14-17

The demands of Truth are spiritual, and reach the body through Mind. The best interpreter of man's needs said: "Take no thought for your life, what ye shall eat, or what ye shall drink."

12. 254: 6-12, 19 (यह)-23

ईश्वर को पूर्णता की आवश्यकता है, लेकिन तब तक नहीं जब तक आत्मा और शरीर के बीच लड़ाई नहीं लड़ी जाती और जीत हासिल नहीं हो जाती। अस्तित्व के आध्यात्मिक तथ्य चरण दर चरण प्राप्त होने से पहले खाना, पीना या भौतिक रूप से कपड़े पहनना बंद करना वैध नहीं है। जब हम धैर्यपूर्वक ईश्वर की प्रतीक्षा करते हैं और सत्य की तलाश करते हैं, तो वह हमारे मार्ग का निर्देशन करता है।

... मानव स्वयं को प्रचारित करना चाहिए। यह कार्य ईश्वर हमें आज प्रेमपूर्वक स्वीकार करने के लिए, और इतनी तेजी से व्यावहारिक सामग्री को छोड़ने के लिए, और आध्यात्मिक कार्य करने के लिए कहता है जो बाहरी और वास्तविक को निर्धारित करता है।

12. 254 : 6-12, 19 (the)-23

God requires perfection, but not until the battle between Spirit and flesh is fought and the victory won. To stop eating, drinking, or being clothed materially before the spiritual facts of existence are gained step by step, is not legitimate. When we wait patiently on God and seek Truth righteously, He directs our path.

...the human self must be evangelized. This task God demands us to accept lovingly to-day, and to abandon so fast as practical the material, and to work out the spiritual which determines the outward and actual.

13. 79: 29-3

माइंड-साइंस सिखाता है कि मनुष्यों को "अच्छे कामों में थके हुए नहीं होना चाहिए।" यह अच्छा करने में थकावट दूर करता है। देने से हमें अपने निर्माता की सेवा में कमजोर नहीं पड़ता है, और न ही हमें समृद्ध बनाता है। हमारे पास सत्य के बारे में हमारी आशंका के अनुपात में ताकत है, और सच्चाई को प्रदर्शन देने से हमारी ताकत कम नहीं है।

13. 79 : 29-3

Mind-science teaches that mortals need "not be weary in well doing." It dissipates fatigue in doing good. Giving does not impoverish us in the service of our Maker, neither does withholding enrich us. We have strength in proportion to our apprehension of the truth, and our strength is not lessened by giving utterance to truth.

14. 261: 32-8

हर घंटे आदमी की अच्छी मांग, जिसमें होने की समस्या को हल करना। भलाई के प्रति समर्पण मनुष्य की ईश्वर पर निर्भरता को कम नहीं करता, बल्कि उसे बढ़ाता है। न तो अभिषेक परमेश्वर के प्रति मनुष्य के दायित्वों को कम करता है, बल्कि उनसे मिलने की सर्वोपरि आवश्यकता को दर्शाता है। क्रिश्चियन साइंस भगवान की पूर्णता से शून्य है, लेकिन यह उसे पूरी महिमा का वर्णन करता है। "बूढ़े आदमी को उसके कामों से दूर करने" के द्वारा, नश्वर "अमरता को पहिन लेते हैं।"

14. 261 : 32-8

Good demands of man every hour, in which to work out the problem of being. Consecration to good does not lessen man's dependence on God, but heightens it. Neither does consecration diminish man's obligations to God, but shows the paramount necessity of meeting them. Christian Science takes naught from the perfection of God, but it ascribes to Him the entire glory. By putting "off the old man with his deeds," mortals "put on immortality."

15. 264: 7-12, 15-19

नश्वर प्राणियों को लुप्त होती, सीमित आकृतियों से परे देखना होगा, यदि वे चीजों का सही अर्थ प्राप्त कर सकें। मन के अज्ञात क्षेत्र के अतिरिक्त दृष्टि कहाँ विश्राम करेगी? हमें यह देखना चाहिए कि हम कहाँ चलेंगे, और हमें उससे सारी शक्ति प्राप्त करने के रूप में कार्य करना चाहिए जिसमें हमारा अस्तित्व है।

जब हम महसूस करते हैं कि जीवन आत्मा है, तो कभी भी नहीं, न ही इस मामले में, यह समझ आत्म-पूर्णता में विस्तारित होगी, सभी को ईश्वर में मिल जाएगी, अच्छा होगा, और किसी अन्य चेतना की आवश्यकता नहीं होगी।

15. 264 : 7-12, 15-19

Mortals must look beyond fading, finite forms, if they would gain the true sense of things. Where shall the gaze rest but in the unsearchable realm of Mind? We must look where we would walk, and we must act as possessing all power from Him in whom we have our being.

When we realize that Life is Spirit, never in nor of matter, this understanding will expand into self-completeness, finding all in God, good, and needing no other consciousness.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6