रविवार 17 नवंबर, 2019 |

रविवार 17 नवंबर, 2019



विषयनश्वर और अमर

SubjectMortals and Immortals

वर्ण पाठ: रोमियो 6: 23

परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है॥



Golden Text: Romans 6 : 23

The gift of God is eternal life through Jesus Christ our Lord.




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भजन संहिता 23: 1-6


1     यहोवा मेरा चरवाहा है, मुझे कुछ घटी न होगी।

2     वह मुझे हरी हरी चराइयों में बैठाता है; वह मुझे सुखदाई जल के झरने के पास ले चलता है;

3     वह मेरे जी में जी ले आता है। धर्म के मार्गो में वह अपने नाम के निमित्त मेरी अगुवाई करता है।

4     चाहे मैं घोर अन्धकार से भरी हुई तराई में होकर चलूं, तौभी हानि से न डरूंगा, क्योंकि तू मेरे साथ रहता है; तेरे सोंटे और तेरी लाठी से मुझे शान्ति मिलती है॥

5     तू मेरे सताने वालों के साम्हने मेरे लिये मेज बिछाता है; तू ने मेरे सिर पर तेल मला है, मेरा कटोरा उमण्ड रहा है।

6     निश्चय भलाई और करूणा जीवन भर मेरे साथ साथ बनी रहेंगी; और मैं यहोवा के धाम में सर्वदा वास करूंगा॥

Responsive Reading: Psalm 23 : 1-6

1.     The Lord is my shepherd; I shall not want.

2.     He maketh me to lie down in green pastures: he leadeth me beside the still waters.

3.     He restoreth my soul: he leadeth me in the paths of righteousness for his name’s sake.

4.     Yea, though I walk through the valley of the shadow of death, I will fear no evil: for thou art with me; thy rod and thy staff they comfort me.

5.     Thou preparest a table before me in the presence of mine enemies: thou anointest my head with oil; my cup runneth over.

6.     Surely goodness and mercy shall follow me all the days of my life: and I will dwell in the house of the Lord for ever.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. यूहन्ना 3 : 16 (परमेश्वर), 17

16     क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।

17     परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिये नहीं भेजा, कि जगत पर दंड की आज्ञा दे परन्तु इसलिये कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए।

1. John 3 : 16 (God), 17

16     God so loved the world, that he gave his only begotten Son, that whosoever believeth in him should not perish, but have everlasting life.

17     For God sent not his Son into the world to condemn the world; but that the world through him might be saved.

2. I तीमुथियुस 1 : 12 (मैं), 13, 15, 16

12     और मैं, अपने प्रभु मसीह यीशु का, जिस ने मुझे सामर्थ दी है, धन्यवाद करता हूं; कि उस ने मुझे विश्वास योग्य समझकर अपनी सेवा के लिये ठहराया।

13     मैं तो पहिले निन्दा करने वाला, और सताने वाला, और अन्धेर करने वाला था; तौभी मुझ पर दया हुई, क्योंकि मैं ने अविश्वास की दशा में बिन समझे बूझे, ये काम किए थे।

15     यह बात सच और हर प्रकार से मानने के योग्य है, कि मसीह यीशु पापियों का उद्धार करने के लिये जगत में आया, जिन में सब से बड़ा मैं हूं।

16     पर मुझ पर इसलिये दया हुई, कि मुझ सब से बड़े पापी में यीशु मसीह अपनी पूरी सहनशीलता दिखाए, कि जो लोग उस पर अनन्त जीवन के लिये विश्वास करेंगे, उन के लिये मैं एक आदर्श बनूं।

2. I Timothy 1 : 12 (I), 13, 15, 16

12     I thank Christ Jesus our Lord, who hath enabled me, for that he counted me faithful, putting me into the ministry;

13     Who was before a blasphemer, and a persecutor, and injurious: but I obtained mercy, because I did it ignorantly in unbelief.

15     This is a faithful saying, and worthy of all acceptation, that Christ Jesus came into the world to save sinners; of whom I am chief.

16     Howbeit for this cause I obtained mercy, that in me first Jesus Christ might shew forth all longsuffering, for a pattern to them which should hereafter believe on him to life everlasting.

3. यूहन्ना 10 : 7 (से यीशु), 14 (से 1st ,), 27-30

7     तब यीशु ने कहा...

14     अच्छा चरवाहा मैं हूं।

27     मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं, और मैं उन्हें जानता हूं, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं।

28     और मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूं, और वे कभी नाश न होंगी, और कोई उन्हें मेरे हाथ से छीन न लेगा।

29     मेरा पिता, जिस ने उन्हें मुझ को दिया है, सब से बड़ा है, और कोई उन्हें पिता के हाथ से छीन नहीं सकता।

30     मैं और पिता एक हैं।

1. लूका 18 : 18-30

18     किसी सरदार ने उस से पूछा, हे उत्तम गुरू, अनन्त जीवन का अधिकारी होने के लिये मैं क्या करूं?

19     यीशु ने उस से कहा; तू मुझे उत्तम क्यों कहता है? कोई उत्तम नहीं, केवल एक, अर्थात परमेश्वर।

20     तू आज्ञाओं को तो जानता है, कि व्यभिचार न करना, हत्या न करना, और चोरी न करना, झूठी गवाही न देना, अपने पिता और अपनी माता का आदर करना।

21     उस ने कहा, मैं तो इन सब को लड़कपन ही से मानता आया हूं।

22     यह सुन, यीशु ने उस से कहा, तुझ में अब भी एक बात की घटी है, अपना सब कुछ बेच कर कंगालों को बांट दे; और तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा, और आकर मेरे पीछे हो ले।

23     वह यह सुनकर बहुत उदास हुआ, क्योंकि वह बड़ा धनी था।

24     यीशु ने उसे देख कर कहा; धनवानों का परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना कैसा कठिन है?

25     परमेश्वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊंट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है।

26     और सुनने वालों ने कहा, तो फिर किस का उद्धार हो सकता है?

27     उस ने कहा; जो मनुष्य से नहीं हो सकता, वह परमेश्वर से हो सकता है।

28     पतरस ने कहा; देख, हम तो घर बार छोड़कर तेरे पीछे हो लिये हैं।

29     उस ने उन से कहा; मैं तुम से सच कहता हूं, कि ऐसा कोई नहीं जिस ने परमेश्वर के राज्य के लिये घर या पत्नी या भाइयों या माता पिता या लड़के-बालों को छोड़ दिया हो।

30     और इस समय कई गुणा अधिक न पाए; और परलोक में अनन्त जीवन॥

3. John 10 : 7 (to Jesus), 14 (to 1st ,), 27-30

7     Then said Jesus…

14     I am the good shepherd,

27     My sheep hear my voice, and I know them, and they follow me:

28     And I give unto them eternal life; and they shall never perish, neither shall any man pluck them out of my hand.

29     My Father, which gave them me, is greater than all; and no man is able to pluck them out of my Father’s hand.

30     I and my Father are one.

4. मत्ती 25 : 31-46

31     जब मनुष्य का पुत्र अपनी महिमा में आएगा, और सब स्वर्ग दूत उसके साथ आएंगे तो वह अपनी महिमा के सिहांसन पर विराजमान होगा।

32     और सब जातियां उसके साम्हने इकट्ठी की जाएंगी; और जैसा चरवाहा भेड़ों को बकिरयों से अलग कर देता है, वैसा ही वह उन्हें एक दूसरे से अलग करेगा।

33     और वह भेड़ों को अपनी दाहिनी ओर और बकिरयों को बाई और खड़ी करेगा।

34     तब राजा अपनी दाहिनी ओर वालों से कहेगा, हे मेरे पिता के धन्य लोगों, आओ, उस राज्य के अधिकारी हो जाओ, जो जगत के आदि से तुम्हारे लिये तैयार किया हुआ है।

35     क्योंकि मैं भूखा था, और तुम ने मुझे खाने को दिया; मैं प्यासा था, और तुम ने मुझे पानी पिलाया, मैं पर देशी था, तुम ने मुझे अपने घर में ठहराया।

36     मैं नंगा था, तुम ने मुझे कपड़े पहिनाए; मैं बीमार था, तुम ने मेरी सुधि ली, मैं बन्दीगृह में था, तुम मुझ से मिलने आए।

37     तब धर्मी उस को उत्तर देंगे कि हे प्रभु, हम ने कब तुझे भूखा देखा और खिलाया? या प्यासा देखा, और पिलाया?

38     हम ने कब तुझे पर देशी देखा और अपने घर में ठहराया या नंगा देखा, और कपड़े पहिनाए?

39     हम ने कब तुझे बीमार या बन्दीगृह में देखा और तुझ से मिलने आए?

40     तब राजा उन्हें उत्तर देगा; मैं तुम से सच कहता हूं, कि तुम ने जो मेरे इन छोटे से छोटे भाइयों में से किसी एक के साथ किया, वह मेरे ही साथ किया।

41     तब वह बाईं ओर वालों से कहेगा, हे स्रापित लोगो, मेरे साम्हने से उस अनन्त आग में चले जाओ, जो शैतान और उसके दूतों के लिये तैयार की गई है।

42     क्योंकि मैं भूखा था, और तुम ने मुझे खाने को नहीं दिया, मैं प्यासा था, और तुम ने मुझे पानी नहीं पिलाया।

43     मैं परदेशी था, और तुम ने मुझे अपने घर में नहीं ठहराया; मैं नंगा था, और तुम ने मुझे कपड़े नहीं पहिनाए; बीमार और बन्दीगृह में था, और तुम ने मेरी सुधि न ली।

44     तब वे उत्तर देंगे, कि हे प्रभु, हम ने तुझे कब भूखा, या प्यासा, या परदेशी, या नंगा, या बीमार, या बन्दीगृह में देखा, और तेरी सेवा टहल न की?

45     तब वह उन्हें उत्तर देगा, मैं तुम से सच कहता हूं कि तुम ने जो इन छोटे से छोटों में से किसी एक के साथ नहीं किया, वह मेरे साथ भी नहीं किया।

46     और यह अनन्त दण्ड भोगेंगे परन्तु धर्मी अनन्त जीवन में प्रवेश करेंगे।

4. Luke 18 : 18-30

18     And a certain ruler asked him, saying, Good Master, what shall I do to inherit eternal life?

19     And Jesus said unto him, Why callest thou me good? none is good, save one, that is, God.

20     Thou knowest the commandments, Do not commit adultery, Do not kill, Do not steal, Do not bear false witness, Honour thy father and thy mother.

21     And he said, All these have I kept from my youth up.

22     Now when Jesus heard these things, he said unto him, Yet lackest thou one thing: sell all that thou hast, and distribute unto the poor, and thou shalt have treasure in heaven: and come, follow me.

23     And when he heard this, he was very sorrowful: for he was very rich.

24     And when Jesus saw that he was very sorrowful, he said, How hardly shall they that have riches enter into the kingdom of God!

25     For it is easier for a camel to go through a needle’s eye, than for a rich man to enter into the kingdom of God.

26     And they that heard it said, Who then can be saved?

27     And he said, The things which are impossible with men are possible with God.

28     Then Peter said, Lo, we have left all, and followed thee.

29     And he said unto them, Verily I say unto you, There is no man that hath left house, or parents, or brethren, or wife, or children, for the kingdom of God’s sake,

30     Who shall not receive manifold more in this present time, and in the world to come life everlasting.

5. I कुरिन्थियों 15 : 50, 51, 53, 54

50     हे भाइयों, मैं यह कहता हूं कि मांस और लोहू परमेश्वर के राज्य के अधिकारी नहीं हो सकते, और न विनाश अविनाशी का अधिकारी हो सकता है।

51     देखे, मैं तुम से भेद की बात कहता हूं: कि हम सब तो नहीं सोएंगे, परन्तु सब बदल जाएंगे।

53     क्योंकि अवश्य है, कि यह नाशमान देह अविनाश को पहिन ले, और यह मरनहार देह अमरता को पहिन ले।

54     और जब यह नाशमान अविनाश को पहिन लेगा, और यह मरनहार अमरता को पहिन लेगा, तक वह वचन जो लिखा है, पूरा हो जाएगा, कि जय ने मृत्यु को निगल लिया।

5. Matthew 25 : 31-46

31     When the Son of man shall come in his glory, and all the holy angels with him, then shall he sit upon the throne of his glory:

32     And before him shall be gathered all nations: and he shall separate them one from another, as a shepherd divideth his sheep from the goats:

33     And he shall set the sheep on his right hand, but the goats on the left.

34     Then shall the King say unto them on his right hand, Come, ye blessed of my Father, inherit the kingdom prepared for you from the foundation of the world:

35     For I was an hungred, and ye gave me meat: I was thirsty, and ye gave me drink: I was a stranger, and ye took me in:

36     Naked, and ye clothed me: I was sick, and ye visited me: I was in prison, and ye came unto me.

37     Then shall the righteous answer him, saying, Lord, when saw we thee an hungred, and fed thee? or thirsty, and gave thee drink?

38     When saw we thee a stranger, and took thee in? or naked, and clothed thee?

39     Or when saw we thee sick, or in prison, and came unto thee?

40     And the King shall answer and say unto them, Verily I say unto you, Inasmuch as ye have done it unto one of the least of these my brethren, ye have done it unto me.

41     Then shall he say also unto them on the left hand, Depart from me, ye cursed, into everlasting fire, prepared for the devil and his angels:

42     For I was an hungred, and ye gave me no meat: I was thirsty, and ye gave me no drink:

43     I was a stranger, and ye took me not in: naked, and ye clothed me not: sick, and in prison, and ye visited me not.

44     Then shall they also answer him, saying, Lord, when saw we thee an hungred, or athirst, or a stranger, or naked, or sick, or in prison, and did not minister unto thee?

45     Then shall he answer them, saying, Verily I say unto you, Inasmuch as ye did it not to one of the least of these, ye did it not to me.

46     And these shall go away into everlasting punishment: but the righteous into life eternal.

6. I Corinthians 15 : 50, 51, 53, 54

50     Now this I say, brethren, that flesh and blood cannot inherit the kingdom of God; neither doth corruption inherit incorruption.

51     Behold, I shew you a mystery; We shall not all sleep, but we shall all be changed,

53     For this corruptible must put on incorruption, and this mortal must put on immortality.

54     So when this corruptible shall have put on incorruption, and this mortal shall have put on immortality, then shall be brought to pass the saying that is written, Death is swallowed up in victory.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 42 : 26 (में)-28

... ईसाई विज्ञान में सच्चा मनुष्य ईश्वर द्वारा शासित है - अच्छाई से, बुराई से नहीं - और इसलिए वह नश्वर नहीं बल्कि अमर है।

1. 42 : 26 (in)-28

… in Christian Science the true man is governed by God — by good, not evil — and is therefore not a mortal but an immortal.

2. 295 : 5-15

भगवान मनुष्य सहित ब्रह्मांड का निर्माण और संचालन करता है। ब्रह्मांड आध्यात्मिक विचारों से भरा है, जिसे वह विकसित करता है, और वे मन के आज्ञाकारी हैं जो उन्हें बनाता है। नश्वर मन आध्यात्मिक को भौतिक में बदल देगा, और फिर इस त्रुटि की नश्वरता से बचने के लिए मनुष्य के मूल स्व को पुनर्प्राप्त करेगा। ईश्वर की स्वयं की छवि में बनाए गए नश्वर अमर की तरह नहीं हैं; लेकिन अनंत आत्मा सभी होने के नाते, नश्वर चेतना वैज्ञानिक तथ्य के लिए अंतिम पैदावार होगी और गायब हो जाएगी, और सही, और हमेशा के लिए होने का वास्तविक अर्थ प्रकट होगा।

2. 295 : 5-15

God creates and governs the universe, including man. The universe is filled with spiritual ideas, which He evolves, and they are obedient to the Mind that makes them. Mortal mind would transform the spiritual into the material, and then recover man’s original self in order to escape from the mortality of this error. Mortals are not like immortals, created in God’s own image; but infinite Spirit being all, mortal consciousness will at last yield to the scientific fact and disappear, and the real sense of being, perfect and forever intact, will appear.

3. 190 : 14-20

मानव जन्म, वृद्धि, परिपक्वता, और क्षय के रूप में घास से वसंत के रूप में सुंदर हरे रंग के ब्लेड के साथ होते हैं, बाद में मुरझा जाते हैं और अपनी मूल शून्य पर लौट आते हैं। यह नश्वर लगने वाला लौकिक है; यह कभी भी अमर होने में विलीन नहीं होता है, लेकिन अंत में गायब हो जाता है, और अमर आदमी, आध्यात्मिक और शाश्वत, वास्तविक आदमी पाया जाता है।

3. 190 : 14-20

Human birth, growth, maturity, and decay are as the grass springing from the soil with beautiful green blades, afterwards to wither and return to its native nothingness. This mortal seeming is temporal; it never merges into immortal being, but finally disappears, and immortal man, spiritual and eternal, is found to be the real man.

4. 476 : 1-5, 10-20, 28-32

नश्वर अमर के नकली हैं। दिव्य विज्ञान में, ईश्वर और वास्तविक मनुष्य दिव्य सिद्धांत और विचार के रूप में अविभाज्य हैं।दिव्य विज्ञान में, ईश्वर और वास्तविक मनुष्य ईश्वरीय सिद्धांत और विचार के रूप में अविभाज्य हैं।

इसलिए मनुष्य न तो नश्वर है और न ही भौतिक। नश्वर गायब हो जाएंगे, और अमर होंगे, या भगवान की संतान, मनुष्य के एकमात्र और अनन्त सत्य के रूप में दिखाई देंगे। मुर्दा भगवान के बच्चे नहीं हैं। उनके पास कभी भी पूर्ण राज्य नहीं था, जिसे बाद में फिर से हासिल किया जा सकता है। वे नश्वर इतिहास की शुरुआत से थे, "पाप में कल्पना की और अधर्म में माता के गर्भ में लाया।" मृत्यु दर अंततः अमरता में निगल जाती है। पाप, बीमारी, और मृत्यु को उन तथ्यों को जगह देनी होगी जो अमर आदमी के हैं।

जब यीशु ने परमेश्वर के बच्चों की बात की, न कि पुरुषों के बच्चों की, तो उन्होंने कहा, "परमेश्वर का राज्य तुम्हारे बीच में है;" इसका मतलब है, सत्य और प्रेम वास्तविक मनुष्य में राज्य करता है, यह दर्शाता है कि भगवान की छवि में आदमी बेदाग और शाश्वत है।

4. 476 : 1-5, 10-20, 28-32

Mortals are the counterfeits of immortals. They are the children of the wicked one, or the one evil, which declares that man begins in dust or as a material embryo. In divine Science, God and the real man are inseparable as divine Principle and idea.

Hence man is not mortal nor material. Mortals will disappear, and immortals, or the children of God, will appear as the only and eternal verities of man. Mortals are not fallen children of God. They never had a perfect state of being, which may subsequently be regained. They were, from the beginning of mortal history, “conceived in sin and brought forth in iniquity.” Mortality is finally swallowed up in immortality. Sin, sickness, and death must disappear to give place to the facts which belong to immortal man.

When speaking of God’s children, not the children of men, Jesus said, “The kingdom of God is within you;” that is, Truth and Love reign in the real man, showing that man in God’s image is unfallen and eternal.

5. 296 : 4-13

प्रगति अनुभव से पैदा होती है। यह नश्वर मनुष्य का पकना है, जिसके माध्यम से नश्वर को अमर के लिए गिरा दिया जाता है। या तो यहां या उसके बाद, पीड़ित या विज्ञान को जीवन और मन के बारे में सभी भ्रमों को नष्ट करना होगा, और भौतिक भावना और स्वयं को पुन: उत्पन्न करना होगा। अपने कर्मों के साथ पुरानी मानवता को बंद करना होगा। कामुक या पापी कुछ भी अमर नहीं है। एक झूठी भौतिक भावना और पाप की मृत्यु, कार्बनिक पदार्थों की मृत्यु नहीं है, जो मनुष्य और जीवन, सामंजस्यपूर्ण, वास्तविक और शाश्वत को प्रकट करती है।

5. 296 : 4-13

Progress is born of experience. It is the ripening of mortal man, through which the mortal is dropped for the immortal. Either here or hereafter, suffering or Science must destroy all illusions regarding life and mind, and regenerate material sense and self. The old man with his deeds must be put off. Nothing sensual or sinful is immortal. The death of a false material sense and of sin, not the death of organic matter, is what reveals man and Life, harmonious, real, and eternal.

6. 496 : 20-27

"मृत्यु का डंक पाप है; और पाप का बल व्यवस्था है," — नश्वर विश्वास के कानून, अमर जीवन के तथ्यों के साथ युद्ध पर, यहां तक कि आध्यात्मिक कानून जो कब्र को कहते हैं, "तुम्हारी जीत कहाँ है?" परंतु "जब यह नाशमान अविनाश को पहिन लेगा, और यह मरनहार अमरता को पहिन लेगा, तक वह वचन जो लिखा है, पूरा हो जाएगा, कि जय ने मृत्यु को निगल लिया।"

6. 496 : 20-27

“The sting of death is sin; and the strength of sin is the law,” — the law of mortal belief, at war with the facts of immortal Life, even with the spiritual law which says to the grave, “Where is thy victory?” But “when this corruptible shall have put on incorruption, and this mortal shall have put on immortality, then shall be brought to pass the saying that is written, Death is swallowed up in victory.”

7. 428 : 22-29

महान आध्यात्मिक तथ्य को सामने लाना चाहिए कि मनुष्य है, पूर्ण और अमर नहीं। हमें हमेशा अस्तित्व की चेतना को धारण करना चाहिए, और जल्द ही या बाद में, मसीह और ईसाई विज्ञान के माध्यम से, हमें पाप और मृत्यु पर नियंत्रण रखना चाहिए। मनुष्य की अमरता के प्रमाण अधिक स्पष्ट हो जाएंगे, क्योंकि भौतिक विश्वासों को छोड़ दिया जाता है और होने के अमर तथ्यों को स्वीकार किया जाता है।

7. 428 : 22-29

The great spiritual fact must be brought out that man is, not shall be, perfect and immortal. We must hold forever the consciousness of existence, and sooner or later, through Christ and Christian Science, we must master sin and death. The evidence of man’s immortality will become more apparent, as material beliefs are given up and the immortal facts of being are admitted.

8. 246 : 27-31

जीवन शाश्वत है। हमें इसका पता लगाना चाहिए, और इसके बाद प्रदर्शन शुरू करना चाहिए। जीवन और अच्छाई अमर है। आइए फिर हम उम्र और तुषार के बजाय अपने अस्तित्व के विचारों को प्रेम, ताजगी और निरंतरता में आकार दें।

8. 246 : 27-31

Life is eternal. We should find this out, and begin the demonstration thereof. Life and goodness are immortal. Let us then shape our views of existence into loveliness, freshness, and continuity, rather than into age and blight.

9. 247 : 10-18

सौंदर्य, साथ ही सत्य, शाश्वत है; लेकिन भौतिक चीजों की सुंदरता नश्वर विश्वास के रूप में दूर, लुप्त होती और क्षणभंगुर हो जाती है। कस्टम, शिक्षा और फैशन नश्वर लोगों के क्षणिक मानकों का निर्माण करते हैं। अमरता, उम्र या क्षय से मुक्त, अपनी खुद की एक महिमा है, - आत्मा की चमक। अमर पुरुष और महिला आध्यात्मिक भावना के उदाहरण हैं, पूर्ण मन से खींचे गए और प्रेम के उन उच्च अवधारणाओं को दर्शाते हैं जो अपनी भौतिक भावना को पार करते हैं।

9. 247 : 10-18

Beauty, as well as truth, is eternal; but the beauty of material things passes away, fading and fleeting as mortal belief. Custom, education, and fashion form the transient standards of mortals. Immortality, exempt from age or decay, has a glory of its own, — the radiance of Soul. Immortal men and women are models of spiritual sense, drawn by perfect Mind and reflecting those higher conceptions of loveliness which transcend all material sense.

10. 495 : 14-24

जब बीमारी या पाप का भ्रम आपको झकझोरता है, ईश्वर और उसके विचार के प्रति दृढ़ रहना अपने विचार में पालन करने के लिए उसकी समानता के अलावा कुछ भी अनुमति न दें। न तो डर और न ही संदेह को अपनी स्पष्ट भावना और शांत विश्वास का पालन करें, कि जीवन के सामंजस्यपूर्ण जीवन की मान्यता - जैसा कि जीवन है - किसी भी दर्दनाक भावना, या विश्वास को नष्ट कर सकता है, जो जीवन नहीं है। क्रिश्चियन साइंस, कॉरपोरल सेंस के बजाय अपनी होने की समझ का समर्थन करें, और यह समझ सच्चाई के साथ त्रुटि को दबा देगी, मृत्यु दर को अमरता से बदल देगी, और सद्भाव के साथ चुप्पी को दूर करेगी।

10. 495 : 14-24

When the illusion of sickness or sin tempts you, cling steadfastly to God and His idea. Allow nothing but His likeness to abide in your thought. Let neither fear nor doubt overshadow your clear sense and calm trust, that the recognition of life harmonious — as Life eternally is — can destroy any painful sense of, or belief in, that which Life is not. Let Christian Science, instead of corporeal sense, support your understanding of being, and this understanding will supplant error with Truth, replace mortality with immortality, and silence discord with harmony.

11. 76 : 22-31

पाप रहित आनन्द, - जीवन की पूर्ण सद्भाव और अमरता, एक दिव्य सुख या पीड़ा के बिना असीमित दिव्य सौंदर्य और अच्छाई का होना, - एकमात्र सत्य, अविनाशी पुरुष का निर्माण करता है, जिसका अस्तित्व आध्यात्मिक है। अस्तित्व की यह स्थिति वैज्ञानिक और अक्षुण्ण है, - एक पूर्णता केवल उन लोगों द्वारा समझ में आती है जिनके पास दिव्य विज्ञान में मसीह की अंतिम समझ है। मृत्यु कभी अस्तित्व की इस स्थिति को जल्दबाजी नहीं कर सकती, क्योंकि अमरता प्रकट होने से पहले मृत्यु को दूर करना होगा, प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।

11. 76 : 22-31

The sinless joy, — the perfect harmony and immortality of Life, possessing unlimited divine beauty and goodness without a single bodily pleasure or pain, — constitutes the only veritable, indestructible man, whose being is spiritual. This state of existence is scientific and intact, — a perfection discernible only by those who have the final understanding of Christ in divine Science. Death can never hasten this state of existence, for death must be overcome, not submitted to, before immortality appears.

12. 288 : 27-28

विज्ञान अमर मानव की गौरवशाली संभावनाओं को प्रकट करता है, नश्वर इंद्रियों द्वारा हमेशा के लिए असीमित।

12. 288 : 27-28

Science reveals the glorious possibilities of immortal man, forever unlimited by the mortal senses.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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