रविवार 17 अप्रैल, 2022



विषयप्रायश्चित का सिद्धांत

SubjectDoctrine of Atonement

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: यूहन्ना 10 : 30

"मैं और पिता एक हैं।"”- क्राइस्ट जीसस



Golden Text: John 10 : 30

I and my Father are one.”— Christ Jesus




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उत्तरदायी अध्ययन: यूहन्ना 17: 1, 2, 19-23


1     यीशु ने ये बातें कहीं और अपनी आंखे आकाश की ओर उठाकर कहा, हे पिता, वह घड़ी आ पहुंची, अपने पुत्र की महिमा कर, कि पुत्र भी तेरी महिमा करे।

2     क्योंकि तू ने उस को सब प्राणियों पर अधिकार दिया, कि जिन्हें तू ने उस को दिया है, उन सब को वह अनन्त जीवन दे।

19     और उन के लिये मैं अपने आप को पवित्र करता हूं ताकि वे भी सत्य के द्वारा पवित्र किए जाएं।

20     मैं केवल इन्हीं के लिये बिनती नहीं करता, परन्तु उन के लिये भी जो इन के वचन के द्वारा मुझ पर विश्वास करेंगे, कि वे सब एक हों।

21     जैसा तू हे पिता मुझ में हैं, और मैं तुझ में हूं, वैसे ही वे भी हम में हों, इसलिये कि जगत प्रतीति करे, कि तू ही ने मुझे भेजा।

22     और वह महिमा जो तू ने मुझे दी, मैं ने उन्हें दी है कि वे वैसे ही एक हों जैसे की हम एक हैं।

23     मैं उन में और तू मुझ में कि वे सिद्ध होकर एक हो जाएं, और जगत जाने कि तू ही ने मुझे भेजा, और जैसा तू ने मुझ से प्रेम रखा, वैसा ही उन से प्रेम रखा।

Responsive Reading: John 17 : 1, 2, 19-23

1.     These words spake Jesus, and lifted up his eyes to heaven, and said, Father, the hour is come; glorify thy Son, that thy Son also may glorify thee:

2.     As thou hast given him power over all flesh, that he should give eternal life to as many as thou hast given him.

19.     And for their sakes I sanctify myself, that they also might be sanctified through the truth.

20.     Neither pray I for these alone, but for them also which shall believe on me through their word;

21.     That they all may be one; as thou, Father, art in me, and I in thee, that they also may be one in us: that the world may believe that thou hast sent me.

22.     And the glory which thou gavest me I have given them; that they may be one, even as we are one:

23.     I in them, and thou in me, that they may be made perfect in one; and that the world may know that thou hast sent me, and hast loved them, as thou hast loved me.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. मत्ती 4: 17

17     उस समय से यीशु प्रचार करना और यह कहना आरम्भ किया, कि मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है।

1. Matthew 4 : 17

17     From that time Jesus began to preach, and to say, Repent: for the kingdom of heaven is at hand.

2. यूहन्ना 13: 31

31     जब वह बाहर चला गया तो यीशु ने कहा; अब मनुष्य पुत्र की महिमा हुई, और परमेश्वर की महिमा उस में हुई।

2. John 13 : 31

31     Therefore, when he was gone out, Jesus said, Now is the Son of man glorified, and God is glorified in him.

3. यूहन्ना 14: 2, 8-12

2     मेरे पिता के घर में बहुत से रहने के स्थान हैं, यदि न होते, तो मैं तुम से कह देता क्योंकि मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूं।

8     फिलेप्पुस ने उस से कहा, हे प्रभु, पिता को हमें दिखा दे: यही हमारे लिये बहुत है।

9     यीशु ने उस से कहा; हे फिलेप्पुस, मैं इतने दिन से तुम्हारे साथ हूं, और क्या तू मुझे नहीं जानता? जिस ने मुझे देखा है उस ने पिता को देखा है: तू क्यों कहता है कि पिता को हमें दिखा।

10     क्या तू प्रतीति नहीं करता, कि मैं पिता में हूं, और पिता मुझ में हैं? ये बातें जो मैं तुम से कहता हूं, अपनी ओर से नहीं कहता, परन्तु पिता मुझ में रहकर अपने काम करता है।

11     मेरी ही प्रतीति करो, कि मैं पिता में हूं; और पिता मुझ में है; नहीं तो कामों ही के कारण मेरी प्रतीति करो।

12     मैं तुम से सच सच कहता हूं, कि जो मुझ पर विश्वास रखता है, ये काम जो मैं करता हूं वह भी करेगा, वरन इन से भी बड़े काम करेगा, क्योंकि मैं पिता के पास जाता हूं।

3. John 14 : 2, 8-12

2     In my Father’s house are many mansions: if it were not so, I would have told you. I go to prepare a place for you.

8     Philip saith unto him, Lord, shew us the Father, and it sufficeth us.

9     Jesus saith unto him, Have I been so long time with you, and yet hast thou not known me, Philip? he that hath seen me hath seen the Father; and how sayest thou then, Shew us the Father?

10     Believest thou not that I am in the Father, and the Father in me? the words that I speak unto you I speak not of myself: but the Father that dwelleth in me, he doeth the works.

11     Believe me that I am in the Father, and the Father in me: or else believe me for the very works’ sake.

12     Verily, verily, I say unto you, He that believeth on me, the works that I do shall he do also; and greater works than these shall he do; because I go unto my Father.

4. यूहन्ना 19: 1-3, 16, 18 (से 1st.)

1     इस पर पीलातुस ने यीशु को लेकर कोड़े लगवाए।

2     और सिपाहियों ने कांटों का मुकुट गूंथकर उसके सिर पर रखा, और उसे बैंजनी वस्त्र पहिनाया।

3     और उसके पास आ आकर कहने लगे, हे यहूदियों के राजा, प्रणाम! और उसे थप्पड़ भी मारे।

16     तब उस ने उसे उन के हाथ सौंप दिया ताकि वह क्रूस पर चढ़ाया जाए॥

18     जहां उन्होंने उसे सूली पर चढ़ाया।

4. John 19 : 1-3, 16, 18 (to 1st ,)

1     Then Pilate therefore took Jesus, and scourged him.

2     And the soldiers platted a crown of thorns, and put it on his head, and they put on him a purple robe,

3     And said, Hail, King of the Jews! and they smote him with their hands.

16     Then delivered he him therefore unto them to be crucified. And they took Jesus, and led him away.

18     Where they crucified him.

5. यूहन्ना 20: 1, 11 (मेरी)-28

1     सप्ताह के पहिले दिन मरियम मगदलीनी भोर को अंधेरा रहते ही कब्र पर आई, और पत्थर को कब्र से हटा हुआ देखा।

11     परन्तु मरियम रोती हुई कब्र के पास ही बाहर खड़ी रही और रोते रोते कब्र की ओर झुककर,

12     दो स्वर्गदूतों को उज्ज़वल कपड़े पहिने हुए एक को सिरहाने और दूसरे को पैताने बैठे देखा, जहां यीशु की लोथ पड़ी थी।

13     उन्होंने उस से कहा, हे नारी, तू क्यों रोती है? उस ने उन से कहा, वे मेरे प्रभु को उठा ले गए और मैं नहीं जानती कि उसे कहां रखा है।

14     यह कहकर वह पीछे फिरी और यीशु को खड़े देखा और न पहचाना कि यह यीशु है।

15     यीशु ने उस से कहा, हे नारी तू क्यों रोती है? किस को ढूंढ़ती है? उस ने माली समझकर उस से कहा, हे महाराज, यदि तू ने उसे उठा लिया है तो मुझ से कह कि उसे कहां रखा है और मैं उसे ले जाऊंगी।

16     यीशु ने उस से कहा, मरियम! उस ने पीछे फिरकर उस से इब्रानी में कहा, रब्बूनी अर्थात हे गुरू।

17     यीशु ने उस से कहा, मुझे मत छू क्योंकि मैं अब तक पिता के पास ऊपर नहीं गया, परन्तु मेरे भाइयों के पास जाकर उन से कह दे, कि मैं अपने पिता, और तुम्हारे पिता, और अपने परमेश्वर और तुम्हारे परमेश्वर के पास ऊपर जाता हूं।

18     मरियम मगदलीनी ने जाकर चेलों को बताया, कि मैं ने प्रभु को देखा और उस ने मुझ से ये बातें कहीं॥

19     उसी दिन जो सप्ताह का पहिला दिन था, सन्ध्या के समय जब वहां के द्वार जहां चेले थे, यहूदियों के डर के मारे बन्द थे, तब यीशु आया और बीच में खड़ा होकर उन से कहा, तुम्हें शान्ति मिले।

20     और यह कहकर उस ने अपना हाथ और अपना पंजर उन को दिखाए: तब चेले प्रभु को देखकर आनन्दित हुए।

21     यीशु ने फिर उन से कहा, तुम्हें शान्ति मिले; जैसे पिता ने मुझे भेजा है, वैसे ही मैं भी तुम्हें भेजता हूं।

22     यह कहकर उस ने उन पर फूंका और उन से कहा, पवित्र आत्मा लो।

23     जिन के पाप तुम क्षमा करो वे उन के लिये क्षमा किए गए हैं जिन के तुम रखो, वे रखे गए हैं॥

24     परन्तु बारहों में से एक व्यक्ति अर्थात थोमा जो दिदुमुस कहलाता है, जब यीशु आया तो उन के साथ न था।

25     जब और चेले उस से कहने लगे कि हम ने प्रभु को देखा है: तब उस ने उन से कहा, जब तक मैं उस के हाथों में कीलों के छेद न देख लूं, और कीलों के छेदों में अपनी उंगली न डाल लूं, और उसके पंजर में अपना हाथ न डाल लूं, तब तक मैं प्रतीति नहीं करूंगा॥

26     आठ दिन के बाद उस के चेले फिर घर के भीतर थे, और थोमा उन के साथ था, और द्वार बन्द थे, तब यीशु ने आकर और बीच में खड़ा होकर कहा, तुम्हें शान्ति मिले।

27     तब उस ने थोमा से कहा, अपनी उंगली यहां लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल और अविश्वासी नहीं परन्तु विश्वासी हो।

28     यह सुन थोमा ने उत्तर दिया, हे मेरे प्रभु, हे मेरे परमेश्वर!

5. John 20 : 1, 11 (Mary)-28

1     The first day of the week cometh Mary Magdalene early, when it was yet dark, unto the sepulchre, and seeth the stone taken away from the sepulchre.

11     Mary stood without at the sepulchre weeping: and as she wept, she stooped down, and looked into the sepulchre,

12     And seeth two angels in white sitting, the one at the head, and the other at the feet, where the body of Jesus had lain.

13     And they say unto her, Woman, why weepest thou? She saith unto them, Because they have taken away my Lord, and I know not where they have laid him.

14     And when she had thus said, she turned herself back, and saw Jesus standing, and knew not that it was Jesus.

15     Jesus saith unto her, Woman, why weepest thou? whom seekest thou? She, supposing him to be the gardener, saith unto him, Sir, if thou have borne him hence, tell me where thou hast laid him, and I will take him away.

16     Jesus saith unto her, Mary. She turned herself, and saith unto him, Rabboni; which is to say, Master.

17     Jesus saith unto her, Touch me not; for I am not yet ascended to my Father: but go to my brethren, and say unto them, I ascend unto my Father, and your Father; and to my God, and your God.

18     Mary Magdalene came and told the disciples that she had seen the Lord, and that he had spoken these things unto her.

19     Then the same day at evening, being the first day of the week, when the doors were shut where the disciples were assembled for fear of the Jews, came Jesus and stood in the midst, and saith unto them, Peace be unto you.

20     And when he had so said, he shewed unto them his hands and his side. Then were the disciples glad, when they saw the Lord.

21     Then said Jesus to them again, Peace be unto you: as my Father hath sent me, even so send I you.

22     And when he had said this, he breathed on them, and saith unto them, Receive ye the Holy Ghost:

23     Whose soever sins ye remit, they are remitted unto them; and whose soever sins ye retain, they are retained.

24     But Thomas, one of the twelve, called Didymus, was not with them when Jesus came.

25     The other disciples therefore said unto him, We have seen the Lord. But he said unto them, Except I shall see in his hands the print of the nails, and put my finger into the print of the nails, and thrust my hand into his side, I will not believe.

26     And after eight days again his disciples were within, and Thomas with them: then came Jesus, the doors being shut, and stood in the midst, and said, Peace be unto you.

27     Then saith he to Thomas, Reach hither thy finger, and behold my hands; and reach hither thy hand, and thrust it into my side: and be not faithless, but believing.

28     And Thomas answered and said unto him, My Lord and my God.

6. रोमियो 5: 8-11

8     परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा।

9     सो जब कि हम, अब उसके लोहू के कारण धर्मी ठहरे, तो उसके द्वारा क्रोध से क्यों न बचेंगे?

10     क्योंकि बैरी होने की दशा में तो उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएंगे?

11     और केवल यही नहीं, परन्तु हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा जिस के द्वारा हमारा मेल हुआ है, परमेश्वर के विषय में घमण्ड भी करते हैं॥

6. Romans 5 : 8-11

8     But God commendeth his love toward us, in that, while we were yet sinners, Christ died for us.

9     Much more then, being now justified by his blood, we shall be saved from wrath through him.

10     For if, when we were enemies, we were reconciled to God by the death of his Son, much more, being reconciled, we shall be saved by his life.

11     And not only so, but we also joy in God through our Lord Jesus Christ, by whom we have now received the atonement.

7. रोमियो 6: 1, 2, 4 (जैसे), 9-11

1     सो हम क्या कहें? क्या हम पाप करते रहें, कि अनुग्रह बहुत हो?

2     कदापि नहीं, हम जब पाप के लिये मर गए तो फिर आगे को उस में क्योंकर जीवन बिताएं?

4     ... जैसे मसीह पिता की महिमा के द्वारा मरे हुओं में से जिलाया गया, वैसे ही हम भी नए जीवन की सी चाल चलें।

9     क्योंकि यह जानते हैं, कि मसीह मरे हुओं में से जी उठकर फिर मरने का नहीं, उस पर फिर मृत्यु की प्रभुता नहीं होने की।

10     क्योंकि वह जो मर गया तो पाप के लिये एक ही बार मर गया; परन्तु जो जीवित है, तो परमेश्वर के लिये जीवित है।

11     ऐसे ही तुम भी अपने आप को पाप के लिये तो मरा, परन्तु परमेश्वर के लिये मसीह यीशु में जीवित समझो।

7. Romans 6 : 1, 2, 4 (like), 9-11

1     What shall we say then? Shall we continue in sin, that grace may abound?

2     God forbid. How shall we, that are dead to sin, live any longer therein?

4     … like as Christ was raised up from the dead by the glory of the Father, even so we also should walk in newness of life.

9     Knowing that Christ being raised from the dead dieth no more; death hath no more dominion over him.

10     For in that he died, he died unto sin once: but in that he liveth, he liveth unto God.

11     Likewise reckon ye also yourselves to be dead indeed unto sin, but alive unto God through Jesus Christ our Lord.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 332 : 32 (क्राइस्ट)-2

इस प्रकार यह है कि मसीह अपनी छवि में भगवान और मनुष्य के बीच के संयोग, या आध्यात्मिक समझौते को दर्शाता है।

1. 332 : 32 (Christ)-2

Christ illustrates the coincidence, or spiritual agreement, between God and man in His image.

2. 333 : 19-31

ईसाई युग से पहले और बाद में सभी पीढ़ियों के दौरान, आध्यात्मिक विचार के रूप में, मसीह, - भगवान का प्रतिबिंब, - शक्ति और अनुग्रह के कुछ उपाय के साथ आया है जो सभी मसीह, सत्य को प्राप्त करने के लिए तैयार हैं। अब्राहम, जैकब, मूसा और नबियों ने मसीहा या मसीह की शानदार झलकें पकड़ीं, जिसने दिव्य प्रकृति, प्रेम के सार में इन द्रष्टाओं को बपतिस्मा दिया। ईश्वरीय छवि, विचार, या मसीह ईश्वरीय सिद्धांत ईश्वर से अविभाज्य था, है और हमेशा के लिए रहेगा। यीशु ने अपनी आध्यात्मिक पहचान की इस एकता का उल्लेख किया: "पहिले इसके कि इब्राहीम उत्पन्न हुआ मैं हूं।" "मैं और पिता एक हैं।" "पिता मुझ से बड़ा है।" एक आत्मा में सभी पहचान शामिल हैं।

2. 333 : 19-31

Throughout all generations both before and after the Christian era, the Christ, as the spiritual idea, — the reflection of God, — has come with some measure of power and grace to all prepared to receive Christ, Truth. Abraham, Jacob, Moses, and the prophets caught glorious glimpses of the Messiah, or Christ, which baptized these seers in the divine nature, the essence of Love. The divine image, idea, or Christ was, is, and ever will be inseparable from the divine Principle, God. Jesus referred to this unity of his spiritual identity thus: "Before Abraham was, I am;" "I and my Father are one;" "My Father is greater than I." The one Spirit includes all identities.

3. 18 : 3-9, 13-2

नासरत के यीशु ने पिता के साथ मनुष्य की एकता को सिखाया और प्रदर्शित किया, और इसके लिए हम उसे अंतहीन श्रद्धांजलि देते हैं। उनका मिशन व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों था। उन्होंने जीवन का काम न केवल स्वयं के प्रति न्याय में, बल्कि मनुष्यों पर दया करने में भी किया।

मसीह का प्रायश्चित मनुष्य को परमेश्वर से मिलाता है, परमेश्वर को मनुष्य से नहीं; क्‍योंकि मसीह का दैवीय तत्‍व ही परमेश्‍वर है, और परमेश्‍वर अपने आप को किस प्रकार तृप्त कर सकता है? क्राइस्ट सत्य है, जो अपने आप से ऊँचा नहीं पहुँचता। फव्वारा अपने स्रोत से अधिक ऊंचा नहीं उठ सकता है। मसीह, ट्रुथ, अपने से ऊपर की किसी भी प्रकृति को, शाश्वत प्रेम से प्राप्त नहीं कर सका। इसलिए मसीह का उद्देश्य मनुष्य को परमेश्वर से मिलाना था, न कि परमेश्वर को मनुष्य से मिलाना।

3. 18 : 3-9, 13-2

Jesus of Nazareth taught and demonstrated man's oneness with the Father, and for this we owe him endless homage. His mission was both individual and collective. He did life's work aright not only in justice to himself, but in mercy to mortals, — to show them how to do theirs, but not to do it for them nor to relieve them of a single responsibility.

The atonement of Christ reconciles man to God, not God to man; for the divine Principle of Christ is God, and how can God propitiate Himself? Christ is Truth, which reaches no higher than itself. The fountain can rise no higher than its source. Christ, Truth, could conciliate no nature above his own, derived from the eternal Love. It was therefore Christ's purpose to reconcile man to God, not God to man.

4. 19 : 6-11

यीशु ने मनुष्य को ईश्वर की शिक्षा, यीशु की शिक्षाओं के दिव्य सिद्धांत, और प्रेम के इस तुच्छ अर्थ को मनुष्य की आत्मा, के नियम, और मृत्यु के नियम से मनुष्य की मृत्यु के रूप में समझने की कोशिश की। ईश्वरीय प्रेम का नियम।

4. 19 : 6-11

Jesus aided in reconciling man to God by giving man a truer sense of Love, the divine Principle of Jesus' teachings, and this truer sense of Love redeems man from the law of matter, sin, and death by the law of Spirit, — the law of divine Love.

5. 11 : 18-20

यीशु ने हमारे पापों के लिए दुख उठाया, किसी व्यक्ति के पाप के लिए ईश्वरीय सजा को रद्द करने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि पाप अपरिहार्य पीड़ा लाता है।

5. 11 : 18-20

Jesus suffered for our sins, not to annul the divine sentence for an individual's sin, but because sin brings inevitable suffering.

6. 38 : 21-32

यीशु ने भौतिक इंद्रियों के कुछ सुखों का अनुभव किया, लेकिन उसके कष्ट अन्य लोगों के पापों के फल थे, न कि स्वयं के। सनातन मसीह, उसका आत्मिक स्वाभिमान, कभी पीड़ित नहीं हुआ। यीशु ने दूसरों के लिए रास्ता निकाला। उन्होंने मसीह, दिव्य प्रेम के आध्यात्मिक विचार का अनावरण किया। पाप और स्वयं के विश्वास में दबे हुए लोगों को, उन लोगों के लिए जो केवल आनंद या इंद्रियों के संतुष्टि के लिए जी रहे हैं, पदार्थ में उसने कहा: आंखे रखते हुए भी नहीं देखते, और कान रखते हुए भी नहीं सुनते; कहीं ऐसा न हो कि वे आंखों से देखें, और कानों से सुनें और मन से समझें, और फिर जाएं, और मैं उन्हें चंगा करूं। उन्होंने सिखाया कि भौतिक इंद्रियाँ सत्य और उसकी उपचार शक्ति को बंद कर देती हैं।

6. 38 : 21-32

Jesus experienced few of the pleasures of the physical senses, but his sufferings were the fruits of other people's sins, not of his own. The eternal Christ, his spiritual selfhood, never suffered. Jesus mapped out the path for others. He unveiled the Christ, the spiritual idea of divine Love. To those buried in the belief of sin and self, living only for pleasure or the gratification of the senses, he said in substance: Having eyes ye see not, and having ears ye hear not; lest ye should understand and be converted, and I might heal you. He taught that the material senses shut out Truth and its healing power.

7. 24 : 27-2

क्रूस की प्रभावकारिता व्यावहारिक स्नेह और भलाई में निहित है जो मानव जाति के लिए प्रदर्शित हुई। सच्चाई पुरुषों के बीच रह चुकी थी; लेकिन जब तक उन्होंने देखा कि इसने अपने गुरु को कब्र पर विजय प्राप्त करने के लिए सक्षम कर दिया है, तब तक उनके अपने शिष्य इस तरह के आयोजन को संभव नहीं मानते थे। पुनरुत्थान के बाद, अविश्वासी थॉमस को भी यह स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ा कि सत्य और प्रेम का महान प्रमाण कितना पूर्ण था।

7. 24 : 27-2

The efficacy of the crucifixion lay in the practical affection and goodness it demonstrated for mankind. The truth had been lived among men; but until they saw that it enabled their Master to triumph over the grave, his own disciples could not admit such an event to be possible. After the resurrection, even the unbelieving Thomas was forced to acknowledge how complete was the great proof of Truth and Love.

8. 19 : 17-24

पश्चाताप और पीड़ा के हर दर्द, सुधार के लिए हर प्रयास, हर अच्छा विचार और काम, हमें पाप के लिए यीशु के प्रायश्चित को समझने और उसकी प्रभावकारिता की सहायता करने में मदद करेगा; लेकिन अगर पापी प्रार्थना और पश्चाताप करना, पाप करना और क्षमा करना जारी रखता है, तो उसके पास प्रायश्चित में बहुत कम हिस्सा है, — परमेश्वर के साथ एकता में, - क्योंकि उसके पास व्यावहारिक पश्चाताप का अभाव है, जो हृदय को सुधारता है और मनुष्य को ज्ञान की इच्छा करने में सक्षम बनाता है।

8. 19 : 17-24

Every pang of repentance and suffering, every effort for reform, every good thought and deed, will help us to understand Jesus' atonement for sin and aid its efficacy; but if the sinner continues to pray and repent, sin and be sorry, he has little part in the atonement, — in the at-one-ment with God, — for he lacks the practical repentance, which reforms the heart and enables man to do the will of wisdom.

9. 542 : 1-13

मामले में जीवन का विश्वास हर कदम पर पाप करता है। यह ईश्वरीय नाराजगी को जन्म देता है, और यह यीशु को मार देगा कि वह परेशानी से छुटकारा दिला सकता है। भौतिक मान्यताएँ जब भी और जहाँ भी दिखाई देती हैं, आध्यात्मिक विचार को मार डालती हैं। यद्यपि त्रुटि एक झूठ के पीछे छिपती है और अपराधबोध का बहाना करती है, लेकिन त्रुटि को हमेशा के लिए छुपाया नहीं जा सकता। सत्य, उसके अनन्त कानूनों के माध्यम से, त्रुटि का खुलासा करता है। सत्य पाप को धोखा देने का कारण बनता है, और त्रुटि को जानवर के निशान पर सेट करता है। यहां तक कि अपराध को छुड़ाने के लिए या उसे छुपाने के लिए सजा दी जाती है। न्याय से बचना और सच्चाई को नकारना पाप को खत्म करने, अपराध को खत्म करने, आत्म-नियंत्रण को खतरे में डालने और ईश्वरीय दया का मजाक उड़ाने के लिए है।

9. 542 : 1-13

The belief of life in matter sins at every step. It incurs divine displeasure, and it would kill Jesus that it might be rid of troublesome Truth. Material beliefs would slay the spiritual idea whenever and wherever it appears. Though error hides behind a lie and excuses guilt, error cannot forever be concealed. Truth, through her eternal laws, unveils error. Truth causes sin to betray itself, and sets upon error the mark of the beast. Even the disposition to excuse guilt or to conceal it is punished. The avoidance of justice and the denial of truth tend to perpetuate sin, invoke crime, jeopardize self-control, and mock divine mercy.

10. 23 : 4-11

प्रायश्चित के लिए पापी की ओर से निरंतर आत्म-विसर्जन की आवश्यकता होती है। भगवान के क्रोध को उनके प्यारे पुत्र पर व्रत किया जाना चाहिए, जो दिव्य अप्राकृतिक है। ऐसा सिद्धांत मानव निर्मित है। प्रायश्चित धर्मशास्त्र में एक कठिन समस्या है, लेकिन इसकी वैज्ञानिक व्याख्या है, कि दुख पाप भावना की त्रुटि है जिसे सत्य नष्ट कर देता है, और अंततः पाप और पीड़ा दोनों ही अनन्त प्रेम के चरणों में गिर जाएंगे।

10. 23 : 4-11

The atonement requires constant self-immolation on the sinner's part. That God's wrath should be vented upon His beloved Son, is divinely unnatural. Such a theory is man-made. The atonement is a hard problem in theology, but its scientific explanation is, that suffering is an error of sinful sense which Truth destroys, and that eventually both sin and suffering will fall at the feet of everlasting Love.

11. 91 : 16-21

भौतिक स्वार्थ में लीन हम विचार और प्रतिबिंबित करते हैं, लेकिन जीवन या मन के प्रति पदार्थ को फीका करते हैं। भौतिक स्वार्थ का खंडन, मनुष्य की आध्यात्मिक और शाश्वत व्यक्ति के विवेक को प्रभावित करता है, और पदार्थ से प्राप्त गलत ज्ञान को नष्ट कर देता है या जिसे भौतिक इंद्रियां कहा जाता है।

11. 91 : 16-21

Absorbed in material selfhood we discern and reflect but faintly the substance of Life or Mind. The denial of material selfhood aids the discernment of man's spiritual and eternal individuality, and destroys the erroneous knowledge gained from matter or through what are termed the material senses.

12. 205 : 32-3

जब हम दिव्य के साथ अपने संबंध को पूरी तरह से समझते हैं, तो हमारे पास कोई अन्य मन नहीं हो सकता है, लेकिन उनका - कोई अन्य प्रेम, ज्ञान, या सत्य, जीवन का कोई अन्य अर्थ नहीं है, और पदार्थ या त्रुटि के अस्तित्व की कोई चेतना नहीं है।

12. 205 : 32-3

When we fully understand our relation to the Divine, we can have no other Mind but His, — no other Love, wisdom, or Truth, no other sense of Life, and no consciousness of the existence of matter or error.

13. 151 : 26-30

वह सब जो वास्तव में मौजूद है, वह है दिव्य मन और उसका विचार, और इस मन में संपूर्ण प्राणी सामंजस्यपूर्ण और शाश्वत पाया जाता है। सीधे और संकीर्ण तरीके से इस तथ्य को देखना और स्वीकार करना है, इस शक्ति से उपजें, और सच्चाई की अग्रणी का पालन करें।

13. 151 : 26-30

All that really exists is the divine Mind and its idea, and in this Mind the entire being is found harmonious and eternal. The straight and narrow way is to see and acknowledge this fact, yield to this power, and follow the leadings of truth.

14. 45 : 6-21

हमारे मास्टर ने पूरी तरह से मृत्यु और कब्र पर अपनी जीत में दिव्य विज्ञान का प्रदर्शन किया। यीशु का कर्म पुरुषों के ज्ञान और पाप, बीमारी और मृत्यु से पूरी दुनिया के उद्धार के लिए था। पॉल लिखते हैं: "क्योंकि बैरी होने की दशा में तो उसके पुत्र की मृत्यु [प्रतीयमान] के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएंगे" अपने शारीरिक दफन के तीन दिन बाद उन्होंने अपने शिष्यों के साथ बात की। अत्याचारी लोग अमर सत्य और प्रेम को एक कब्र में छिपाने में असफल रहे।

भगवान की जय हो, और संघर्षशील दिलों को शांति मिले! मसीह ने मानव आशा और विश्वास के द्वार से पत्थर को लुढ़का दिया, और ईश्वर में जीवन के रहस्योद्घाटन और प्रदर्शन के माध्यम से, उन्हें मनुष्य के आध्यात्मिक विचार और उनके दिव्य सिद्धांत, प्रेम के साथ संभवतया एक-मानसिक रूप से उन्नत किया।

14. 45 : 6-21

Our Master fully and finally demonstrated divine Science in his victory over death and the grave. Jesus' deed was for the enlightenment of men and for the salvation of the whole world from sin, sickness, and death. Paul writes: "For if, when we were enemies, we were reconciled to God by the [seeming] death of His Son, much more, being reconciled, we shall be saved by his life." Three days after his bodily burial he talked with his disciples. The persecutors had failed to hide immortal Truth and Love in a sepulchre.

Glory be to God, and peace to the struggling hearts! Christ hath rolled away the stone from the door of human hope and faith, and through the revelation and demonstration of life in God, hath elevated them to possible at-one-ment with the spiritual idea of man and his divine Principle, Love.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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