रविवार 16 फरवरी, 2020 |

रविवार 16 फरवरी, 2020



विषयआत्मा

SubjectSoul

वर्ण पाठ: मरकुस 12 : 30

सब आज्ञाओं में से यह मुख्य है; और तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन से और अपने सारे प्राण से, और अपनी सारी बुद्धि से, और अपनी सारी शक्ति से प्रेम रखना।



Golden Text: Mark 12 : 30

Thou shalt love the Lord thy God with all thy heart, and with all thy soul, and with all thy mind, and with all thy strength: this is the first commandment.




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भजन संहिता 84 : 2, 5, 7, 9, 11, 12


2     मेरा प्राण यहोवा के आंगनों की अभिलाषा करते करते मूर्छित हो चला; मेरा तन मन दोनों जीवते ईश्वर को पुकार रहे॥

5     क्या ही धन्य है, वह मनुष्य जो तुझ से शक्ति पाता है, और वे जिन को सिय्योन की सड़क की सुधि रहती है।

7     वे बल पर बल पाते जाते हैं; उन में से हर एक जन सिय्योन में परमेश्वर को अपना मुंह दिखाएगा॥

9     हे परमेश्वर, हे हमारी ढ़ाल, दृष्टि कर; और अपने अभिषिक्ति का मुख देख!

11     क्योंकि यहोवा परमेश्वर सूर्य और ढाल है; यहोवा अनुग्रह करेगा, और महिमा देगा; और जो लोग खरी चाल चलते हैं; उन से वह कोई अच्छा पदार्थ रख न छोड़ेगा।

12     हे सेनाओं के यहोवा, क्या ही धन्य वह मनुष्य है, जो तुझ पर भरोसा रखता है!

Responsive Reading: Psalm 84 : 2, 5, 7, 9, 11, 12

2.     My soul longeth, yea, even fainteth for the courts of the Lord: my heart and my flesh crieth out for the living God.

5.     Blessed is the man whose strength is in thee; in whose heart are the ways of them.

7.     They go from strength to strength, every one of them in Zion appeareth before God.

9.     Behold, O God our shield, and look upon the face of thine anointed.

11.     For the Lord God is a sun and shield: the Lord will give grace and glory: no good thing will he withhold from them that walk uprightly.

12.     O Lord of hosts, blessed is the man that trusteth in thee.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. यशायाह 55 : 3, 6, 7

3     कान लगाओ, और मेरे पास आओ; सुनो, तब तुम जीवित रहोगे; और मैं तुम्हारे साथ सदा की वाचा बान्धूंगा अर्थात दाऊद पर की अटल करूणा की वाचा।

6     जब तक यहोवा मिल सकता है तब तक उसकी खोज में रहो, जब तक वह निकट है तब तक उसे पुकारो;

7     दुष्ट अपनी चालचलन और अनर्थकारी अपने सोच विचार छोड़कर यहोवा ही की ओर फिरे, वह उस पर दया करेगा, वह हमारे परमेश्वर की ओर फिरे और वह पूरी रीति से उसको क्षमा करेगा।

1. Isaiah 55 : 3, 6, 7

3     Incline your ear, and come unto me: hear, and your soul shall live; and I will make an everlasting covenant with you, even the sure mercies of David.

6     Seek ye the Lord while he may be found, call ye upon him while he is near:

7     Let the wicked forsake his way, and the unrighteous man his thoughts: and let him return unto the Lord, and he will have mercy upon him; and to our God, for he will abundantly pardon.

2. नीतिवचन 29 : 25, 26

25     मनुष्य का भय खाना फन्दा हो जाता है, परन्तु जो यहोवा पर भरोसा रखता है वह ऊंचे स्थान पर चढ़ाया जाता है।

26     हाकिम से भेंट करना बहुत लोग चाहते हैं, परन्तु मनुष्य का न्याय यहोवा की करता है।

2. Proverbs 29 : 25, 26

25     The fear of man bringeth a snare: but whoso putteth his trust in the Lord shall be safe.

26     Many seek the ruler’s favour; but every man’s judgment cometh from the Lord.

3. उत्पत्ति 27 : 41

41     ऐसाव ने तो याकूब से अपने पिता के दिए हुए आशीर्वाद के कारण बैर रखा; सो उसने सोचा, कि मेरे पिता के अन्तकाल का दिन निकट है, फिर मैं अपने भाई याकूब को घात करूंगा।

3. Genesis 27 : 41

41     And Esau hated Jacob because of the blessing wherewith his father blessed him: and Esau said in his heart, The days of mourning for my father are at hand; then will I slay my brother Jacob.

4. उत्पत्ति 32 : 1, 2 (से :), 3, 6, 7 (से :), 9, 10 (से 1st ;), 11, 24-31

1     याकूब ने भी अपना मार्ग लिया और परमेश्वर के दूत उसे आ मिले।

2     उन को देखते ही याकूब ने कहा, यह तो परमेश्वर का दल है॥

3     तब याकूब ने सेईर देश में, अर्थात एदोम देश में, अपने भाई ऐसाव के पास अपने आगे दूत भेज दिए।

6     वे दूत याकूब के पास लौट के कहने लगे, हम तेरे भाई ऐसाव के पास गए थे, और वह भी तुझ से भेंट करने को चार सौ पुरूष संग लिये हुए चला आता है।

7     तब याकूब निपट डर गया, और संकट में पड़ा:

9     फिर याकूब ने कहा, हे यहोवा, हे मेरे दादा इब्राहीम के परमेश्वर, तू ने तो मुझ से कहा, कि अपने देश और जन्म भूमि में लौट जा, और मैं तेरी भलाई करूंगा:

10     तू ने जो जो काम अपनी करूणा और सच्चाई से अपने दास के साथ किए हैं, कि मैं जो अपनी छड़ी ही ले कर इस यरदन नदी के पार उतर आया, सो अब मेरे दो दल हो गए हैं, तेरे ऐसे ऐसे कामों में से मैं एक के भी योग्य तो नहीं हूं।

11     मेरी विनती सुन कर मुझे मेरे भाई ऐसाव के हाथ से बचा: मैं तो उससे डरता हूं, कहीं ऐसा ने हो कि वह आकर मुझे और मां समेत लड़कों को भी मार डाले।

24     और याकूब आप अकेला रह गया; तब कोई पुरूष आकर पह फटने तक उससे मल्लयुद्ध करता रहा।

25     जब उसने देखा, कि मैं याकूब पर प्रबल नहीं होता, तब उसकी जांघ की नस को छूआ; सो याकूब की जांघ की नस उससे मल्लयुद्ध करते ही करते चढ़ गई।

26     तब उसने कहा, मुझे जाने दे, क्योंकि भोर हुआ चाहता है; याकूब ने कहा जब तक तू मुझे आशीर्वाद न दे, तब तक मैं तुझे जाने न दूंगा।

27     और उसने याकूब से पूछा, तेरा नाम क्या है? उसने कहा याकूब।

28     उसने कहा तेरा नाम अब याकूब नहीं, परन्तु इस्राएल होगा, क्योंकि तू परमेश्वर से और मनुष्यों से भी युद्ध कर के प्रबल हुआ है।

29     याकूब ने कहा, मैं बिनती करता हूं, मुझे अपना नाम बता। उसने कहा, तू मेरा नाम क्यों पूछता है? तब उसने उसको वहीं आशीर्वाद दिया।

30     तब याकूब ने यह कह कर उस स्थान का नाम पनीएल रखा: कि परमेश्वर को आम्हने साम्हने देखने पर भी मेरा प्राण बच गया है।

31     पनूएल के पास से चलते चलते सूर्य उदय हो गया, और वह जांघ से लंगड़ाता था।

4. Genesis 32 : 1, 2 (to :), 3, 6, 7 (to :), 9, 10 (to 1st ;), 11, 24-31

1     And Jacob went on his way, and the angels of God met him.

2     And when Jacob saw them, he said, This is God’s host:

3     And Jacob sent messengers before him to Esau his brother unto the land of Seir, the country of Edom.

6     And the messengers returned to Jacob, saying, We came to thy brother Esau, and also he cometh to meet thee, and four hundred men with him.

7     Then Jacob was greatly afraid and distressed:

9     And Jacob said, O God of my father Abraham, and God of my father Isaac, the Lord which saidst unto me, Return unto thy country, and to thy kindred, and I will deal well with thee:

10     I am not worthy of the least of all the mercies, and of all the truth, which thou hast shewed unto thy servant;

11     Deliver me, I pray thee, from the hand of my brother, from the hand of Esau: for I fear him, lest he will come and smite me, and the mother with the children.

24     And Jacob was left alone; and there wrestled a man with him until the breaking of the day.

25     And when he saw that he prevailed not against him, he touched the hollow of his thigh; and the hollow of Jacob’s thigh was out of joint, as he wrestled with him.

26     And he said, Let me go, for the day breaketh. And he said, I will not let thee go, except thou bless me.

27     And he said unto him, What is thy name? And he said, Jacob.

28     And he said, Thy name shall be called no more Jacob, but Israel: for as a prince hast thou power with God and with men, and hast prevailed.

29     And Jacob asked him, and said, Tell me, I pray thee, thy name. And he said, Wherefore is it that thou dost ask after my name? And he blessed him there.

30     And Jacob called the name of the place Peniel: for I have seen God face to face, and my life is preserved.

31     And as he passed over Penuel the sun rose upon him, and he halted upon his thigh.

5. उत्पत्ति 33 : 1 (से 1st .), 4

1     और याकूब ने आंखें उठा कर यह देखा, कि ऐसाव चार सौ पुरूष संग लिये हुए चला जाता है।

4     तब ऐसाव उससे भेंट करने को दौड़ा, और उसको हृदय से लगा कर, गले से लिपट कर चूमा: फिर वे दोनों रो पड़े।

5. Genesis 33 : 1 (to 1st .), 4

1     And Jacob lifted up his eyes, and looked, and, behold, Esau came, and with him four hundred men.

4     And Esau ran to meet him, and embraced him, and fell on his neck, and kissed him: and they wept.

6. 2 इतिहास 7 : 14

14     तब यदि मेरी प्रजा के लोग जो मेरे कहलाते हैं, दीन हो कर प्रार्थना करें और मेरे दर्शन के खोजी हो कर अपनी बुरी चाल से फिरें, तो मैं स्वर्ग में से सुन कर उनका पाप क्षमा करूंगा और उनके देश को ज्यों का त्यों कर दूंगा।

6. II Chronicles 7 : 14

14     If my people, which are called by my name, shall humble themselves, and pray, and seek my face, and turn from their wicked ways; then will I hear from heaven, and will forgive their sin, and will heal their land.

7. गलातियों 5 : 2 (से 2nd ,), 5, 7-10, 13, 14

2     देखो, मैं पौलुस तुम से कहता हूं।

5     क्योंकि आत्मा के कारण, हम विश्वास से, आशा की हुई धामिर्कता की बाट जोहते हैं।

7     तुम तो भली भांति दौड रहे थे, अब किस ने तुम्हें रोक दिया, कि सत्य को न मानो।

8     ऐसी सीख तुम्हारे बुलाने वाले की ओर से नहीं।

9     थोड़ा सा खमीर सारे गूंधे हुए आटे को खमीर कर डालता है।

10     मैं प्रभु पर तुम्हारे विषय में भरोसा रखता हूं, कि तुम्हारा कोई दूसरा विचार न होगा; परन्तु जो तुम्हें घबरा देता है, वह कोई क्यों न हो दण्ड पाएगा।

13     हे भाइयों, तुम स्वतंत्र होने के लिये बुलाए गए हो परन्तु ऐसा न हो, कि यह स्वतंत्रता शारीरिक कामों के लिये अवसर बने, वरन प्रेम से एक दूसरे के दास बनो।

14     क्योंकि सारी व्यवस्था इस एक ही बात में पूरी हो जाती है, कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।

7. Galatians 5 : 2 (to 2nd ,), 5, 7-10, 13, 14

2     Behold, I Paul say unto you,

5     For we through the Spirit wait for the hope of righteousness by faith.

7     Ye did run well; who did hinder you that ye should not obey the truth?

8     This persuasion cometh not of him that calleth you.

9     A little leaven leaveneth the whole lump.

10     I have confidence in you through the Lord, that ye will be none otherwise minded: but he that troubleth you shall bear his judgment, whosoever he be.

13     For, brethren, ye have been called unto liberty; only use not liberty for an occasion to the flesh, but by love serve one another.

14     For all the law is fulfilled in one word, even in this; Thou shalt love thy neighbour as thyself.

8. I कुरिन्थियों 1 : 1 (से 2nd ,), 3-5, 10, 26, 29-31

1     पौलुस की ओर से जो परमेश्वर की इच्छा से यीशु मसीह का प्रेरित होने के लिये बुलाया गया।

3     हमारे पिता परमेश्वर और प्रभु यीशु मसीह की ओर से तुम्हें अनुग्रह और शान्ति मिलती रहे॥

4     मैं तुम्हारे विषय में अपने परमेश्वर का धन्यवाद सदा करता हूं, इसलिये कि परमेश्वर का यह अनुग्रह तुम पर मसीह यीशु में हुआ।

5     कि उस में होकर तुम हर बात में अर्थात सारे वचन और सारे ज्ञान में धनी किए गए।

10     हे भाइयो, मैं तुम से यीशु मसीह जो हमारा प्रभु है उसके नाम के द्वारा बिनती करता हूं, कि तुम सब एक ही बात कहो; और तुम में फूट न हो, परन्तु एक ही मन और एक ही मत होकर मिले रहो।

26     हे भाइयो, अपने बुलाए जाने को तो सोचो, कि न शरीर के अनुसार बहुत ज्ञानवान, और न बहुत सामर्थी, और न बहुत कुलीन बुलाए गए।

29     ताकि कोई प्राणी परमेश्वर के साम्हने घमण्ड न करने पाए।

30     परन्तु उसी की ओर से तुम मसीह यीशु में हो, जो परमेश्वर की ओर से हमारे लिये ज्ञान ठहरा अर्थात धर्म, और पवित्रता, और छुटकारा।

31     ताकि जैसा लिखा है, वैसा ही हो, कि जो घमण्ड करे वह प्रभु में घमण्ड करे॥

8. I Corinthians 1 : 1 (to 2nd ,), 3-5, 10, 26, 29-31

1     Paul, called to be an apostle of Jesus Christ through the will of God,

3     Grace be unto you, and peace, from God our Father, and from the Lord Jesus Christ.

4     I thank my God always on your behalf, for the grace of God which is given you by Jesus Christ;

5     That in every thing ye are enriched by him, in all utterance, and in all knowledge;

10     Now I beseech you, brethren, by the name of our Lord Jesus Christ, that ye all speak the same thing, and that there be no divisions among you; but that ye be perfectly joined together in the same mind and in the same judgment.

26     For ye see your calling, brethren, how that not many wise men after the flesh, not many mighty, not many noble, are called:

29     That no flesh should glory in his presence.

30     But of him are ye in Christ Jesus, who of God is made unto us wisdom, and righteousness, and sanctification, and redemption:

31     That, according as it is written, He that glorieth, let him glory in the Lord.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 58 : 12 केवल

आत्मा में नैतिक स्वतंत्रता है।

1. 58 : 12 only

There is moral freedom in Soul.

2. 477 : 22-26

आत्मा ही मनुष्य का पदार्थ, जीवन और बुद्धिमत्ता है, जो व्यक्तिगत है, लेकिन पदार्थ में नहीं। आत्मा कभी भी किसी भी चीज को हीन नहीं कर सकती

मनुष्य आत्मा की अभिव्यक्ति है।

2. 477 : 22-26

Soul is the substance, Life, and intelligence of man, which is individualized, but not in matter. Soul can never reflect anything inferior to Spirit.

Man is the expression of Soul.

3. 70 : 13-9

प्रश्न हैं: भगवान की पहचान क्या हैं? जीवात्मा क्या है? क्या जीवन या आत्मा का गठन की गई चीज में होता है?

कुछ भी वास्तविक और शाश्वत नहीं है, — कुछ भी आत्मा नहीं है, - भगवान और उनके विचार को छोड़कर। बुराई की कोई वास्तविकता नहीं है। यह न तो व्यक्ति, स्थान, न ही चीज है, लेकिन केवल एक विश्वास है, भौतिक अर्थ का भ्रम है।

सभी वास्तविकता की पहचान या विचार हमेशा के लिए जारी है; लेकिन आत्मा, या सभी का दिव्य सिद्धांत, आत्मा के निर्माण में नहीं है। जीवात्मा आत्मा, ईश्वर का पर्याय है, परिमित रूप से बाहर का रचनात्मक, शासी, अनंत सिद्धांत, जो केवल प्रतिबिंबित होता है।

3. 70 : 13-9

The questions are: What are God's identities? What is Soul? Does life or soul exist in the thing formed?

Nothing is real and eternal, — nothing is Spirit, — but God and His idea. Evil has no reality. It is neither person, place, nor thing, but is simply a belief, an illusion of material sense.

The identity, or idea, of all reality continues forever; but Spirit, or the divine Principle of all, is not in Spirit's formations. Soul is synonymous with Spirit, God, the creative, governing, infinite Principle outside of finite form, which forms only reflect.

4. 300 : 23 केवल, 31-4

आत्मा ईश्वर है, जीवात्मा; इसलिए जीवात्मा पदार्थ में नहीं है। … ईश्वर केवल उसी में प्रगट होता है जो जीवन, सत्य, प्रेम, - परावर्तित को दर्शाता है, जो ईश्वर की विशेषताओं और शक्ति को प्रकट करता है, यहां तक कि जैसे कि मानव समानता दर्पण पर फेंकी जाती है, दर्पण के सामने व्यक्ति के रंग, रूप और क्रिया को दोहराता है ।

4. 300 : 23 only, 31-4

Spirit is God, Soul; therefore Soul is not in matter. … God is revealed only in that which reflects Life, Truth, Love, — yea, which manifests God's attributes and power, even as the human likeness thrown upon the mirror, repeats the color, form, and action of the person in front of the mirror.

5. 308 : 14-28

आत्मा से प्रेरित पितृपुरुषों ने सत्य की आवाज सुनी, और भगवान के साथ सचेत रूप से बात की जैसे कि आदमी आदमी के साथ बात करता है।

जैकब अकेला था, त्रुटि के साथ कुश्ती, - जीवन, पदार्थ और बुद्धिमत्ता की एक नश्वर भावना से जूझते हुए, अपने झूठे सुख और पीड़ा के साथ अस्तित्व के रूप में, - जब एक दूत, सत्य और प्रेम का एक संदेश, उसे दिखाई दिया और मुस्कुराया पाप, या शक्ति, उसकी त्रुटि की, जब तक कि उसने इसकी असत्यता को नहीं देखा; और सत्य, इस प्रकार समझा जा रहा है, उसे दिव्य विज्ञान के इस पेनेल में आध्यात्मिक शक्ति प्रदान की। तब आध्यात्मिक प्रचारक ने कहा: ""मुझे जाने दे, क्योंकि भोर हुआ चाहता है;" मतलब, सत्य और प्रेम का प्रकाश तुम्हारे ऊपर है। लेकिन पितृसत्ता, उनकी त्रुटि और उनकी मदद की आवश्यकता को मानते हुए, इस शानदार प्रकाश पर अपनी पकड़ तब तक ढीली नहीं की जब तक कि उनका स्वभाव बदल नहीं गया।

5. 308 : 14-28

The Soul-inspired patriarchs heard the voice of Truth, and talked with God as consciously as man talks with man.

Jacob was alone, wrestling with error, — struggling with a mortal sense of life, substance, and intelligence as existent in matter with its false pleasures and pains, — when an angel, a message from Truth and Love, appeared to him and smote the sinew, or strength, of his error, till he saw its unreality; and Truth, being thereby understood, gave him spiritual strength in this Peniel of divine Science. Then said the spiritual evangel: "Let me go, for the day breaketh;" that is, the light of Truth and Love dawns upon thee. But the patriarch, perceiving his error and his need of help, did not loosen his hold upon this glorious light until his nature was transformed.

6. 309 : 7-12

इस प्रकार जैकब के संघर्ष का परिणाम सामने आया। उन्होंने आत्मा की आध्यात्मिक शक्ति और आध्यात्मिक शक्ति के साथ भौतिक त्रुटि पर विजय प्राप्त की थी। इससे आदमी बदल गया। उन्हें अब याकूब नहीं कहा जाता था, लेकिन इज़राइल, - भगवान का एक राजकुमार, या भगवान का एक सैनिक, जिसने एक अच्छी लड़ाई लड़ी थी।

6. 309 : 7-12

The result of Jacob's struggle thus appeared. He had conquered material error with the under-standing of Spirit and of spiritual power. This changed the man. He was no longer called Jacob, but Israel, — a prince of God, or a soldier of God, who had fought a good fight.

7. 481 : 28-32

जीवात्मा मनुष्य का दिव्य सिद्धांत है और कभी पाप नहीं करता, - इसलिए जीवात्मा की अमरता है। विज्ञान में हम सीखते हैं कि यह भौतिक अर्थ है, न कि जो पाप है; और यह पाया जाएगा कि यह पाप का बोध है जो खो गया है, और पापपूर्ण पाप नहीं है।

7. 481 : 28-32

Soul is the divine Principle of man and never sins, — hence the immortality of Soul. In Science we learn that it is material sense, not Soul, which sins; and it will be found that it is the sense of sin which is lost, and not a sinful soul.

8. 482 : 6-12

शब्द देवता का उचित उपयोग हमेशा ईश्वर शब्द को प्रतिस्थापित करके प्राप्त किया जा सकता है, जहां बहुत अधिक अर्थ की आवश्यकता होती है। अन्य मामलों में, शब्द का उपयोग करें, और आपके पास वैज्ञानिक संकेत होगा। क्राइस्टियन साइंस में इस्तेमाल के रूप में, जीवात्मा आत्मा या ईश्वर का पर्याय है; लेकिन विज्ञान से बाहर, जीवात्मा भौतिक अनुभूति के साथ समान है।

8. 482 : 6-12

The proper use of the word soul can always be gained by substituting the word God, where the deific meaning is required. In other cases, use the word sense, and you will have the scientific signification. As used in Christian Science, Soul is properly the synonym of Spirit, or God; but out of Science, soul is identical with sense, with material sensation.

9. 89 : 20-24

आत्मा, ईश्वर, तब सुनाई देता है जब इंद्रियाँ चुप हो जाती हैं। हम जितना करते हैं उससे कहीं अधिक हम सभी सक्षम हैं। आत्मा का प्रभाव या क्रिया एक स्वतंत्रता प्रदान करती है, जो कि अविवेक की घटनाओं और असभ्य होंठों के उत्साह की व्याख्या करती है।

9. 89 : 20-24

Spirit, God, is heard when the senses are silent. We are all capable of more than we do. The influence or action of Soul confers a freedom, which explains the phenomena of improvisation and the fervor of untutored lips.

10. 273 : 10-20

दिव्य विज्ञान भौतिक इंद्रियों की झूठी गवाही को उलट देता है, और इस प्रकार त्रुटि की नींव टूट जाती है। इसलिए विज्ञान और इंद्रियों के बीच की दुश्मनी, और समझ की त्रुटियों को समाप्त करने तक सही समझ प्राप्त करने की असंभवता।

सामग्री और चिकित्सा विज्ञान के तथाकथित कानूनों ने नश्वर को कभी भी पूर्ण, सामंजस्यपूर्ण और अमर नहीं बनाया है। आत्मा द्वारा शासित होने पर मनुष्य सामंजस्यपूर्ण होता है। इसलिए होने के सत्य को समझने का महत्व, जो आध्यात्मिक अस्तित्व के नियमों को प्रकट करता है।

10. 273 : 10-20

Divine Science reverses the false testimony of the material senses, and thus tears away the foundations of error. Hence the enmity between Science and the senses, and the impossibility of attaining perfect understanding till the errors of sense are eliminated.

The so-called laws of matter and of medical science have never made mortals whole, harmonious, and immortal. Man is harmonious when governed by Soul. Hence the importance of understanding the truth of being, which reveals the laws of spiritual existence.

11. 323 : 19-24

जब बीमार या पापी अपनी आवश्यकता को महसूस करने के लिए जागते हैं, तो वे दिव्य विज्ञान के प्रति ग्रहणशील होंगे, जो जीवात्मा की ओर और भौतिक अर्थ से दूर, शरीर से विचार को हटाता है, और यहां तक कि मन को भी चिंतन के स्तर तक बढ़ा देता है। कुछ बात बीमारी या पाप से बेहतर है।

11. 323 : 19-24

When the sick or the sinning awake to realize their need of what they have not, they will be receptive of divine Science, which gravitates towards Soul and away from material sense, removes thought from the body, and elevates even mortal mind to the contemplation of something better than disease or sin.

12. 390 : 4-11

हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि जीवन आत्मनिर्भर है और हमें आत्मा के सदा के सामंजस्य से इनकार नहीं करना चाहिए, सिर्फ इसलिए कि, नश्वर इंद्रियों के लिए, प्रतीत होता है कलह। यह ईश्वर की हमारी अज्ञानता है, ईश्वरीय सिद्धांत, जो स्पष्ट कलह उत्पन्न करता है, और उसके सामंजस्य की सही समझ।सत्य हम सभी को आत्मा के सुख के लिए सुखों और दुखों के आदान-प्रदान के लिए मजबूर करेगा।

12. 390 : 4-11

We cannot deny that Life is self-sustained, and we should never deny the everlasting harmony of Soul, simply because, to the mortal senses, there is seeming discord. It is our ignorance of God, the divine Principle, which produces apparent discord, and the right understanding of Him restores harmony. Truth will at length compel us all to exchange the pleasures and pains of sense for the joys of Soul.

13. 322 : 3-13

जब एक सामग्री से आध्यात्मिक आधार पर जीवन और बुद्धिमत्ता के दृष्टिकोण को बदलते हैं, हम जीवन की वास्तविकता प्राप्त करेंगे, आत्मा का नियंत्रण और हम अपने ईश्वरीय सिद्धांत में ईसाई धर्म या सत्य का अनुभव करेंगे। यह सामंजस्यपूर्ण और अमर आदमी प्राप्त होने से पहले चरमोत्कर्ष होना चाहिए और उसकी क्षमताओं का पता चला। यह अत्यधिक महत्वपूर्ण है - दिव्य विज्ञान की इस मान्यता के आने से पहले पूरा होने वाले अपार कार्य के मद्देनजर - अपने विचारों को दिव्य सिद्धांत की ओर मोड़ने के लिए, कि परिमित विश्वास अपनी त्रुटि को त्यागने के लिए तैयार हो सकता है।

13. 322 : 3-13

When understanding changes the standpoints of life and intelligence from a material to a spiritual basis, we shall gain the reality of Life, the control of Soul over sense, and we shall perceive Christianity, or Truth, in its divine Principle. This must be the climax before harmonious and immortal man is obtained and his capabilities revealed. It is highly important — in view of the immense work to be accomplished before this recognition of divine Science can come — to turn our thoughts towards divine Principle, that finite belief may be prepared to relinquish its error.

14. 125 : 2-20

अब मानव शरीर में कार्बनिक और कार्यात्मक स्वास्थ्य के लिए सबसे अच्छी स्थिति क्या मानी जाती है, वह अब स्वास्थ्य के लिए अपरिहार्य नहीं है। नैतिक स्थितियां हमेशा सामंजस्यपूर्ण और स्वास्थ्य देने वाली पाई जाएंगी। न तो जैविक निष्क्रियता और न ही अधिकता भगवान के नियंत्रण से परे है; और मनुष्य को नश्वर विचार बदलने के लिए सामान्य और स्वाभाविक पाया जाएगा, और इसलिए उसकी अभिव्यक्तियों में अधिक सामंजस्यपूर्ण रूप से वह पहले की अवस्थाओं में था जिसे मानव विश्वास ने बनाया और मंजूरी दी थी।

जैसे-जैसे मानव विचार एक अवस्था से दूसरे चरण में बदलता है, दर्द और दर्द रहितता, दुःख और आनन्द, - भय से आशा और विश्वास से समझ तक, - दृश्य अभिव्यक्ति अंतिम रूप से मनुष्य द्वारा शासित होगी, भौतिक अर्थ से नहीं। भगवान की सरकार को दर्शाते हुए, मनुष्य स्व-शासित है। जब दिव्य आत्मा के अधीन होते हैं, तो मनुष्य को पाप या मृत्यु से नियंत्रित नहीं किया जा सकता है, इस प्रकार स्वास्थ्य के नियमों के बारे में हमारी सामग्री सिद्ध होती है।

14. 125 : 2-20

What is now considered the best condition for organic and functional health in the human body may no longer be found indispensable to health. Moral conditions will be found always harmonious and health-giving. Neither organic inaction nor overaction is beyond God's control; and man will be found normal and natural to changed mortal thought, and therefore more harmo-nious in his manifestations than he was in the prior states which human belief created and sanctioned.

As human thought changes from one stage to another of conscious pain and painlessness, sorrow and joy, — from fear to hope and from faith to understanding, — the visible manifestation will at last be man governed by Soul, not by material sense. Reflecting God's government, man is self-governed. When subordinate to the divine Spirit, man cannot be controlled by sin or death, thus proving our material theories about laws of health to be valueless.

15. 590 : 1-3

स्वर्ग के राज्य। दिव्य विज्ञान में सामंजस्य की प्रबलता; अनियंत्रित, शाश्वत और सर्वशक्तिमान मन के दायरे; आत्मा का वातावरण, जहाँ जीवाश्म सर्वोच्च है।

15. 590 : 1-3

Kingdom of Heaven. The rein of harmony in divine Science; the realm of unerring, eternal, and omnipotent Mind; the atmosphere of Spirit, where Soul is supreme.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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