रविवार 15 सितंबर, 2019 |

रविवार 15 सितंबर, 2019



विषयपदार्थ

SubjectSubstance

वर्ण पाठ: भजन संहिता 78 : 19

क्या ईश्वर जंगल में मेज लगा सकता है?



Golden Text: Psalm 78 : 19

Can God furnish a table in the wilderness?




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I इतिहास 16 : 8-12, 23, 24


8     यहोवा का धन्यवाद करो, कि प्रार्थना करो; देश देश में उसके कामों का प्रचार करो।

9     उसका गीत गाओ, उसका भजन करो, उसके सब आश्चर्य-कर्मों का ध्यान करो।

10     उसका पवित्र नाम घमंड पर; भगवान के खोजियों का हृदय आनन्दित हो।

11     यहोवा और उसकी सामर्थ्य की खोज करो; उसके दर्शन के लिए लगातार खोज करो।

12     उसके किए गए आश्चर्यकर्म, उसके चमत्कार और न्याय स्मरण करो।

23     हे समस्त पृथ्वी के लोगो यहोवा का गीत गाओ। प्रतिदिन उसके किए हुए उद्धार का शुभ समाचार सुनाते रहो।

24     अन्यजातियों में उसकी महिमा का, और देश देश के लोगों में उसके आश्चर्य-कर्मों का वर्णन करो।

Responsive Reading: I Chronicles 16 : 8-12, 23, 24

8.     Give thanks unto the Lord, call upon his name, make known his deeds among the people.

9.     Sing unto him, sing psalms unto him, talk ye of all his wondrous works.

10.     Glory ye in his holy name: let the heart of them rejoice that seek the Lord.

11.     Seek the Lord and his strength, seek his face continually.

12.     Remember his marvellous works that he hath done, his wonders, and the judgments of his mouth;

23.     Sing unto the Lord, all the earth; shew forth from day to day his salvation.

24.     Declare his glory among the heathen; his marvellous works among all nations.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. व्यवस्थाविवरण 28 : 12

12     यहोवा तेरे लिये अपने आकाशरूपी उत्तम भण्डार को खोल कर तेरी भूमि पर समय पर मेंह बरसाया करेगा, और तेरे सारे कामों पर आशीष देगा; और तू बहुतेरी जातियों को उधार देगा, परन्तु किसी से तुझे उधार लेना न पड़ेगा।

1. Deuteronomy 28 : 12

12     The Lord shall open unto thee his good treasure, the heaven to give the rain unto thy land in his season, and to bless all the work of thine hand: and thou shalt lend unto many nations, and thou shalt not borrow.

2. रोमियो 11: 33, 36 (से 1st.)

33     आहा! परमेश्वर का धन और बुद्धि और ज्ञान क्या ही गंभीर है! उसके विचार कैसे अथाह, और उसके मार्ग कैसे अगम हैं!

36     क्योंकि उस की ओर से, और उसी के द्वारा, और उसी के लिये सब कुछ है: उस की महिमा युगानुयुग होती रहे॥

2. Romans 11 : 33, 36 (to 1st .)

33     O the depth of the riches both of the wisdom and knowledge of God! how unsearchable are his judgments, and his ways past finding out!

36     For of him, and through him, and to him, are all things: to whom be glory for ever.

3. भजन संहिता 68: 17 (से :), 19 (से 1st.)

17     परमेश्वर के रथ बीस हजार, वरन हजारों हजार हैं;

19     धन्य है प्रभु, जो प्रति दिन हमारा बोझ उठाता है; वही हमारा उद्धारकर्ता ईश्वर है।

3. Psalm 68 : 17 (to :), 19 (to 1st .)

17     The chariots of God are twenty thousand, even thousands of angels:

19     Blessed be the Lord, who daily loadeth us with benefits, even the God of our salvation.

4. निर्गमन 16 : 11-18

11     तब यहोवा ने मूसा से कहा,

12     इस्राएलियों का बुड़बुड़ाना मैं ने सुना है; उन से कह दे, कि गोधूलि के समय तुम मांस खाओगे और भोर को तुम रोटी से तृप्त हो जाओगे; और तुम यह जान लोगे कि मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूं।

13     और ऐसा हुआ कि सांझ को बटेरें आकर सारी छावनी पर बैठ गईं; और भोर को छावनी के चारों ओर ओस पड़ी।

14     और जब ओस सूख गई तो वे क्या देखते हैं, कि जंगल की भूमि पर छोटे छोटे छिलके छोटाई में पाले के किनकों के समान पड़े हैं।

15     यह देखकर इस्राएली, जो न जानते थे कि यह क्या वस्तु है, सो आपस में कहने लगे यह तो मन्ना है। तब मूसा ने उन से कहा, यह तो वही भोजन वस्तु है जिसे यहोवा तुम्हें खाने के लिये देता है।

16     जो आज्ञा यहोवा ने दी है वह यह है, कि तुम उस में से अपने अपने खाने के योग्य बटोरा करना, अर्थात अपने अपने प्राणियों की गिनती के अनुसार, प्रति मनुष्य के पीछे एक एक ओमेर बटोरना; जिसके डेरे में जितने हों वह उन्हीं भर के लिये बटोरा करे।

17     और इस्राएलियों ने वैसा ही किया; और किसी ने अधिक, और किसी ने थोड़ा बटोर लिया।

18     और जब उन्होंने उसको ओमेर से नापा, तब जिसके पास अधिक था उसके कुछ अधिक न रह गया, ओर जिसके पास थोड़ा था उसको कुछ घटी न हुई; क्योंकि एक एक मनुष्य ने अपने खाने के योग्य ही बटोर लिया था।

4. Exodus 16 : 11-18

11     And the Lord spake unto Moses, saying,

12     I have heard the murmurings of the children of Israel: speak unto them, saying, At even ye shall eat flesh, and in the morning ye shall be filled with bread; and ye shall know that I am the Lord your God.

13     And it came to pass, that at even the quails came up, and covered the camp: and in the morning the dew lay round about the host.

14     And when the dew that lay was gone up, behold, upon the face of the wilderness there lay a small round thing, as small as the hoar frost on the ground.

15     And when the children of Israel saw it, they said one to another, It is manna: for they wist not what it was. And Moses said unto them, This is the bread which the Lord hath given you to eat.

16     This is the thing which the Lord hath commanded, Gather of it every man according to his eating, an omer for every man, according to the number of your persons; take ye every man for them which are in his tents.

17     And the children of Israel did so, and gathered, some more, some less.

18     And when they did mete it with an omer, he that gathered much had nothing over, and he that gathered little had no lack; they gathered every man according to his eating.

5. निर्गमन 17 : 1-7

1     फिर इस्राएलियों की सारी मण्डली सीन नाम जंगल से निकल चली, और यहोवा के आज्ञानुसार कूच करके रपीदीम में अपने डेरे खड़े किए; और वहां उन लोगों को पीने का पानी न मिला।

2     इसलिये वे मूसा से वादविवाद करके कहने लगे, कि हमें पीने का पानी दे। मूसा ने उन से कहा, तुम मुझ से क्यों वादविवाद करते हो? और यहोवा की परीक्षा क्यों करते हो?

3     फिर वहां लोगों को पानी की प्यास लगी तब वे यह कहकर मूसा पर बुड़बुड़ाने लगे, कि तू हमें लड़के बालोंऔर पशुओं समेत प्यासों मार डालने के लिये मिस्र से क्यों ले आया है?

4     तब मूसा ने यहोवा की दोहाई दी, और कहा, इन लोगों से मैं क्या करूं? ये सब मुझे पत्थरवाह करने को तैयार हैं।

5     यहोवा ने मूसा से कहा, इस्राएल के वृद्ध लोगों में से कुछ को अपने साथ ले ले; और जिस लाठी से तू ने नील नदी पर मारा था, उसे अपने हाथ में ले कर लोगों के आगे बढ़ चल।

6     देख मैं तेरे आगे चलकर होरेब पहाड़ की एक चट्टान पर खड़ा रहूंगा; और तू उस चट्टान पर मारना, तब उस में से पानी निकलेगा जिससे ये लोग पीएं। तब मूसा ने इस्राएल के वृद्ध लोगों के देखते वैसा ही किया।

7     और मूसा ने उस स्थान का नाम मस्सा और मरीबा रखा, क्योंकि इस्राएलियों ने वहां वादविवाद किया था, और यहोवा की परीक्षा यह कहकर की, कि क्या यहोवा हमारे बीच है वा नहीं?

5. Exodus 17 : 1-7

1     And all the congregation of the children of Israel journeyed from the wilderness of Sin, after their journeys, according to the commandment of the Lord, and pitched in Rephidim: and there was no water for the people to drink.

2     Wherefore the people did chide with Moses, and said, Give us water that we may drink. And Moses said unto them, Why chide ye with me? wherefore do ye tempt the Lord?

3     And the people thirsted there for water; and the people murmured against Moses, and said, Wherefore is this that thou hast brought us up out of Egypt, to kill us and our children and our cattle with thirst?

4     And Moses cried unto the Lord, saying, What shall I do unto this people? they be almost ready to stone me.

5     And the Lord said unto Moses, Go on before the people, and take with thee of the elders of Israel; and thy rod, wherewith thou smotest the river, take in thine hand, and go.

6     Behold, I will stand before thee there upon the rock in Horeb; and thou shalt smite the rock, and there shall come water out of it, that the people may drink. And Moses did so in the sight of the elders of Israel.

7     And he called the name of the place Massah, and Meribah, because of the chiding of the children of Israel, and because they tempted the Lord, saying, Is the Lord among us, or not?

6. यशायाह 58 : 11

11     और यहोवा तुझे लगातार लिए चलेगा, और काल के समय तुझे तृप्त और तेरी हड्डियों को हरी भरी करेगा; और तू सींची हुई बारी और ऐसे सोते के समान होगा जिसका जल कभी नहीं सूखता।

6. Isaiah 58 : 11

11     And the Lord shall guide thee continually, and satisfy thy soul in drought, and make fat thy bones: and thou shalt be like a watered garden, and like a spring of water, whose waters fail not.

7. मत्ती 4 : 23

23     और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उन की सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बल्ता को दूर करता रहा।

7. Matthew 4 : 23

23     And Jesus went about all Galilee, teaching in their synagogues, and preaching the gospel of the kingdom, and healing all manner of sickness and all manner of disease among the people.

8. मत्ती 5 : 2

2     और वह अपना मुंह खोलकर उन्हें यह उपदेश देने लगा,

8. Matthew 5 : 2

2     And he opened his mouth, and taught them, saying,

9. मत्ती 6 : 26, 28 (विचार करें), 29

26     आकाश के पक्षियों को देखो! वे न बोते हैं, न काटते हैं, और न खत्तों में बटोरते हैं; तौभी तुम्हारा स्वर्गीय पिता उन को खिलाता है; क्या तुम उन से अधिक मूल्य नहीं रखते।

28     जंगली सोसनों पर ध्यान करो, कि वै कैसे बढ़ते हैं, वे न तो परिश्रम करते हैं, न कातते हैं।

29     तौभी मैं तुम से कहता हूं, कि सुलैमान भी, अपने सारे विभव में उन में से किसी के समान वस्त्र पहिने हुए न था।

9. Matthew 6 : 26, 28 (Consider), 29

26     Behold the fowls of the air: for they sow not, neither do they reap, nor gather into barns; yet your heavenly Father feedeth them. Are ye not much better than they?

28     Consider the lilies of the field, how they grow; they toil not, neither do they spin:

29     And yet I say unto you, That even Solomon in all his glory was not arrayed like one of these.

10. यूहन्ना 21 : 4 (जब)-6

4     भोर होते ही यीशु किनारे पर खड़ा हुआ; तौभी चेलों ने न पहचाना कि यह यीशु है।

5     तब यीशु ने उन से कहा, हे बाल को, क्या तुम्हारे पास कुछ खाने को है? उन्होंने उत्तर दिया कि नहीं।

6     उस ने उन से कहा, नाव की दाहनी ओर जाल डालो, तो पाओगे, तब उन्होंने जाल डाला, और अब मछिलयों की बहुतायत के कारण उसे खींच न सके।

10. John 21 : 4 (when)-6

4     …when the morning was now come, Jesus stood on the shore: but the disciples knew not that it was Jesus.

5     Then Jesus saith unto them, Children, have ye any meat? They answered him, No.

6     And he said unto them, Cast the net on the right side of the ship, and ye shall find. They cast therefore, and now they were not able to draw it for the multitude of fishes.

11. नीतिवचन 8 : 14, 18-21

14     उत्तम युक्ति, और खरी बुद्धि मेरी ही है, मैं तो समझ हूं, और पराक्रम भी मेरा है।

18     धन और प्रतिष्ठा मेरे पास है, वरन ठहरने वाला धन और धर्म भी हैं।

19     मेरा फल चोखे सोने से, वरन कुन्दन से भी उत्तम है, और मेरी उपज उत्तम चान्दी से अच्छी है।

20     मैं धर्म की बाट में, और न्याय की डगरों के बीच में चलती हूं,

21     जिस से मैं अपने प्रेमियों को परमार्थ के भागी करूं, और उनके भण्डारों को भर दूं।

11. Proverbs 8 : 14, 18-21

14     Counsel is mine, and sound wisdom: I am understanding; I have strength.

18     Riches and honour are with me; yea, durable riches and righteousness.

19     My fruit is better than gold, yea, than fine gold; and my revenue than choice silver.

20     I lead in the way of righteousness, in the midst of the paths of judgment:

21     That I may cause those that love me to inherit substance; and I will fill their treasures.

12. फिलिप्पियों 4 : 19 (मेरा)

19     ... मेरा परमेश्वर भी अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु में है तुम्हारी हर एक घटी को पूरी करेगा।

12. Philippians 4 : 19 (my)

19     …my God shall supply all your need according to his riches in glory by Christ Jesus.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 330: 11 (परमेश्वर)-12

ईश्वर अनंत है, एकमात्र जीवन, पदार्थ, आत्मा या आत्मा, ब्रह्मांड की एकमात्र बुद्धि, जिसमें मनुष्य भी शामिल है।

1. 330 : 11 (God)-12

God is infinite, the only Life, substance, Spirit, or Soul, the only intelligence of the universe, including man.

2. 468: 16-24

सवाल। — पदार्थ क्या है?

उत्तर। — पदार्थ वह है जो अनादि है और कलह और क्षय से असमर्थ है। सत्य, जीवन और प्रेम पदार्थ हैं, क्योंकि इब्रानियों में इस शब्द का उपयोग होता है: “विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है।" आत्मा, मन, आत्मा या ईश्वर का पर्यायवाची एकमात्र वास्तविक पदार्थ है। व्यक्ति सहित आध्यात्मिक ब्रह्मांड, एक यौगिक विचार है, वह आत्मा के दिव्य पदार्थ को दर्शाता है।

2. 468 : 16-24

Question. — What is substance?

Answer. — Substance is that which is eternal and incapable of discord and decay. Truth, Life, and Love are substance, as the Scriptures use this word in Hebrews: "The substance of things hoped for, the evidence of things not seen." Spirit, the synonym of Mind, Soul, or God, is the only real substance. The spiritual universe, including individual man, is a compound idea, reflecting the divine substance of Spirit. 

3. 349: 31-5

क्रिएस्टियन साइंस में, पदार्थ को आत्मा के रूप में समझा जाता है, जबकि क्रिश्चियन साइंस के विरोधियों का मानना है कि सामग्री भौतिक है। वे किसी चीज़ के बारे में और लगभग एक ही चीज़ के बारे में विचार करते हैं, और वे उन चीजों के बारे में सोचते हैं जो आत्मा से संबंधित हैं और कुछ भी नहीं, या ये दैनिक अनुभव से बहुत दूर हैं। क्रिश्चियन साइंस इसके विपरीत दृश्य लेता है।

3. 349 : 31-5

In Christian Science, substance is understood to be Spirit, while the opponents of Christian Science believe substance to be matter. They think of matter as something and almost the only thing, and of the things which pertain to Spirit as next to nothing, or as very far removed from daily experience. Christian Science takes exactly the opposite view.

4. 335: 12-15

आत्मा एकमात्र पदार्थ है, अदृश्य और अविभाज्य अनंत भगवान। आध्यात्मिक और शाश्वत चीजें पर्याप्त हैं। चीजें सामग्री और अस्थायी असाध्य हैं।

4. 335 : 12-15

Spirit is the only substance, the invisible and indivisible infinite God. Things spiritual and eternal are substantial. Things material and temporal are insubstantial.

5. 507: 11-8

उत्पत्ति 1:11 फिर भगवान ने कहा, पृथ्वी से हरी घास, और बीज वाले छोटे छोटे पेड़, और फलदाई वृक्ष भी जिनके बीज उन्ही में एक एक की जाति के अनुसार होते हैं पृथ्वी पर उगते हैं; और वैसा ही हो गया।

आत्मा का ब्रह्मांड ईश्वरीय सिद्धांत या जीवन की रचनात्मक शक्ति को दर्शाता है, जो मन के बहुआयामी रूपों को पुन: पेश करता है और यौगिक विचार मनुष्य के गुणन को नियंत्रित करता है। पेड़ और जड़ी बूटी, किसी भी तरह की अपनी स्वयं की प्रचार शक्ति के कारण फल नहीं देते हैं, लेकिन क्योंकि वे मन को प्रतिबिंबित करते हैं जिसमें सभी शामिल हैं। एक भौतिक दुनिया एक नश्वर मन और मनुष्य को एक निर्माता बनाती है। वैज्ञानिक ईश्वरीय रचना अमर मन और ईश्वर द्वारा निर्मित ब्रह्मांड की घोषणा करती है।

अनंत मन मानसिक अणु से अनंत तक सभी को बनाता और नियंत्रित करता है। सभी का यह दिव्य सिद्धांत उनकी रचना के दौरान विज्ञान और कला, और मनुष्य और ब्रह्मांड की अमरता को व्यक्त करता है। सृजन हमेशा दिखाई दे रहा है, और हमेशा अपने अटूट स्रोत की प्रकृति से प्रकट होता रहना चाहिए। नश्वर भाव इस प्रकार प्रकट होता है और विचार सामग्री कहता है। इस प्रकार, गलत अर्थ में, दिव्य विचार मानव या भौतिक विश्वास के स्तर तक गिर जाता है, जिसे नश्वर मनुष्य कहा जाता है। लेकिन बीज अपने आप में है, केवल दिव्य मन ही सब कुछ है और सभी को पुन: उत्पन्न करता है — जैसा कि मन गुणक है, और मन का अनंत विचार, मनुष्य और ब्रह्मांड, उत्पाद है। एक विचार, एक बीज, या एक फूल की एकमात्र बुद्धि या पदार्थ ईश्वर है, जो इसका निर्माता है। मन सभी की आत्मा है। मन ही जीवन, सत्य और प्रेम है जो सभी को नियंत्रित करता है।

5. 507 : 11-8

Genesis i. 11. And God said, Let the earth bring forth grass, the herb yielding seed, and the fruit tree yielding fruit after his kind, whose seed is in itself, upon the earth: and it was so.

The universe of Spirit reflects the creative power of the divine Principle, or Life, which reproduces the multitudinous forms of Mind and governs the multiplication of the compound idea man. The tree and herb do not yield fruit because of any propagating power of their own, but because they reflect the Mind which includes all. A material world implies a mortal mind and man a creator. The scientific divine creation declares immortal Mind and the universe created by God.

Infinite Mind creates and governs all, from the mental molecule to infinity. This divine Principle of all expresses Science and art throughout His creation, and the immortality of man and the universe. Creation is ever appearing, and must ever continue to appear from the nature of its inexhaustible source. Mortal sense inverts this appearing and calls ideas material. Thus misinterpreted, the divine idea seems to fall to the level of a human or material belief, called mortal man. But the seed is in itself, only as the divine Mind is All and reproduces all — as Mind is the multiplier, and Mind's infinite idea, man and the universe, is the product. The only intelligence or substance of a thought, a seed, or a flower is God, the creator of it. Mind is the Soul of all. Mind is Life, Truth, and Love which governs all.

6. 60: 29-31

आत्मा के पास आत्मा को प्राप्त करने के लिए अनंत संसाधन हैं, और खुशी अधिक आसानी से प्राप्त की जाएगी और हमारे रखने में अधिक सुरक्षित होगी, अगर आत्मा में मांग की जाए।

6. 60 : 29-31

Soul has infinite resources with which to bless mankind, and happiness would be more readily attained and would be more secure in our keeping, if sought in Soul.

7. 206: 15-18

मनुष्य के साथ भगवान के वैज्ञानिक संबंध में, हम पाते हैं कि जो कुछ भी एक को आशीर्वाद देता है, वह सभी को आशीर्वाद देता है, जैसा कि यीशु ने आत्मा को दिखाया, भौतिक नहीं, आपूर्ति का स्रोत होने के नाते, रोटियों और मछलियों के साथ।

7. 206 : 15-18

In the scientific relation of God to man, we find that whatever blesses one blesses all, as Jesus showed with the loaves and the fishes, — Spirit, not matter, being the source of supply.

8. 507: 3-6

आत्मा प्रत्येक वस्तु को विधिवत् खिलाती है और कपड़े देती है, जैसा कि आध्यात्मिक निर्माण की पंक्ति में दिखाई देता है, इस प्रकार भगवान के पितात्व और मातृत्व को कोमलता से व्यक्त करके।

8. 507 : 3-6

Spirit duly feeds and clothes every object, as it appears in the line of spiritual creation, thus tenderly expressing the fatherhood and motherhood of God.

9. 2: 26 (करेगा)-30

क्या हम खुले फव्वारे में और अधिक की याचना करेंगे, जिसे हम स्वीकार करने की तुलना में अधिक डाल रहे हैं? अनिच्छुक इच्छा हमें सभी अस्तित्व और आशीर्वाद के स्रोत के करीब लाती है।

9. 2 : 26 (Shall)-30

Shall we plead for more at the open fount, which is pouring forth more than we accept? The unspoken desire does bring us nearer the source of all existence and blessedness.

10. 530: 5-12

दिव्य विज्ञान में, मनुष्य ईश्वर के द्वारा कायम है,होने का दिव्य सिद्धांत। परमेश्वर के आदेश पर पृथ्वी, मनुष्य के उपयोग के लिए भोजन लाती है। यह जानकर, यीशु ने एक बार कहा था, "से कहता हूं, कि अपने प्राण के लिये यह चिन्ता न करना कि हम क्या खाएंगे?" — अपने निर्माता के विशेषाधिकार पर नहीं मानते हुए, लेकिन सभी के पिता और माता को पहचान कर, जो मनुष्य को खिलाने और कपड़े पहनने में सक्षम है, जैसे वह गेंदे के साथ करता है।

10. 530 : 5-12

In divine Science, man is sustained by God, the divine Principle of being. The earth, at God's command, brings forth food for man's use. Knowing this, Jesus once said, "Take no thought for your life, what ye shall eat, or what ye shall drink," — presuming not on the prerogative of his creator, but recognizing God, the Father and Mother of all, as able to feed and clothe man as He doth the lilies.

11. 442: 22-29

क्राइस्ट, ट्रुथ, मॉर्टल्स को अस्थायी भोजन और कपड़े देता है जब तक कि सामग्री गायब नहीं हो जाती, जो आदर्श के साथ बदल जाती है, और जब तक आदमी को कपड़े नहीं पहनाए जाते हैं और आध्यात्मिक रूप से नहीं खिलाया जाता है। संत पॉल कहते हैं, "डरते और कांपते हुए अपने अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ:" ईश ने कहा, "हे छोटे झुण्ड, मत डर; क्योंकि तुम्हारे पिता को यह भाया है, कि तुम्हें राज्य दे।" यह सच्चाई क्रिश्चियन साइंस है।

11. 442 : 22-29

Christ, Truth, gives mortals temporary food and clothing until the material, transformed with the ideal, disappears, and man is clothed and fed spiritually. St. Paul says, "Work out your own salvation with fear and trembling:" Jesus said, "Fear not, little flock; for it is your Father's good pleasure to give you the kingdom." This truth is Christian Science.

12. 367: 30-32

क्योंकि सत्य अनंत है, त्रुटि को कुछ भी नहीं के रूप में जाना जाना चाहिए। क्योंकि सत्य अच्छाई में सर्वशक्तिमान है, त्रुटि, सत्य के विपरीत, कोई शक्ति नहीं है।

12. 367 : 30-32

Because Truth is infinite, error should be known as nothing. Because Truth is omnipotent in goodness, error, Truth's opposite, has no might.

13. 454: 4-9

अपने छात्रों को सत्य की सर्वशक्तिमानता सिखाएं, जो त्रुटि की नपुंसकता को दर्शाता है। एक अंश में भी, परमात्मा की समझ से सारी शक्ति भय को नष्ट कर देती है, और यह सच्चे मार्ग में पैर रखता है, — वह मार्ग जो बिना हाथों के बने घर की ओर जाता है "आकाश में अनन्त।"

13. 454 : 4-9

Teach your students the omnipotence of Truth, which illustrates the impotence of error. The understanding, even in a degree, of the divine All-power destroys fear, and plants the feet in the true path, — the path which leads to the house built without hands "eternal in the heavens."

14. 578: 5-18

[दिव्य प्रेम] मेरा चरवाहा है, मुझे कुछ घटी न होगी।

[प्रेम] मुझे हरी हरी चराइयों में बैठाता है; [प्रेम] मुझे सुखदाई जल के झरने के पास ले चलता है;

[प्रेम] मेरे जी में जी ले आता है। धर्म के मार्गो में [प्रेम] अपने नाम के निमित्त मेरी अगुवाई करता है।

चाहे मैं घोर अन्धकार से भरी हुई तराई में होकर चलूं, तौभी हानि से न डरूंगा, क्योंकि [प्रेम] मेरे साथ रहता है;

[प्रेम का] सोंटे और [प्रेम का] लाठी से मुझे शान्ति मिलती है॥

[प्रेम] मेरे सताने वालों के साम्हने मेरे लिये मेज बिछाता है; [प्रेम] ने मेरे सिर पर तेल मला है, मेरा कटोरा उमण्ड रहा है।

निश्चय भलाई और करूणा जीवन भर मेरे साथ साथ बनी रहेंगी; और मैं [प्रेम] के [चेतना] धाम में वास करूंगा ॥

14. 578 : 5-18

[Divine love] is my shepherd; I shall not want.

[Love] maketh me to lie down in green pastures: [love] leadeth me beside the still waters.

[Love] restoreth my soul [spiritual sense]: [love] leadeth me in the paths of righteousness for His name's sake.

Yea, though I walk through the valley of the shadow of death, I will fear no evil: for [love] is with me; [love’s] rod and [love’s] staff they comfort me.

[Love] prepareth a table before me in the presence of mine enemies: [love] anointeth my head with oil; my cup runneth over.

Surely goodness and mercy shall follow me all the days of my life; and I will dwell in the house [the consciousness] of [love] for ever.

15. 494: 10-14

ईश्वरीय प्रेम हमेशा से मिला है और हमेशा हर मानवीय आवश्यकता को पूरा करेगा। यह कल्पना करना ठीक नहीं है कि यीशु ने दिव्य शक्ति का चयन केवल संख्या के लिए या सीमित समय के लिए ठीक करने के लिए किया, क्योंकि सभी मानव जाति के लिए और सभी समयों में, दिव्य प्रेम सभी अच्छे की आपूर्ति करता है।

15. 494 : 10-14

Divine Love always has met and always will meet every human need. It is not well to imagine that Jesus demonstrated the divine power to heal only for a select number or for a limited period of time, since to all mankind and in every hour, divine Love supplies all good.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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