रविवार 15 मार्च, 2020 |

रविवार 15 मार्च, 2020



विषयपदार्थ

SubjectSubstance

वर्ण पाठ: इब्रानियों 10 : 34

कि तुम्हारे पास एक और भी उत्तम और सर्वदा ठहरने वाली संपत्ति है।



Golden Text: Hebrews 10 : 34

Ye have in heaven a better and an enduring substance.




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भजन संहिता 37 : 3-6, 16, 18, 19


3     यहोवा पर भरोसा रख, और भला कर; देश में बसा रह, और सच्चाई में मन लगाए रह।

4     यहोवा को अपने सुख का मूल जान, और वह तेरे मनोरथों को पूरा करेगा॥

5     अपने मार्ग की चिन्ता यहोवा पर छोड़; और उस पर भरोसा रख, वही पूरा करेगा।

6     और वह तेरा धर्म ज्योति की नाईं, और तेरा न्याय दोपहर के उजियाले की नाईं प्रगट करेगा॥

16     धर्मी का थोड़ा से माल दुष्टों के बहुत से धन से उत्तम है।

18     यहोवा खरे लोगों की आयु की सुधि रखता है, और उनका भाग सदैव बना रहेगा।

19     विपत्ति के समय, उनकी आशा न टूटेगी और न वे लज्जित होंगे, और अकाल के दिनों में वे तृप्त रहेंगे॥

Responsive Reading: Psalm 37 : 3-6, 16, 18, 19

3.     Trust in the Lord, and do good; so shalt thou dwell in the land, and verily thou shalt be fed.

4.     Delight thyself also in the Lord; and he shall give thee the desires of thine heart.

5.     Commit thy way unto the Lord; trust also in him; and he shall bring it to pass.

6.     And he shall bring forth thy righteousness as the light, and thy judgment as the noonday.

16.     A little that a righteous man hath is better than the riches of many wicked.

18.     The Lord knoweth the days of the upright: and their inheritance shall be for ever.

19.     They shall not be ashamed in the evil time: and in the days of famine they shall be satisfied.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 36 : 5-9

5     हे यहोवा तेरी करूणा स्वर्ग में है, तेरी सच्चाई आकाश मण्डल तक पहुंची है।

6     तेरा धर्म ऊंचे पर्वतों के समान है, तेरे नियम अथाह सागर ठहरे हैं; हे यहोवा तू मनुष्य और पशु दोनों की रक्षा करता है॥

7     हे परमेश्वर तेरी करूणा, कैसी अनमोल है! मनुष्य तेरे पंखो के तले शरण लेते हैं।

8     वे तेरे भवन के चिकने भोजन से तृप्त होंगे, और तू अपनी सुख की नदी में से उन्हें पिलाएगा।

9     क्योंकि जीवन का सोता तेरे ही पास है; तेरे प्रकाश के द्वारा हम प्रकाश पाएंगे॥

1. Psalm 36 : 5-9

5     Thy mercy, O Lord, is in the heavens; and thy faithfulness reacheth unto the clouds.

6     Thy righteousness is like the great mountains; thy judgments are a great deep: O Lord, thou preservest man and beast.

7     How excellent is thy lovingkindness, O God! therefore the children of men put their trust under the shadow of thy wings.

8     They shall be abundantly satisfied with the fatness of thy house; and thou shalt make them drink of the river of thy pleasures.

9     For with thee is the fountain of life: in thy light shall we see light.

2. यशायाह 58 : 10, 11, 13 (आप को), 13 (सम्मान), 14

10     उदारता से भूखे की सहायता करे और दीन दु:खियों को सन्तुष्ट करे, तब अन्धियारे में तेरा प्रकाश चमकेगा, और तेरा घोर अन्धकार दोपहर का सा उजियाला हो जाएगा।

11     और यहोवा तुझे लगातार लिए चलेगा, और काल के समय तुझे तृप्त और तेरी हड्डियों को हरी भरी करेगा; और तू सींची हुई बारी और ऐसे सोते के समान होगा जिसका जल कभी नहीं सूखता।

13     यदि तू ... उसका सन्मान कर के उस दिन अपने मार्ग पर न चले, अपनी इच्छा पूरी न करे, और अपनी ही बातें न बोले,

14     तो तू यहोवा के कारण सुखी होगा, और मैं तुझे देश के ऊंचे स्थानों पर चलने दूंगा; मैं तेरे मूलपुरूष याकूब के भाग की उपज में से तुझे खिलाऊंगा, क्योंकि यहोवा ही के मुख से यह वचन निकला है॥

2. Isaiah 58 : 10, 11, 13 (to thou), 13 (honour), 14

10     And if thou draw out thy soul to the hungry, and satisfy the afflicted soul; then shall thy light rise in obscurity, and thy darkness be as the noonday:

11     And the Lord shall guide thee continually, and satisfy thy soul in drought, and make fat thy bones: and thou shalt be like a watered garden, and like a spring of water, whose waters fail not.

13     If thou … honour him, not doing thine own ways, nor finding thine own pleasure, nor speaking thine own words:

14     Then shalt thou delight thyself in the Lord; and I will cause thee to ride upon the high places of the earth, and feed thee with the heritage of Jacob thy father: for the mouth of the Lord hath spoken it.

3. मरकुस 11: 11 (से :)

11     और वह यरूशलेम पहुंचकर मन्दिर में आया॥

3. Mark 11 : 11 (to :)

11     And Jesus entered into Jerusalem, and into the temple:

4. मरकुस 12 : 28-31

28     और शास्त्रियों में से एक ने आकर उन्हें विवाद करते सुना, और यह जानकर कि उस ने उन्हें अच्छी रीति से उत्तर दिया; उस से पूछा, सब से मुख्य आज्ञा कौन सी है?

29     यीशु ने उसे उत्तर दिया, सब आज्ञाओं में से यह मुख्य है; हे इस्राएल सुन; प्रभु हमारा परमेश्वर एक ही प्रभु है।

30     और तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन से और अपने सारे प्राण से, और अपनी सारी बुद्धि से, और अपनी सारी शक्ति से प्रेम रखना।

31     और दूसरी यह है, कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना: इस से बड़ी और कोई आज्ञा नहीं।

4. Mark 12 : 28-31

28     And one of the scribes came, and having heard them reasoning together, and perceiving that he had answered them well, asked him, Which is the first commandment of all?

29     And Jesus answered him, The first of all the commandments is, Hear, O Israel; The Lord our God is one Lord:

30     And thou shalt love the Lord thy God with all thy heart, and with all thy soul, and with all thy mind, and with all thy strength: this is the first commandment.

31     And the second is like, namely this, Thou shalt love thy neighbour as thyself. There is none other commandment greater than these.

5. यूहन्ना 6 : 1, 2, 5, 8-13, 15, 25-27, 63

1     इन बातों के बाद यीशु गलील की झील अर्थात तिबिरियास की झील के पास गया।

2     और एक बड़ी भीड़ उसके पीछे हो ली क्योंकि जो आश्चर्य कर्म वह बीमारों पर दिखाता था वे उन को देखते थे।

5     तब यीशु ने अपनी आंखे उठाकर एक बड़ी भीड़ को अपने पास आते देखा, और फिलेप्पुस से कहा, कि हम इन के भोजन के लिये कहां से रोटी मोल लाएं?

8     उसके चेलों में से शमौन पतरस के भाई अन्द्रियास ने उस से कहा।

9     यहां एक लड़का है जिस के पास जव की पांच रोटी और दो मछिलयां हैं परन्तु इतने लोगों के लिये वे क्या हैं?

10     यीशु ने कहा, कि लोगों को बैठा दो। उस जगह बहुत घास थी: तब वे लोग जो गिनती में लगभग पांच हजार के थे, बैठ गए:

11     तब यीशु ने रोटियां लीं, और धन्यवाद करके बैठने वालों को बांट दी: और वैसे ही मछिलयों में से जितनी वे चाहते थे बांट दिया।

12     जब वे खाकर तृप्त हो गए तो उस ने अपने चेलों से कहा, कि बचे हुए टुकड़े बटोर लो, कि कुछ फेंका न जाए।

13     सो उन्होंने बटोरा, और जव की पांच रोटियों के टुकड़े जो खाने वालों से बच रहे थे उन की बारह टोकिरयां भरीं।

15     यीशु यह जानकर कि वे मुझे राजा बनाने के लिये आकर पकड़ना चाहते हैं, फिर पहाड़ पर अकेला चला गया।

25     और झील के पार उस से मिलकर कहा, हे रब्बी, तू यहां कब आया?

26     यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, कि मैं तुम से सच सच कहता हूं, तुम मुझे इसलिये नहीं ढूंढ़ते हो कि तुम ने अचम्भित काम देखे, परन्तु इसलिये कि तुम रोटियां खाकर तृप्त हुए।

27     नाशमान भोजन के लिये परिश्रम न करो, परन्तु उस भोजन के लिये जो अनन्त जीवन तक ठहरता है, जिसे मनुष्य का पुत्र तुम्हें देगा, क्योंकि पिता, अर्थात परमेश्वर ने उसी पर छाप कर दी है।

63     आत्मा तो जीवनदायक है, शरीर से कुछ लाभ नहीं: जो बातें मैं ने तुम से कहीं हैं वे आत्मा है, और जीवन भी हैं।

5. John 6 : 1, 2, 5, 8-13, 15, 25-27, 63

1     After these things Jesus went over the sea of Galilee, which is the sea of Tiberias.

2     And a great multitude followed him, because they saw his miracles which he did on them that were diseased.

5     When Jesus then lifted up his eyes, and saw a great company come unto him, he saith unto Philip, Whence shall we buy bread, that these may eat?

8     One of his disciples, Andrew, Simon Peter’s brother, saith unto him,

9     There is a lad here, which hath five barley loaves, and two small fishes: but what are they among so many?

10     And Jesus said, Make the men sit down. Now there was much grass in the place. So the men sat down, in number about five thousand.

11     And Jesus took the loaves; and when he had given thanks, he distributed to the disciples, and the disciples to them that were set down; and likewise of the fishes as much as they would.

12     When they were filled, he said unto his disciples, Gather up the fragments that remain, that nothing be lost.

13     Therefore they gathered them together, and filled twelve baskets with the fragments of the five barley loaves, which remained over and above unto them that had eaten.

15     When Jesus therefore perceived that they would come and take him by force, to make him a king, he departed again into a mountain himself alone.

25     And when they had found him on the other side of the sea, they said unto him, Rabbi, when camest thou hither?

26     Jesus answered them and said, Verily, verily, I say unto you, Ye seek me, not because ye saw the miracles, but because ye did eat of the loaves, and were filled.

27     Labour not for the meat which perisheth, but for that meat which endureth unto everlasting life, which the Son of man shall give unto you: for him hath God the Father sealed.

63     It is the spirit that quickeneth; the flesh profiteth nothing: the words that I speak unto you, they are spirit, and they are life.

6. मरकुस 16 : 17 (से 2nd ;), 18 (वे पर रखेंगे)

17     और विश्वास करने वालों में ये चिन्ह होंगे कि वे मेरे नाम से दुष्टात्माओं को निकालेंगे।

18     ... वे बीमारों पर हाथ रखेंगे, और वे चंगे हो जाएंगे।

6. Mark 16 : 17 (to 2nd ;), 18 (they shall lay)

17     And these signs shall follow them that believe; In my name shall they cast out devils;

18     …they shall lay hands on the sick, and they shall recover.

7. II कुरिन्थियों 9 : 6-11

6     परन्तु बात तो यह है, कि जो थोड़ा बोता है वह थोड़ा काटेगा भी; और जो बहुत बोता है, वह बहुत काटेगा।

7     हर एक जन जैसा मन में ठाने वैसा ही दान करे न कुढ़ कुढ़ के, और न दबाव से, क्योंकि परमेश्वर हर्ष से देने वाले से प्रेम रखता है।

8     और परमेश्वर सब प्रकार का अनुग्रह तुम्हें बहुतायत से दे सकता है जिस से हर बात में और हर समय, सब कुछ, जो तुम्हें आवश्यक हो, तुम्हारे पास रहे, और हर एक भले काम के लिये तुम्हारे पास बहुत कुछ हो।

9     जेसा लिखा है, उस ने बिथराया, उस ने कंगालों को दान दिया, उसका धर्म सदा बना रहेगा।

10     सो जो बोने वाले को बीज, और भोजन के लिये रोटी देता है वह तुम्हें बीज देगा, और उसे फलवन्त करेगा; और तुम्हारे धर्म के फलों को बढ़ाएगा।

11     कि तुम हर बात में सब प्रकार की उदारता के लिये जो हमारे द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद करवाती है, धनवान किए जाओ।

7. II Corinthians 9 : 6-11

6     But this I say, He which soweth sparingly shall reap also sparingly; and he which soweth bountifully shall reap also bountifully.

7     Every man according as he purposeth in his heart, so let him give; not grudgingly, or of necessity: for God loveth a cheerful giver.

8     And God is able to make all grace abound toward you; that ye, always having all sufficiency in all things, may abound to every good work:

9     (As it is written, He hath dispersed abroad; he hath given to the poor: his righteousness remaineth for ever.

10     Now he that ministereth seed to the sower both minister bread for your food, and multiply your seed sown, and increase the fruits of your righteousness;)

11     Being enriched in every thing to all bountifulness, which causeth through us thanksgiving to God.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 468 : 17 (पदार्थ)-24

पदार्थ वह है जो अनादि है और कलह और क्षय से असमर्थ है। सत्य, जीवन और प्रेम पदार्थ हैं, क्योंकि इब्रानियों में इस शब्द का उपयोग होता है: “विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है।" आत्मा, मन, आत्मा या ईश्वर का पर्यायवाची एकमात्र वास्तविक पदार्थ है। व्यक्ति सहित आध्यात्मिक ब्रह्मांड, एक यौगिक विचार है, वह आत्मा के दिव्य पदार्थ को दर्शाता है।

1. 468 : 17 (Substance)-24

Substance is that which is eternal and incapable of discord and decay. Truth, Life, and Love are substance, as the Scriptures use this word in Hebrews: "The substance of things hoped for, the evidence of things not seen." Spirit, the synonym of Mind, Soul, or God, is the only real substance. The spiritual universe, including individual man, is a compound idea, reflecting the divine substance of Spirit.

2. 311 : 26-7

भौतिक इंद्रियों द्वारा पहचानी गई वस्तुओं में पदार्थ की वास्तविकता नहीं है। वे केवल वही हैं जो नश्वर विश्वास उन्हें कहते हैं। पदार्थ, पाप और मृत्यु दर जीवन या अस्तित्व के लिए सभी कथित चेतना या दावे खो देते हैं जब नश्वर जीवन, पदार्थ और बुद्धिमत्ता की झूठी भावना को दूर करते हैं लेकिन आध्यात्मिक, अनन्त मनुष्य को मृत्यु के इन चरणों से नहीं छुआ जाता है।

यह कितना अद्भुत है कि भौतिक ज्ञान के माध्यम से जो कुछ भी सीखा जाता है उसे खोना चाहिए क्योंकि इस तरह के तथाकथित ज्ञान विज्ञान में होने के आध्यात्मिक तथ्यों से उलट है। जिसे भौतिक अर्थ अमूर्त कहता है, वह पदार्थ कहलाता है। जो भौतिक अर्थों में पदार्थ लगता है, वह शून्य हो जाता है, क्योंकि इंद्रिय-स्वप्न लुप्त हो जाता है और वास्तविकता प्रकट होती है।

2. 311 : 26-7

The objects cognized by the physical senses have not the reality of substance. They are only what mortal belief calls them. Matter, sin, and mortality lose all supposed consciousness or claim to life or existence, as mortals lay off a false sense of life, substance, and intelligence. But the spiritual, eternal man is not touched by these phases of mortality.

How true it is that whatever is learned through material sense must be lost because such so-called knowledge is reversed by the spiritual facts of being in Science. That which material sense calls intangible, is found to be substance. What to material sense seems substance, becomes nothingness, as the sense-dream vanishes and reality appears.

3. 89 : 32-15

यदि बीज का उत्पादन करने के लिए गेहूं, और गेहूं के आटे का उत्पादन करना आवश्यक है, या यदि एक जानवर दूसरे की उत्पत्ति कर सकता है, तो हम उनके हिमालय मूल के लिए कैसे अनुमान लगा सकते हैं? गलील के तट पर रोटियों और मछलियों को कैसे गुणा किया गया, - और वह भी, बिना भोजन या मोनाद से, जिसमें से रोटी या मछली आ सकती है?

पृथ्वी की कक्षा और भूमध्य रेखा नामक काल्पनिक रेखा पदार्थ नहीं हैं। पृथ्वी की गति और स्थिति अकेले मन द्वारा कायम हैं। अपने आप को इस विचार से विभाजित करें कि पदार्थ में पदार्थ हो सकता है, और नश्वर मन के लिए अब संभव होने वाले आंदोलनों और संक्रमण शरीर के लिए समान रूप से संभव हो जाएंगे। तब आध्यात्मिक होने के रूप में पहचाना जाएगा, और मृत्यु अप्रचलित होगी, हालांकि अब कुछ लोग जोर देते हैं कि मृत्यु अमरता के लिए आवश्यक प्रस्तावना है।

3. 89 : 32-15

If seed is necessary to produce wheat, and wheat to produce flour, or if one animal can originate another, how then can we account for their primal origin? How were the loaves and fishes multiplied on the shores of Galilee, — and that, too, without meal or monad from which loaf or fish could come?

The earth's orbit and the imaginary line called the equator are not substance. The earth's motion and position are sustained by Mind alone. Divest yourself of the thought that there can be substance in matter, and the movements and transitions now possible for mortal mind will be found to be equally possible for the body. Then being will be recognized as spiritual, and death will be obsolete, though now some insist that death is the necessary prelude to immortality.

4. 467 : 3 (यह)-8

इस विज्ञान की पहली मांग है, "दूसरों को ईश्वर करके न मानना॥" यह "मैं" आत्मा है। T इसलिए आज्ञा का यह अर्थ है: आपके पास कोई बुद्धि नहीं है, कोई जीवन नहीं है, कोई पदार्थ नहीं है, कोई सत्य नहीं है, कोई प्रेम नहीं है, इसके अलावा जो आध्यात्मिक है। दूसरा उसके जैसा है, "तू अपने पड़ोसी से अपने जैसा प्रेम रखना।"

4. 467 : 3 (The)-8

The first demand of this Science is, "Thou shalt have no other gods before me." This me is Spirit. Therefore the command means this: Thou shalt have no intelligence, no life, no substance, no truth, no love, but that which is spiritual. The second is like unto it, "Thou shalt love thy neighbor as thyself."

5. 454 : 17-21

ईश्वर और मनुष्य के लिए प्यार हीलिंग और शिक्षण दोनों में सच्चा प्रोत्साहन है। प्रेम प्रेरणा देता है, रोशनी करता है, नामित करता है और मार्ग प्रशस्त करता है। सही इरादों ने विचार, और ताकत और बोलने और कार्रवाई करने की स्वतंत्रता को चुटकी दी।

5. 454 : 17-21

Love for God and man is the true incentive in both healing and teaching. Love inspires, illumines, designates, and leads the way. Right motives give pinions to thought, and strength and freedom to speech and action.

6. 494 : 10-19

ईश्वरीय प्रेम हमेशा से मिला है और हमेशा हर मानवीय आवश्यकता को पूरा करेगा। यह कल्पना करना ठीक नहीं है कि यीशु ने दिव्य शक्ति का चयन केवल संख्या के लिए या सीमित समय के लिए ठीक करने के लिए किया, क्योंकि सभी मानव जाति के लिए और सभी समयों में, दिव्य प्रेम सभी अच्छे की आपूर्ति करता है।

कृपा का चमत्कार प्रेम का कोई चमत्कार नहीं है। यीशु ने शारीरिक शक्ति के साथ-साथ आत्मा की असीम क्षमता की अक्षमता का प्रदर्शन किया, इस प्रकार मानव भावना को अपने स्वयं के दोषों से भागने में मदद करने और दिव्य विज्ञान में सुरक्षा की तलाश करने के लिए।

6. 494 : 10-19

Divine Love always has met and always will meet every human need. It is not well to imagine that Jesus demonstrated the divine power to heal only for a select number or for a limited period of time, since to all mankind and in every hour, divine Love supplies all good.

The miracle of grace is no miracle to Love. Jesus demonstrated the inability of corporeality, as well as the infinite ability of Spirit, thus helping erring human sense to flee from its own convictions and seek safety in divine Science.

7. 25 : 22-31

यद्यपि पाप और बीमारी पर अपने नियंत्रण का प्रदर्शन, किसी भी तरह से महान शिक्षक ने दूसरों को अपने स्वयं के पवित्रता के अपेक्षित प्रमाण देने से राहत नहीं दी। उन्होंने उनके मार्गदर्शन के लिए काम किया, ताकि वे इस शक्ति का प्रदर्शन कर सकें, जैसा कि उन्होंने किया और इसके दिव्य सिद्धांत को समझा। शिक्षक के प्रति विश्वास और सभी भावनात्मक प्रेम हम उस पर पूरा कर सकते हैं, कभी भी हमें उसका अनुकरण करने वाला नहीं बनाएंगे। हमें इसी तरह से जाना चाहिए और करना चाहिए, अन्यथा हम उन महान आशीषों में सुधार नहीं कर रहे हैं जो हमारे मास्टर ने काम किया था और हमारे लिए सबसे अच्छा था। मसीह की दिव्यता को यीशु की मानवता में प्रकट किया गया था।

7. 25 : 22-31

Though demonstrating his control over sin and disease, the great Teacher by no means relieved others from giving the requisite proofs of their own piety. He worked for their guidance, that they might demonstrate this power as he did and understand its divine Principle. Implicit faith in the Teacher and all the emotional love we can bestow on him, will never alone make us imitators of him. We must go and do likewise, else we are not improving the great blessings which our Master worked and suffered to bestow upon us. The divinity of the Christ was made manifest in the humanity of Jesus.

8. 8 : 22-24

यदि हम गरीबों से दूर हो जाते हैं, तो हम गरीबों को आशीर्वाद देने वाले से पुरस्कार प्राप्त करने के लिए तैयार नहीं हैं।

8. 8 : 22-24

If we turn away from the poor, we are not ready to receive the reward of Him who blesses the poor.

9. 9 : 5-13 (से ;), 17-24

इन सवालों के जवाब में सभी प्रार्थनाओं का परीक्षण निहित है: क्या हम इस आज्ञा के कारण अपने पड़ोसी से बेहतर प्रेम करते हैं? क्या हम पुराने स्वार्थ का पीछा करते हैं, किसी चीज़ के लिए बेहतर प्रार्थना करने से संतुष्ट हैं, हालाँकि हम अपनी प्रार्थना के साथ लगातार रहकर अपने अनुरोधों की ईमानदारी का कोई सबूत नहीं देते हैं? अगर स्वार्थ ने दया को जगह दी है, तो हम अपने पड़ोसी को निस्वार्थ रूप से सम्मान देंगे, और उन्हें आशीर्वाद देंगे कि हमें अभिशाप दें।

क्या आप "अपने भगवान को अपने प्रभु और अपने सभी प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रखते हैं"? इस आदेश में बहुत कुछ शामिल है, यहां तक कि सभी भौतिक संवेदना, स्नेह और पूजा का समर्पण भी। यह ईसाई धर्म का एल डोराडो है। इसमें जीवन का विज्ञान शामिल है, और केवल आत्मा के दिव्य नियंत्रण को मान्यता देता है, जिसमें आत्मा हमारा स्वामी है, और भौतिक अर्थ और मानव का कोई स्थान नहीं होगा।

9. 9 : 5-13 (to ;), 17-24

The test of all prayer lies in the answer to these questions: Do we love our neighbor better because of this asking? Do we pursue the old selfishness, satisfied with having prayed for something better, though we give no evidence of the sincerity of our requests by living consistently with our prayer? If selfishness has given place to kindness, we shall regard our neighbor unselfishly, and bless them that curse us;

Dost thou "love the Lord thy God with all thy heart, and with all thy soul, and with all thy mind"? This command includes much, even the surrender of all merely material sensation, affection, and worship. This is the El Dorado of Christianity. It involves the Science of Life, and recognizes only the divine control of Spirit, in which Soul is our master, and material sense and human will have no place.

10. 79 : 29-3

माइंड-साइंस सिखाता है कि मनुष्यों को "अच्छे कामों में थके हुए नहीं होना चाहिए।" यह अच्छा करने में थकावट दूर करता है। देने से हमें अपने निर्माता की सेवा में कमजोर नहीं पड़ता है, और न ही हमें समृद्ध बनाता है। हमारे पास सत्य के बारे में हमारी आशंका के अनुपात में ताकत है, और सच्चाई को प्रदर्शन देने से हमारी ताकत कम नहीं है।

10. 79 : 29-3

Mind-science teaches that mortals need "not be weary in well doing." It dissipates fatigue in doing good. Giving does not impoverish us in the service of our Maker, neither does withholding enrich us. We have strength in proportion to our apprehension of the truth, and our strength is not lessened by giving utterance to truth.

11. 518 : 13-19

ईश्वर स्वयं का विचार देता है, अधिक के लिए कम करने के लिए, और बदले में, उच्च हमेशा कम की रक्षा करता है। सभी को एक ही सिद्धांत, या पिता, को एक भव्य भाईचारे में रखते हुए, आत्मा में समृद्ध गरीबों की मदद करते हैं। और धन्य है वह आदमी जो दूसरे की भलाई में अपनी भलाई जानता है, अपने भाई की आवश्यकता को देखता है और उसकी आपूर्ति करता है।

11. 518 : 13-19

God gives the lesser idea of Himself for a link to the greater, and in return, the higher always protects the lower. The rich in spirit help the poor in one grand brotherhood, all having the same Principle, or Father; and blessed is that man who seeth his brother's need and supplieth it, seeking his own in another's good.

12. 570 : 14-21, 23-25

लाखों अजेय मन - सत्य के लिए सरल साधक, थके हुए भटकने वाले, रेगिस्तान में प्यासे - आराम करने और पीने के लिए इंतजार कर रहे हैं। उन्हें मसीह के नाम पर एक कप ठंडा पानी दें, और इसके परिणामों से कभी न डरें। क्या होगा अगर पुराने नाग, मसीह-विचार को डूबने के लिए एक नई बाढ़ भेजेंगे? वह अपनी गर्जना से न तो आपकी आवाज को डुबो सकता है, न ही फिर से दुनिया को अराजकता और पुरानी रात के गहरे पानी में डुबो सकता है। … आपके द्वारा प्रदान किए गए आशीर्वाद के लिए तैयार लोग धन्यवाद देंगे। पानी को शांत किया जाएगा, और मसीह लहर की कमान करेगा।

12. 570 : 14-21, 23-25

Millions of unprejudiced minds — simple seekers for Truth, weary wanderers, athirst in the desert — are waiting and watching for rest and drink. Give them a cup of cold water in Christ's name, and never fear the consequences. What if the old dragon should send forth a new flood to drown the Christ-idea? He can neither drown your voice with its roar, nor again sink the world into the deep waters of chaos and old night. … Those ready for the blessing you impart will give thanks. The waters will be pacified, and Christ will command the wave.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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