रविवार 15 अगस्त, 2021



विषयविषय — आत्मा

SubjectSoul

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: भजन संहिता 23 : 3

"वह मेरे जी में जी ले आता है। धर्म के मार्गो में वह अपने नाम के निमित्त मेरी अगुवाई करता है।"



Golden Text: Psalm 23 : 3

He restoreth my soul: he leadeth me in the paths of righteousness for his name’s sake.




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उत्तरदायी अध्ययन: 1 कुरिन्थियों 2 : 9-14, 16


9     परन्तु जैसा लिखा है, कि जो आंख ने नहीं देखी, और कान ने नहीं सुना, और जो बातें मनुष्य के चित्त में नहीं चढ़ीं वे ही हैं, जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखने वालों के लिये तैयार की हैं।

10     परन्तु परमेश्वर ने उन को अपने आत्मा के द्वारा हम पर प्रगट किया; क्योंकि आत्मा सब बातें, वरन परमेश्वर की गूढ़ बातें भी जांचता है।

11     मनुष्यों में से कौन किसी मनुष्य की बातें जानता है, केवल मनुष्य की आत्मा जो उस में है? वैसे ही परमेश्वर की बातें भी कोई नहीं जानता, केवल परमेश्वर का आत्मा।

12     परन्तु हम ने संसार की आत्मा नहीं, परन्तु वह आत्मा पाया है, जो परमेश्वर की ओर से है, कि हम उन बातों को जानें, जो परमेश्वर ने हमें दी हैं।

13     जिन को हम मनुष्यों के ज्ञान की सिखाई हुई बातों में नहीं, परन्तु आत्मा की सिखाई हुई बातों में, आत्मिक बातें आत्मिक बातों से मिला मिला कर सुनाते हैं।

14     परन्तु शारीरिक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता, क्योंकि वे उस की दृष्टि में मूर्खता की बातें हैं, और न वह उन्हें जान सकता है क्योंकि उन की जांच आत्मिक रीति से होती है।

16     क्योंकि प्रभु का मन किस ने जाना है, कि उसे सिखलाए? परन्तु हम में मसीह का मन है॥

Responsive Reading: I Corinthians 2 : 9-14, 16

9.     As it is written, Eye hath not seen, nor ear heard, neither have entered into the heart of man, the things which God hath prepared for them that love him.

10.     But God hath revealed them unto us by his Spirit: for the Spirit searcheth all things, yea, the deep things of God.

11.     For what man knoweth the things of a man, save the spirit of man which is in him? even so the things of God knoweth no man, but the Spirit of God.

12.     Now we have received, not the spirit of the world, but the spirit which is of God; that we might know the things that are freely given to us of God.

13.     Which things also we speak, not in the words which man’s wisdom teacheth, but which the Holy Ghost teacheth; comparing spiritual things with spiritual.

14.     But the natural man receiveth not the things of the Spirit of God: for they are foolishness unto him: neither can he know them, because they are spiritually discerned.

16.     For who hath known the mind of the Lord, that he may instruct him? But we have the mind of Christ.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 35 : 9 (मेरे)

9     ... मैं यहोवा के कारण अपने मन में मगन होऊंगा, मैं उसके किए हुए उद्धार से हर्षित होऊंगा।

1. Psalm 35 : 9 (my)

9     …my soul shall be joyful in the Lord: it shall rejoice in his salvation.

2. भजन संहिता 143 : 8, 10-12

8     अपनी करूणा की बात मुझे शीघ्र सुना, क्योंकि मैं ने तुझी पर भरोसा रखा है। जिस मार्ग से मुझे चलना है, वह मुझ को बता दे, क्योंकि मैं अपना मन तेरी ही ओर लगाता हूं॥

10     मुझ को यह सिखा, कि मैं तेरी इच्छा क्योंकर पूरी करूं, क्योंकि मेरा परमेश्वर तू ही है! तेरा भला आत्मा मुझ को धर्म के मार्ग में ले चले!

11     हे यहोवा, मुझे अपने नाम के निमित्त जिला! तू जो धर्मी है, मुझ को संकट से छुड़ा ले!

12     और करूणा करके मेरे शत्रुओं को सत्यानाश कर, और मेरे सब सताने वालों का नाश कर डाल, क्योंकि मैं तेरा दास हूं॥

2. Psalm 143 : 8, 10-12

8     Cause me to hear thy lovingkindness in the morning; for in thee do I trust: cause me to know the way wherein I should walk; for I lift up my soul unto thee.

10     Teach me to do thy will; for thou art my God: thy spirit is good; lead me into the land of uprightness.

11     Quicken me, O Lord, for thy name’s sake: for thy righteousness’ sake bring my soul out of trouble.

12     And of thy mercy cut off mine enemies, and destroy all them that afflict my soul: for I am thy servant.

3. मत्ती 11 : 1

1     जब यीशु अपने बारह चेलों को आज्ञा दे चुका, तो वह उन के नगरों में उपदेश और प्रचार करने को वहां से चला गया॥

3. Matthew 11 : 1

1     And it came to pass, when Jesus had made an end of commanding his twelve disciples, he departed thence to teach and to preach in their cities.

4. मत्ती 12 : 22-28

22     तब लोग एक अन्धे-गूंगे को जिस में दुष्टात्मा थी, उसके पास लाए; और उस ने उसे अच्छा किया; और वह गूंगा बोलने और देखने लगा।

23     इस पर सब लोग चकित होकर कहने लगे, यह क्या दाऊद की सन्तान का है?

24     परन्तु फरीसियों ने यह सुनकर कहा, यह तो दुष्टात्माओं के सरदार शैतान की सहायता के बिना दुष्टात्माओं को नहीं निकालता।

25     उस ने उन के मन की बात जानकर उन से कहा; जिस किसी राज्य में फूट होती है, वह उजड़ जाता है, और कोई नगर या घराना जिस में फूट होती है, बना न रहेगा।

26     और यदि शैतान ही शैतान को निकाले, तो वह अपना ही विरोधी हो गया है; फिर उसका राज्य क्योंकर बना रहेगा?

27     भला, यदि मैं शैतान की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता हूं, तो तुम्हारे वंश किस की सहायता से निकालते हैं? इसलिये वे ही तुम्हारा न्याय चुकाएंगे।

28     पर यदि मैं परमेश्वर के आत्मा की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता हूं, तो परमेश्वर का राज्य तुम्हारे पास आ पहुंचा है।

4. Matthew 12 : 22-28

22     Then was brought unto him one possessed with a devil, blind, and dumb: and he healed him, insomuch that the blind and dumb both spake and saw.

23     And all the people were amazed, and said, Is not this the son of David?

24     But when the Pharisees heard it, they said, This fellow doth not cast out devils, but by Beelzebub the prince of the devils.

25     And Jesus knew their thoughts, and said unto them, Every kingdom divided against itself is brought to desolation; and every city or house divided against itself shall not stand:

26     And if Satan cast out Satan, he is divided against himself; how shall then his kingdom stand?

27     And if I by Beelzebub cast out devils, by whom do your children cast them out? therefore they shall be your judges.

28     But if I cast out devils by the Spirit of God, then the kingdom of God is come unto you.

5. मत्ती 16: 24-26

24     तब यीशु ने अपने चेलों से कहा; यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आप का इन्कार करे और अपना क्रूस उठाए, और मेरे पीछे हो ले।

25     क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे, वह उसे खोएगा; और जो कोई मेरे लिये अपना प्राण खोएगा, वह उसे पाएगा।

26     यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे, और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा?

5. Matthew 16 : 24-26

24     Then said Jesus unto his disciples, If any man will come after me, let him deny himself, and take up his cross, and follow me.

25     For whosoever will save his life shall lose it: and whosoever will lose his life for my sake shall find it.

26     For what is a man profited, if he shall gain the whole world, and lose his own soul? or what shall a man give in exchange for his soul?

6. मत्ती 8 : 5-13

5     और जब वह कफरनहूम में आया तो एक सूबेदार ने उसके पास आकर उस से बिनती की।

6     कि हे प्रभु, मेरा सेवक घर में झोले का मारा बहुत दुखी पड़ा है।

7     उस ने उस से कहा; मैं आकर उसे चंगा करूंगा।

8     सूबेदार ने उत्तर दिया; कि हे प्रभु मैं इस योग्य नहीं, कि तू मेरी छत के तले आए, पर केवल मुख से कह दे तो मेरा सेवक चंगा हो जाएगा।

9     क्योंकि मैं भी पराधीन मनुष्य हूं, और सिपाही मेरे हाथ में हैं, और जब एक से कहता हूं, जा, तो वह जाता है; और दूसरे को कि आ, तो वह आता है; और अपने दास से कहता हूं, कि यह कर, तो वह करता है।

10     यह सुनकर यीशु ने अचम्भा किया, और जो उसके पीछे आ रहे थे उन से कहा; मैं तुम से सच कहता हूं, कि मैं ने इस्राएल में भी ऐसा विश्वास नहीं पाया।

11     और मैं तुम से कहता हूं, कि बहुतेरे पूर्व और पश्चिम से आकर इब्राहीम और इसहाक और याकूब के साथ स्वर्ग के राज्य में बैठेंगे।

12     परन्तु राज्य के सन्तान बाहर अन्धियारे में डाल दिए जाएंगे: वहां रोना और दांतों का पीसना होगा।

13     और यीशु ने सूबेदार से कहा, जा; जैसा तेरा विश्वास है, वैसा ही तेरे लिये हो: और उसका सेवक उसी घड़ी चंगा हो गया॥

6. Matthew 8 : 5-13

5     And when Jesus was entered into Capernaum, there came unto him a centurion, beseeching him,

6     And saying, Lord, my servant lieth at home sick of the palsy, grievously tormented.

7     And Jesus saith unto him, I will come and heal him.

8     The centurion answered and said, Lord, I am not worthy that thou shouldest come under my roof: but speak the word only, and my servant shall be healed.

9     For I am a man under authority, having soldiers under me: and I say to this man, Go, and he goeth; and to another, Come, and he cometh; and to my servant, Do this, and he doeth it.

10     When Jesus heard it, he marvelled, and said to them that followed, Verily I say unto you, I have not found so great faith, no, not in Israel.

11     And I say unto you, That many shall come from the east and west, and shall sit down with Abraham, and Isaac, and Jacob, in the kingdom of heaven.

12     But the children of the kingdom shall be cast out into outer darkness: there shall be weeping and gnashing of teeth.

13     And Jesus said unto the centurion, Go thy way; and as thou hast believed, so be it done unto thee. And his servant was healed in the selfsame hour.

7. यशायाह 55 : 2, 3

2     जो भोजनवस्तु नहीं है, उसके लिये तुम क्यों रूपया लगाते हो, और, जिस से पेट नहीं भरता उसके लिये क्यों परिश्रम करते हो? मेरी ओर मन लगाकर सुनो, तब उत्तम वस्तुएं खाने पाओगे और चिकनी चिकनी वस्तुएं खाकर सन्तुष्ट हो जाओगे।

3     कान लगाओ, और मेरे पास आओ; सुनो, तब तुम जीवित रहोगे; और मैं तुम्हारे साथ सदा की वाचा बान्धूंगा अर्थात दाऊद पर की अटल करूणा की वाचा।

7. Isaiah 55 : 2, 3

2     Wherefore do ye spend money for that which is not bread? and your labour for that which satisfieth not? hearken diligently unto me, and eat ye that which is good, and let your soul delight itself in fatness.

3     Incline your ear, and come unto me: hear, and your soul shall live; and I will make an everlasting covenant with you, even the sure mercies of David.

8. इफिसियों 4 : 17-24

17     इसलिये मैं यह कहता हूं, और प्रभु में जताए देता हूं कि जैसे अन्यजातीय लोग अपने मन की अनर्थ की रीति पर चलते हैं, तुम अब से फिर ऐसे न चलो।

18     क्योंकि उनकी बुद्धि अन्धेरी हो गई है और उस अज्ञानता के कारण जो उन में है और उनके मन की कठोरता के कारण वे परमेश्वर के जीवन से अलग किए हुए हैं।

19     और वे सुन्न होकर, लुचपन में लग गए हैं, कि सब प्रकार के गन्दे काम लालसा से किया करें।

20     पर तुम ने मसीह की ऐसी शिक्षा नहीं पाई।

21     वरन तुम ने सचमुच उसी की सुनी, और जैसा यीशु में सत्य है, उसी में सिखाए भी गए।

22     कि तुम अगले चालचलन के पुराने मनुष्यत्व को जो भरमाने वाली अभिलाषाओं के अनुसार भ्रष्ट होता जाता है, उतार डालो।

23     और अपने मन के आत्मिक स्वभाव में नये बनते जाओ।

24     और नये मनुष्यत्व को पहिन लो, जो परमेश्वर के अनुसार सत्य की धामिर्कता, और पवित्रता में सृजा गया है॥

8. Ephesians 4 : 17-24

17     This I say therefore, and testify in the Lord, that ye henceforth walk not as other Gentiles walk, in the vanity of their mind,

18     Having the understanding darkened, being alienated from the life of God through the ignorance that is in them, because of the blindness of their heart:

19     Who being past feeling have given themselves over unto lasciviousness, to work all uncleanness with greediness.

20     But ye have not so learned Christ;

21     If so be that ye have heard him, and have been taught by him, as the truth is in Jesus:

22     That ye put off concerning the former conversation the old man, which is corrupt according to the deceitful lusts;

23     And be renewed in the spirit of your mind;

24     And that ye put on the new man, which after God is created in righteousness and true holiness.

9. रोमियो 8 : 1, 2, 14-17 (से 2nd ;)

1     सोअब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं: क्योंकि वे शरीर के अनुसार नहीं वरन आत्मा के अनुसार चलते हैं।

2     क्योंकि जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की, और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया।

14     इसलिये कि जितने लोग परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलते हैं, वे ही परमेश्वर के पुत्र हैं।

15     क्योंकि तुम को दासत्व की आत्मा नहीं मिली, कि फिर भयभीत हो परन्तु लेपालकपन की आत्मा मिली है, जिस से हम हे अब्बा, हे पिता कह कर पुकारते हैं।

16     आत्मा आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है, कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं।

17     और यदि सन्तान हैं, तो वारिस भी, वरन परमेश्वर के वारिस और मसीह के संगी वारिस हैं॥

9. Romans 8 : 1, 2, 14-17 (to 2nd ;)

1     There is therefore now no condemnation to them which are in Christ Jesus, who walk not after the flesh, but after the Spirit.

2     For the law of the Spirit of life in Christ Jesus hath made me free from the law of sin and death.

14     For as many as are led by the Spirit of God, they are the sons of God.

15     For ye have not received the spirit of bondage again to fear; but ye have received the Spirit of adoption, whereby we cry, Abba, Father.

16     The Spirit itself beareth witness with our spirit, that we are the children of God:

17     And if children, then heirs; heirs of God, and joint-heirs with Christ;



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 60 : 29-31

आत्मा के पास आत्मा को प्राप्त करने के लिए अनंत संसाधन हैं, और खुशी अधिक आसानी से प्राप्त की जाएगी और हमारे रखने में अधिक सुरक्षित होगी, अगर आत्मा में मांग की जाए।

1. 60 : 29-31

Soul has infinite resources with which to bless mankind, and happiness would be more readily attained and would be more secure in our keeping, if sought in Soul.

2. 302 : 19-24

मनुष्य के पूर्ण, यहाँ तक कि पिता के रूप में भी पूर्ण होने का विज्ञान बताता है, क्योंकि आध्यात्मिक मनुष्य का आत्मा या मन, ईश्वर है, जो सभी का दिव्य सिद्धांत है, और क्योंकि यह वास्तविक व्यक्ति आत्मा के बजाय आत्मा के नियम द्वारा शासित है, न कि पदार्थ के तथाकथित नियमों द्वारा।

2. 302 : 19-24

The Science of being reveals man as perfect, even as the Father is perfect, because the Soul, or Mind, of the spiritual man is God, the divine Principle of all being, and because this real man is governed by Soul instead of sense, by the law of Spirit, not by the so-called laws of matter.

3. 273 : 16-20

सामग्री और चिकित्सा विज्ञान के तथाकथित कानूनों ने नश्वर को कभी भी पूर्ण, सामंजस्यपूर्ण और अमर नहीं बनाया है। आत्मा द्वारा शासित होने पर मनुष्य सामंजस्यपूर्ण होता है। इसलिए होने के सत्य को समझने का महत्व, जो आध्यात्मिक अस्तित्व के नियमों को प्रकट करता है।

3. 273 : 16-20

The so-called laws of matter and of medical science have never made mortals whole, harmonious, and immortal. Man is harmonious when governed by Soul. Hence the importance of understanding the truth of being, which reveals the laws of spiritual existence.

4. 482 : 3-12

मानव विचार ने आत्मा शब्द के अर्थ को इस परिकल्पना के माध्यम से मिला दिया है कि आत्मा एक दुष्ट और अच्छी बुद्धि दोनों है, पदार्थ में निवास करती है। शब्द देवता का उचित उपयोग हमेशा ईश्वर शब्द को प्रतिस्थापित करके प्राप्त किया जा सकता है, जहां बहुत अधिक अर्थ की आवश्यकता होती है। अन्य मामलों में, शब्द का उपयोग करें, और आपके पास वैज्ञानिक संकेत होगा। क्राइस्टियन साइंस में इस्तेमाल के रूप में, जीवात्मा आत्मा या ईश्वर का पर्याय है; लेकिन विज्ञान से बाहर, जीवात्मा भौतिक अनुभूति के साथ समान है।

4. 482 : 3-12

Human thought has adulterated the meaning of the word soul through the hypothesis that soul is both an evil and a good intelligence, resident in matter. The proper use of the word soul can always be gained by substituting the word God, where the deific meaning is required. In other cases, use the word sense, and you will have the scientific signification. As used in Christian Science, Soul is properly the synonym of Spirit, or God; but out of Science, soul is identical with sense, with material sensation.

5. 210 : 11-18

यह जानकर कि आत्मा और उसकी विशेषताओं को हमेशा मनुष्य के माध्यम से प्रकट किया गया था, मास्टर ने बीमारों को चंगा किया, अंधे को दृष्टि दी, बधिर को सुना, पैरों को लंगड़ा किया, इस प्रकार दिव्य की वैज्ञानिक कार्रवाई को प्रकाश में लाया मानव मन और शरीर पर मन और आत्मा और मोक्ष की बेहतर समझ देना। यीशु ने एक ही आध्यात्मिक प्रक्रिया के द्वारा बीमारी और पाप को चंगा किया।

5. 210 : 11-18

Knowing that Soul and its attributes were forever manifested through man, the Master healed the sick, gave sight to the blind, hearing to the deaf, feet to the lame, thus bringing to light the scientific action of the divine Mind on human minds and bodies and giving a better understanding of Soul and salvation. Jesus healed sickness and sin by one and the same metaphysical process.

6. 477 : 22-29

आत्मा ही मनुष्य का पदार्थ, जीवन और बुद्धिमत्ता है, जो व्यक्तिगत है, लेकिन पदार्थ में नहीं। अंतर मन कभी भी आत्मा से हीन किसी भी चीज को प्रतिबिंबित नहीं कर सकता है।

मनुष्य आत्मा की अभिव्यक्ति है। भारतीयों ने अंतर्निहित वास्तविकता की कुछ झलकियाँ पकड़ीं, जब उन्होंने एक निश्चित सुंदर झील को "द ग्रेट स्पिरिट की मुस्कान" कहा।

6. 477 : 22-29

Soul is the substance, Life, and intelligence of man, which is individualized, but not in matter. Soul can never reflect anything inferior to Spirit.

Man is the expression of Soul. The Indians caught some glimpses of the underlying reality, when they called a certain beautiful lake "the smile of the Great Spirit."

7. 315 : 11-20

लोगों के विपरीत और झूठे विचारों ने उनकी भावना से, परमेश्वर के साथ मसीह के पुत्रत्व को छिपा दिया वे उसके आध्यात्मिक अस्तित्व को समझ नहीं पाए। उनके कार्तिक मन इसके शत्रु थे। उनके विचारों को नश्वर त्रुटि के साथ भरा गया था, बजाय भगवान के आध्यात्मिक विचार के साथ जो मसीह यीशु द्वारा प्रस्तुत किया गया था। भगवान की समानता जिससे हम पाप के माध्यम से दृष्टि खो देते हैं, जो सत्य के आध्यात्मिक अर्थ को उद्घाटित करता है; और हम इस समानता का एहसास तभी करते हैं जब हम पाप को कम करते हैं और मनुष्य की विरासत को साबित करते हैं, भगवान के बेटों की स्वतंत्रता।

7. 315 : 11-20

The opposite and false views of the people hid from their sense Christ's sonship with God. They could not discern his spiritual existence. Their carnal minds were at enmity with it. Their thoughts were filled with mortal error, instead of with God's spiritual idea as presented by Christ Jesus. The likeness of God we lose sight of through sin, which beclouds the spiritual sense of Truth; and we realize this likeness only when we subdue sin and prove man's heritage, the liberty of the sons of God.

8. 481 : 28-32

जीवात्मा मनुष्य का दिव्य सिद्धांत है और कभी पाप नहीं करता, - इसलिए जीवात्मा की अमरता है। विज्ञान में हम सीखते हैं कि यह भौतिक अर्थ है, न कि जो पाप है; और यह पाया जाएगा कि यह पाप का बोध है जो खो गया है, और पापपूर्ण पाप नहीं है।

8. 481 : 28-32

Soul is the divine Principle of man and never sins, — hence the immortality of Soul. In Science we learn that it is material sense, not Soul, which sins; and it will be found that it is the sense of sin which is lost, and not a sinful soul.

9. 301 : 23-2

नश्वर मनुष्य खुद को भौतिक पदार्थ लगता है, जबकि मनुष्य "छवि" (विचार) है। भ्रम, पाप, बीमारी और मृत्यु भौतिक अर्थों की झूठी गवाही से उत्पन्न होती है, जो कि अनंत आत्मा की केंद्रीय दूरी के बाहर एक निश्चित दृष्टिकोण से, मन और पदार्थ की एक उलटी छवि प्रस्तुत करता है और सब कुछ उल्टा हो जाता है।

यह मिथ्यात्व आत्मा को भौतिक रूपों में एक असंदिग्ध निवासी होने के लिए प्रेरित करता है, और मनुष्य आध्यात्मिक के बजाय भौतिक होने के लिए। अमरता मृत्यु से बंधी नहीं है। आत्मा परिमितता से प्रभावित नहीं होती है। सिद्धांत खंडित विचारों में नहीं पाया जाना है।

9. 301 : 23-2

Mortal man seems to himself to be material substance, while man is "image" (idea). Delusion, sin, disease, and death arise from the false testimony of material sense, which, from a supposed standpoint outside the focal distance of infinite Spirit, presents an inverted image of Mind and substance with everything turned upside down.

This falsity presupposes soul to be an unsubstantial dweller in material forms, and man to be material instead of spiritual. Immortality is not bounded by mortality. Soul is not compassed by finiteness. Principle is not to be found in fragmentary ideas.

10. 240 : 27-32

इन्द्रिय भ्रान्तियों को दूर करने के प्रयास में व्यक्ति को पूर्णतया और निष्पक्ष रूप से सबसे अधिक कीमत चुकानी पड़ती है, जब तक कि सभी त्रुटियाँ अंततः सत्य के अधीन न आ जाएँ। पाप की मजदूरी का भुगतान करने की दैवीय पद्धति में किसी के झंझटों को खोलना, और अनुभव से सीखना शामिल है कि कैसे इंद्रिय और आत्मा के बीच विभाजन करना है।

10. 240 : 27-32

In trying to undo the errors of sense one must pay fully and fairly the utmost farthing, until all error is finally brought into subjection to Truth. The divine method of paying sin's wages involves unwinding one's snarls, and learning from experience how to divide between sense and Soul.

11. 281 : 27-1

दिव्य विज्ञान नई शराब को पुरानी बोतलों में नहीं डालता है, आत्मा को सामग्री में, न ही अनंत में। जब हम आत्मा के तथ्यों को समझ लेते हैं, तो भौतिक वस्तुओं के बारे में हमारे झूठे विचार नष्ट हो जाते हैं। पुरानी मान्यता को खत्म किया जाना चाहिए या नया विचार फैलाया जाएगा, और प्रेरणा, जो हमारे दृष्टिकोण को बदलने के लिए है, खो जाएगी।

11. 281 : 27-1

Divine Science does not put new wine into old bottles, Soul into matter, nor the infinite into the finite. Our false views of matter perish as we grasp the facts of Spirit. The old belief must be cast out or the new idea will be spilled, and the inspiration, which is to change our standpoint, will be lost.

12. 430 : 3-7

नश्वर मन को त्रुटि के साथ भाग लेना चाहिए, अपने कर्मों से खुद को दूर करना चाहिए, और अमर आदर्श मर्दानगी, मसीह आदर्श दिखाई देगा। विश्वास को अपनी सीमाओं को बढ़ाना चाहिए और पदार्थ के बजाय आत्मा पर आराम करके अपने आधार को मजबूत करना चाहिए।

12. 430 : 3-7

Mortal mind must part with error, must put off itself with its deeds, and immortal manhood, the Christ ideal, will appear. Faith should enlarge its borders and strengthen its base by resting upon Spirit instead of matter.

13. 201 : 7-12

हम झूठी नींव पर सुरक्षित रूप से निर्माण नहीं कर सकते। सत्य एक नया प्राणी बनाता है, जिसमें पुरानी चीजें गुजर जाती हैं और "सभी चीजें नई हो गई हैं।" जुनून, स्वार्थ, झूठी भूख, घृणा, भय, सभी कामुकता, आध्यात्मिकता के लिए उपज, और होने का अतिरेक ईश्वर की तरफ है , अच्छा।

13. 201 : 7-12

We cannot build safely on false foundations. Truth makes a new creature, in whom old things pass away and "all things are become new." Passions, selfishness, false appetites, hatred, fear, all sensuality, yield to spirituality, and the superabundance of being is on the side of God, good.

14. 40 : 31-7

ईसाई धर्म की प्रकृति शांतिपूर्ण और धन्य है, लेकिन राज्य में प्रवेश करने के लिए, आशा के लंगर को शकीना में सामग्री के घूंघट से परे डाल दिया जाना चाहिए जिसमें यीशु हमारे जाने से पहले चला गया है; और सामग्री से परे यह उन्नति धर्मियों की खुशियों और विजय के साथ-साथ उनके दुखों और कष्टों से भी होनी चाहिए। अपने गुरु की तरह, हमें भौतिक अर्थों में होने के आध्यात्मिक अर्थ से प्रस्थान करना चाहिए।

14. 40 : 31-7

The nature of Christianity is peaceful and blessed, but in order to enter into the kingdom, the anchor of hope must be cast beyond the veil of matter into the Shekinah into which Jesus has passed before us; and this advance beyond matter must come through the joys and triumphs of the righteous as well as through their sorrows and afflictions. Like our Master, we must depart from material sense into the spiritual sense of being.

15. 14 : 25-30

भौतिक समझ के विश्वास और सपने से पूरी तरह से अलग, आध्यात्मिक समझ और पूरी पृथ्वी पर मनुष्य के प्रभुत्व की चेतना को प्रकट करके, जीवन दिव्य है। यह समझ त्रुटि निकालती है और बीमारों को चंगा करता है, और इसके साथ आप "धिकारी की नान" बोल सकते हैं।

15. 14 : 25-30

Entirely separate from the belief and dream of material living, is the Life divine, revealing spiritual understanding and the consciousness of man's dominion over the whole earth. This understanding casts out error and heals the sick, and with it you can speak "as one having authority."


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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