रविवार 14 मार्च, 2021



विषयपदार्थ

SubjectSubstance

वर्ण पाठ: मत् 6 : 33

पहिले तुम उसे राज्य और धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएं भी तुम्हें मिल जाएंगी।



Golden Text: Matthew 6 : 33

Seek ye first the kingdom of God, and his righteousness; and all these things shall be added unto you.




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भजन संहिता 23 : 1-6


1     यहोवा मेरा चरवाहा है, मुझे कुछ घटी न होगी।

2     वह मुझे हरी हरी चराइयों में बैठाता है; वह मुझे सुखदाई जल के झरने के पास ले चलता है;

3     वह मेरे जी में जी ले आता है। धर्म के मार्गो में वह अपने नाम के निमित्त मेरी अगुवाई करता है।

4     चाहे मैं घोर अन्धकार से भरी हुई तराई में होकर चलूं, तौभी हानि से न डरूंगा, क्योंकि तू मेरे साथ रहता है; तेरे सोंटे और तेरी लाठी से मुझे शान्ति मिलती है॥

5     तू मेरे सताने वालों के साम्हने मेरे लिये मेज बिछाता है; तू ने मेरे सिर पर तेल मला है, मेरा कटोरा उमण्ड रहा है।

6     निश्चय भलाई और करूणा जीवन भर मेरे साथ साथ बनी रहेंगी; और मैं यहोवा के धाम में सर्वदा वास करूंगा॥

Responsive Reading: Psalm 23 : 1-6

1.     The Lord is my shepherd; I shall not want.

2.     He maketh me to lie down in green pastures: he leadeth me beside the still waters.

3.     He restoreth my soul: he leadeth me in the paths of righteousness for his name’s sake.

4.     Yea, though I walk through the valley of the shadow of death, I will fear no evil: for thou art with me; thy rod and thy staff they comfort me.

5.     Thou preparest a table before me in the presence of mine enemies: thou anointest my head with oil; my cup runneth over.

6.     Surely goodness and mercy shall follow me all the days of my life: and I will dwell in the house of the Lord for ever.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 37 : 3-5

3     यहोवा पर भरोसा रख,     और भला कर;     देश में बसा रह,     और सच्चाई में मन लगाए रह।

4     यहोवा को अपने सुख का मूल जान,     और वह तेरे मनोरथों को पूरा करेगा॥

5     अपने मार्ग की चिन्ता यहोवा पर छोड़;     और उस पर भरोसा रख,     वही पूरा करेगा।

1. Psalm 37 : 3-5

3     Trust in the Lord, and do good; so shalt thou dwell in the land, and verily thou shalt be fed.

4     Delight thyself also in the Lord; and he shall give thee the desires of thine heart.

5     Commit thy way unto the Lord; trust also in him; and he shall bring it to pass.

2. 2 राजा 4 : 1-7

1     भविष्यद्वक्ताओं के चेलों की पत्नियों में से एक स्त्री ने एलीशा की दोहाई देकर कहा, तेरा दास मेरा पति मर गया, और तू जानता है कि वह यहोवा का भय माननेवाला था, और जिसका वह कर्जदार था वह आया है कि मेरे दोनों पुत्रों को अपने दास बनाने के लिये ले जाए।

2     एलीशा ने उस से पूछा, मैं तेरे लिये क्या करूं? मुझ से कह, कि तेरे घर में क्या है? उसने कहा, तेरी दासी के घर में एक हांड़ी तेल को छोड़ और कुछ तहीं है।

3     उसने कहा, तू बाहर जा कर अपनी सब पड़ोसियों खाली बरतन मांग ले आ, और थोड़े बरतन न लाना।

4     फिर तू अपने बेटों समेत अपने घर में जा, और द्वार बन्द कर के उन सब बरतनों में तेल उण्डेल देना, और जो भर जाए उन्हें अलग रखना।

5     तब वह उसके पास से चली गई, और अपने बेटों समेत अपने घर जा कर द्वार बन्द किया; तब वे तो उसके पास बरतन लाते गए और वह उण्डेलती गई।

6     जब बरतन भर गए, तब उसने अपने बेटे से कहा, मेरे पास एक और भी ले आ, उसने उस से कहा, और बरतन तो नहीं रहा। तब तेल थम गया।

7     तब उसने जा कर परमेश्वर के भक्त को यह बता दिया। ओर उसने कहा, जा तेल बेच कर ऋण भर दे; और जो रह जाए, उस से तू अपने पुत्रों सहित अपना निर्वाह करना।

2. II Kings 4 : 1-7

1     Now there cried a certain woman of the wives of the sons of the prophets unto Elisha, saying, Thy servant my husband is dead; and thou knowest that thy servant did fear the Lord: and the creditor is come to take unto him my two sons to be bondmen.

2     And Elisha said unto her, What shall I do for thee? tell me, what hast thou in the house? And she said, Thine handmaid hath not any thing in the house, save a pot of oil.

3     Then he said, Go, borrow thee vessels abroad of all thy neighbours, even empty vessels; borrow not a few.

4     And when thou art come in, thou shalt shut the door upon thee and upon thy sons, and shalt pour out into all those vessels, and thou shalt set aside that which is full.

5     So she went from him, and shut the door upon her and upon her sons, who brought the vessels to her; and she poured out.

6     And it came to pass, when the vessels were full, that she said unto her son, Bring me yet a vessel. And he said unto her, There is not a vessel more. And the oil stayed.

7     Then she came and told the man of God. And he said, Go, sell the oil, and pay thy debt, and live thou and thy children of the rest.

3. यिर्मयाह 29 : 11-13

11     क्योंकि यहोवा की यह वाणी है,     कि जो कल्पनाएं मैं तुम्हारे विषय करता हूँ उन्हें मैं जानता हूँ,     वे हानी की नहीं,     वरन कुशल ही की हैं,     और अन्त में तुम्हारी आशा पूरी करूंगा।

12     तब उस समय तुम मुझ को पुकारोगे और आकर मुझ से प्रार्थना करोगे और मैं तुम्हारी सुनूंगा।

13     तुम मुझे ढूंढ़ोगे और पाओगे भी;     क्योंकि तुम अपने सम्पूर्ण मन से मेरे पास आओगे।

3. Jeremiah 29 : 11-13

11     For I know the thoughts that I think toward you, saith the Lord, thoughts of peace, and not of evil, to give you an expected end.

12     Then shall ye call upon me, and ye shall go and pray unto me, and I will hearken unto you.

13     And ye shall seek me, and find me, when ye shall search for me with all your heart.

4. यूहन्ना 6 : 3-14, 26, 27 (से :), 29 (इस), 37, 38, 41 (से 1st ,), 42, 43, 47, 48, 63

3     तब यीशु पहाड़ पर चढ़कर अपने चेलों के साथ वहां बैठा।

4     और यहूदियों के फसह के पर्व निकट था।

5     तब यीशु ने अपनी आंखे उठाकर एक बड़ी भीड़ को अपने पास आते देखा, और फिलेप्पुस से कहा, कि हम इन के भोजन के लिये कहां से रोटी मोल लाएं?

6     परन्तु उस ने यह बात उसे परखने के लिये कही; क्योंकि वह आप जानता था कि मैं क्या करूंगा।

7     फिलेप्पुस ने उस को उत्तर दिया, कि दो सौ दीनार की रोटी उन के लिये पूरी भी न होंगी कि उन में से हर एक को थोड़ी थोड़ी मिल जाए।

8     उसके चेलों में से शमौन पतरस के भाई अन्द्रियास ने उस से कहा।

9     यहां एक लड़का है जिस के पास जव की पांच रोटी और दो मछिलयां हैं परन्तु इतने लोगों के लिये वे क्या हैं?

10     यीशु ने कहा, कि लोगों को बैठा दो। उस जगह बहुत घास थी: तब वे लोग जो गिनती में लगभग पांच हजार के थे, बैठ गए:

11     तब यीशु ने रोटियां लीं, और धन्यवाद करके बैठने वालों को बांट दी: और वैसे ही मछिलयों में से जितनी वे चाहते थे बांट दिया।

12     जब वे खाकर तृप्त हो गए तो उस ने अपने चेलों से कहा, कि बचे हुए टुकड़े बटोर लो, कि कुछ फेंका न जाए।

13     सो उन्होंने बटोरा, और जव की पांच रोटियों के टुकड़े जो खाने वालों से बच रहे थे उन की बारह टोकिरयां भरीं।

14     तब जो आश्चर्य कर्म उस ने कर दिखाया उसे वे लोग देखकर कहने लगे; कि वह भविष्यद्वक्ता जो जगत में आनेवाला था निश्चय यही है।

26     यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, कि मैं तुम से सच सच कहता हूं, तुम मुझे इसलिये नहीं ढूंढ़ते हो कि तुम ने अचम्भित काम देखे, परन्तु इसलिये कि तुम रोटियां खाकर तृप्त हुए।

27     नाशमान भोजन के लिये परिश्रम न करो, परन्तु उस भोजन के लिये जो अनन्त जीवन तक ठहरता है, जिसे मनुष्य का पुत्र तुम्हें देगा, क्योंकि पिता, अर्थात परमेश्वर ने उसी पर छाप कर दी है।

29     यीशु ने उन्हें उत्तर दिया; परमेश्वर का कार्य यह है, कि तुम उस पर, जिसे उस ने भेजा है, विश्वास करो।

37     जो कुछ पिता मुझे देता है वह सब मेरे पास आएगा, उसे मैं कभी न निकालूंगा।

38     क्योंकि मैं अपनी इच्छा नहीं, वरन अपने भेजने वाले की इच्छा पूरी करने के लिये स्वर्ग से उतरा हूं।

41     सो यहूदी उस पर कुड़कुड़ाने लगे।

42     और उन्होंने कहा; क्या यह यूसुफ का पुत्र यीशु नहीं, जिस के माता पिता को हम जानते हैं? तो वह क्योंकर कहता है कि मैं स्वर्ग से उतरा हूं।

43     यीशु ने उन को उत्तर दिया, कि आपस में मत कुड़कुड़ाओ।

47     मैं तुम से सच सच कहता हूं, कि जो कोई विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसी का है।

48     जीवन की रोटी मैं हूं।

63     आत्मा तो जीवनदायक है, शरीर से कुछ लाभ नहीं: जो बातें मैं ने तुम से कहीं हैं वे आत्मा है, और जीवन भी हैं।

4. John 6 : 3-14, 26, 27 (to :), 29 (This), 37, 38, 41 (to 1st ,), 42, 43, 47, 48, 63

3     And Jesus went up into a mountain, and there he sat with his disciples.

4     And the passover, a feast of the Jews, was nigh.

5     When Jesus then lifted up his eyes, and saw a great company come unto him, he saith unto Philip, Whence shall we buy bread, that these may eat?

6     And this he said to prove him: for he himself knew what he would do.

7     Philip answered him, Two hundred pennyworth of bread is not sufficient for them, that every one of them may take a little.

8     One of his disciples, Andrew, Simon Peter’s brother, saith unto him,

9     There is a lad here, which hath five barley loaves, and two small fishes: but what are they among so many?

10     And Jesus said, Make the men sit down. Now there was much grass in the place. So the men sat down, in number about five thousand.

11     And Jesus took the loaves; and when he had given thanks, he distributed to the disciples, and the disciples to them that were set down; and likewise of the fishes as much as they would.

12     When they were filled, he said unto his disciples, Gather up the fragments that remain, that nothing be lost.

13     Therefore they gathered them together, and filled twelve baskets with the fragments of the five barley loaves, which remained over and above unto them that had eaten.

14     Then those men, when they had seen the miracle that Jesus did, said, This is of a truth that prophet that should come into the world.

26     Jesus answered them and said, Verily, verily, I say unto you, Ye seek me, not because ye saw the miracles, but because ye did eat of the loaves, and were filled.

27     Labour not for the meat which perisheth, but for that meat which endureth unto everlasting life, which the Son of man shall give unto you:

29     This is the work of God, that ye believe on him whom he hath sent.

37     All that the Father giveth me shall come to me; and him that cometh to me I will in no wise cast out.

38     For I came down from heaven, not to do mine own will, but the will of him that sent me.

41     The Jews then murmured at him,

42     And they said, Is not this Jesus, the son of Joseph, whose father and mother we know? how is it then that he saith, I came down from heaven?

43     Jesus therefore answered and said unto them, Murmur not among yourselves.

47     Verily, verily, I say unto you, He that believeth on me hath everlasting life.

48     I am that bread of life.

63     It is the spirit that quickeneth; the flesh profiteth nothing: the words that I speak unto you, they are spirit, and they are life.

5. मत्ती 6: 24-26 (से.), 34 (से 1st.)

24     कोई मनुष्य दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता, क्योंकि वह एक से बैर ओर दूसरे से प्रेम रखेगा, वा एक से मिला रहेगा और दूसरे को तुच्छ जानेगा; “तुम परमेश्वर और धन दोनो की सेवा नहीं कर सकते”।

25     इसलिये मैं तुम से कहता हूं, कि अपने प्राण के लिये यह चिन्ता न करना कि हम क्या खाएंगे? और क्या पीएंगे? और न अपने शरीर के लिये कि क्या पहिनेंगे? क्या प्राण भोजन से, और शरीर वस्त्र से बढ़कर नहीं?

26     आकाश के पक्षियों को देखो! वे न बोते हैं, न काटते हैं, और न खत्तों में बटोरते हैं; तौभी तुम्हारा स्वर्गीय पिता उन को खिलाता है।

34     सो कल के लिये चिन्ता न करो, क्योंकि कल का दिन अपनी चिन्ता आप कर लेगा; आज के लिये आज ही का दुख बहुत है॥

5. Matthew 6 : 24-26 (to .), 34 (to 1st .)

24     No man can serve two masters: for either he will hate the one, and love the other; or else he will hold to the one, and despise the other. Ye cannot serve God and mammon.

25     Therefore I say unto you, Take no thought for your life, what ye shall eat, or what ye shall drink; nor yet for your body, what ye shall put on. Is not the life more than meat, and the body than raiment?

26     Behold the fowls of the air: for they sow not, neither do they reap, nor gather into barns; yet your heavenly Father feedeth them.

34     Take therefore no thought for the morrow: for the morrow shall take thought for the things of itself.

6. फिलिप्पियों 4 : 4-7

4     प्रभु में सदा आनन्दित रहो; मैं फिर कहता हूं, आनन्दित रहो।

5     तुम्हारी कोमलता सब मनुष्यों पर प्रगट हो: प्रभु निकट है।

6     किसी भी बात की चिन्ता मत करो: परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख अपस्थित किए जाएं।

7     तब परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरिक्षत रखेगी॥

6. Philippians 4 : 4-7

4     Rejoice in the Lord alway: and again I say, Rejoice.

5     Let your moderation be known unto all men. The Lord is at hand.

6     Be careful for nothing; but in every thing by prayer and supplication with thanksgiving let your requests be made known unto God.

7     And the peace of God, which passeth all understanding, shall keep your hearts and minds through Christ Jesus.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 275 : 10-15

वास्तविकता और उसके विज्ञान में होने के क्रम को समझने के लिए, आपको परमेश्वर को उस सभी के दिव्य सिद्धांत के रूप में फिर से शुरू करना चाहिए जो वास्तव में है। आत्मा, जीवन, सत्य, प्रेम, एक के रूप में गठबंधन, - और भगवान के लिए शास्त्र के नाम हैं। सभी पदार्थ, बुद्धि, ज्ञान, अस्तित्व, अमरता, कारण और प्रभाव ईश्वर के हैं।

1. 275 : 10-15

To grasp the reality and order of being in its Science, you must begin by reckoning God as the divine Principle of all that really is. Spirit, Life, Truth, Love, combine as one, — and are the Scriptural names for God. All substance, intelligence, wisdom, being, immortality, cause, and effect belong to God.

2. 468 : 17 (पदार्थ)-22

पदार्थ वह है जो अनादि है और कलह और क्षय से असमर्थ है। सत्य, जीवन और प्रेम पदार्थ हैं, क्योंकि इब्रानियों में इस शब्द का उपयोग होता है: “विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है।" आत्मा, मन, आत्मा या ईश्वर का पर्यायवाची एकमात्र वास्तविक पदार्थ है।

2. 468 : 17 (Substance)-22

Substance is that which is eternal and incapable of discord and decay. Truth, Life, and Love are substance, as the Scriptures use this word in Hebrews: "The substance of things hoped for, the evidence of things not seen." Spirit, the synonym of Mind, Soul, or God, is the only real substance.

3. 301 : 17-29

जैसा कि ईश्वर पदार्थ है और मनुष्य ईश्वरीय छवि और समानता है, मनुष्य को आत्मा के पदार्थ की इच्छा करनी चाहिए, केवल पदार्थ की, न कि पदार्थ की और वास्तव में उसने ऐसा किया है। यह विश्वास कि मनुष्य के पास कोई अन्य पदार्थ या मन है, आध्यात्मिक नहीं है और पहले आज्ञा को तोड़ता है, आप एक ईश्वर को, एक मन को स्वीकार करेंगे। नश्वर मनुष्य खुद को भौतिक पदार्थ लगता है, जबकि मनुष्य "छवि" (विचार) है। भ्रम, पाप, बीमारी और मृत्यु भौतिक अर्थों की झूठी गवाही से उत्पन्न होती है, जो कि अनंत आत्मा की केंद्रीय दूरी के बाहर एक निश्चित दृष्टिकोण से, मन और पदार्थ की एक उलटी छवि प्रस्तुत करता है और सब कुछ उल्टा हो जाता है।

3. 301 : 17-29

As God is substance and man is the divine image and likeness, man should wish for, and in reality has, only the substance of good, the substance of Spirit, not matter. The belief that man has any other substance, or mind, is not spiritual and breaks the First Commandment, Thou shalt have one God, one Mind. Mortal man seems to himself to be material substance, while man is "image" (idea). Delusion, sin, disease, and death arise from the false testimony of material sense, which, from a supposed standpoint outside the focal distance of infinite Spirit, presents an inverted image of Mind and substance with everything turned upside down.

4. 139 : 4-9

शुरुआत से लेकर अंत तक, पवित्रशास्त्र आत्मा, मन की बात की विजय से भरपूर है। मूसा ने मन की शक्ति को उसके द्वारा सिद्ध किया, जिसे पुरुषों ने चमत्कार कहा; तब यहोशू, एलिय्याह और एलीशा ने किया। संकेत और चमत्कार के साथ ईसाई युग की शुरुआत हुई।

4. 139 : 4-9

From beginning to end, the Scriptures are full of accounts of the triumph of Spirit, Mind, over matter. Moses proved the power of Mind by what men called miracles; so did Joshua, Elijah, and Elisha. The Christian era was ushered in with signs and wonders.

5. 591 : 21-22

चमत्कार। जो दैवीय रूप से स्वाभाविक है, लेकिन उसे मानवीय रूप से सीखना चाहिए; विज्ञान की एक घटना।

5. 591 : 21-22

Miracle. That which is divinely natural, but must be learned humanly; a phenomenon of Science.

6. 134 : 31-1

एक चमत्कार भगवान के कानून को पूरा करता है, लेकिन उस कानून का उल्लंघन नहीं करता है। वर्तमान में यह तथ्य चमत्कार से अधिक रहस्यमय प्रतीत होता है।

6. 134 : 31-1

A miracle fulfils God's law, but does not violate that law. This fact at present seems more mysterious than the miracle itself. 

7. 509 : 20-28

तथाकथित खनिज, सब्जी, और पशु पदार्थ अब समय या सामग्री संरचना से अधिक आकस्मिक नहीं हैं, जब वे "सुबह के सितारे एक साथ गाते थे।" मन ने पृथ्वी में होने से पहले "खेत का पौधा" बनाया। आध्यात्मिक स्वर्गारोहण के काल मन की रचना के दिन और मौसम हैं, जिसमें सौंदर्य, उदात्तता, पवित्रता, और पवित्रता - हाँ, दैवीय प्रकृति - मनुष्य में प्रकट होती है और ब्रह्मांड कभी गायब नहीं होता है।

7. 509 : 20-28

So-called mineral, vegetable, and animal substances are no more contingent now on time or material structure than they were when "the morning stars sang together." Mind made the "plant of the field before it was in the earth." The periods of spiritual ascension are the days and seasons of Mind's creation, in which beauty, sublimity, purity, and holiness — yea, the divine nature — appear in man and the universe never to disappear.

8. 257 : 6-11

सिद्धांत यह है कि आत्मा एकमात्र पदार्थ नहीं है और निर्माता पैंटीहिस्ट हेटरोडोक्सी है, जो बीमारी, पाप और मृत्यु में सिद्ध होता है; यह एक शारीरिक आत्मा और एक भौतिक मन में विश्वास है, एक आत्मा जो शरीर और एक मन द्वारा शासित है। यह धारणा उथली पैंटीवाद है।

8. 257 : 6-11

The theory that Spirit is not the only substance and creator is pantheistic heterodoxy, which ultimates in sickness, sin, and death; it is the belief in a bodily soul and a material mind, a soul governed by the body and a mind in matter. This belief is shallow pantheism.

9. 281 : 27-1

दिव्य विज्ञान नई शराब को पुरानी बोतलों में नहीं डालता है, आत्मा को सामग्री में, न ही अनंत में। जब हम आत्मा के तथ्यों को समझ लेते हैं, तो भौतिक वस्तुओं के बारे में हमारे झूठे विचार नष्ट हो जाते हैं। पुरानी मान्यता को खत्म किया जाना चाहिए या नया विचार फैलाया जाएगा, और प्रेरणा, जो हमारे दृष्टिकोण को बदलने के लिए है, खो जाएगी।

9. 281 : 27-1

Divine Science does not put new wine into old bottles, Soul into matter, nor the infinite into the finite. Our false views of matter perish as we grasp the facts of Spirit. The old belief must be cast out or the new idea will be spilled, and the inspiration, which is to change our standpoint, will be lost.

10. 91 : 16-21

भौतिक स्वार्थ में लीन हम विचार और प्रतिबिंबित करते हैं, लेकिन जीवन या मन के प्रति पदार्थ को फीका करते हैं। भौतिक स्वार्थ का खंडन, मनुष्य की आध्यात्मिक और शाश्वत व्यक्ति के विवेक को प्रभावित करता है, और पदार्थ से प्राप्त गलत ज्ञान को नष्ट कर देता है या जिसे भौतिक इंद्रियां कहा जाता है।

10. 91 : 16-21

Absorbed in material selfhood we discern and reflect but faintly the substance of Life or Mind. The denial of material selfhood aids the discernment of man's spiritual and eternal individuality, and destroys the erroneous knowledge gained from matter or through what are termed the material senses.

11. 66 : 6-16

परीक्षण नश्वर लोगों को एक भौतिक कर्मचारियों और एक टूटी हुई ईख पर झुकना नहीं सिखाते हैं, जो हृदय को छेदता है। हम आनंद और समृद्धि की धूप में इसे याद नहीं करते। दुःख लाभकारी है। महान क्लेश के माध्यम से हम राज्य में प्रवेश करते हैं। परीक्षण परमेश्वर की देखभाल के प्रमाण हैं। भौतिक विकास की उम्मीदों की मिट्टी में बोए गए बीज से आध्यात्मिक विकास अंकुरण नहीं करता है, लेकिन जब ये क्षय होता है, तो प्रेम आत्मा के ऊंचे उत्साह का प्रचार करता है, जिसमें पृथ्वी का कोई दाग नहीं होता है। अनुभव के प्रत्येक क्रमिक चरण में ईश्वरीय अच्छाई और प्रेम के नए विचार सामने आते हैं।

11. 66 : 6-16

Trials teach mortals not to lean on a material staff, — a broken reed, which pierces the heart. We do not half remember this in the sunshine of joy and prosperity. Sorrow is salutary. Through great tribulation we enter the kingdom. Trials are proofs of God's care. Spiritual development germinates not from seed sown in the soil of material hopes, but when these decay, Love propagates anew the higher joys of Spirit, which have no taint of earth. Each successive stage of experience unfolds new views of divine goodness and love.

12. 92 : 32-9

क्या आप कहते हैं कि समय अभी तक नहीं आया है जिसमें आत्मा को पर्याप्त रूप से पहचानना और शरीर को नियंत्रित करने में सक्षम होना चाहिए? यीशु को याद करें, जिन्होंने लगभग उन्नीस सदियों पहले आत्मा की शक्ति का प्रदर्शन किया था और कहा था, "जो मुझ पर विश्वास रखता है, ये काम जो मैं करता हूं वह भी करेगा", और यह भी कहा, "परन्तु वह समय आता है, वरन अब भी है जिस में सच्चे भक्त पिता का भजन आत्मा और सच्चाई से करेंगे।" "अभी वह प्रसन्नता का समय है; देखो, अभी उद्धार का दिन है," पॉल ने कहा।

12. 92 : 32-9

Do you say the time has not yet come in which to recognize Soul as substantial and able to control the body? Remember Jesus, who nearly nineteen centuries ago demonstrated the power of Spirit and said, "He that believeth on me, the works that I do shall he do also," and who also said, "But the hour cometh, and now is, when the true worshippers shall worship the Father in spirit and in truth." "Behold, now is the accepted time; behold, now is the day of salvation," said Paul.

13. 195 : 11-16

हर एक को तय करने का बिंदु यह है कि क्या यह एक नश्वर मन है या एक अमर मन है, जो एक कारण है। हमें तत्वमीमांसा विज्ञान और इसके दिव्य सिद्धांत के लिए पदार्थ के आधार का त्याग करना चाहिए।

जो कुछ भी अपने सिद्धांत द्वारा शासित एक विचार की झलक प्रस्तुत करता है, विचार के लिए भोजन प्रस्तुत करता है।

13. 195 : 11-16

The point for each one to decide is, whether it is mortal mind or immortal Mind that is causative. We should forsake the basis of matter for metaphysical Science and its divine Principle.

Whatever furnishes the semblance of an idea governed by its Principle, furnishes food for thought.

14. 201 : 1-9

सबसे अच्छा उपदेश जो सत्य का उपदेश है, वह पाप, बीमारी और मृत्यु के विनाश द्वारा प्रचलित और प्रदर्शित किया जाने वाला सत्य है। यह जानकर और यह जानकर कि एक स्नेह हम में सर्वोच्च होगा और हमारे जीवन में अग्रणी होगा, यीशु ने कहा; "कोई मनुष्य दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता।"

हम झूठी नींव पर सुरक्षित रूप से निर्माण नहीं कर सकते। सत्य एक नया प्राणी बनाता है, जिसमें पुरानी चीजें गुजर जाती हैं और "सभी चीजें नई हो गई हैं।"

14. 201 : 1-9

The best sermon ever preached is Truth practised and demonstrated by the destruction of sin, sickness, and death. Knowing this and knowing too that one affection would be supreme in us and take the lead in our lives, Jesus said, "No man can serve two masters."

We cannot build safely on false foundations. Truth makes a new creature, in whom old things pass away and "all things are become new." 

15. 269 : 11-20

तत्त्वमीमांसा भौतिकी से ऊपर है, और सामग्री आध्यात्मिक परिसर या निष्कर्ष में प्रवेश नहीं करती है। तत्त्वमीमांसा की श्रेणियां एक आधार पर हैं, दिव्य मन। तत्त्वमीमांसा चीजों को विचारों में बदल देता है, और आत्मा के विचारों के लिए अर्थ की वस्तुओं का आदान-प्रदान करता है।

ये विचार आध्यात्मिक चेतना के बिल्कुल वास्तविक और मूर्त हैं, और भौतिक लाभ की वस्तुओं और विचारों पर उनका यह लाभ है - वे अच्छे और शाश्वत हैं।

15. 269 : 11-20

Metaphysics is above physics, and matter does not enter into metaphysical premises or conclusions. The categories of metaphysics rest on one basis, the divine Mind. Metaphysics resolves things into thoughts, and exchanges the objects of sense for the ideas of Soul.

These ideas are perfectly real and tangible to spiritual consciousness, and they have this advantage over the objects and thoughts of material sense, — they are good and eternal.

16. 261 : 2-7

सत्य और प्रेम में शरीर से दूर देखो, सभी खुशी, सद्भाव और अमरता का सिद्धांत। धीरज, अच्छे और सच्चे विचार को दृढ़ता से पकड़ें, और आप अपने अनुभवों के अनुपात में इन्हें अपने अनुभव में लाएंगे।

16. 261 : 2-7

Look away from the body into Truth and Love, the Principle of all happiness, harmony, and
immortality. Hold thought steadfastly to the enduring, the good, and the true, and you will bring these into your experience proportionably to their occupancy of your thoughts.

17. 17 : 14-15

क्योंकि परमेश्वर अनंत है, सर्व-शक्ति है, सभी जीवन, सत्य, प्रेम, सभी पर शासक है, और सभी में है।

17. 17 : 14-15

For God is infinite, all-power, all Life, Truth, Love, over all, and All.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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