रविवार 14 जुलाई, 2019 |

रविवार 14 जुलाई, 2019



विषयधर्मविधि

SubjectSacrament

वर्ण पाठ: भजन संहिता 51 : 17

टूटा मन परमेश्वर के योग्य बलिदान है; टूटे और पिसे मन को



Golden Text: Psalm 51 : 17

The sacrifices of God are a broken spirit: a broken and a contrite heart.




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इब्रानियों 9 : 11-15


11     परन्तु जब मसीह आने वाली अच्छी अच्छी वस्तुओं का महायाजक होकर आया, तो उस ने और भी बड़े और सिद्ध तम्बू से होकर जो हाथ का बनाया हुआ नहीं, अर्थात इस सृष्टि का नहीं।

12     और बकरों और बछड़ों के लोहू के द्वारा नहीं, पर अपने ही लोहू के द्वारा एक ही बार पवित्र स्थान में प्रवेश किया, और अनन्त छुटकारा प्राप्त किया।

13     क्योंकि जब बकरों और बैलों का लोहू और कलोर की राख अपवित्र लोगों पर छिड़के जाने से शरीर की शुद्धता के लिये पवित्र करती है।

14     तो मसीह का लोहू जिस ने अपने आप को सनातन आत्मा के द्वारा परमेश्वर के साम्हने निर्दोष चढ़ाया, तुम्हारे विवेक को मरे हुए कामों से क्यों न शुद्ध करेगा, ताकि तुम जीवते परमेश्वर की सेवा करो।

15     और इसी कारण वह नई वाचा का मध्यस्थ है।

Responsive Reading: Hebrews 9 : 11-15

11.     Christ being come an high priest of good things to come, by a greater and more perfect tabernacle, not made with hands, that is to say, not of this building;

12.     Neither by the blood of goats and calves, but by his own blood he entered in once into the holy place, having obtained eternal redemption for us.

13.     For if the blood of bulls and of goats, and the ashes of an heifer sprinkling the unclean, sanctifieth to the purifying of the flesh:

14.     How much more shall the blood of Christ, who through the eternal Spirit offered himself without spot to God, purge your conscience from dead works to serve the living God?

15.     And for this cause he is the mediator of the new testament.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. रोमियो 12 : 1, 2

1     इसलिये हे भाइयों, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिला कर बिनती करता हूं, कि अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ: यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है।

2     और इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिस से तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो॥

1. Romans 12 : 1, 2

1     I beseech you therefore, brethren, by the mercies of God, that ye present your bodies a living sacrifice, holy, acceptable unto God, which is your reasonable service.

2     And be not conformed to this world: but be ye transformed by the renewing of your mind, that ye may prove what is that good, and acceptable, and perfect, will of God.

2. मत्ती 4 : 18-25

18     उस ने गलील की झील के किनारे फिरते हुए दो भाइयों अर्थात शमौन को जो पतरस कहलाता है, और उसके भाई अन्द्रियास को झील में जाल डालते देखा; क्योंकि वे मछवे थे।

19     और उन से कहा, मेरे पीछे चले आओ, तो मैं तुम को मनुष्यों के पकड़ने वाले बनाऊंगा।

20     वे तुरन्त जालों को छोड़कर उसके पीछे हो लिए।

21     और वहां से आगे बढ़कर, उस ने और दो भाइयों अर्थात जब्दी के पुत्र याकूब और उसके भाई यूहन्ना को अपने पिता जब्दी के साथ नाव पर अपने जालों को सुधारते देखा; और उन्हें भी बुलाया

22     वे तुरन्त नाव और अपने पिता को छोड़कर उसके पीछे हो लिए॥

23     और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उन की सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बल्ता को दूर करता रहा।

24     और सारे सूरिया में उसका यश फैल गया; और लोग सब बीमारों को, जो नाना प्रकार की बीमारियों और दुखों में जकड़े हुए थे, और जिन में दुष्टात्माएं थीं और मिर्गी वालों और झोले के मारे हुओं को उसके पास लाए और उस ने उन्हें चंगा किया।

25     और गलील और दिकापुलिस और यरूशलेम और यहूदिया से और यरदन के पार से भीड़ की भीड़ उसके पीछे हो ली॥

2. Matthew 4 : 18-25

18     And Jesus, walking by the sea of Galilee, saw two brethren, Simon called Peter, and Andrew his brother, casting a net into the sea: for they were fishers.

19     And he saith unto them, Follow me, and I will make you fishers of men.

20     And they straightway left their nets, and followed him.

21     And going on from thence, he saw other two brethren, James the son of Zebedee, and John his brother, in a ship with Zebedee their father, mending their nets; and he called them.

22     And they immediately left the ship and their father, and followed him.

23     And Jesus went about all Galilee, teaching in their synagogues, and preaching the gospel of the kingdom, and healing all manner of sickness and all manner of disease among the people.

24     And his fame went throughout all Syria: and they brought unto him all sick people that were taken with divers diseases and torments, and those which were possessed with devils, and those which were lunatick, and those that had the palsy; and he healed them.

25     And there followed him great multitudes of people from Galilee, and from Decapolis, and from Jerusalem, and from Judæa, and from beyond Jordan.

3. लूका 9 : 1, 2, 6, 57-62

1     फिर उस ने बारहों को बुलाकर उन्हें सब दुष्टात्माओं और बिमारियों को दूर करने की सामर्थ और अधिकार दिया।

2     और उन्हें परमेश्वर के राज्य का प्रचार करने, और बिमारों को अच्छा करने के लिये भेजा।

6     सो वे निकलकर गांव गांव सुसमाचार सुनाते, और हर कहीं लोगों को चंगा करते हुए फिरते रहे॥

57     जब वे मार्ग में चले जाते थे, तो किसी न उस से कहा, जहां जहां तू जाएगा, मैं तेरे पीछे हो लूंगा।

58     यीशु ने उस से कहा, लोमडिय़ों के भट और आकाश के पक्षियों के बसेरे होते हैं, पर मनुष्य के पुत्र को सिर धरने की भी जगह नहीं।

59     उस ने दूसरे से कहा, मेरे पीछे हो ले; उस ने कहा; हे प्रभु, मुझे पहिले जाने दे कि अपने पिता को गाड़ दूं।

60     उस ने उस से कहा, मरे हुओं को अपने मुरदे गाड़ने दे, पर तू जाकर परमेश्वर के राज्य की कथा सुना।

61     एक और ने भी कहा; हे प्रभु, मैं तेरे पीछे हो लूंगा; पर पहिले मुझे जाने दे कि अपने घर के लोगों से विदा हो आऊं।

62     यीशु ने उस से कहा; जो कोई अपना हाथ हल पर रखकर पीछे देखता है, वह परमेश्वर के राज्य के योग्य नहीं॥

3. Luke 9 : 1, 2, 6, 57-62

1     Then he called his twelve disciples together, and gave them power and authority over all devils, and to cure diseases.

2     And he sent them to preach the kingdom of God, and to heal the sick.

6     And they departed, and went through the towns, preaching the gospel, and healing every where.

57     And it came to pass, that, as they went in the way, a certain man said unto him, Lord, I will follow thee whithersoever thou goest.

58     And Jesus said unto him, Foxes have holes, and birds of the air have nests; but the Son of man hath not where to lay his head.

59     And he said unto another, Follow me. But he said, Lord, suffer me first to go and bury my father.

60     Jesus said unto him, Let the dead bury their dead: but go thou and preach the kingdom of God.

61     And another also said, Lord, I will follow thee; but let me first go bid them farewell, which are at home at my house.

62     And Jesus said unto him, No man, having put his hand to the plough, and looking back, is fit for the kingdom of God.

4. लूका 10 : 1, 2

1     और इन बातों के बाद प्रभु ने सत्तर और मनुष्य नियुक्त किए और जिस जिस नगर और जगह को वह आप जाने पर था, वहां उन्हें दो दो करके अपने आगे भेजा।

2     और उस ने उन से कहा; पके खेत बहुत हैं; परन्तु मजदूर थोड़े हैं: इसलिये खेत के स्वामी से बिनती करो, कि वह अपने खेत काटने को मजदूर भेज दे।

4. Luke 10 : 1, 2

1     After these things the Lord appointed other seventy also, and sent them two and two before his face into every city and place, whither he himself would come.

2     Therefore said he unto them, The harvest truly is great, but the labourers are few: pray ye therefore the Lord of the harvest, that he would send forth labourers into his harvest.

5. लूका 14 : 1-7 (दृष्टान्त देने योग्य), 16 (एक निश्चित)-27, 33-35

1     फिर वह सब्त के दिन फरीसियों के सरदारों में से किसी के घर में रोटी खाने गया: और वे उस की घात में थे।

2     और देखो, एक मनुष्य उसके साम्हने था, जिसे जलन्धर का रोग था।

3     इस पर यीशु ने व्यवस्थापकों और फरीसियों से कहा; क्या सब्त के दिन अच्छा करना उचित है, कि नहीं परन्तु वे चुपचाप रहे।

4     तब उस ने उसे हाथ लगा कर चंगा किया, और जाने दिया।

5     और उन से कहा; कि तुम में से ऐसा कौन है, जिस का गदहा या बैल कुएं में गिर जाए और वह सब्त के दिन उसे तुरन्त बाहर न निकाल ले?

6     वे इन बातों का कुछ उत्तर न दे सके॥

7     जब उस ने देखा, कि नेवताहारी लोग क्योंकर मुख्य मुख्य जगहें चुन लेते हैं तो एक दृष्टान्त देकर उन से कहा।

16     उस ने उस से कहा; किसी मनुष्य ने बड़ी जेवनार की और बहुतों को बुलाया।

17     जब भोजन तैयार हो गया, तो उस ने अपने दास के हाथ नेवतहारियों को कहला भेजा, कि आओ; अब भोजन तैयार है।

18     पर वे सब के सब क्षमा मांगने लगे, पहिले ने उस से कहा, मैं ने खेत मोल लिया है; और अवश्य है कि उसे देखूं: मैं तुझ से बिनती करता हूं, मुझे क्षमा करा दे।

19     दूसरे ने कहा, मैं ने पांच जोड़े बैल मोल लिए हैं: और उन्हें परखने जाता हूं : मैं तुझ से बिनती करता हूं, मुझे क्षमा करा दे।

20     एक और ने कहा; मै ने ब्याह किया है, इसलिये मैं नहीं आ सकता।

21     उस दास ने आकर अपने स्वामी को ये बातें कह सुनाईं, तब घर के स्वामी ने क्रोध में आकर अपने दास से कहा, नगर के बाजारों और गलियों में तुरन्त जाकर कंगालों, टुण्डों, लंगड़ों और अन्धों को यहां ले आओ।

22     दास ने फिर कहा; हे स्वामी, जैसे तू ने कहा था, वैसे ही किया गया है; फिर भी जगह है।

23     स्वामी ने दास से कहा, सड़कों पर और बाड़ों की ओर जाकर लोगों को बरबस ले ही आ ताकि मेरा घर भर जाए।

24     क्योंकि मैं तुम से कहता हूं, कि उन नेवते हुओं में से कोई मेरी जेवनार को न चखेगा।

25     और जब बड़ी भीड़ उसके साथ जा रही थी, तो उस ने पीछे फिरकर उन से कहा।

26     यदि कोई मेरे पास आए, और अपने पिता और माता और पत्नी और लड़के बालों और भाइयों और बहिनों बरन अपने प्राण को भी अप्रिय न जाने, तो वह मेरा चेला नहीं हो सकता।

27     और जो कोई अपना क्रूस न उठाए; और मेरे पीछे न आए; वह भी मेरा चेला नहीं हो सकता।

33     इसी रीति से तुम में से जो कोई अपना सब कुछ त्याग न दे, तो वह मेरा चेला नहीं हो सकता।

34     नमक तो अच्छा है, परन्तु यदि नमक का स्वाद बिगड़ जाए, तो वह किस वस्तु से स्वादिष्ट किया जाएगा।

35     वह न तो भूमि के और न खाद के लिये काम में आता है: उसे तो लोग बाहर फेंक देते हैं: जिस के सुनने के कान हों वह सुन ले॥

5. Luke 14 : 1-7 (to parable), 16 (A certain)-27, 33-35

1     And it came to pass, as he went into the house of one of the chief Pharisees to eat bread on the sabbath day, that they watched him.

2     And, behold, there was a certain man before him which had the dropsy.

3     And Jesus answering spake unto the lawyers and Pharisees, saying, Is it lawful to heal on the sabbath day?

4     And they held their peace. And he took him, and healed him, and let him go;

5     And answered them, saying, Which of you shall have an ass or an ox fallen into a pit, and will not straightway pull him out on the sabbath day?

6     And they could not answer him again to these things.

7     And he put forth a parable…

16     A certain man made a great supper, and bade many:

17     And sent his servant at supper time to say to them that were bidden, Come; for all things are now ready.

18     And they all with one consent began to make excuse. The first said unto him, I have bought a piece of ground, and I must needs go and see it: I pray thee have me excused.

19     And another said, I have bought five yoke of oxen, and I go to prove them: I pray thee have me excused.

20     And another said, I have married a wife, and therefore I cannot come.

21     So that servant came, and shewed his lord these things. Then the master of the house being angry said to his servant, Go out quickly into the streets and lanes of the city, and bring in hither the poor, and the maimed, and the halt, and the blind.

22     And the servant said, Lord, it is done as thou hast commanded, and yet there is room.

23     And the lord said unto the servant, Go out into the highways and hedges, and compel them to come in, that my house may be filled.

24     For I say unto you, That none of those men which were bidden shall taste of my supper.

25     And there went great multitudes with him: and he turned, and said unto them,

26     If any man come to me, and hate not his father, and mother, and wife, and children, and brethren, and sisters, yea, and his own life also, he cannot be my disciple.

27     And whosoever doth not bear his cross, and come after me, cannot be my disciple.

33     So likewise, whosoever he be of you that forsaketh not all that he hath, he cannot be my disciple.

34     Salt is good: but if the salt have lost his savour, wherewith shall it be seasoned?

35     It is neither fit for the land, nor yet for the dunghill; but men cast it out. He that hath ears to hear, let him hear.

6. मत्ती 13 : 44-46

44     स्वर्ग का राज्य खेत में छिपे हुए धन के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने पाकर छिपा दिया, और मारे आनन्द के जाकर और अपना सब कुछ बेचकर उस खेत को मोल लिया॥

45     फिर स्वर्ग का राज्य एक व्यापारी के समान है जो अच्छे मोतियों की खोज में था।

46     जब उसे एक बहुमूल्य मोती मिला तो उस ने जाकर अपना सब कुछ बेच डाला और उसे मोल ले लिया॥

6. Matthew 13 : 44-46

44     Again, the kingdom of heaven is like unto treasure hid in a field; the which when a man hath found, he hideth, and for joy thereof goeth and selleth all that he hath, and buyeth that field.

45     Again, the kingdom of heaven is like unto a merchant man, seeking goodly pearls:

46     Who, when he had found one pearl of great price, went and sold all that he had, and bought it.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 241 : 19-22

सभी भक्ति का तत्व ईश्वरीय प्रेम का प्रतिबिंब और प्रदर्शन है, बीमारी को ठीक करना और पाप को नष्ट करना है। हमारे मास्टर ने कहा, "यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे।"

1. 241 : 19-22

The substance of all devotion is the reflection and demonstration of divine Love, healing sickness and destroying sin. Our Master said, “If ye love me, keep my commandments.”

2. 1 : 6-9

प्रार्थना, देखना, और काम करना, आत्म-अलगाव के साथ संयुक्त, ईश्वर का अनुग्रह है जो मानव जाति के ईसाईकरण और स्वास्थ्य के लिए सफलतापूर्वक किया गया है।

2. 1 : 6-9

Prayer, watching, and working, combined with self-immolation, are God’s gracious means for accomplishing whatever has been successfully done for the Christianization and health of mankind.

3. 20 : 27-32

सेंट पॉल ने लिखा, “तो आओ, हर एक रोकने वाली वस्तु, और उलझाने वाले पाप को दूर कर के, वह दौड़ जिस में हमें दौड़ना है, धीरज से दौड़ें;" इसका मतलब है, आइए हम भौतिक और आत्मविश्‍वास को अलग रखें और सभी उपचारों के दिव्य सिद्धांत और विज्ञान की तलाश करें।

3. 20 : 27-32

St. Paul wrote, “Let us lay aside every weight, and the sin which doth so easily beset us, and let us run with patience the race that is set before us;” that is, let us put aside material self and sense, and seek the divine Principle and Science of all healing.

4. 4 : 5-11

हमारे मास्टर की आज्ञाओं को रखने के लिए और उनके उदाहरण का पालन करने के लिए, क्या वह हमारे लिए उचित ऋण है और उसने जो कुछ भी किया है, उसके लिए हमारी कृतज्ञता का एकमात्र योग्य प्रमाण है। बाहरी पूजा स्वयं के प्रति वफादार और हार्दिक आभार व्यक्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि उसने कहा है: "यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे।"

4. 4 : 5-11

To keep the commandments of our Master and follow his example, is our proper debt to him and the only worthy evidence of our gratitude for all that he has done. Outward worship is not of itself sufficient to express loyal and heartfelt gratitude, since he has said: “If ye love me, keep my commandments.”

5. 11: 22-27

हम जानते हैं कि पवित्रता पाने के लिए पवित्रता की इच्छा आवश्यक है; लेकिन अगर हम सब से ऊपर पवित्रता की इच्छा रखते हैं, तो हम इसके लिए सब कुछ त्याग देंगे। हमें ऐसा करने के लिए तैयार होना चाहिए, ताकि हम पवित्रता के लिए एकमात्र व्यावहारिक मार्ग में सुरक्षित रूप से चल सकें।

5. 11 : 22-27

We know that a desire for holiness is requisite in order to gain holiness; but if we desire holiness above all else, we shall sacrifice everything for it. We must be willing to do this, that we may walk securely in the only practical road to holiness.

6. 9: 17-24

क्या आप "अपने भगवान को अपने प्रभु और अपने सभी प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रखते हैं"? इस आदेश में बहुत कुछ शामिल है, यहां तक कि सभी भौतिक संवेदना, स्नेह और पूजा का समर्पण भी। यह ईसाई धर्म का एल डोराडो है। इसमें जीवन का विज्ञान शामिल है, और केवल आत्मा के दिव्य नियंत्रण को मान्यता देता है, जिसमें आत्मा हमारा स्वामी है, और भौतिक अर्थ और मानव का कोई स्थान नहीं होगा।

6. 9 : 17-24

Dost thou “love the Lord thy God with all thy heart, and with all thy soul, and with all thy mind”? This command includes much, even the surrender of all merely material sensation, affection, and worship. This is the El Dorado of Christianity. It involves the Science of Life, and recognizes only the divine control of Spirit, in which Soul is our master, and material sense and human will have no place.

7. 27: 22-27

यीशु ने एक समय में सत्तर छात्रों को भेजा, लेकिन केवल ग्यारह ने एक वांछनीय ऐतिहासिक रिकॉर्ड छोड़ दिया। परंपरा उसे दो या तीन सौ अन्य शिष्यों के साथ श्रेय देती है जिन्होंने कोई नाम नहीं छोड़ा है। "क्योंकि बुलाए हुए तो बहुत परन्तु चुने हुए थोड़े हैं॥" वे अनुग्रह से दूर हो गए क्योंकि वे कभी भी अपने गुरु के निर्देश को नहीं समझते थे।

7. 27 : 22-27

Jesus sent forth seventy students at one time, but only eleven left a desirable historic record. Tradition credits him with two or three hundred other disciples who have left no name. “Many are called, but few are chosen.” They fell away from grace because they never truly understood their Master’s instruction.

8. 38: 26-32

पाप और स्वयं के विश्वास में दबे हुए लोगों के लिए, केवल आनंद या इंद्रियों की संतुष्टि के लिए जीना, उन्होंने कहा: तुम जो आंखें रहते हुए नहीं देखते, जो कान रहते हुए नहीं सुनते, ऐसा न हो कि वे आंखों से देखें, और कानों से सुनें, और मन से बूझें, और मन फिरावें और चंगे हो जाएं। उन्होंने सिखाया कि भौतिक इंद्रियाँ सत्य और उसकी उपचार शक्ति को बंद कर देती हैं।

8. 38 : 26-32

To those buried in the belief of sin and self, living only for pleasure or the gratification of the senses, he said in substance: Having eyes ye see not, and having ears ye hear not; lest ye should understand and be converted, and I might heal you. He taught that the material senses shut out Truth and its healing power.

9. 129: 30-6

उदार जिगर लेखक के टेबल के सुख के छोटे अनुमान पर आपत्ति कर सकता है। पापी देखता है, इस पुस्तक में सिखाई गई व्यवस्था में, कि परमेश्वर की माँग को पूरा करना चाहिए। क्षुद्र बुद्धि मन को निरंतर प्रसन्न करती है। इसकी थोड़ी सी आध्यात्मिक संभावनाओं को देखते हुए लाइसेंसशुदा स्वभाव को हतोत्साहित किया जाता है। जब सभी पुरुषों को दावत के लिए प्रतिबंधित किया जाता है, तो बहाने आते हैं। एक के पास खेत है, दूसरे के पास माल है और इसलिए वे स्वीकार नहीं कर सकते।

9. 129 : 30-6

The generous liver may object to the author’s small estimate of the pleasures of the table. The sinner sees, in the system taught in this book, that the demands of God must be met. The petty intellect is alarmed by constant appeals to Mind. The licentious disposition is discouraged over its slight spiritual prospects. When all men are bidden to the feast, the excuses come. One has a farm, another has merchandise, and therefore they cannot accept.

10. 91: 16-21

भौतिक स्वार्थ में लीन हम विचार और प्रतिबिंबित करते हैं, लेकिन जीवन या मन के प्रति पदार्थ को फीका करते हैं। भौतिक स्वार्थ का खंडन, मनुष्य की आध्यात्मिक और शाश्वत व्यक्ति के विवेक को प्रभावित करता है, और पदार्थ से प्राप्त गलत ज्ञान को नष्ट कर देता है या जिसे भौतिक इंद्रियां कहा जाता है।

10. 91 : 16-21

Absorbed in material selfhood we discern and reflect but faintly the substance of Life or Mind. The denial of material selfhood aids the discernment of man’s spiritual and eternal individuality, and destroys the erroneous knowledge gained from matter or through what are termed the material senses.

11. 455: 20-2

ईश्वर सर्वोच्च सेवा के लिए चयन करता है जो इस तरह की फिटनेस के लिए विकसित हुआ है क्योंकि यह मिशन के किसी भी दुरुपयोग को एक असंभवता प्रदान करता है। सभी बुद्धिमान अयोग्य पर अपने उच्चतम विश्वासों को पूरा नहीं करते हैं। जब वह एक संदेशवाहक का कमीशन करता है, तो यह वह है जो आध्यात्मिक रूप से खुद के पास है। कोई भी व्यक्ति इस मानसिक शक्ति का दुरुपयोग नहीं कर सकता है, अगर उसे ईश्वर को समझाना सिखाया जाए।

क्रिश्चियन साइंस में इस मजबूत बिंदु को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए, - कि एक ही फव्वारा मीठा पानी और कड़वा दोनों को आगे नहीं भेज सकता है। मानसिक चिकित्सा और शिक्षण के क्षेत्र में आपकी उपलब्धि जितनी अधिक होगी, मानव जाति को उसकी सर्वोच्च आशा और उपलब्धि के लिए जानबूझकर प्रभावित करना उतना ही असंभव होगा।

11. 455 : 20-2

God selects for the highest service one who has grown into such a fitness for it as renders any abuse of the mission an impossibility. The All-wise does not bestow His highest trusts upon the unworthy. When He commissions a messenger, it is one who is spiritually near Himself. No person can misuse this mental power, if he is taught of God to discern it.

This strong point in Christian Science is not to be overlooked, — that the same fountain cannot send forth both sweet waters and bitter. The higher your attainment in the Science of mental healing and teaching, the more impossible it will become for you intentionally to influence mankind adverse to its highest hope and achievement.

12. 456: 5-15, 19-20

ईश्वरीय सिद्धांत और वैज्ञानिक पद्धति के नियमों के सख्त पालन ने ईसाई विज्ञान के छात्रों की एकमात्र सफलता हासिल की है। यह अकेले उन्हें उच्च स्तर पर ले जाता है, जो उनमें से अधिकांश समुदाय में रखते हैं, एक प्रतिष्ठा जो उनके प्रयासों द्वारा प्रयोगात्मक रूप से उचित है। जो कोई इस बात की पुष्टि करता है कि ईसाई विज्ञान का प्रदर्शन करने का एक से अधिक सिद्धांत और तरीका है, वह अज्ञानतावश या जानबूझकर गलत करता है, और खुद को ईसाई विज्ञान उपचार की वास्तविक अवधारणा से और अपने संभावित प्रदर्शन से अलग करता है।

व्यक्ति को सत्य के मनोबल में रहना चाहिए या वह ईश्वरीय सिद्धांत को प्रदर्शित नहीं कर सकता है।

12. 456 : 5-15, 19-20

Strict adherence to the divine Principle and rules of the scientific method has secured the only success of the students of Christian Science. This alone entitles them to the high standing which most of them hold in the community, a reputation experimentally justified by their efforts. Whoever affirms that there is more than one Principle and method of demonstrating Christian Science greatly errs, ignorantly or intentionally, and separates himself from the true conception of Christian Science healing and from its possible demonstration.

One must abide in the morale of truth or he cannot demonstrate the divine Principle.

13. 457 : 19-24

ईसाई विज्ञान सामान्य नियम का अपवाद नहीं है, कि सीधी रेखा में श्रम के बिना कोई उत्कृष्टता नहीं है। कोई अपनी आग को नहीं फैला सकता है, और एक ही समय में निशान मारा। अन्य विज्ञानों को आगे बढ़ाने और इस विज्ञान के प्रदर्शन में तेजी से आगे बढ़ना संभव नहीं है।

13. 457 : 19-24

Christian Science is not an exception to the general rule, that there is no excellence without labor in a direct line. One cannot scatter his fire, and at the same time hit the mark. To pursue other vocations and advance rapidly in the demonstration of this Science, is not possible.

14. 459 : 3-8

पॉल और जॉन को स्पष्ट आशंका थी कि, जैसा कि नश्वर मनुष्य बलिदान के अलावा कोई सांसारिक सम्मान प्राप्त नहीं करता है, इसलिए उसे सभी सांसारिकता का त्याग करके स्वर्गीय धन प्राप्त करना चाहिए। तब उसके पास दुनियादारी के अभिप्रायों, उद्देश्यों और उद्देश्यों के साथ कुछ भी सामान्य नहीं होगा।

14. 459 : 3-8

Paul and John had a clear apprehension that, as mortal man achieves no worldly honors except by sacrifice, so he must gain heavenly riches by forsaking all worldliness. Then he will have nothing in common with the worldling’s affections, motives, and aims.

15. 33 : 31-17

क्या वे सभी जो यीशु की याद में रोटी खाते हैं और शराब पीते हैं, अपना प्याला पीना चाहते हैं, अपना क्रूस लेते हैं, और मसीह-सिद्धांत के लिए सब छोड़ देते हैं? फिर एक मृत संस्कार की प्रेरणा को दिखाने के बजाय, त्रुटि दिखाने और शरीर को "भगवान के लिए स्वीकार्य," बनाकर दिखाने के बजाय कि सत्य समझ में आ गया है? यदि मसीह, सत्य, प्रदर्शन में हमारे पास आए हैं, तो प्रदर्शन के लिए किसी अन्य स्मारक की आवश्यकता नहीं है, प्रदर्शन के लिए इमैनुअल, या भगवान हमारे साथ हैं; और यदि कोई मित्र हमारे साथ है, तो हमें उस मित्र के स्मारक की आवश्यकता क्यों है?

अगर कभी संस्कार का हिस्सा बनने वाले सभी लोगों ने यीशु की पीड़ाओं को याद किया और उनके प्याले को पीया, तो उन्होंने दुनिया में क्रांति ला दी। यदि सभी जो भौतिक प्रतीकों के माध्यम से अपने स्मरणोत्सव की तलाश करते हैं, तो क्रूस को उठाएंगे, बीमारों को चंगा करेंगे, बुराइयों को बाहर निकालेंगे, और गरीबों को मसीह, या सत्य का उपदेश देंगे, - ग्रहणशील विचार, - वे सहस्त्राब्दी में लाएंगे।

15. 33 : 31-17

Are all who eat bread and drink wine in memory of Jesus willing truly to drink his cup, take his cross, and leave all for the Christ-principle? Then why ascribe this inspiration to a dead rite, instead of showing, by casting out error and making the body “holy, acceptable unto God,” that Truth has come to the understanding? If Christ, Truth, has come to us in demonstration, no other commemoration is requisite, for demonstration is Immanuel, or God with us; and if a friend be with us, why need we memorials of that friend?

If all who ever partook of the sacrament had really commemorated the sufferings of Jesus and drunk of his cup, they would have revolutionized the world. If all who seek his commemoration

through material symbols will take up the cross, heal the sick, cast out evils, and preach Christ, or Truth, to the poor, — the receptive thought, — they will bring in the millennium.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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