रविवार 14 जनवरी, 2024



विषयधार्मिक संस्कार

SubjectSacrament

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: 1 शमूएल 16: 7

"क्योंकि यहोवा का देखना मनुष्य का सा नहीं है; मनुष्य तो बाहर का रूप देखता है, परन्तु यहोवा की दृष्टि मन पर रहती है।"



Golden Text: I Samuel 16 : 7

For the Lord seeth not as man seeth; for man looketh on the outward appearance, but the Lord looketh on the heart.




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उत्तरदायी अध्ययन: भजन संहिता 51: 6, 7, 10, 15-17 • भजन संहिता 19: 14


6     देख, तू हृदय की सच्चाई से प्रसन्न होता है; और मेरे मन ही में ज्ञान सिखाएगा।

7     जूफा से मुझे शुद्ध कर, तो मैं पवित्र हो जाऊंगा; मुझे धो, और मैं हिम से भी अधिक श्वेत बनूंगा।

10     हे परमेश्वर, मेरे अन्दर शुद्ध मन उत्पन्न कर, और मेरे भीतर स्थिर आत्मा नये सिरे से उत्पन्न कर।

15     हे प्रभु, मेरा मुंह खोल दे तब मैं तेरा गुणानुवाद कर सकूंगा।

16     क्योंकि तू मेलबलि से प्रसन्न नहीं होता, नहीं तो मैं देता; होमबलि से भी तू प्रसन्न नहीं होता।

17     टूटा मन परमेश्वर के योग्य बलिदान है; हे परमेश्वर, तू टूटे और पिसे हुए मन को तुच्छ नहीं जानता॥

14     मेरे मुंह के वचन और मेरे हृदय का ध्यान तेरे सम्मुख ग्रहण योग्य हों, हे यहोवा परमेश्वर, मेरी चट्टान और मेरे उद्धार करने वाले।

Responsive Reading: Psalm 51 : 6, 7, 10, 15-17   •   Psalm 19 : 14

6.     Behold, thou desirest truth in the inward parts: and in the hidden part thou shalt make me to know wisdom.

7.     Purge me with hyssop, and I shall be clean: wash me, and I shall be whiter than snow.

10.     Create in me a clean heart, O God; and renew a right spirit within me.

15.     O Lord, open thou my lips; and my mouth shall shew forth thy praise.

16.     For thou desirest not sacrifice; else would I give it: thou delightest not in burnt offering.

17.     The sacrifices of God are a broken spirit: a broken and a contrite heart, O God, thou wilt not despise.

14.     Let the words of my mouth, and the meditation of my heart, be acceptable in thy sight, O Lord, my strength, and my redeemer.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. व्यवस्थाविवरण 10: 12, 13

12     और अब, हे इस्राएल, तेरा परमेश्वर यहोवा तुझ से इसके सिवाय और क्या चाहता है, कि तू अपने परमेश्वर यहोवा का भय मानें, और उसके सारे मार्गों पर चले, उस से प्रेम रखे, और अपने पूरे मन और अपने सारे प्राण से उसकी सेवा करे,

13     और यहोवा की जो जो आज्ञा और विधि मैं आज तुझे सुनाता हूं उन को ग्रहण करे, जिस से तेरा भला हो?

1. Deuteronomy 10 : 12, 13

12     And now, Israel, what doth the Lord thy God require of thee, but to fear the Lord thy God, to walk in all his ways, and to love him, and to serve the Lord thy God with all thy heart and with all thy soul,

13     To keep the commandments of the Lord, and his statutes, which I command thee this day for thy good?

2. भजन संहिता 86: 11, 12

11     हे यहोवा अपना मार्ग मुझे दिखा, तब मैं तेरे सत्य मार्ग पर चलूंगा, मुझ को एक चित्त कर कि मैं तेरे नाम का भय मानूं।

12     हे प्रभु हे मेरे परमेश्वर मैं अपने सम्पूर्ण मन से तेरा धन्यवाद करूंगा, और तेरे नाम की महिमा सदा करता रहूंगा।

2. Psalm 86 : 11, 12

11     Teach me thy way, O Lord; I will walk in thy truth: unite my heart to fear thy name.

12     I will praise thee, O Lord my God, with all my heart: and I will glorify thy name for evermore.

3. व्यवस्थाविवरण 30: 6

6     और तेरा परमेश्वर यहोवा तेरे और तेरे वंश के मन का खतना करेगा, कि तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे मन और सारे प्राण के साथ प्रेम करे, जिस से तू जीवित रहे।

3. Deuteronomy 30 : 6

6     And the Lord thy God will circumcise thine heart, and the heart of thy seed, to love the Lord thy God with all thine heart, and with all thy soul, that thou mayest live.

4. यिर्मयाह 29: 11-14 (से :)

11     क्योंकि यहोवा की यह वाणी है, कि जो कल्पनाएं मैं तुम्हारे विषय करता हूँ उन्हें मैं जानता हूँ, वे हानी की नहीं, वरन कुशल ही की हैं, और अन्त में तुम्हारी आशा पूरी करूंगा।

12     तब उस समय तुम मुझ को पुकारोगे और आकर मुझ से प्रार्थना करोगे और मैं तुम्हारी सुनूंगा।

13     तुम मुझे ढूंढ़ोगे और पाओगे भी; क्योंकि तुम अपने सम्पूर्ण मन से मेरे पास आओगे।

14     मैं तुम्हें मिलूंगा, यहोवा की यह वाणी है, और बंधुआई से लौटा ले आऊंगा।

4. Jeremiah 29 : 11-14 (to :)

11     For I know the thoughts that I think toward you, saith the Lord, thoughts of peace, and not of evil, to give you an expected end.

12     Then shall ye call upon me, and ye shall go and pray unto me, and I will hearken unto you.

13     And ye shall seek me, and find me, when ye shall search for me with all your heart.

14     And I will be found of you, saith the Lord:

5. मत्ती 4: 17

17     उस समय से यीशु प्रचार करना और यह कहना आरम्भ किया, कि मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है।

5. Matthew 4 : 17

17     From that time Jesus began to preach, and to say, Repent: for the kingdom of heaven is at hand.

6. मत्ती 5: 1, 2, 8, 16-20

1     वह इस भीड़ को देखकर, पहाड़ पर चढ़ गया; और जब बैठ गया तो उसके चेले उसके पास आए।

2     और वह अपना मुंह खोलकर उन्हें यह उपदेश देने लगा,

8     धन्य हैं वे, जिन के मन शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे।

16     तुम्हारा उजियाला मनुष्यों के साम्हने चमके कि वे तुम्हारे भले कामों को देखकर तुम्हारे पिता की, जो स्वर्ग में हैं, बड़ाई करें॥

17     यह न समझो, कि मैं व्यवस्था था भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों को लोप करने आया हूं।

18     लोप करने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूं, क्योंकि मैं तुम से सच कहता हूं, कि जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएं, तब तक व्यवस्था से एक मात्रा या बिन्दु भी बिना पूरा हुए नहीं टलेगा।

19     इसलिये जो कोई इन छोटी से छोटी आज्ञाओं में से किसी एक को तोड़े, और वैसा ही लोगों को सिखाए, वह स्वर्ग के राज्य में सब से छोटा कहलाएगा; परन्तु जो कोई उन का पालन करेगा और उन्हें सिखाएगा, वही स्वर्ग के राज्य में महान कहलाएगा।

20     क्योंकि मैं तुम से कहता हूं, कि यदि तुम्हारी धामिर्कता शास्त्रियों और फरीसियों की धामिर्कता से बढ़कर न हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे॥

6. Matthew 5 : 1, 2, 8, 16-20

1     And seeing the multitudes, he went up into a mountain: and when he was set, his disciples came unto him:

2     And he opened his mouth, and taught them, saying,

8     Blessed are the pure in heart: for they shall see God.

16     Let your light so shine before men, that they may see your good works, and glorify your Father which is in heaven.

17     Think not that I am come to destroy the law, or the prophets: I am not come to destroy, but to fulfil.

18     For verily I say unto you, Till heaven and earth pass, one jot or one tittle shall in no wise pass from the law, till all be fulfilled.

19     Whosoever therefore shall break one of these least commandments, and shall teach men so, he shall be called the least in the kingdom of heaven: but whosoever shall do and teach them, the same shall be called great in the kingdom of heaven.

20     For I say unto you, That except your righteousness shall exceed the righteousness of the scribes and Pharisees, ye shall in no case enter into the kingdom of heaven.

7. मत्ती 19: 16-30

16     और देखो, एक मनुष्य ने पास आकर उस से कहा, हे गुरू; मैं कौन सा भला काम करूं, कि अनन्त जीवन पाऊं?

17     उस ने उस से कहा, तू मुझ से भलाई के विषय में क्यों पूछता है? भला तो एक ही है; पर यदि तू जीवन में प्रवेश करना चाहता है, तो आज्ञाओं को माना कर।

18     उस ने उस से कहा, कौन सी आज्ञाएं? यीशु ने कहा, यह कि हत्या न करना, व्यभिचार न करना, चोरी न करना, झूठी गवाही न देना।

19     अपने पिता और अपनी माता का आदर करना, और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना।

20     उस जवान ने उस से कहा, इन सब को तो मैं ने माना है अब मुझ में किस बात की घटी है?

21     यीशु ने उस से कहा, यदि तू सिद्ध होना चाहता है; तो जा, अपना माल बेचकर कंगालों को दे; और तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा; और आकर मेरे पीछे हो ले।

22     परन्तु वह जवान यह बात सुन उदास होकर चला गया, क्योंकि वह बहुत धनी था॥

23     तब यीशु ने अपने चेलों से कहा, मैं तुम से सच कहता हूं, कि धनवान का स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना कठिन है।

24     फिर तुम से कहता हूं, कि परमेश्वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊंट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है।

25     यह सुनकर, चेलों ने बहुत चकित होकर कहा, फिर किस का उद्धार हो सकता है?

26     यीशु ने उन की ओर देखकर कहा, मनुष्यों से तो यह नहीं हो सकता, परन्तु परमेश्वर से सब कुछ हो सकता है।

27     इस पर पतरस ने उस से कहा, कि देख, हम तो सब कुछ छोड़ के तेरे पीछे हो लिये हैं: तो हमें क्या मिलेगा?

28     यीशु ने उन से कहा, मैं तुम से सच कहता हूं, कि नई उत्पत्ति से जब मनुष्य का पुत्र अपनी महिमा के सिहांसन पर बैठेगा, तो तुम भी जो मेरे पीछे हो लिये हो, बारह सिंहासनों पर बैठकर इस्राएल के बारह गोत्रों का न्याय करोगे।

29     और जिस किसी ने घरों या भाइयों या बहिनों या पिता या माता या लड़केबालों या खेतों को मेरे नाम के लिये छोड़ दिया है, उस को सौ गुना मिलेगा: और वह अनन्त जीवन का अधिकारी होगा।

30     परन्तु बहुतेरे जो पहिले हैं, पिछले होंगे; और जो पिछले हैं, पहिले होंगे॥

7. Matthew 19 : 16-30

16     And, behold, one came and said unto him, Good Master, what good thing shall I do, that I may have eternal life?

17     And he said unto him, Why callest thou me good? there is none good but one, that is, God: but if thou wilt enter into life, keep the commandments.

18     He saith unto him, Which? Jesus said, Thou shalt do no murder, Thou shalt not commit adultery, Thou shalt not steal, Thou shalt not bear false witness,

19     Honour thy father and thy mother: and, Thou shalt love thy neighbour as thyself.

20     The young man saith unto him, All these things have I kept from my youth up: what lack I yet?

21     Jesus said unto him, If thou wilt be perfect, go and sell that thou hast, and give to the poor, and thou shalt have treasure in heaven: and come and follow me.

22     But when the young man heard that saying, he went away sorrowful: for he had great possessions.

23     Then said Jesus unto his disciples, Verily I say unto you, That a rich man shall hardly enter into the kingdom of heaven.

24     And again I say unto you, It is easier for a camel to go through the eye of a needle, than for a rich man to enter into the kingdom of God.

25     When his disciples heard it, they were exceedingly amazed, saying, Who then can be saved?

26     But Jesus beheld them, and said unto them, With men this is impossible; but with God all things are possible.

27     Then answered Peter and said unto him, Behold, we have forsaken all, and followed thee; what shall we have therefore?

28     And Jesus said unto them, Verily I say unto you, That ye which have followed me, in the regeneration when the Son of man shall sit in the throne of his glory, ye also shall sit upon twelve thrones, judging the twelve tribes of Israel.

29     And every one that hath forsaken houses, or brethren, or sisters, or father, or mother, or wife, or children, or lands, for my name’s sake, shall receive an hundredfold, and shall inherit everlasting life.

30     But many that are first shall be last; and the last shall be first.

8. मत्ती 26: 17-20, 26, 27, 29

17     अखमीरी रोटी के पर्व्व के पहिले दिन, चेले यीशु के पास आकर पूछने लगे; तू कहां चाहता है कि हम तेरे लिये फसह खाने की तैयारी करें?

18     उस ने कहा, नगर में फुलाने के पास जाकर उस से कहो, कि गुरू कहता है, कि मेरा समय निकट है, मैं अपने चेलों के साथ तेरे यहां पर्व्व मनाऊंगा।

19     सो चेलों ने यीशु की आज्ञा मानी, और फसह तैयार किया।

20     जब सांझ हुई, तो वह बारहों के साथ भोजन करने के लिये बैठा।

26     उस ने उस से कहा, तू कह चुका: जब वे खा रहे थे, तो यीशु ने रोटी ली, और आशीष मांग कर तोड़ी, और चेलों को देकर कहा, लो, खाओ; यह मेरी देह है।

27     फिर उस ने कटोरा लेकर, धन्यवाद किया, और उन्हें देकर कहा, तुम सब इस में से पीओ।

29     मैं तुम से कहता हूं, कि दाख का यह रस उस दिन तक कभी न पीऊंगा, जब तक तुम्हारे साथ अपने पिता के राज्य में नया न पीऊं॥

8. Matthew 26 : 17-20, 26, 27, 29

17     Now the first day of the feast of unleavened bread the disciples came to Jesus, saying unto him, Where wilt thou that we prepare for thee to eat the passover?

18     And he said, Go into the city to such a man, and say unto him, The Master saith, My time is at hand; I will keep the passover at thy house with my disciples.

19     And the disciples did as Jesus had appointed them; and they made ready the passover.

20     Now when the even was come, he sat down with the twelve.

26     And as they were eating, Jesus took bread, and blessed it, and brake it, and gave it to the disciples, and said, Take, eat; this is my body.

27     And he took the cup, and gave thanks, and gave it to them, saying, Drink ye all of it;

29     But I say unto you, I will not drink henceforth of this fruit of the vine, until that day when I drink it new with you in my Father’s kingdom.

9. रोमियो 16: 24

24     हमारे प्रभु यीशु मसीह की कृपा तुम सब पर बनी रहे। तथास्तु।

9. Romans 16 : 24

24     The grace of our Lord Jesus Christ be with you all. Amen.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 18: 3-12

नासरत के यीशु ने पिता के साथ मनुष्य की एकता को सिखाया और प्रदर्शित किया, और इसके लिए हम उसे अंतहीन श्रद्धांजलि देते हैं। उनका मिशन व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों था। उन्होंने जीवन का काम न केवल स्वयं के प्रति न्याय में, बल्कि मनुष्यों पर दया करने में भी किया। यीशु ने निर्भीकता से, इंद्रियों के मान्यता प्राप्त सबूतों के खिलाफ, फरिसासिक पंथों और प्रथाओं के खिलाफ काम किया, और उन्होंने अपनी उपचार शक्ति के साथ सभी विरोधियों का खंडन किया।

1. 18 : 3-12

Jesus of Nazareth taught and demonstrated man's oneness with the Father, and for this we owe him endless homage. His mission was both individual and collective. He did life's work aright not only in justice to himself, but in mercy to mortals, — to show them how to do theirs, but not to do it for them nor to relieve them of a single responsibility. Jesus acted boldly, against the accredited evidence of the senses, against Pharisaical creeds and practices, and he refuted all opponents with his healing power.

2. 32: 28-10

फसह, जो यीशु ने अपने क्रूस पर चढ़ने से पहले रात को निसान के महीने में अपने शिष्यों के साथ खाया था, एक दुखद अवसर था, दिन के अंत में लिया गया एक उदास भोजन, छाया के साथ एक शानदार कैरियर के धुंधलेपन में तेजी से गिर रहा था; और इस भोजन ने हमेशा के लिए यीशु के कर्मकांड या रियायतों को समाप्त कर दिया।

उनके अनुयायियों, दुखी और चुपचाप, अपने मास्टर के दर्द के समय का अनुमान लगाते हुए, स्वर्गीय मन्ना में शामिल हो गए, जिसने अतीत में सत्य के सताए हुए अनुयायियों को जंगल में खिलाया था। उनकी रोटी वास्तव में स्वर्ग से नीचे आई थी। यह आध्यात्मिक का महान सत्य था, बीमारों को ठीक करना और त्रुटि को दूर करना। उनके मास्टर ने पहले यह सब समझाया था, और अब यह रोटी उन्हें खिला रही थी और उन्हें बनाए रख रही थी।

2. 32 : 28-10

The Passover, which Jesus ate with his disciples in the month Nisan on the night before his crucifixion, was a mournful occasion, a sad supper taken at the close of day, in the twilight of a glorious career with shadows fast falling around; and this supper closed forever Jesus' ritualism or concessions to matter.

His followers, sorrowful and silent, anticipating the hour of their Master's betrayal, partook of the heavenly manna, which of old had fed in the wilderness the persecuted followers of Truth. Their bread indeed came down from heaven. It was the great truth of spiritual being, healing the sick and casting out error. Their Master had explained it all before, and now this bread was feeding and sustaining them.

3. 33: 13-17

आध्यात्मिक होने के इस सत्य के लिए, उनके स्वामी हिंसा को पीड़ित करने वाले थे और उनके दुःख के प्याले को सूखा। उसे उन्हें छोड़ना होगा। उस पर विजय प्राप्त करने की महान महिमा के साथ, उन्होंने धन्यवाद दिया और कहा, "तुम सब इससे पी लो।"

3. 33 : 13-17

For this truth of spiritual being, their Master was about to suffer violence and drain to the dregs his cup of sorrow. He must leave them. With the great glory of an everlasting victory overshadowing him, he gave thanks and said, "Drink ye all of it."

4. 25: 13-16, 22-32

यीशु ने प्रदर्शन के द्वारा जीवन का मार्ग सिखाया, कि हम समझ सकते हैं कि यह दिव्य सिद्धांत कैसे बीमारों को चंगा करता है, त्रुटि को जन्म देता है, और मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है।

यद्यपि पाप और बीमारी पर अपने नियंत्रण का प्रदर्शन, किसी भी तरह से महान शिक्षक ने दूसरों को अपने स्वयं के पवित्रता के अपेक्षित प्रमाण देने से राहत नहीं दी। उन्होंने उनके मार्गदर्शन के लिए काम किया, ताकि वे इस शक्ति का प्रदर्शन कर सकें, जैसा कि उन्होंने किया और इसके दिव्य सिद्धांत को समझा। शिक्षक के प्रति विश्वास और सभी भावनात्मक प्रेम हम उस पर पूरा कर सकते हैं, कभी भी हमें उसका अनुकरण करने वाला नहीं बनाएंगे। हमें इसी तरह से जाना चाहिए और करना चाहिए, अन्यथा हम उन महान आशीषों में सुधार नहीं कर रहे हैं जो हमारे मास्टर ने काम किया था और हमारे लिए सबसे अच्छा था। मसीह की दिव्यता को यीशु की मानवता में प्रकट किया गया था।

4. 25 : 13-16, 22-32

Jesus taught the way of Life by demonstration, that we may understand how this divine Principle heals the sick, casts out error, and triumphs over death.

Though demonstrating his control over sin and disease, the great Teacher by no means relieved others from giving the requisite proofs of their own piety. He worked for their guidance, that they might demonstrate this power as he did and understand its divine Principle. Implicit faith in the Teacher and all the emotional love we can bestow on him, will never alone make us imitators of him. We must go and do likewise, else we are not improving the great blessings which our Master worked and suffered to bestow upon us. The divinity of the Christ was made manifest in the humanity of Jesus.

5. 4: 27-2

श्रव्य प्रार्थना कभी भी आध्यात्मिक समझ का कार्य नहीं कर सकती, जो पुनर्जीवित करती है; लेकिन मौन प्रार्थना, सतर्कता और निष्ठावान आज्ञाकारिता हमें यीशु के उदाहरण का अनुसरण करने में सक्षम बनाती है। लंबी प्रार्थनाएँ, अंधविश्वास और पंथ प्रेम के मजबूत आधारों को काटते हैं, और धर्म को मानवीय रूपों में ढालते हैं। जो कुछ भी पूजा को मूर्त रूप देता है वह मनुष्य के आध्यात्मिक विकास में बाधा डालता है और उसे त्रुटि पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने से रोकता है।

5. 4 : 27-2

Audible prayer can never do the works of spiritual understanding, which regenerates; but silent prayer, watchfulness, and devout obedience enable us to follow Jesus' example. Long prayers, superstition, and creeds clip the strong pinions of love, and clothe religion in human forms. Whatever materializes worship hinders man's spiritual growth and keeps him from demonstrating his power over error.

6. 3: 32-11

जबकि हृदय ईश्वरीय सत्य और प्रेम से दूर है, हम बंजर जीवन की अकर्मण्यता को छिपा नहीं सकते।

हमें सबसे अधिक जरूरत है, अनुग्रह में वृद्धि, धैर्य, नम्रता, प्रेम, और अच्छे कार्यों में व्यक्त की गई इच्छा की प्रार्थना। हमारे मास्टर की आज्ञाओं को रखने के लिए और उनके उदाहरण का पालन करने के लिए, क्या वह हमारे लिए उचित ऋण है और उसने जो कुछ भी किया है, उसके लिए हमारी कृतज्ञता का एकमात्र योग्य प्रमाण है। बाहरी पूजा स्वयं के प्रति वफादार और हार्दिक आभार व्यक्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि उसने कहा है: "यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे।"

6. 3 : 32-11

While the heart is far from divine Truth and Love, we cannot conceal the ingratitude of barren lives.

What we most need is the prayer of fervent desire for growth in grace, expressed in patience, meekness, love, and good deeds. To keep the commandments of our Master and follow his example, is our proper debt to him and the only worthy evidence of our gratitude for all that he has done. Outward worship is not of itself sufficient to express loyal and heartfelt gratitude, since he has said: "If ye love me, keep my commandments."

7. 8: 1-9, 28-30

एक शाब्दिक प्रार्थना आत्म-औचित्य की एक शांत भावना प्रदान कर सकती है, हालांकि यह पापी को पाखंडी बना देती है। हमें कभी भी सच्चे हृदय से निराश होने की आवश्यकता नहीं है; लेकिन उन लोगों के लिए बहुत कम उम्मीद है जो अपनी दुष्टता के साथ अचानक आमने-सामने आते हैं और फिर इसे छिपाने की कोशिश करते हैं। उनकी प्रार्थनाएं सूचक हैं जो उनके चरित्र के अनुरूप नहीं हैं। वे पाप के साथ गुप्त संगति रखते हैं, और इस तरह के बाहरी लोगों के बारे में यीशु ने कहा है, "सफेदी से भरी हुई कब्रों की तरह ... सभी अशुद्धता से भरा हुआ।"

हमें खुद की जांच करनी चाहिए और सीखना चाहिए कि दिल का स्नेह और उद्देश्य क्या है, इस तरह से हम केवल वही सीख सकते हैं जो हम ईमानदारी से करते हैं।

7. 8 : 1-9, 28-30

A wordy prayer may afford a quiet sense of self-justification, though it makes the sinner a hypocrite. We never need to despair of an honest heart; but there is little hope for those who come only spasmodically face to face with their wickedness and then seek to hide it. Their prayers are indexes which do not correspond with their character. They hold secret fellowship with sin, and such externals are spoken of by Jesus as "like unto whited sepulchres ... full ... of all uncleanness."

We should examine ourselves and learn what is the affection and purpose of the heart, for in this way only can we learn what we honestly are.

8. 13: 5-12, 15 (ईश्वर)-16

सार्वजनिक प्रार्थना में हम अक्सर अपनी प्रतिबद्धताओं से परे, उत्कट इच्छा के ईमानदार दृष्टिकोण से परे चले जाते हैं। यदि हम गुप्त रूप से इच्छा नहीं कर रहे हैं और खुले तौर पर हम जो कुछ भी मांगते हैं उसकी पूर्ति के लिए प्रयास नहीं कर रहे हैं, तो हमारी प्रार्थनाएं "व्यर्थ दोहराव" हैं, जैसे कि बुतपरस्त लोग करते थे। यदि हमारी प्रार्थनाएँ शुद्ध हैं, तो हम जो माँगते हैं उसके लिए परिश्रम करते हैं; तब हमारा पिता, जो गुप्‍त में देखता है, हमें खुले आम प्रतिफल देगा। … इससे पहले कि हम उसे या हमारे साथी-प्राणियों को इसके बारे में बताएं, ईश्वर हमारी आवश्यकता को जानता है।

8. 13 : 5-12, 15 (God)-16

In public prayer we often go beyond our convictions, beyond the honest standpoint of fervent desire. If we are not secretly yearning and openly striving for the accomplishment of all we ask, our prayers are "vain repetitions," such as the heathen use. If our petitions are sincere, we labor for what we ask; and our Father, who seeth in secret, will reward us openly. … God knows our need before we tell Him or our fellow-beings about it.

9. 11: 29 (प्रार्थना)-32 (से 2nd.)

...प्रार्थना, ईश्वर की इच्छा को जानने और उसे पूरा करने की उत्कट अभ्यस्त इच्छा के साथ मिलकर, हमें सभी सत्य तक पहुंचाएगी। ऐसी इच्छा को श्रव्य अभिव्यक्ति की बहुत कम आवश्यकता होती है। यह विचार और जीवन में सर्वोत्तम रूप से व्यक्त होता है।

9. 11 : 29 (prayer)-32 (to 2nd .)

…prayer, coupled with a fervent habitual desire to know and do the will of God, will bring us into all Truth. Such a desire has little need of audible expression. It is best expressed in thought and in life.

10. 15: 7-9, 21-24

गुप्त में पिता भौतिक इंद्रियों के लिए अनदेखा है, लेकिन वह सभी चीजों को जानता है और इरादों के अनुसार पुरस्कार लेता है, भाषण के अनुसार नहीं।

ऐसी प्रार्थना का उत्तर तब तक मिलता है, जब तक हम अपनी इच्छाओं को व्यवहार में लाते हैं। गुरु का आदेश है कि हम गुप्त रूप से प्रार्थना करें और अपने जीवन को अपनी ईमानदारी को प्रमाणित करने दें।

10. 15 : 7-9, 21-24

The Father in secret is unseen to the physical senses, but He knows all things and rewards according to motives, not according to speech.

Such prayer is answered, in so far as we put our desires into practice. The Master's injunction is, that we pray in secret and let our lives attest our sincerity.

11. 37: 20-31

हो सकता है कि आज के ईसाई उस करियर के अधिक व्यावहारिक महत्व को अपनाएं! यह संभव है, - हाँ, यह प्रत्येक बच्चे, पुरुष और महिला का कर्तव्य और विशेषाधिकार है, - कि उन्हें कुछ हद तक स्वास्थ्य और पवित्रता के सत्य और जीवन के प्रदर्शन द्वारा मास्टर के उदाहरण का पालन करना चाहिए। ईसाई उसके अनुयायी होने का दावा करते हैं, लेकिन क्या वे उस तरीके से उसका अनुसरण करते हैं जो उसने आज्ञा दी थी? ये अनिवार्य आदेश सुनें: "इसलिये चाहिये कि तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है॥" "तुम सारे जगत में जाकर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो!" "बीमारों को चंगा करो।"

11. 37 : 20-31

May the Christians of to-day take up the more practical import of that career! It is possible, — yea, it is the duty and privilege of every child, man, and woman, — to follow in some degree the example of the Master by the demonstration of Truth and Life, of health and holiness. Christians claim to be his followers, but do they follow him in the way that he commanded? Hear these imperative commands: "Be ye therefore perfect, even as your Father which is in heaven is perfect!" "Go ye into all the world, and preach the gospel to every creature!" "Heal the sick!"

12. 34: 10-17

अगर कभी संस्कार का हिस्सा बनने वाले सभी लोगों ने यीशु की पीड़ाओं को याद किया और उनके प्याले को पीया, तो उन्होंने दुनिया में क्रांति ला दी। यदि सभी जो भौतिक प्रतीकों के माध्यम से अपने स्मरणोत्सव की तलाश करते हैं, तो क्रूस को उठाएंगे, बीमारों को चंगा करेंगे, बुराइयों को बाहर निकालेंगे, और गरीबों को मसीह, या सत्य का उपदेश देंगे, - ग्रहणशील विचार, - वे सहस्त्राब्दी में लाएंगे।

12. 34 : 10-17

If all who ever partook of the sacrament had really commemorated the sufferings of Jesus and drunk of his cup, they would have revolutionized the world. If all who seek his commemoration through material symbols will take up the cross, heal the sick, cast out evils, and preach Christ, or Truth, to the poor, — the receptive thought, — they will bring in the millennium.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6