रविवार 14 अप्रैल, 2024



विषयक्या पाप, बीमारी और मृत्यु वास्तविक हैं?

SubjectAre Sin, Disease, And Death Real?

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: यशायाह 45: 22

"हे पृथ्वी के दूर दूर के देश के रहने वालो, तुम मेरी ओर फिरो और उद्धार पाओ! क्योंकि मैं ही ईश्वर हूं और दूसरा कोई नहीं है।"



Golden Text: Isaiah 45 : 22

Look unto me, and be ye saved, all the ends of the earth: for I am God, and there is none else.




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उत्तरदायी अध्ययन: भजन संहिता 103: 1-5, 10, 11, 19


1     हेमेरे मन, यहोवा को धन्य कह; और जो कुछ मुझ में है, वह उसके पवित्र नाम को धन्य कहे!

2     हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह, और उसके किसी उपकार को न भूलना।

3     वही तो तेरे सब अधर्म को क्षमा करता, और तेरे सब रोगों को चंगा करता है,

4     वही तो तेरे प्राण को नाश होने से बचा लेता है, और तेरे सिर पर करूणा और दया का मुकुट बान्धता है,

5     वही तो तेरी लालसा को उत्तम पदार्थों से तृप्त करता है, जिस से तेरी जवानी उकाब की नाईं नई हो जाती है॥

10     उसने हमारे पापों के अनुसार हम से व्यवहार नहीं किया, और न हमारे अधर्म के कामों के अनुसार हम को बदला दिया है।

11     जैसे आकाश पृथ्वी के ऊपर ऊंचा है, वैसे ही उसकी करूणा उसके डरवैयों के ऊपर प्रबल है।

19     यहोवा ने तो अपना सिंहासन स्वर्ग में स्थिर किया है, और उसका राज्य पूरी सृष्टि पर है।

Responsive Reading: Psalm 103 : 1-5, 10, 11, 19

1.     Bless the Lord, O my soul: and all that is within me, bless his holy name.

2.     Bless the Lord, O my soul, and forget not all his benefits:

3.     Who forgiveth all thine iniquities; who healeth all thy diseases;

4.     Who redeemeth thy life from destruction; who crowneth thee with lovingkindness and tender mercies;

5.     Who satisfieth thy mouth with good things; so that thy youth is renewed like the eagle’s.

10.     He hath not dealt with us after our sins; nor rewarded us according to our iniquities.

11.     For as the heaven is high above the earth, so great is his mercy toward them that fear him.

19.     The Lord hath prepared his throne in the heavens; and his kingdom ruleth over all.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. यिर्मयाह 17: 14

14     हे यहोवा मुझे चंगा कर, तब मैं चंगा हो जाऊंगा; मुझे बचा, तब मैं बच जाऊंगा; क्योंकि मैं तेरी ही स्तुति करता हूँ।

1. Jeremiah 17 : 14

14     Heal me, O Lord, and I shall be healed; save me, and I shall be saved: for thou art my praise.

2. 2 राजा 5: 1-4, 9-15 (से 2nd :)

1     अराम के राजा का नामान नाम सेनापति अपने स्वामी की दृष्टि में बड़ा और प्रतिष्ठित पुरुष था, क्योंकि यहोवा ने उसके द्वारा अरामियों को विजयी किया था, और यह शूरवीर था, परन्तु कोढ़ी था।

2     अरामी लोग दल बान्ध कर इस्राएल के देश में जा कर वहां से एक छोटी लड़की बन्धुवाई में ले आए थे और वह नामान की पत्नी की सेवा करती थी।

3     उसने अपनी स्वामिन से कहा, जो मेरा स्वामी शोमरोन के भविष्यद्वक्ता के पास होता, तो क्या ही अच्छा होता! क्योंकि वह उसको कोढ़ से चंगा कर देता।

4     तो किसी ने उसके प्रभु के पास जा कर कह दिया, कि इस्राएली लड़की इस प्रकार कहती है।

9     तब नामान घोड़ों और रथों समेत एलीशा के द्वार पर आकर खड़ा हुआ।

10     तब एलीशा ने एक दूत से उसके पास यह कहला भेजा, कि तू जा कर यरदन में सात बार डुबकी मार, तब तेरा शरीर ज्यों का त्यों हो जाएगा, और तू शुद्ध होगा।

11     परन्तु नामान क्रोधित हो यह कहता हुआ चला गया, कि मैं ने तो सोचा था, कि अवश्य वह मेरे पास बाहर आएगा, और खड़ा हो कर अपने परमेश्वर यहोवा से प्रार्थना कर के कोढ़ के स्थान पर अपना हाथ फेर कर कोढ़ को दूर करेगा!

12     क्या दमिश्क की अबाना और पर्पर नदियां इस्राएल के सब जलाशयों से अत्तम नहीं हैं? क्या मैं उन में स्नान कर के शुद्ध नहीं हो सकता हूँ? इसलिये वह जलजलाहट से भरा हुआ लौट कर चला गया।

13     तब उसके सेवक पास आकर कहने लगे, हे हमारे पिता यदि भविष्यद्वक्ता तुझे कोई भारी काम करने की आज्ञा देता, तो क्या तू उसे न करता? फिर जब वह कहता है, कि स्नान कर के शुद्ध हो जा, तो कितना अधिक इसे मानना चाहिये।

14     तब उसने परमेश्वर के भक्त के वचन के अनुसार यरदन को जा कर उस में सात बार डुबकी मारी, और उसका शरीर छोटे लड़के का सा हो गया; उौर वह शुद्ध हो गया।

15     तब वह अपने सब दल बल समेत परमेश्वर के भक्त के यहां लौट आया, और उसके सम्मुख खड़ा हो कर कहने लगा सुन, अब मैं ने जान लिया है, कि समस्त पृथ्वी में इस्राएल को छोड़ और कहीं परमेश्वर नहीं है। इसलिये अब अपने दास की भेंट ग्रहण कर।

2. II Kings 5 : 1-4, 9-15 (to 2nd :)

1     Now Naaman, captain of the host of the king of Syria, was a great man with his master, and honourable, because by him the Lord had given deliverance unto Syria: he was also a mighty man in valour, but he was a leper.

2     And the Syrians had gone out by companies, and had brought away captive out of the land of Israel a little maid; and she waited on Naaman’s wife.

3     And she said unto her mistress, Would God my lord were with the prophet that is in Samaria! for he would recover him of his leprosy.

4     And one went in, and told his lord, saying, Thus and thus said the maid that is of the land of Israel.

9     So Naaman came with his horses and with his chariot, and stood at the door of the house of Elisha.

10     And Elisha sent a messenger unto him, saying, Go and wash in Jordan seven times, and thy flesh shall come again to thee, and thou shalt be clean.

11     But Naaman was wroth, and went away, and said, Behold, I thought, He will surely come out to me, and stand, and call on the name of the Lord his God, and strike his hand over the place, and recover the leper.

12     Are not Abana and Pharpar, rivers of Damascus, better than all the waters of Israel? may I not wash in them, and be clean? So he turned and went away in a rage.

13     And his servants came near, and spake unto him, and said, My father, if the prophet had bid thee do some great thing, wouldest thou not have done it? how much rather then, when he saith to thee, Wash, and be clean?

14     Then went he down, and dipped himself seven times in Jordan, according to the saying of the man of God: and his flesh came again like unto the flesh of a little child, and he was clean.

15     And he returned to the man of God, he and all his company, and came, and stood before him: and he said, Behold, now I know that there is no God in all the earth, but in Israel:

3. मत्ती 4: 17 (यीशु), 24

17     उस समय से यीशु प्रचार करना और यह कहना आरम्भ किया, कि मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है।

24     और सारे सूरिया में उसका यश फैल गया; और लोग सब बीमारों को, जो नाना प्रकार की बीमारियों और दुखों में जकड़े हुए थे, और जिन में दुष्टात्माएं थीं और मिर्गी वालों और झोले के मारे हुओं को उसके पास लाए और उस ने उन्हें चंगा किया।

3. Matthew 4 : 17 (Jesus), 24

17     Jesus began to preach, and to say, Repent: for the kingdom of heaven is at hand.

24     And his fame went throughout all Syria: and they brought unto him all sick people that were taken with divers diseases and torments, and those which were possessed with devils, and those which were lunatick, and those that had the palsy; and he healed them.

4. मत्ती 9: 1-8

1     फिर वह नाव पर चढ़कर पार गया; और अपने नगर में आया।

2     और देखो, कई लोग एक झोले के मारे हुए को खाट पर रखकर उसके पास लाए; यीशु ने उन का विश्वास देखकर, उस झोले के मारे हुए से कहा; हे पुत्र, ढाढ़स बान्ध; तेरे पाप क्षमा हुए।

3     और देखो, कई शास्त्रियों ने सोचा, कि यह तो परमेश्वर की निन्दा करता है।

4     यीशु ने उन के मन की बातें मालूम करके कहा, कि तुम लोग अपने अपने मन में बुरा विचार क्यों कर रहे हो?

5     सहज क्या है, यह कहना, कि तेरे पाप क्षमा हुए; या यह कहना कि उठ और चल फिर।

6     परन्तु इसलिये कि तुम जान लो कि मनुष्य के पुत्र को पृथ्वी पर पाप क्षमा करने का अधिकार है (उस ने झोले के मारे हुए से कहा) उठ: अपनी खाट उठा, और अपने घर चला जा।

7     वह उठकर अपने घर चला गया।

8     लोग यह देखकर डर गए और परमेश्वर की महिमा करने लगे जिस ने मनुष्यों को ऐसा अधिकार दिया है॥

4. Matthew 9 : 1-8

1     And he entered into a ship, and passed over, and came into his own city.

2     And, behold, they brought to him a man sick of the palsy, lying on a bed: and Jesus seeing their faith said unto the sick of the palsy; Son, be of good cheer; thy sins be forgiven thee.

3     And, behold, certain of the scribes said within themselves, This man blasphemeth.

4     And Jesus knowing their thoughts said, Wherefore think ye evil in your hearts?

5     For whether is easier, to say, Thy sins be forgiven thee; or to say, Arise, and walk?

6     But that ye may know that the Son of man hath power on earth to forgive sins, (then saith he to the sick of the palsy,) Arise, take up thy bed, and go unto thine house.

7     And he arose, and departed to his house.

8     But when the multitudes saw it, they marvelled, and glorified God, which had given such power unto men.

5. लूका 7: 11-16

11     थोड़े दिन के बाद वह नाईंन नाम के एक नगर को गया, और उसके चेले, और बड़ी भीड़ उसके साथ जा रही थी।

12     जब वह नगर के फाटक के पास पहुंचा, तो देखो, लोग एक मुरदे को बाहर लिए जा रहे थे; जो अपनी मां का एकलौता पुत्र था, और वह विधवा थी: और नगर के बहुत से लोग उसके साथ थे।

13     उसे देख कर प्रभु को तरस आया, और उस से कहा; मत रो।

14     तब उस ने पास आकर, अर्थी को छुआ; और उठाने वाले ठहर गए, तब उस ने कहा; हे जवान, मैं तुझ से कहता हूं, उठ।

15     तब वह मुरदा उठ बैठा, और बोलने लगा: और उस ने उसे उस की मां को सौप दिया।

16     इस से सब पर भय छा गया; और वे परमेश्वर की बड़ाई करके कहने लगे कि हमारे बीच में एक बड़ा भविष्यद्वक्ता उठा है, और परमेश्वर ने अपने लोगों पर कृपा दृष्टि की है।

5. Luke 7 : 11-16

11     And it came to pass the day after, that he went into a city called Nain; and many of his disciples went with him, and much people.

12     Now when he came nigh to the gate of the city, behold, there was a dead man carried out, the only son of his mother, and she was a widow: and much people of the city was with her.

13     And when the Lord saw her, he had compassion on her, and said unto her, Weep not.

14     And he came and touched the bier: and they that bare him stood still. And he said, Young man, I say unto thee, Arise.

15     And he that was dead sat up, and began to speak. And he delivered him to his mother.

16     And there came a fear on all: and they glorified God, saying, That a great prophet is risen up among us; and, That God hath visited his people.

6. प्रकाशित वाक्य 1: 1

1     यीशु मसीह का प्रकाशितवाक्य जो उसे परमेश्वर ने इसलिये दिया, कि अपने दासों को वे बातें, जिन का शीघ्र होना अवश्य है, दिखाए: और उस ने अपने स्वर्गदूत को भेज कर उसके द्वारा अपने दास यूहन्ना को बताया।

6. Revelation 1 : 1

1     The Revelation of Jesus Christ, which God gave unto him, to shew unto his servants things which must shortly come to pass; and he sent and signified it by his angel unto his servant John:

7. प्रकाशित वाक्य 21: 1-6

1     फिर मैं ने नये आकाश और नयी पृथ्वी को देखा, क्योंकि पहिला आकाश और पहिली पृथ्वी जाती रही थी, और समुद्र भी न रहा।

2     फिर मैं ने पवित्र नगर नये यरूशलेम को स्वर्ग पर से परमेश्वर के पास से उतरते देखा, और वह उस दुल्हिन के समान थी, जो अपने पति के लिये सिंगार किए हो।

3     फिर मैं ने सिंहासन में से किसी को ऊंचे शब्द से यह कहते सुना, कि देख, परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है; वह उन के साथ डेरा करेगा, और वे उसके लोग होंगे, और परमेश्वर आप उन के साथ रहेगा; और उन का परमेश्वर होगा।

4     और वह उन की आंखोंसे सब आंसू पोंछ डालेगा; और इस के बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहिली बातें जाती रहीं।

5     और जो सिंहासन पर बैठा था, उस ने कहा, कि देख, मैं सब कुछ नया कर देता हूं: फिर उस ने कहा, कि लिख ले, क्योंकि ये वचन विश्वास के योग्य और सत्य हैं।

6     फिर उस ने मुझ से कहा, ये बातें पूरी हो गई हैं, मैं अलफा और ओमिगा, आदि और अन्त हूं: मैं प्यासे को जीवन के जल के सोते में से सेंतमेंत पिलाऊंगा।

7. Revelation 21 : 1-6

1     And I saw a new heaven and a new earth: for the first heaven and the first earth were passed away; and there was no more sea.

2     And I John saw the holy city, new Jerusalem, coming down from God out of heaven, prepared as a bride adorned for her husband.

3     And I heard a great voice out of heaven saying, Behold, the tabernacle of God is with men, and he will dwell with them, and they shall be his people, and God himself shall be with them, and be their God.

4     And God shall wipe away all tears from their eyes; and there shall be no more death, neither sorrow, nor crying, neither shall there be any more pain: for the former things are passed away.

5     And he that sat upon the throne said, Behold, I make all things new. And he said unto me, Write: for these words are true and faithful.

6     And he said unto me, It is done. I am Alpha and Omega, the beginning and the end. I will give unto him that is athirst of the fountain of the water of life freely.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 99: 23-29

सच्ची आध्यात्मिकता की शांत, मजबूत धाराएँ, जिनमें से अभिव्यक्तियाँ स्वास्थ्य, पवित्रता और आत्म-विनाश हैं, मानव अनुभव को गहरा करना चाहिए, जब तक कि भौतिक अस्तित्व की मान्यताओं को एक गंजेपन के रूप में नहीं देखा जाता है, और पाप, बीमारी, और मृत्यु ईश्वरीय आत्मा के वैज्ञानिक प्रदर्शन और परमेश्‍वर के आध्यात्मिक, सिद्ध इंसान को हमेशा के लिए जगह देते हैं।

1. 99 : 23-29

The calm, strong currents of true spirituality, the manifestations of which are health, purity, and self-immolation, must deepen human experience, until the beliefs of material existence are seen to be a bald imposition, and sin, disease, and death give everlasting place to the scientific demonstration of divine Spirit and to God's spiritual, perfect man.

2. 339: 25-28

सभी स्वास्थ्य, पापहीनता, और अमरता का आधार महान तथ्य यह है कि भगवान केवल मन है; और इस मन को केवल विश्वास नहीं होना चाहिए, लेकिन इसे समझना चाहिए।

2. 339 : 25-28

The basis of all health, sinlessness, and immortality is the great fact that God is the only Mind; and this Mind must be not merely believed, but it must be understood.

3. 120: 15-24

स्वास्थ्य पदार्थ की नहीं, मन की स्थिति है; न ही स्वास्थ्य के विषय पर सामग्री इंद्रियां विश्वसनीय गवाही दे सकती हैं। दिमागी चिकित्सा विज्ञान यह दिखाता है कि यह असंभव है लेकिन मन को सही मायने में गवाही देना या मनुष्य की वास्तविक स्थिति का प्रदर्शन करना है। इसलिए विज्ञान के दिव्य सिद्धांत, भौतिक इंद्रियों की गवाही को उलट कर, मनुष्य को सच्चाई में सामंजस्यपूर्ण रूप से अस्तित्व के रूप में प्रकट करता है, जो स्वास्थ्य का एकमात्र आधार है; और इस प्रकार विज्ञान सभी बीमारियों से इनकार करता है, बीमारों को चंगा करता है, झूठे सबूतों को उखाड़ फेंकता है और भौतिकवादी तर्क का खंडन करता है।

3. 120 : 15-24

Health is not a condition of matter, but of Mind; nor can the material senses bear reliable testimony on the subject of health. The Science of Mind-healing shows it to be impossible for aught but Mind to testify truly or to exhibit the real status of man. Therefore the divine Principle of Science, reversing the testimony of the physical senses, reveals man as harmoniously existent in Truth, which is the only basis of health; and thus Science denies all disease, heals the sick, overthrows false evidence, and refutes materialistic logic.

4. 301: 24-29

भ्रम, पाप, बीमारी और मृत्यु भौतिक अर्थों की झूठी गवाही से उत्पन्न होती है, जो कि अनंत आत्मा की केंद्रीय दूरी के बाहर एक निश्चित दृष्टिकोण से, मन और पदार्थ की एक उलटी छवि प्रस्तुत करता है और सब कुछ उल्टा हो जाता है।

4. 301 : 24-29

Delusion, sin, disease, and death arise from the false testimony of material sense, which, from a supposed standpoint outside the focal distance of infinite Spirit, presents an inverted image of Mind and substance with everything turned upside down.

5. 472: 24 (सब)-15

सारी वास्तविकता ईश्वर और उसकी रचना, सामंजस्य और शाश्वत में है। वह जो बनाता है वह अच्छा है, और जो कुछ भी बना है, उसके द्वारा बनाया गया है। इसलिये पाप, बीमारी, या मृत्यु का एकमात्र वास्तविकता यह भयानक तथ्य है कि अवास्तविकता मानव को वास्तविक लगती है, विश्वास को गलत करती है, जब तक कि भगवान उनके भेस को बंद नहीं करते। वे सत्य नहीं हैं, क्योंकि वे भगवान के नहीं हैं। हम क्रिश्चियन साइंस में सीखते हैं कि नश्वर मन या शरीर के सभी अंतर्ज्ञान भ्रम हैं, न तो वास्तविकता और न ही पहचान के बावजूद वास्तविक और समान प्रतीत होते हैं।

मन का विज्ञान सभी बुराई का निपटारा करता है। सत्य, ईश्वर, त्रुटि का जनक नहीं है। पाप, बीमारी और मृत्यु को त्रुटि के प्रभावों के रूप में वर्गीकृत किया जाना है। मसीह पाप के विश्वास को नष्ट करने के लिए आया था। ईश्वर-तत्त्व सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान है। ईश्वर हर जगह है, और उसके बिना कुछ भी मौजूद नहीं है या उसकी कोई शक्ति नहीं है। मसीह एक आदर्श सत्य है, जो क्रायश्चियन साइंस के माध्यम से बीमारी और पाप को ठीक करने के लिए आता है, और ईश्वर को सभी शक्ति प्रदान करता है। यीशु उस व्यक्ति का नाम है जिसने बीमारों और पापों का उपचार करके और मृत्यु की शक्ति को नष्ट करके, मसीह को प्रस्तुत किया, जो कि अन्य सभी पुरुषों की तुलना में अधिक परमेश्वर का सच्चा विचार है।

5. 472 : 24 (All)-15

All reality is in God and His creation, harmonious and eternal. That which He creates is good, and He makes all that is made. Therefore the only reality of sin, sickness, or death is the awful fact that unrealities seem real to human, erring belief, until God strips off their disguise. They are not true, because they are not of God. We learn in Christian Science that all inharmony of mortal mind or body is illusion, possessing neither reality nor identity though seeming to be real and identical.

The Science of Mind disposes of all evil. Truth, God, is not the father of error. Sin, sickness, and death are to be classified as effects of error. Christ came to destroy the belief of sin. The God-principle is omnipresent and omnipotent. God is everywhere, and nothing apart from Him is present or has power. Christ is the ideal Truth, that comes to heal sickness and sin through Christian Science, and attributes all power to God. Jesus is the name of the man who, more than all other men, has presented Christ, the true idea of God, healing the sick and the sinning and destroying the power of death.

6. 473: 18-31

कलीसियाई निरंकुशता के युग में, यीशु ने ईसाई धर्म की शिक्षा और अभ्यास की शुरुआत की, जो ईसाई धर्म की सच्चाई और प्रेम का प्रमाण प्रस्तुत करता है; लेकिन उसके उदाहरण तक पहुँचने के लिए और उसके नियम के अनुसार उसके अचूक विज्ञान का परीक्षण करने के लिए, बीमारी, पाप और मृत्यु को ठीक करने के लिए, ईश्वर को ईश्वरीय सिद्धांत के रूप में बेहतर समझने की आवश्यकता है, व्यक्तित्व या मनुष्य यीशु के बजाय प्रेम की आवश्यकता है।

यीशु ने जो कुछ कहा उसे प्रदर्शन के द्वारा स्थापित किया, इस प्रकार उसके कार्यों को उसके वचनों से अधिक महत्वपूर्ण बना दिया। उन्होंने जो सिखाया वह साबित किया। यह ईसाई धर्म का विज्ञान है। यीशु ने उस सिद्धांत को सिद्ध कर दिया, जो बीमारों को ठीक करता है और त्रुटि को दूर करता है, ईश्वरीय है।

6. 473 : 18-31

In an age of ecclesiastical despotism, Jesus introduced the teaching and practice of Christianity, affording the proof of Christianity's truth and love; but to reach his example and to test its unerring Science according to his rule, healing sickness, sin, and death, a better understanding of God as divine Principle, Love, rather than personality or the man Jesus, is required.

Jesus established what he said by demonstration, thus making his acts of higher importance than his words. He proved what he taught. This is the Science of Christianity. Jesus proved the Principle, which heals the sick and casts out error, to be divine.

7. 373: 14-15

रोग का भय और पाप का प्रेम मनुष्य की दासता के स्रोत हैं।

7. 373 : 14-15

The fear of disease and the love of sin are the sources of man's enslavement.

8. 403: 14-20

आप स्थिति को आज्ञा देते हैं यदि आप समझते हैं कि नश्वर अस्तित्व आत्म-धोखे की स्थिति है न कि सत्य होने की। नश्वर मन लगातार नश्वर शरीर पर गलत विचारों के परिणाम उत्पन्न कर रहा है; और यह तब तक करना जारी रखेगा, जब तक कि नश्वर त्रुटि सत्य द्वारा अपनी काल्पनिक शक्तियों से वंचित न हो, जो नश्वर भ्रम के गॉसमेर वेब को मिटा देता है।

8. 403 : 14-20

You command the situation if you understand that mortal existence is a state of self-deception and not the truth of being. Mortal mind is constantly producing on mortal body the results of false opinions; and it will continue to do so, until mortal error is deprived of its imaginary powers by Truth, which sweeps away the gossamer web of mortal illusion.

9. 230: 1-10

यदि बीमारी वास्तविक है, तो यह अमरता से संबंधित है; अगर यह सच है, यह सत्य का एक हिस्सा है। क्या आप सत्य की गुणवत्ता या स्थिति को नष्ट करने के लिए दवाओं के साथ या बिना प्रयास करेंगे? लेकिन अगर बीमारी और पाप भ्रम हैं, तो इस नश्वर सपने से जागृति, या भ्रम, हमें स्वास्थ्य, पवित्रता और अमरता में लाएगा। यह जागृति हमेशा के लिए मसीह के आने की है, सत्य का उन्नत रूप है, जो त्रुटि को बाहर निकालता है और बीमारों को ठीक करता है। यह वह मोक्ष है जो ईश्वर, ईश्वरीय सिद्धांत और प्रेम के माध्यम से आता है, जैसा कि यीशु द्वारा प्रदर्शित किया गया है।

9. 230 : 1-10

If sickness is real, it belongs to immortality; if true, it is a part of Truth. Would you attempt with drugs, or without, to destroy a quality or condition of Truth? But if sickness and sin are illusions, the awakening from this mortal dream, or illusion, will bring us into health, holiness, and immortality. This awakening is the forever coming of Christ, the advanced appearing of Truth, which casts out error and heals the sick. This is the salvation which comes through God, the divine Principle, Love, as demonstrated by Jesus.

10. 412: 13-18, 23-27

क्राइस्टियन साइंस और दिव्य प्रेम की शक्ति सर्वशक्तिमान है। यह वास्तव में पकड़ को नष्ट करने और बीमारी, पाप और मृत्यु को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है।

बीमारी को रोकने या उसका इलाज करने के लिए, सत्य की शक्ति, दिव्य आत्मा की शक्ति को भौतिक इंद्रियों के सपने को तोड़ना होगा।

मानसिक रूप से इस बात पर जोर दें कि सद्भाव ही सच्चाई है और बीमारी एक अस्थायी सपना है। स्वास्थ्य की उपस्थिति और सामंजस्यपूर्ण अस्तित्व के तथ्य को तब तक महसूस करें, जब तक कि शरीर स्वास्थ्य और सद्भाव की सामान्य स्थितियों के अनुरूप न हो जाए।

10. 412 : 13-18, 23-27

The power of Christian Science and divine Love is omnipotent. It is indeed adequate to unclasp the hold and to destroy disease, sin, and death.

To prevent disease or to cure it, the power of Truth, of divine Spirit, must break the dream of the material senses.

Mentally insist that harmony is the fact, and that sickness is a temporal dream. Realize the presence of health and the fact of harmonious being, until the body corresponds with the normal conditions of health and harmony.

11. 428: 3 केवल, 6-14

जीवन वास्तविक है, और मृत्यु भ्रम है। ... इस सर्वोच्च क्षण में मनुष्य का विशेषाधिकार हमारे मास्टर के शब्दों को साबित करना है: "कि यदि कोई व्यक्ति मेरे वचन पर चलेगा, तो वह अनन्त काल तक मृत्यु को न देखेगा।" झूठे न्यासों और भौतिक साक्ष्यों के बारे में विचार करने के लिए ताकि आध्यात्मिक तथ्य सामने आ सकें — यह महान प्राप्ति है जिसके माध्यम से हम असत्य को मिटा देंगे और सत्य को स्थान देंगे। इस प्रकार हम मंदिर, या देह को सच में स्थापित कर सकते हैं, "जिसका निर्माता और निर्माता भगवान है।"

11. 428 : 3 only, 6-14

Life is real, and death is the illusion. ... Man's privilege at this supreme moment is to prove the words of our Master: "If a man keep my saying, he shall never see death." To divest thought of false trusts and material evidences in order that the spiritual facts of being may appear, — this is the great attainment by means of which we shall sweep away the false and give place to the true. Thus we may establish in truth the temple, or body, "whose builder and maker is God."

12. 495: 14-24

जब बीमारी या पाप का भ्रम आपको झकझोरता है, ईश्वर और उसके विचार के प्रति दृढ़ रहना अपने विचार में पालन करने के लिए उसकी समानता के अलावा कुछ भी अनुमति न दें। न तो डर और न ही संदेह को अपनी स्पष्ट भावना और शांत विश्वास का पालन करें, कि जीवन के सामंजस्यपूर्ण जीवन की मान्यता - जैसा कि जीवन है - किसी भी दर्दनाक भावना, या विश्वास को नष्ट कर सकता है, जो जीवन नहीं है। क्रिश्चियन साइंस, कॉरपोरल सेंस के बजाय अपनी होने की समझ का समर्थन करें, और यह समझ सच्चाई के साथ त्रुटि को दबा देगी, मृत्यु दर को अमरता से बदल देगी, और सद्भाव के साथ चुप्पी को दूर करेगी।

12. 495 : 14-24

When the illusion of sickness or sin tempts you, cling steadfastly to God and His idea. Allow nothing but His likeness to abide in your thought. Let neither fear nor doubt overshadow your clear sense and calm trust, that the recognition of life harmonious — as Life eternally is — can destroy any painful sense of, or belief in, that which Life is not. Let Christian Science, instead of corporeal sense, support your understanding of being, and this understanding will supplant error with Truth, replace mortality with immortality, and silence discord with harmony.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6