रविवार 13 अक्टूबर, 2019 |

रविवार 13 अक्टूबर, 2019



विषयक्या पाप, बीमारी और मृत्यु वास्तविक हैं?

SubjectAre Sin, Disease, and Death Real?

वर्ण पाठ: नीतिवचन 12 : 28

धर्म की बाट में जीवन मिलता है, और उसके पथ में मृत्यु का पता भी नहीं॥



Golden Text: Proverbs 12 : 28

In the way of righteousness is life; and in the pathway thereof there is no death.




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भजन संहिता 51 : 1, 10-13, 15


1     हे परमेश्वर, अपनी करूणा के अनुसार मुझ पर अनुग्रह कर; अपनी बड़ी दया के अनुसार मेरे अपराधों को मिटा दे।

10     हे परमेश्वर, मेरे अन्दर शुद्ध मन उत्पन्न कर, और मेरे भीतर स्थिर आत्मा नये सिरे से उत्पन्न कर।

11     मुझे अपने साम्हने से निकाल न दे, और अपने पवित्र आत्मा को मुझ से अलग न कर।

12     अपने किए हुए उद्धार का हर्ष मुझे फिर से दे, और उदार आत्मा देकर मुझे सम्भाल॥

13     तब मैं अपराधियों को तेरा मार्ग सिखाऊंगा, और पापी तेरी ओर फिरेंगे।

15     हे प्रभु, मेरा मुंह खोल दे तब मैं तेरा गुणानुवाद कर सकूंगा।

Responsive Reading: Psalm 51 : 1, 10-13, 15

1.     Have mercy upon me, O God, according to thy lovingkindness: according unto the multitude of thy tender mercies blot out my transgressions.

10.     Create in me a clean heart, O God; and renew a right spirit within me.

11.     Cast me not away from thy presence; and take not thy holy spirit from me.

12.     Restore unto me the joy of thy salvation; and uphold me with thy free spirit.

13.     Then will I teach transgressors thy ways; and sinners shall be converted unto thee.

15.     O Lord, open thou my lips; and my mouth shall shew forth thy praise.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. यिर्मयाह 31 : 33 (इस)-34

33     ...जो वाचा मैं उन दिनों के बाद इस्राएल के घराने से बान्धूंगा, वह यह है: मैं अपनी व्यवस्था उनके मन में समवाऊंगा, और उसे उनके हृदय पर लिखूंगा; और मैं उनका परमेश्वर ठहरूंगा, और वे मेरी प्रजा ठहरेंगे, यहोवा की यह वाणी है।

34     और तब उन्हें फिर एक दूसरे से यह न कहना पड़ेगा कि यहोवा को जानो, क्योंकि, यहोवा की यह वाणी है कि छोटे से ले कर बड़े तक, सब के सब मेरा ज्ञान रखेंगे; क्योंकि मैं उनका अधर्म क्षमा करूंगा, और उनका पाप फिर स्मरण न करूंगा।

1. Jeremiah 31 : 33 (this)-34

33     …this shall be the covenant that I will make with the house of Israel; After those days, saith the Lord, I will put my law in their inward parts, and write it in their hearts; and will be their God, and they shall be my people.

34     And they shall teach no more every man his neighbour, and every man his brother, saying, Know the Lord: for they shall all know me, from the least of them unto the greatest of them, saith the Lord: for I will forgive their iniquity, and I will remember their sin no more.

2. लूका 19 : 1 (यीशु)-10

1     वह यरीहो में प्रवेश करके जा रहा था।

2     और देखो, ज़क्कई नाम एक मनुष्य था जो चुंगी लेने वालों का सरदार और धनी था।

3     वह यीशु को देखना चाहता था कि वह कौन सा है परन्तु भीड़ के कारण देख न सकता था। क्योंकि वह नाटा था।

4     तब उस को देखने के लिये वह आगे दौड़कर एक गूलर के पेड़ पर चढ़ गया, क्योंकि वह उसी मार्ग से जाने वाला था।

5     जब यीशु उस जगह पहुंचा, तो ऊपर दृष्टि कर के उस से कहा; हे ज़क्कई झट उतर आ; क्योंकि आज मुझे तेरे घर में रहना अवश्य है।

6     वह तुरन्त उतर कर आनन्द से उसे अपने घर को ले गया।

7     यह देख कर सब लोगे कुड़कुड़ा कर कहने लगे, वह तो एक पापी मनुष्य के यहां जा उतरा है।

8     ज़क्कई ने खड़े होकर प्रभु से कहा; हे प्रभु, देख मैं अपनी आधी सम्पत्ति कंगालों को देता हूं, और यदि किसी का कुछ भी अन्याय करके ले लिया है तो उसे चौगुना फेर देता हूं।

9     तब यीशु ने उस से कहा; आज इस घर में उद्धार आया है, इसलिये कि यह भी इब्राहीम का एक पुत्र है।

10     क्योंकि मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को ढूंढ़ने और उन का उद्धार करने आया है॥

2. Luke 19 : 1 (Jesus)-10

1     Jesus entered and passed through Jericho.

2     And, behold, there was a man named Zacchæus, which was the chief among the publicans, and he was rich.

3     And he sought to see Jesus who he was; and could not for the press, because he was little of stature.

4     And he ran before, and climbed up into a sycomore tree to see him: for he was to pass that way.

5     And when Jesus came to the place, he looked up, and saw him, and said unto him, Zacchæus, make haste, and come down; for to day I must abide at thy house.

6     And he made haste, and came down, and received him joyfully.

7     And when they saw it, they all murmured, saying, That he was gone to be guest with a man that is a sinner.

8     And Zacchæus stood, and said unto the Lord; Behold, Lord, the half of my goods I give to the poor; and if I have taken any thing from any man by false accusation, I restore him fourfold.

9     And Jesus said unto him, This day is salvation come to this house, forsomuch as he also is a son of Abraham.

10     For the Son of man is come to seek and to save that which was lost.

3. मत्ती 4 : 23 (यीशु)-25

23     और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उन की सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बल्ता को दूर करता रहा।

24     और सारे सूरिया में उसका यश फैल गया; और लोग सब बीमारों को, जो नाना प्रकार की बीमारियों और दुखों में जकड़े हुए थे, और जिन में दुष्टात्माएं थीं और मिर्गी वालों और झोले के मारे हुओं को उसके पास लाए और उस ने उन्हें चंगा किया।

25     और गलील और दिकापुलिस और यरूशलेम और यहूदिया से और यरदन के पार से भीड़ की भीड़ उसके पीछे हो ली॥

3. Matthew 4 : 23 (Jesus)-25

23     Jesus went about all Galilee, teaching in their synagogues, and preaching the gospel of the kingdom, and healing all manner of sickness and all manner of disease among the people.

24     And his fame went throughout all Syria: and they brought unto him all sick people that were taken with divers diseases and torments, and those which were possessed with devils, and those which were lunatick, and those that had the palsy; and he healed them.

25     And there followed him great multitudes of people from Galilee, and from Decapolis, and from Jerusalem, and from Judæa, and from beyond Jordan.

4. यूहन्ना 21 : 4 (कब)-14

4     ...भोर होते ही यीशु किनारे पर खड़ा हुआ; तौभी चेलों ने न पहचाना कि यह यीशु है।

5     तब यीशु ने उन से कहा, हे बाल को, क्या तुम्हारे पास कुछ खाने को है? उन्होंने उत्तर दिया कि नहीं।

6     उस ने उन से कहा, नाव की दाहनी ओर जाल डालो, तो पाओगे, तब उन्होंने जाल डाला, और अब मछिलयों की बहुतायत के कारण उसे खींच न सके।

7     इसलिये उस चेले ने जिस से यीशु प्रेम रखता था पतरस से कहा, यह तो प्रभु है: शमौन पतरस ने यह सुनकर कि प्रभु है, कमर में अंगरखा कस लिया, क्योंकि वह नंगा था, और झील में कूद पड़ा।

8     परन्तु और चेले डोंगी पर मछिलयों से भरा हुआ जाल खींचते हुए आए, क्योंकि वे किनारे से अधिक दूर नहीं, कोई दो सौ हाथ पर थे।

9     जब किनारे पर उतरे, तो उन्होंने कोएले की आग, और उस पर मछली रखी हुई, और रोटी देखी।

10     यीशु ने उन से कहा, जो मछिलयां तुम ने अभी पकड़ी हैं, उन में से कुछ लाओ।

11     शमौन पतरस ने डोंगी पर चढ़कर एक सौ तिर्पन बड़ी मछिलयों से भरा हुआ जाल किनारे पर खींचा, और इतनी मछिलयां होने से भी जाल न फटा।

12     यीशु ने उन से कहा, कि आओ, भोजन करो और चेलों में से किसी को हियाव न हुआ, कि उस से पूछे, कि तू कौन है? क्योंकि वे जानते थे, कि हो न हो यह प्रभु ही है।

13     यीशु आया, और रोटी लेकर उन्हें दी, और वैसे ही मछली भी।

14     यह तीसरी बार है, कि यीशु ने मरे हुओं में से जी उठने के बाद चेलों को दर्शन दिए॥

4. John 21 : 4 (when)-14

4     …when the morning was now come, Jesus stood on the shore: but the disciples knew not that it was Jesus.

5     Then Jesus saith unto them, Children, have ye any meat? They answered him, No.

6     And he said unto them, Cast the net on the right side of the ship, and ye shall find. They cast therefore, and now they were not able to draw it for the multitude of fishes.

7     Therefore that disciple whom Jesus loved saith unto Peter, It is the Lord. Now when Simon Peter heard that it was the Lord, he girt his fisher’s coat unto him, (for he was naked,) and did cast himself into the sea.

8     And the other disciples came in a little ship; (for they were not far from land, but as it were two hundred cubits,) dragging the net with fishes.

9     As soon then as they were come to land, they saw a fire of coals there, and fish laid thereon, and bread.

10     Jesus saith unto them, Bring of the fish which ye have now caught.

11     Simon Peter went up, and drew the net to land full of great fishes, an hundred and fifty and three: and for all there were so many, yet was not the net broken.

12     Jesus saith unto them, Come and dine. And none of the disciples durst ask him, Who art thou? knowing that it was the Lord.

13     Jesus then cometh, and taketh bread, and giveth them, and fish likewise.

14     This is now the third time that Jesus shewed himself to his disciples, after that he was risen from the dead.

5. भजन संहिता 116 : 1-9

1     मैं प्रेम रखता हूं, इसलिये कि यहोवा ने मेरे गिड़गिड़ाने को सुना है।

2     उसने जो मेरी ओर कान लगाया है, इसलिये मैं जीवन भर उसको पुकारा करूंगा।

3     मृत्यु की रस्सियां मेरे चारोंओर थीं; मैं अधोलोक की सकेती में पड़ा था; मुझे संकट और शोक भोगना पड़ा।

4     तब मैं ने यहोवा से प्रार्थना की, कि हे यहोवा बिनती सुन कर मेरे प्राण को बचा ले!

5     यहोवा अनुग्रहकारी और धर्मी है; और हमारा परमेश्वर दया करने वाला है।

6     यहोवा भोलों की रक्षा करता है; जब मैं बलहीन हो गया था, उसने मेरा उद्धार किया।

7     हे मेरे प्राण तू अपने विश्राम स्थान में लौट आ; क्योंकि यहोवा ने तेरा उपकार किया है॥

8     तू ने तो मेरे प्राण को मृत्यु से, मेरी आंख को आंसू बहाने से, और मेरे पांव को ठोकर खाने से बचाया है।

9     मैं जीवित रहते हुए, अपने को यहोवा के साम्हने जान कर नित चलता रहूंगा।

5. Psalm 116 : 1-9

1     I love the Lord, because he hath heard my voice and my supplications.

2     Because he hath inclined his ear unto me, therefore will I call upon him as long as I live.

3     The sorrows of death compassed me, and the pains of hell gat hold upon me: I found trouble and sorrow.

4     Then called I upon the name of the Lord; O Lord, I beseech thee, deliver my soul.

5     Gracious is the Lord, and righteous; yea, our God is merciful.

6     The Lord preserveth the simple: I was brought low, and he helped me.

7     Return unto thy rest, O my soul; for the Lord hath dealt bountifully with thee.

8     For thou hast delivered my soul from death, mine eyes from tears, and my feet from falling.

9     I will walk before the Lord in the land of the living.

6. प्रकाशित वाक्य 21 : 1-4

1     फिर मैं ने नये आकाश और नयी पृथ्वी को देखा, क्योंकि पहिला आकाश और पहिली पृथ्वी जाती रही थी, और समुद्र भी न रहा।

2     फिर मैं ने पवित्र नगर नये यरूशलेम को स्वर्ग पर से परमेश्वर के पास से उतरते देखा, और वह उस दुल्हिन के समान थी, जो अपने पति के लिये सिंगार किए हो।

3     फिर मैं ने सिंहासन में से किसी को ऊंचे शब्द से यह कहते सुना, कि देख, परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है; वह उन के साथ डेरा करेगा, और वे उसके लोग होंगे, और परमेश्वर आप उन के साथ रहेगा; और उन का परमेश्वर होगा।

4     और वह उन की आंखोंसे सब आंसू पोंछ डालेगा; और इस के बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहिली बातें जाती रहीं।

6. Revelation 21 : 1-4

And I saw a new heaven and a new earth: for the first heaven and the first earth were passed away; and there was no more sea.

2     And I John saw the holy city, new Jerusalem, coming down from God out of heaven, prepared as a bride adorned for her husband.

3     And I heard a great voice out of heaven saying, Behold, the tabernacle of God is with men, and he will dwell with them, and they shall be his people, and God himself shall be with them, and be their God.

4     And God shall wipe away all tears from their eyes; and there shall be no more death, neither sorrow, nor crying, neither shall there be any more pain: for the former things are passed away.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 99 : 23-29

सच्ची आध्यात्मिकता की शांत, मजबूत धाराएँ, जिनमें से अभिव्यक्तियाँ स्वास्थ्य, पवित्रता और आत्म-विनाश हैं, मानव अनुभव को गहरा करना चाहिए, जब तक कि भौतिक अस्तित्व की मान्यताओं को एक गंजेपन के रूप में नहीं देखा जाता है, और पाप, बीमारी, और मृत्यु ईश्वरीय आत्मा के वैज्ञानिक प्रदर्शन और परमेश्‍वर के आध्यात्मिक, सिद्ध इंसान को हमेशा के लिए जगह देते हैं।

1. 99 : 23-29

The calm, strong currents of true spirituality, the manifestations of which are health, purity, and self-immolation, must deepen human experience, until the beliefs of material existence are seen to be a bald imposition, and sin, disease, and death give everlasting place to the scientific demonstration of divine Spirit and to God's spiritual, perfect man.

2. 248 : 26-32

हमें विचार में आदर्श मॉडल बनाना चाहिए और उन्हें लगातार देखना चाहिए, या हम उन्हें भव्य और महान जीवन में कभी नहीं उकेरेंगे। निःस्वार्थता, अच्छाई, दया, न्याय, स्वास्थ्य, पवित्रता, प्रेम - स्वर्ग का राज्य - हमारे भीतर राज करो, और पाप, बीमारी, और मृत्यु तब तक कम हो जाएगी जब तक वे अंततः गायब नहीं हो जाते।

2. 248 : 26-32

We must form perfect models in thought and look at them continually, or we shall never carve them out in grand and noble lives. Let unselfishness, goodness, mercy, justice, health, holiness, love — the kingdom of heaven — reign within us, and sin, disease, and death will diminish until they finally disappear.

3. 166 : 23-32

शरीर विज्ञान और स्वच्छता के पालन के माध्यम से स्वास्थ्य को ठीक करने में असफल, निराश व्यक्ति अक्सर उन्हें छोड़ देता है, और अपने चरम में और केवल अंतिम उपाय के रूप में, भगवान की ओर मुड़ता है। परमात्मा के मन में अमान्य विश्वास ड्रग्स, हवा और व्यायाम की तुलना में कम है, या उसने पहले माइंड का सहारा लिया होगा। शक्ति का संतुलन अधिकांश चिकित्सा प्रणालियों द्वारा पदार्थ के साथ होने के लिए माना जाता है; लेकिन जब माइंड अंतिम बार पाप, बीमारी और मृत्यु पर अपनी महारत हासिल करता है, तो मनुष्य सामंजस्यपूर्ण और अमर हो जाता है।

3. 166 : 23-32

Failing to recover health through adherence to physiology and hygiene, the despairing invalid often drops them, and in his extremity and only as a last resort, turns to God. The invalid's faith in the divine Mind is less than in drugs, air, and exercise, or he would have resorted to Mind first. The balance of power is conceded to be with matter by most of the medical systems; but when Mind at last asserts its mastery over sin, disease, and death, then is man found to be harmonious and immortal.

4. 317 : 16-23

मनुष्य का व्यक्तित्व कम मूर्त नहीं है क्योंकि यह आध्यात्मिक है और क्योंकि उसका जीवन पदार्थ की दया पर नहीं है। उनकी आध्यात्मिक व्यक्तित्व की समझ, मनुष्य को सच्चाई में अधिक वास्तविक, अधिक दुर्जेय बनाती है और उसे पाप, बीमारी और मृत्यु पर विजय प्राप्त करने में सक्षम बनाती है। हमारे प्रभु और स्वामी ने कब्र से पुनरुत्थान के बाद अपने शिष्यों को स्वयं को प्रस्तुत किया, जैसा कि स्वयं यीशु ने कलवारी की त्रासदी से पहले किया था।

4. 317 : 16-23

The individuality of man is no less tangible because it is spiritual and because his life is not at the mercy of matter. The understanding of his spiritual individuality makes man more real, more formidable in truth, and enables him to conquer sin, disease, and death. Our Lord and Master presented himself to his disciples after his resurrection from the grave, as the self-same Jesus whom they had loved before the tragedy on Calvary.

5. 494 : 15 (यीशु)-24

यीशु ने शारीरिक शक्ति के साथ-साथ आत्मा की असीम क्षमता की अक्षमता का प्रदर्शन किया, इस प्रकार मानव भावना को अपने स्वयं के दोषों से भागने में मदद करने और दिव्य विज्ञान में सुरक्षा की तलाश करने के लिए। (19th May, 2019. [10. First Paragraph]). कारण, सही ढंग से निर्देशित, कॉर्पोरल सेंस की त्रुटियों को ठीक करने का कार्य करता है; लेकिन पाप, बीमारी और मृत्यु वास्तविक प्रतीत होगी (भले ही सोते हुए सपने के अनुभव वास्तविक लगते हैं) जब तक कि मनुष्य के शाश्वत सद्भाव का विज्ञान वैज्ञानिक की अखंड वास्तविकता के साथ उनके भ्रम को नहीं तोड़ता।

5. 494 : 15 (Jesus)-24

Jesus demonstrated the inability of corporeality, as well as the infinite ability of Spirit, thus helping erring human sense to flee from its own convictions and seek safety in divine Science. Reason, rightly directed, serves to correct the errors of corporeal sense; but sin, sickness, and death will seem real (even as the experiences of the sleeping dream seem real) until the Science of man's eternal harmony breaks their illusion with the unbroken reality of scientific being. 

6. 429 : 31-11

यीशु ने कहा (यूहन्ना 8: 51), "यदि कोई व्यक्ति मेरे वचन पर चलेगा, तो वह अनन्त काल तक मृत्यु को न देखेगा।" यह कथन आध्यात्मिक जीवन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें अस्तित्व की सभी घटनाएं शामिल हैं। यीशु ने यह प्रदर्शित किया, मरते हुए और मृतकों को ऊपर उठाते हुए। नश्वर मन को त्रुटि के साथ भाग लेना चाहिए, अपने कर्मों से खुद को दूर करना चाहिए, और अमर आदर्श मर्दानगी, मसीह आदर्श दिखाई देगा। विश्वास को अपनी सीमाओं को बढ़ाना चाहिए और पदार्थ के बजाय आत्मा पर आराम करके अपने आधार को मजबूत करना चाहिए। जब मनुष्य मृत्यु पर अपना विश्वास छोड़ देता है, तो वह ईश्वर, जीवन और प्रेम की ओर अधिक तेजी से आगे बढ़ेगा। बीमारी और मृत्यु में विश्वास, निश्चित रूप से पाप में विश्वास के रूप में, जीवन और स्वास्थ्य की सही भावना को बंद करने के लिए जाता है।

6. 429 : 31-11

Jesus said (John viii. 51), "If a man keep my saying, he shall never see death." That statement is not confined to spiritual life, but includes all the phenomena of existence. Jesus demonstrated this, healing the dying and raising the dead. Mortal mind must part with error, must put off itself with its deeds, and immortal manhood, the Christ ideal, will appear. Faith should enlarge its borders and strengthen its base by resting upon Spirit instead of matter. When man gives up his belief in death, he will advance more rapidly towards God, Life, and Love. Belief in sickness and death, as certainly as belief in sin, tends to shut out the true sense of Life and health.

7. 543 : 8-16

ईश्वरीय विज्ञान में, भौतिक मनुष्य को ईश्वर की उपस्थिति से बंद कर दिया जाता है। पांच शारीरिक इंद्रियां आत्मा का संज्ञान नहीं ले सकती हैं। वे उसकी उपस्थिति में नहीं आ सकते हैं, और स्वप्नभूमि में निवास करना चाहिए, जब तक कि नश्वर उस भौतिक जीवन को समझने के लिए नहीं पहुंचते, जब तक कि उसके सभी पाप, बीमारी और मृत्यु के साथ, एक भ्रम है, जिसके खिलाफ ईश्वरीय विज्ञान विनाश की लड़ाई में लगा हुआ है। अस्तित्व की महानताओं को कभी भी मिथ्यात्व से बाहर नहीं रखा जाता है।

7. 543 : 8-16

In divine Science, the material man is shut out from the presence of God. The five corporeal senses cannot take cognizance of Spirit. They cannot come into His presence, and must dwell in dreamland, until mortals arrive at the understanding that material life, with all its sin, sickness, and death, is an illusion, against which divine Science is engaged in a warfare of extermination. The great verities of existence are never excluded by falsity.

8. 395 : 6-14

महान एग्जम्पलर की तरह, मरहम लगाने वाले को बीमारी के बारे में बोलना चाहिए, क्योंकि आत्मा को कॉरपोरेट इंद्रियों के झूठे सबूतों को साबित करने और मृत्यु दर और बीमारी पर अपने दावों को साबित करने के लिए छोड़ देना चाहिए। एक ही सिद्धांत पाप और बीमारी दोनों को ठीक करता है। जब दैवीय विज्ञान एक कार्तिक मन में विश्वास को खत्म कर देता है, और भगवान में विश्वास पाप में और उपचार के भौतिक तरीकों में सभी विश्वासों को नष्ट कर देता है, तो पाप, बीमारी और मृत्यु गायब हो जाएगी।

8. 395 : 6-14

Like the great Exemplar, the healer should speak to disease as one having authority over it, leaving Soul to master the false evidences of the corporeal senses and to assert its claims over mortality and disease. The same Principle cures both sin and sickness. When divine Science overcomes faith in a carnal mind, and faith in God destroys all faith in sin and in material methods of healing, then sin, disease, and death will disappear.

9. 253 : 9-17

मुझे आशा है, प्रिय पाठक, मैं आपके दिव्य अधिकारों, आपके स्वर्ग-सद्भाव सद्भाव की समझ में अग्रणी हूं, — जैसा कि आप पढ़ते हैं, आप देखते हैं कि कोई कारण नहीं है (ग़लती से, भौतिक अर्थ जो शक्ति नहीं है) आपको बीमार या पापी बनाने में सक्षम है; और मुझे आशा है कि आप इस झूठे अर्थ पर विजय प्राप्त कर रहे हैं। तथाकथित भौतिक अर्थों के मिथ्यात्व को जानने के बाद, आप पाप, बीमारी या मृत्यु में विश्वास को दूर करने के लिए अपने विशेषाधिकार का दावा कर सकते हैं।

9. 253 : 9-17

I hope, dear reader, I am leading you into the understanding of your divine rights, your heaven-bestowed harmony, — that, as you read, you see there is no cause (outside of erring, mortal, material sense which is not power) able to make you sick or sinful; and I hope that you are conquering this false sense. Knowing the falsity of so-called material sense, you can assert your prerogative to overcome the belief in sin, disease, or death.

10. 572 : 19-25

प्रकाशित वाक्य 21: 1 में हमने पढ़ा:

फिर मैं ने नये आकाश और नयी पृथ्वी को देखा, क्योंकि पहिला आकाश और पहिली पृथ्वी जाती रही थी, और समुद्र भी न रहा।

पुनरुत्थानवादी ने मृत्यु नामक मानव अनुभव में अभी तक संक्रमणकालीन चरण को पारित नहीं किया था, लेकिन उसने पहले ही एक नया स्वर्ग और एक नई पृथ्वी देखी।

10. 572 : 19-25

In Revelation xxi. 1 we read: —

And I saw a new heaven and a new earth: for the first heaven and the first earth were passed away; and there was no more sea.

The Revelator had not yet passed the transitional stage in human experience called death, but he already saw a new heaven and a new earth.

11. 573 : 19 (St.)-2

क्योंकि स्वर्ग और पृथ्वी के सेंट जॉन के प्रति शत्रुता गायब हो गई थी, और इस झूठे अर्थ के स्थान पर आध्यात्मिक भावना थी, व्यक्तिपरक स्थिति जिसके द्वारा वह नए स्वर्ग और नई पृथ्वी को देख सकता था, जिसमें आध्यात्मिक विचार और वास्तविकता की चेतना शामिल है । यह निष्कर्ष निकालने के लिए शास्त्र सम्मत अधिकार है कि इस अस्तित्व की वर्तमान स्थिति में पुरुषों के लिए यह संभव है, और - यह कि हम यहाँ, और अब, मृत्यु, दुःख और पीड़ा के निवारण के लिए सचेत हो सकते हैं। यह वास्तव में पूर्ण क्रिश्चियन साइंस का पूर्वज है। दिल थाम लो, प्रिय पीड़ित, इस वास्तविकता के लिए निश्चित रूप से कुछ समय में और किसी तरह दिखाई देगा। अधिक दर्द नहीं होगा, और सभी आँसू मिटा दिए जाएंगे। जब आप इसे पढ़ते हैं, तो यीशु के शब्दों को याद रखें, “का राज्य तुम्हारे बीच में है॥” यह आध्यात्मिक चेतना इसलिए एक वर्तमान संभावना है।

11. 573 : 19 (St.)-2

St. John's corporeal sense of the heavens and earth had vanished, and in place of this false sense was the spiritual sense, the subjective state by which he could see the new heaven and new earth, which involve the spiritual idea and consciousness of reality. This is Scriptural authority for concluding that such a recognition of being is, and has been, possible to men in this present state of existence, — that we can become conscious, here and now, of a cessation of death, sorrow, and pain. This is indeed a foretaste of absolute Christian Science. Take heart, dear sufferer, for this reality of being will surely appear sometime and in some way. There will be no more pain, and all tears will be wiped away. When you read this, remember Jesus' words, "The kingdom of God is within you." This spiritual consciousness is therefore a present possibility.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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