रविवार 12 सितंबर, 2021



विषयविषय — पदार्थ

SubjectSubstance

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: नीतिवचन 3 : 9

"अपनी संपत्ति के द्वारा और अपनी भूमि की पहिली उपज दे देकर यहोवा की प्रतिष्ठा करना"



Golden Text: Proverbs 3 : 9

Honour the Lord with thy substance, and with the firstfruits of all thine increase.




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उत्तरदायी अध्ययन: भजन संहिता 37: 3, 4, 16, 18, 26, 29


3     यहोवा पर भरोसा रख, और भला कर; देश में बसा रह, और सच्चाई में मन लगाए रह।

4     यहोवा को अपने सुख का मूल जान, और वह तेरे मनोरथों को पूरा करेगा॥

16     धर्मी का थोड़ा से माल दुष्टों के बहुत से धन से उत्तम है।

18     यहोवा खरे लोगों की आयु की सुधि रखता है, और उनका भाग सदैव बना रहेगा।

26     वह तो दिन भर अनुग्रह कर करके ऋण देता है, और उसके वंश पर आशीष फलती रहती है॥

29     धर्मी लोग पृथ्वी के अधिकारी होंगे, और उस में सदा बसे रहेंगे॥

Responsive Reading: Psalm 37 : 3, 4, 16, 18, 26, 29

3.     Trust in the Lord, and do good; so shalt thou dwell in the land, and verily thou shalt be fed.

4.     Delight thyself also in the Lord; and he shall give thee the desires of thine heart.

16.     A little that a righteous man hath is better than the riches of many wicked.

18.     The Lord knoweth the days of the upright: and their inheritance shall be for ever.

26.     He is ever merciful, and lendeth; and his seed is blessed.

29.     The righteous shall inherit the land, and dwell therein for ever.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. यिर्मयाह 9: 23, 24

23     यहोवा यों कहता है, बुद्धिमान अपनी बुद्धि पर घमण्ड न करे, न वीर अपनी वीरता पर, न धनी अपने धन पर घमण्ड करे;

24     परन्तु जो घमण्ड करे वह इसी बात पर घमण्ड करे, कि वह मुझे जानता और समझता हे, कि मैं ही वह यहोवा हूँ, जो पृथ्वी पर करुणा, न्याय और धर्म के काम करता है; क्योंकि मैं इन्हीं बातों से प्रसन्न रहता हूँ।

1. Jeremiah 9 : 23, 24

23     Thus saith the Lord, Let not the wise man glory in his wisdom, neither let the mighty man glory in his might, let not the rich man glory in his riches:

24     But let him that glorieth glory in this, that he understandeth and knoweth me, that I am the Lord which exercise lovingkindness, judgment, and righteousness, in the earth: for in these things I delight, saith the Lord.

2. उत्पत्ति 13 : 1 (अब्राहम), 2, 5-12, 14-18

1     तब अब्राम अपनी पत्नी, और अपनी सारी सम्पत्ति ले कर, लूत को भी संग लिये हुए, मिस्र को छोड़ कर कनान के दक्खिन देश में आया।

2     अब्राम भेड़-बकरी, गाय-बैल, और सोने-रूपे का बड़ा धनी था।

5     और लूत के पास भी, जो अब्राम के साथ चलता था, भेड़-बकरी, गाय-बैल, और तम्बू थे।

6     सो उस देश में उन दोनों की समाई न हो सकी कि वे इकट्ठे रहें: क्योंकि उनके पास बहुत धन था इसलिये वे इकट्ठे न रह सके।

7     सो अब्राम, और लूत की भेड़-बकरी, और गाय-बैल के चरवाहों के बीच में झगड़ा हुआ: और उस समय कनानी, और परिज्जी लोग, उस देश में रहते थे।

8     तब अब्राम लूत से कहने लगा, मेरे और तेरे बीच, और मेरे और तेरे चरवाहों के बीच में झगड़ा न होने पाए; क्योंकि हम लोग भाई बन्धु हैं।

9     क्या सारा देश तेरे साम्हने नहीं? सो मुझ से अलग हो, यदि तू बाईं ओर जाए तो मैं दाहिनी ओर जाऊंगा; और यदि तू दाहिनी ओर जाए तो मैं बाईं ओर जाऊंगा।

10     तब लूत ने आंख उठा कर, यरदन नदी के पास वाली सारी तराई को देखा, कि वह सब सिंची हुई है। जब तक यहोवा ने सदोम और अमोरा को नाश न किया था, तब तक सोअर के मार्ग तक वह तराई यहोवा की बाटिका, और मिस्र देश के समान उपजाऊ थी।

11     सो लूत अपने लिये यरदन की सारी तराई को चुन के पूर्व की ओर चला, और वे एक दूसरे से अलग हो गए।

12     अब्राम तो कनान देश में रहा, पर लूत उस तराई के नगरों में रहने लगा; और अपना तम्बू सदोम के निकट खड़ा किया।

14     जब लूत अब्राम से अलग हो गया तब उसके पश्चात यहोवा ने अब्राम से कहा, आंख उठा कर जिस स्थान पर तू है वहां से उत्तर-दक्खिन, पूर्व-पश्चिम, चारों ओर दृष्टि कर।

15     क्योंकि जितनी भूमि तुझे दिखाई देती है, उस सब को मैं तुझे और तेरे वंश को युग युग के लिये दूंगा।

16     और मैं तेरे वंश को पृथ्वी की धूल के किनकों की नाईं बहुत करूंगा, यहां तक कि जो कोई पृथ्वी की धूल के किनकों को गिन सकेगा वही तेरा वंश भी गिन सकेगा।

17     उठ, इस देश की लम्बाई और चौड़ाई में चल फिर; क्योंकि मैं उसे तुझी को दूंगा।

18     इसके पशचात् अब्राम अपना तम्बू उखाड़ कर, माम्रे के बांजों के बीच जो हेब्रोन में थे जा कर रहने लगा, और वहां भी यहोवा की एक वेदी बनाई॥

2. Genesis 13 : 1 (Abram), 2, 5-12, 14-18

1     Abram went up out of Egypt, he, and his wife, and all that he had, and Lot with him, into the south.

2     And Abram was very rich in cattle, in silver, and in gold.

5     And Lot also, which went with Abram, had flocks, and herds, and tents.

6     And the land was not able to bear them, that they might dwell together: for their substance was great, so that they could not dwell together.

7     And there was a strife between the herdmen of Abram’s cattle and the herdmen of Lot’s cattle: and the Canaanite and the Perizzite dwelled then in the land.

8     And Abram said unto Lot, Let there be no strife, I pray thee, between me and thee, and between my herdmen and thy herdmen; for we be brethren.

9     Is not the whole land before thee? separate thyself, I pray thee, from me: if thou wilt take the left hand, then I will go to the right; or if thou depart to the right hand, then I will go to the left.

10     And Lot lifted up his eyes, and beheld all the plain of Jordan, that it was well watered every where, before the Lord destroyed Sodom and Gomorrah, even as the garden of the Lord, like the land of Egypt, as thou comest unto Zoar.

11     Then Lot chose him all the plain of Jordan; and Lot journeyed east: and they separated themselves the one from the other.

12     Abram dwelled in the land of Canaan, and Lot dwelled in the cities of the plain, and pitched his tent toward Sodom.

14     And the Lord said unto Abram, after that Lot was separated from him, Lift up now thine eyes, and look from the place where thou art northward, and southward, and eastward, and westward:

15     For all the land which thou seest, to thee will I give it, and to thy seed for ever.

16     And I will make thy seed as the dust of the earth: so that if a man can number the dust of the earth, then shall thy seed also be numbered.

17     Arise, walk through the land in the length of it and in the breadth of it; for I will give it unto thee.

18     Then Abram removed his tent, and came and dwelt in the plain of Mamre, which is in Hebron, and built there an altar unto the Lord.

3. 1 कुरिन्थियों 3 : 6, 7

6     मैं ने लगाया, अपुल्लोस ने सींचा, परन्तु परमेश्वर ने बढ़ाया।

7     इसलिये न तो लगाने वाला कुछ है, और न सींचने वाला, परन्तु परमेश्वर जो बढ़ाने वाला है।

3. I Corinthians 3 : 6, 7

6     I have planted, Apollos watered; but God gave the increase.

7     So then neither is he that planteth any thing, neither he that watereth; but God that giveth the increase.

4. 2 इतिहास 31 : 2 (हिजकिय्याह)-8

2     और हिजकिय्याह ने याजकों के दलों को और लेवियों को वरन याजकों और लेवियों दोनों को, प्रति दल के अनुसार और एक एक मनुष्य को उसकी सेवकाई के अनुसार इसलिये ठहरा दिया, कि वे यहोवा की छावनी के द्वारों के भीतर होमबलि, मेलबलि, सेवा टहल, धन्यवाद और स्तुति किया करें।

3     फिर उसने अपनी सम्पत्ति में से राजभाषा को होमबलियों के लिये ठहरा दिया; अर्थात सवेरे और सांझ की होमबलि और विश्राम और नये चांद के दिनों और नियत समयों की होमबलि के लिये जैसा कि यहोवा की व्यवस्था में लिखा है।

4     और उसने यरूशलेम में रहने वालों को याजकों और लेवियों को उनका भाग देने की आज्ञा दी, ताकि वे यहोवा की व्यवस्था के काम मन लगा कर कर सकें।

5     यह आज्ञा सुनते ही इस्राएली अन्न, नया दाखमधु, टटका तेल, मधु आादि खेती की सब भांति की पहिली उपज बहुतायत से देने, और सब वस्तुओं का दशमांश अधिक मात्रा में लाने लगे।

6     और जो इस्राएली और यहूदी, यहूदा के नगरों में रहते थे, वे भी बैलों और भेड़-बकरियों का दशमांश, और उन पवित्र वस्तुओं का दशमांश, जो उनके परमेश्वर यहोवा के निमित्त पवित्र की गई थीं, लाकर ढेर ढेर कर के रखने लगे।

7     इस प्रकार ढेर का लगाना उन्होंने तीसरे महीने में आरम्भ किया और सातवें महीने में पूरा किया।

8     जब हिजकिय्याह और हाकिमों ने आ कर उन ढेरों को देखा, तब यहोवा को और उसकी प्रजा इस्राएल को धन्य धन्य कहा।

4. II Chronicles 31 : 2 (Hezekiah)-8

2 Hezekiah appointed the courses of the priests and the Levites after their courses, every man according to his service, the priests and Levites for burnt offerings and for peace offerings, to minister, and to give thanks, and to praise in the gates of the tents of the Lord.

3     He appointed also the king’s portion of his substance for the burnt offerings, to wit, for the morning and evening burnt offerings, and the burnt offerings for the sabbaths, and for the new moons, and for the set feasts, as it is written in the law of the Lord.

4     Moreover he commanded the people that dwelt in Jerusalem to give the portion of the priests and the Levites, that they might be encouraged in the law of the Lord.

5     And as soon as the commandment came abroad, the children of Israel brought in abundance the firstfruits of corn, wine, and oil, and honey, and of all the increase of the field; and the tithe of all things brought they in abundantly.

6     And concerning the children of Israel and Judah, that dwelt in the cities of Judah, they also brought in the tithe of oxen and sheep, and the tithe of holy things which were consecrated unto the Lord their God, and laid them by heaps.

7     In the third month they began to lay the foundation of the heaps, and finished them in the seventh month.

8     And when Hezekiah and the princes came and saw the heaps, they blessed the Lord, and his people Israel.

5. 1 तीमुथियुस 6 : 17-19

17     इस संसार के धनवानों को आज्ञा दे, कि वे अभिमानी न हों और चंचल धन पर आशा न रखें, परन्तु परमेश्वर पर जो हमारे सुख के लिये सब कुछ बहुतायत से देता है।

18     और भलाई करें, और भले कामों में धनी बनें, और उदार और सहायता देने में तत्पर हों।

19     और आगे के लिये एक अच्छी नेव डाल रखें, कि सत्य जीवन को वश में कर लें॥

5. I Timothy 6 : 17-19

17     Charge them that are rich in this world, that they be not highminded, nor trust in uncertain riches, but in the living God, who giveth us richly all things to enjoy;

18     That they do good, that they be rich in good works, ready to distribute, willing to communicate;

19     Laying up in store for themselves a good foundation against the time to come, that they may lay hold on eternal life.

6. 2 कुरिन्थियों 9: 6-11

6     परन्तु बात तो यह है, कि जो थोड़ा बोता है वह थोड़ा काटेगा भी; और जो बहुत बोता है, वह बहुत काटेगा।

7     हर एक जन जैसा मन में ठाने वैसा ही दान करे न कुढ़ कुढ़ के, और न दबाव से, क्योंकि परमेश्वर हर्ष से देने वाले से प्रेम रखता है।

8     और परमेश्वर सब प्रकार का अनुग्रह तुम्हें बहुतायत से दे सकता है जिस से हर बात में और हर समय, सब कुछ, जो तुम्हें आवश्यक हो, तुम्हारे पास रहे, और हर एक भले काम के लिये तुम्हारे पास बहुत कुछ हो।

9     जेसा लिखा है, उस ने बिथराया, उस ने कंगालों को दान दिया, उसका धर्म सदा बना रहेगा।

10     सो जो बोने वाले को बीज, और भोजन के लिये रोटी देता है वह तुम्हें बीज देगा, और उसे फलवन्त करेगा; और तुम्हारे धर्म के फलों को बढ़ाएगा।

11     कि तुम हर बात में सब प्रकार की उदारता के लिये जो हमारे द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद करवाती है, धनवान किए जाओ।

6. II Corinthians 9 : 6-11

6     But this I say, He which soweth sparingly shall reap also sparingly; and he which soweth bountifully shall reap also bountifully.

7     Every man according as he purposeth in his heart, so let him give; not grudgingly, or of necessity: for God loveth a cheerful giver.

8     And God is able to make all grace abound toward you; that ye, always having all sufficiency in all things, may abound to every good work:

9     (As it is written, He hath dispersed abroad; he hath given to the poor: his righteousness remaineth for ever.

10     Now he that ministereth seed to the sower both minister bread for your food, and multiply your seed sown, and increase the fruits of your righteousness;)

11     Being enriched in every thing to all bountifulness, which causeth through us thanksgiving to God.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 468 : 17 (पदार्थ)-24

पदार्थ वह है जो अनादि है और कलह और क्षय से असमर्थ है। सत्य, जीवन और प्रेम पदार्थ हैं, क्योंकि इब्रानियों में इस शब्द का उपयोग होता है: “विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है।" आत्मा, मन, आत्मा या ईश्वर का पर्यायवाची एकमात्र वास्तविक पदार्थ है। व्यक्ति सहित आध्यात्मिक ब्रह्मांड, एक यौगिक विचार है, वह आत्मा के दिव्य पदार्थ को दर्शाता है।

1. 468 : 17 (Substance)-24

Substance is that which is eternal and incapable of discord and decay. Truth, Life, and Love are substance, as the Scriptures use this word in Hebrews: "The substance of things hoped for, the evidence of things not seen." Spirit, the synonym of Mind, Soul, or God, is the only real substance. The spiritual universe, including individual man, is a compound idea, reflecting the divine substance of Spirit.

2. 469 : 2-3

जिसे पदार्थ कहा जाता है वह आत्मा के लिए अज्ञात है, जो अपने आप में सभी पदार्थों को शामिल करता है और जीवन शाश्वत है।

2. 469 : 2-3

What is termed matter is unknown to Spirit, which includes in itself all substance and is Life eternal.

3. 278 : 28-3

जिसे हम पाप, बीमारी और मृत्यु कहते हैं, वह नश्वर विश्वास है। हम सामग्री को त्रुटि के रूप में परिभाषित करते हैं, क्योंकि यह जीवन, पदार्थ और बुद्धि के विपरीत है। यदि आत्मा पर्याप्त और शाश्वत है, तो पदार्थ, उसकी मृत्यु दर के साथ, पर्याप्त नहीं हो सकता। हमारे लिए कौन सा पदार्थ होना चाहिए, — ग़लती से, बदलते हुए, परिवर्तनशील और नश्वर, या बेरोकटोक, अपरिवर्तनीय और अमर चीज़?

3. 278 : 28-3

All that we term sin, sickness, and death is a mortal belief. We define matter as error, because it is the opposite of life, substance, and intelligence. Matter, with its mortality, cannot be substantial if Spirit is substantial and eternal. Which ought to be substance to us, — the erring, changing, and dying, the mutable and mortal, or the unerring, immutable, and immortal?

4. 311 : 26-7

भौतिक इंद्रियों द्वारा पहचानी गई वस्तुओं में पदार्थ की वास्तविकता नहीं है। वे केवल वही हैं जो नश्वर विश्वास उन्हें कहते हैं। पदार्थ, पाप और मृत्यु दर जीवन या अस्तित्व के लिए सभी कथित चेतना या दावे खो देते हैं जब नश्वर जीवन, पदार्थ और बुद्धिमत्ता की झूठी भावना को दूर करते हैं लेकिन आध्यात्मिक, अनन्त मनुष्य को मृत्यु के इन चरणों से नहीं छुआ जाता है।

यह कितना अद्भुत है कि भौतिक ज्ञान के माध्यम से जो कुछ भी सीखा जाता है उसे खोना चाहिए क्योंकि इस तरह के तथाकथित ज्ञान विज्ञान में होने के आध्यात्मिक तथ्यों से उलट है। जिसे भौतिक अर्थ अमूर्त कहता है, वह पदार्थ कहलाता है। जो भौतिक अर्थों में पदार्थ लगता है, वह शून्य हो जाता है, क्योंकि इंद्रिय-स्वप्न लुप्त हो जाता है और वास्तविकता प्रकट होती है।

4. 311 : 26-7

The objects cognized by the physical senses have not the reality of substance. They are only what mortal belief calls them. Matter, sin, and mortality lose all supposed consciousness or claim to life or existence, as mortals lay off a false sense of life, substance, and intelligence. But the spiritual, eternal man is not touched by these phases of mortality.

How true it is that whatever is learned through material sense must be lost because such so-called knowledge is reversed by the spiritual facts of being in Science. That which material sense calls intangible, is found to be substance. What to material sense seems substance, becomes nothingness, as the sense-dream vanishes and reality appears.

5. 458 : 32-8

जैसा कि फूल अंधकार से प्रकाश की ओर जाता है, ईसाई धर्म पुरुषों को आत्मा से पदार्थ की ओर मुड़ने का कारण बनता है। मनुष्य फिर उन चीजों को नियुक्त करता है जो “आँख ने देखा नहीं और न ही कानों ने सुना।” पॉल और जॉन को स्पष्ट आशंका थी कि नश्वर मनुष्य बलिदान के बिना सांसारिक सम्मान प्राप्त नहीं करता है, उसी तरह उसे सारी दुनिया को त्यागकर स्वर्गीय धन प्राप्त करना चाहिए। तब उसके पास दुनियादारी के उद्देश्य, उद्देश्य और साधन के साथ कुछ भी सामान्य नहीं होगा।

5. 458 : 32-8

Christianity causes men to turn naturally from matter to Spirit, as the flower turns from darkness to light. Man then appropriates those things which "eye hath not seen nor ear heard." Paul and John had a clear apprehension that, as mortal man achieves no worldly honors except by sacrifice, so he must gain heavenly riches by forsaking all worldliness. Then he will have nothing in common with the worldling’s affections, motives, and aims.

6. 252 : 15-23 (to .), 31-8

भौतिक बोध के झूठे प्रमाण आत्मा की गवाही के साथ विपरीत रूप से विरोधाभासी हैं। भौतिक बोध, वास्तविकता के अहंकार के साथ अपनी आवाज बुलंद करता है और कहता है:

मैं पूरी तरह से बेईमान हूं, और कोई भी आदमी इसे नहीं जानता है। मैं धोखा दे सकता हूं, झूठ बोल सकता हूं, व्यभिचार कर सकता हूं, लूट सकता हूं, हत्या कर सकता हूं, और मैंने चिकनी-चुपड़ी खलनायकी का पता लगाया। प्रवृत्ति में पशु, भावना में धोखा, उद्देश्य में कपट मेरा मतलब है कि मेरे जीवन की छोटी अवधि को एक पर्व दिन बनाना है।

विपरीत गवाही देते हुए आत्मा कहती है:

मैं आत्मा हूं। मनुष्य, जिसकी इंद्रियाँ आध्यात्मिक हैं, मेरी समानता है। वह अनंत समझ को दर्शाता है, क्योंकि मैं अनंत हूं। पवित्रता की सुंदरता, होने की पूर्णता, अविनाशी महिमा, — सभी मेरे हैं, क्योंकि मैं भगवान हूं। मैं मनुष्य को अमरता देता हूं, क्योंकि मैं सत्य हूं। मैं सभी आनंद प्रदान करता हूं और उन्हें शामिल करता हूं, क्योंकि मैं प्रेम हूं। मैं जीवन देता हूं, बिना शुरुआत और बिना अंत के, क्योंकि मैं जीवन हूं। मैं सर्वोच्च हूं और सभी को देता हूं, क्योंकि मैं माइंड हूं। मैं सब का पदार्थ हूं, क्योंकि मैं जो हूं सो हूं.

6. 252 : 15-23 (to .), 31-8

The false evidence of material sense contrasts strikingly with the testimony of Spirit. Material sense lifts its voice with the arrogance of reality and says:

I am wholly dishonest, and no man knoweth it. I can cheat, lie, commit adultery, rob, murder, and I elude detection by smooth-tongued villainy. Animal in propensity, deceitful in sentiment, fraudulent in purpose, I mean to make my short span of life one gala day.

Spirit, bearing opposite testimony, saith:

I am Spirit. Man, whose senses are spiritual, is my likeness. He reflects the infinite understanding, for I am Infinity. The beauty of holiness, the perfection of being, imperishable glory, — all are Mine, for I am God. I give immortality to man, for I am Truth. I include and impart all bliss, for I am Love. I give life, without beginning and without end, for I am Life. I am supreme and give all, for I am Mind. I am the substance of all, because I am that I am.

7. 450 : 27-4

वह कौन है जिसने जीवन, पदार्थ और बुद्धिमत्ता में खतरनाक मान्यताओं को ईश्वर से अलग कर दिया है, और यह कह सकता है कि विश्वास की कोई त्रुटि नहीं है? पशु चुंबकत्व के दावे को जानते हुए, कि सभी बुराई जीवन, पदार्थ, और बुद्धि के विश्वास में जोड़ती है, बिजली, पशु प्रकृति, और जैविक जीवन, कौन इस बात से इंकार करेगा कि ये गलतियाँ हैं जो सत्य को सत्यानाश कर देंगी?

ईसाई वैज्ञानिकों को भौतिक दुनिया से बाहर आने और अलग होने के लिए धर्मत्यागी आदेश के निरंतर दबाव में रहना चाहिए।

7. 450 : 27-4

Who, that has felt the perilous beliefs in life, substance, and intelligence separated from God, can say that there is no error of belief? Knowing the claim of animal magnetism, that all evil combines in the belief of life, substance, and intelligence in matter, electricity, animal nature, and organic life, who will deny that these are the errors which Truth must and will annihilate? Christian Scientists must live under the constant pressure of the apostolic command to come out from the material world and be separate.

8. 239 : 5-10, 16-22

धन, प्रसिद्धि और सामाजिक संगठनों को दूर करें, जो भगवान के संतुलन में एक भी वजन नहीं करते हैं, तब हमें सिद्धांत के स्पष्ट विचार मिलते हैं। गुटबंदी तोड़ो, ईमानदारी के साथ धन कमाओ, ज्ञान के अनुसार न्याय करने दो, फिर हमें मानवता के बारे में बेहतर विचार मिलेंगे।

अपनी प्रगति का पता लगाने के लिए, हमें यह सीखना चाहिए कि हमारे साथ हमारे संबंध किससे हैं और हम किसको स्वीकार करते हैं और ईश्वर के रूप में मानते हैं। यदि ईश्वरीय प्रेम निकट, प्रिय, और अधिक वास्तविक होता जा रहा है, तब पदार्थ आत्मा को सौंप रहा है। जिन वस्तुओं का हम अनुसरण करते हैं और जो आत्मा हम प्रकट करते हैं वह हमारे दृष्टिकोण को प्रकट करती है, और दिखाते हैं कि हम क्या जीत रहे हैं।

8. 239 : 5-10, 16-22

Take away wealth, fame, and social organizations, which weigh not one jot in the balance of God, and we get clearer views of Principle. Break up cliques, level wealth with honesty, let worth be judged according to wisdom, and we get better views of humanity.

To ascertain our progress, we must learn where our affections are placed and whom we acknowledge and obey as God. If divine Love is becoming nearer, dearer, and more real to us, matter is then submitting to Spirit. The objects we pursue and the spirit we manifest reveal our standpoint, and show what we are winning.

9. 518 : 15-21

सभी को एक ही सिद्धांत, या पिता, को एक भव्य भाईचारे में रखते हुए, आत्मा में समृद्ध गरीबों की मदद करते हैं। और धन्य है वह आदमी जो दूसरे की भलाई में अपनी भलाई जानता है, अपने भाई की आवश्यकता को देखता है और उसकी आपूर्ति करता है। प्रेम कमजोर आध्यात्मिक को, अमरता, और अच्छाई देता है, जो सभी के माध्यम से चमकता है जैसे कि कली के माध्यम से खिलता है।

9. 518 : 15-21

The rich in spirit help the poor in one grand brotherhood, all having the same Principle, or Father; and blessed is that man who seeth his brother's need and supplieth it, seeking his own in another's good. Love giveth to the least spiritual idea might, immortality, and goodness, which shine through all as the blossom shines through the bud.

10. 21 : 9-14

यदि शिष्य आध्यात्मिक रूप से आगे बढ़ रहा है, तो वह अंदर प्रवेश करने का प्रयास कर रहा है। वह भौतिक दृष्टि से लगातार दूर होता जाता है, और आत्मा की अपूर्ण चीजों की ओर देखता है यदि वह ईमानदार है, तो वह शुरू से ही सबसे अधिक लाभ में रहेगा, और जब तक वह खुशी के साथ अपना कोर्स पूरा नहीं कर लेता, तब तक वह हर दिन सही दिशा में थोड़ा-थोड़ा हासिल करेगा।

10. 21 : 9-14

If the disciple is advancing spiritually, he is striving to enter in. He constantly turns away from material sense, and looks towards the imperishable things of Spirit. If honest, he will be in earnest from the start, and gain a little each day in the right direction, till at last he finishes his course with joy.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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