रविवार 12 मार्च, 2023



विषयपदार्थ

SubjectSubstance

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: मत्ती 6: 33

"पहिले तुम उसे राज्य और धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएं भी तुम्हें मिल जाएंगी।"



Golden Text: Matthew 6 : 33

Seek ye first the kingdom of God, and his righteousness; and all these things shall be added unto you.




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उत्तरदायी अध्ययन: व्यवस्थाविवरण 8: 1-4 • व्यवस्थाविवरण 33: 11, 25, 27


1     जोजो आज्ञा मैं आज तुझे सुनाता हूं उन सभों पर चलने की चौकसी करना, इसलिये कि तुम जीवित रहो और बढ़ते रहो, और जिस देश के विषय में यहोवा ने तुम्हारे पूर्वजों से शपथ खाई है उस में जा कर उसके अधिकारी हो जाओ।

2     और स्मरण रख कि तेरा परमेश्वर यहोवा उन चालीस वर्षों में तुझे सारे जंगल के मार्ग में से इसलिये ले आया है, कि वह तुझे नम्र बनाए, और तेरी परीक्षा करके यह जान ले कि तेरे मन में क्या क्या है, और कि तू उसकी आज्ञाओं का पालन करेगा वा नहीं।

3     उसने तुझ को नम्र बनाया, और भूखा भी होने दिया, फिर वह मन्ना, जिसे न तू और न तेरे पुरखा ही जानते थे, वही तुझ को खिलाया; इसलिये कि वह तुझ को सिखाए कि मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं जीवित रहता, परन्तु जो जो वचन यहोवा के मुंह से निकलते हैं उन ही से वह जीवित रहता है।

4     इन चालीस वर्षों में तेरे वस्त्र पुराने न हुए, और तेरे तन से भी नहीं गिरे, और न तेरे पांव फूले।

11     हे यहोवा, उसकी सम्पत्ति पर आशीष दे, और उसके हाथों की सेवा को ग्रहण कर॥

25     तेरे जूते लोहे और पीतल के होंगे, और जैसे तेरे दिन वैसी ही तेरी शक्ति हो॥

27     अनादि परमेश्वर तेरा गृहधाम है, और नीचे सनातन भुजाएं हैं।

Responsive Reading: Deuteronomy 8 : 1-4Deuteronomy 33 : 11, 25, 27

1.     All the commandments which I command thee this day shall ye observe to do, that ye may live, and multiply, and go in and possess the land which the Lord sware unto your fathers.

2.     And thou shalt remember all the way which the Lord thy God led thee these forty years in the wilderness, to humble thee, and to prove thee, to know what was in thine heart, whether thou wouldest keep his commandments, or no.

3.     And suffered thee to hunger, and fed thee with manna, which thou knewest not, neither did thy fathers know; that he might make thee know that man doth not live by bread only, but by every word that proceedeth out of the mouth of the Lord doth man live.

4.     Thy raiment waxed not old upon thee, neither did thy foot swell, these forty years.

11.     Bless, Lord, his substance, and accept the work of his hands.

25.     Thy shoes shall be iron and brass; and as thy days, so shall thy strength be.

27.     The eternal God is thy refuge, and underneath are the everlasting arms.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 37: 5 (से 2nd ;), 6, 23, 39 (मोक्ष)

5     अपने मार्ग की चिन्ता यहोवा पर छोड़; और उस पर भरोसा रख, वही पूरा करेगा।

6     और वह तेरा धर्म ज्योति की नाईं, और तेरा न्याय दोपहर के उजियाले की नाईं प्रगट करेगा॥

23     मनुष्य की गति यहोवा की ओर से दृढ़ होती है, और उसके चलन से वह प्रसन्न रहता है;

39     ... धर्मियों की मुक्ति यहोवा की ओर से होती है; संकट के समय वह उनका दृढ़ गढ़ है।

1. Psalm 37 : 5 (to 2nd ;), 6, 23, 39 (the salvation)

5     Commit thy way unto the Lord; trust also in him;

6     And he shall bring forth thy righteousness as the light, and thy judgment as the noonday.

23     The steps of a good man are ordered by the Lord: and he delighteth in his way.

39     …the salvation of the righteous is of the Lord: he is their strength in the time of trouble.

2. व्यवस्थाविवरण 1: 1 (मूसा) (से इजराइल)

1     ... मूसा ने सारे इस्राएल से कहा...

2. Deuteronomy 1 : 1 (Moses) (to Israel)

1     …Moses spake unto all Israel…

3. व्यवस्थाविवरण 10: 12 (क्या)-13

12     ... तेरा परमेश्वर यहोवा तुझ से इसके सिवाय और क्या चाहता है, कि तू अपने परमेश्वर यहोवा का भय मानें, और उसके सारे मार्गों पर चले, उस से प्रेम रखे, और अपने पूरे मन और अपने सारे प्राण से उसकी सेवा करे,

13     और यहोवा की जो जो आज्ञा और विधि मैं आज तुझे सुनाता हूं उन को ग्रहण करे, जिस से तेरा भला हो?

3. Deuteronomy 10 : 12 (what)-13

12     …what doth the Lord thy God require of thee, but to fear the Lord thy God, to walk in all his ways, and to love him, and to serve the Lord thy God with all thy heart and with all thy soul,

13     To keep the commandments of the Lord, and his statutes, which I command thee this day for thy good?

4. नीतिवचन 3: 9, 10

9     अपनी संपत्ति के द्वारा और अपनी भूमि की पहिली उपज दे देकर यहोवा की प्रतिष्ठा करना;

10     इस प्रकार तेरे खत्ते भरे और पूरे रहेंगे, और तेरे रसकुण्डोंसे नया दाखमधु उमण्डता रहेगा॥

4. Proverbs 3 : 9, 10

9     Honour the Lord with thy substance, and with the firstfruits of all thine increase:

10     So shall thy barns be filled with plenty, and thy presses shall burst out with new wine.

5. मत्ती 4: 23

23     और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उन की सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बल्ता को दूर करता रहा।

5. Matthew 4 : 23

23     And Jesus went about all Galilee, teaching in their synagogues, and preaching the gospel of the kingdom, and healing all manner of sickness and all manner of disease among the people.

6. मत्ती 5: 2

2     और वह अपना मुंह खोलकर उन्हें यह उपदेश देने लगा,

6. Matthew 5 : 2

2     And he opened his mouth, and taught them, saying,

7. मत्ती 6: 19-21, 24, 25 (करना), 32-34 (से 1st .)

19     अपने लिये पृथ्वी पर धन इकट्ठा न करो; जहां कीड़ा और काई बिगाड़ते हैं, और जहां चोर सेंध लगाते और चुराते हैं।

20     परन्तु अपने लिये स्वर्ग में धन इकट्ठा करो, जहां न तो कीड़ा, और न काई बिगाड़ते हैं, और जहां चोर न सेंध लगाते और न चुराते हैं।

21     क्योंकि जहां तेरा धन है वहां तेरा मन भी लगा रहेगा।

24     कोई मनुष्य दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता, क्योंकि वह एक से बैर ओर दूसरे से प्रेम रखेगा, वा एक से मिला रहेगा और दूसरे को तुच्छ जानेगा; तुम परमेश्वर और धन दोनो की सेवा नहीं कर सकते।

25     इसलिये मैं तुम से कहता हूं, कि अपने प्राण के लिये यह चिन्ता न करना कि हम क्या खाएंगे? और क्या पीएंगे? और न अपने शरीर के लिये कि क्या पहिनेंगे? क्या प्राण भोजन से, और शरीर वस्त्र से बढ़कर नहीं?

32     (क्योंकि अन्यजाति इन सब वस्तुओं की खोज में रहते हैं), और तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है, कि तुम्हें ये सब वस्तुएं चाहिए।

33     इसलिये पहिले तुम उसे राज्य और धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएं भी तुम्हें मिल जाएंगी।

34     सो कल के लिये चिन्ता न करो, क्योंकि कल का दिन अपनी चिन्ता आप कर लेगा; आज के लिये आज ही का दुख बहुत है॥

7. Matthew 6 : 19-21, 24, 25 (Take), 32-34 (to 1st .)

19     Lay not up for yourselves treasures upon earth, where moth and rust doth corrupt, and where thieves break through and steal:

20     But lay up for yourselves treasures in heaven, where neither moth nor rust doth corrupt, and where thieves do not break through nor steal:

21     For where your treasure is, there will your heart be also.

24     No man can serve two masters: for either he will hate the one, and love the other; or else he will hold to the one, and despise the other. Ye cannot serve God and mammon.

25     Take no thought for your life, what ye shall eat, or what ye shall drink; nor yet for your body, what ye shall put on. Is not the life more than meat, and the body than raiment?

32     (For after all these things do the Gentiles seek:) for your heavenly Father knoweth that ye have need of all these things.

33     But seek ye first the kingdom of God, and his righteousness; and all these things shall be added unto you.

34     Take therefore no thought for the morrow: for the morrow shall take thought for the things of itself.

8. लूका 7: 11 (वह)-16

11     थोड़े दिन के बाद वह नाईंन नाम के एक नगर को गया, और उसके चेले, और बड़ी भीड़ उसके साथ जा रही थी।

12     जब वह नगर के फाटक के पास पहुंचा, तो देखो, लोग एक मुरदे को बाहर लिए जा रहे थे; जो अपनी मां का एकलौता पुत्र था, और वह विधवा थी: और नगर के बहुत से लोग उसके साथ थे।

13     उसे देख कर प्रभु को तरस आया, और उस से कहा; मत रो।

14     तब उस ने पास आकर, अर्थी को छुआ; और उठाने वाले ठहर गए, तब उस ने कहा; हे जवान, मैं तुझ से कहता हूं, उठ।

15     तब वह मुरदा उठ बैठा, और बोलने लगा: और उस ने उसे उस की मां को सौप दिया।

16     इस से सब पर भय छा गया; और वे परमेश्वर की बड़ाई करके कहने लगे कि हमारे बीच में एक बड़ा भविष्यद्वक्ता उठा है, और परमेश्वर ने अपने लोगों पर कृपा दृष्टि की है।

8. Luke 7 : 11 (he)-16

11     …he went into a city called Nain; and many of his disciples went with him, and much people.

12     Now when he came nigh to the gate of the city, behold, there was a dead man carried out, the only son of his mother, and she was a widow: and much people of the city was with her.

13     And when the Lord saw her, he had compassion on her, and said unto her, Weep not.

14     And he came and touched the bier: and they that bare him stood still. And he said, Young man, I say unto thee, Arise.

15     And he that was dead sat up, and began to speak. And he delivered him to his mother.

16     And there came a fear on all: and they glorified God, saying, That a great prophet is risen up among us; and, That God hath visited his people.

9. मत्ती 14: 14-21

14     उस ने निकलकर बड़ी भीड़ देखी; और उन पर तरस खाया; और उस ने उन के बीमारों को चंगा किया।

15     जब सांझ हुई, तो उसके चेलों ने उसके पास आकर कहा; यह तो सुनसान जगह है और देर हो रही है, लोगों को विदा किया जाए कि वे बस्तियों में जाकर अपने लिये भोजन मोल लें।

16     यीशु ने उन से कहा उन का जाना आवश्यक नहीं! तुम ही इन्हें खाने को दो।

17     उन्होंने उस से कहा; यहां हमारे पास पांच रोटी और दो मछिलयों को छोड़ और कुछ नहीं है।

18     उस ने कहा, उन को यहां मेरे पास ले आओ।

19     तब उस ने लोगों को घास पर बैठने को कहा, और उन पांच रोटियों और दो मछिलयों को लिया; और स्वर्ग की ओर देखकर धन्यवाद किया और रोटियां तोड़ तोड़कर चेलों को दीं, और चेलों ने लोगों को।

20     और सब खाकर तृप्त हो गए, और उन्होंने बचे हुए टुकड़ों से भरी हुई बारह टोकिरयां उठाईं।

21     और खाने वाले स्त्रियों और बालकों को छोड़कर पांच हजार पुरूषों के अटकल थे॥

9. Matthew 14 : 14-21

14     And Jesus went forth, and saw a great multitude, and was moved with compassion toward them, and he healed their sick.

15     And when it was evening, his disciples came to him, saying, This is a desert place, and the time is now past; send the multitude away, that they may go into the villages, and buy themselves victuals.

16     But Jesus said unto them, They need not depart; give ye them to eat.

17     And they say unto him, We have here but five loaves, and two fishes.

18     He said, Bring them hither to me.

19     And he commanded the multitude to sit down on the grass, and took the five loaves, and the two fishes, and looking up to heaven, he blessed, and brake, and gave the loaves to his disciples, and the disciples to the multitude.

20     And they did all eat, and were filled: and they took up of the fragments that remained twelve baskets full.

21     And they that had eaten were about five thousand men, beside women and children.

10. यूहन्ना 6: 16 (उसका)-21

16     ... उसके चेले झील के किनारे गए।

17     और नाव पर चढ़कर झील के पार कफरनहूम को जाने लगे: उस समय अन्धेरा हो गया था, और यीशु अभी तक उन के पास नहीं आया था।

18     और आन्धी के कारण झील में लहरे उठने लगीं।

19     सो जब वे खेते खेते तीन चार मील के लगभग निकल गए, तो उन्होंने यीशु को झील पर चलते, और नाव के निकट आते देखा, और डर गए।

20     परन्तु उस ने उन से कहा, कि मैं हूं; डरो मत।

21     सो वे उसे नाव पर चढ़ा लेने के लिये तैयार हुए और तुरन्त वह नाव उस स्थान पर जा पहुंची जहां वह जाते थे।

10. John 6 : 16 (his)-21

16     …his disciples went down unto the sea,

17     And entered into a ship, and went over the sea toward Capernaum. And it was now dark, and Jesus was not come to them.

18     And the sea arose by reason of a great wind that blew.

19     So when they had rowed about five and twenty or thirty furlongs, they see Jesus walking on the sea, and drawing nigh unto the ship: and they were afraid.

20     But he saith unto them, It is I; be not afraid.

21     Then they willingly received him into the ship: and immediately the ship was at the land whither they went.

11. सभोपदेशक 12: 13

13     सब कुछ सुना गया; अन्त की बात यह है कि परमेश्वर का भय मान और उसकी आज्ञाओं का पालन कर; क्योंकि मनुष्य का सम्पूर्ण कर्त्तव्य यही है।

11. Ecclesiastes 12 : 13

13     Let us hear the conclusion of the whole matter: Fear God, and keep his commandments: for this is the whole duty of man.

12. यिर्मयाह 17: 7, 8

7     धन्य है वह पुरुष जो यहोवा पर भरोसा रखता है, जिसने परमेश्वर को अपना आधार माना हो।

8     वह उस वृक्ष के समान होगा जो नदी के तीर पर लगा हो और उसकी जड़ जल के पास फैली हो; जब घाम होगा तब उसको न लगेगा, उसके पत्ते हरे रहेंगे, और सूखे वर्ष में भी उनके विषय में कुछ चिन्ता न होगी, क्योंकि वह तब भी फलता रहेगा।

12. Jeremiah 17 : 7, 8

7     Blessed is the man that trusteth in the Lord, and whose hope the Lord is.

8     For he shall be as a tree planted by the waters, and that spreadeth out her roots by the river, and shall not see when heat cometh, but her leaf shall be green; and shall not be careful in the year of drought, neither shall cease from yielding fruit.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 139 : 4-9

शुरुआत से लेकर अंत तक, पवित्रशास्त्र आत्मा, मन की बात की विजय से भरपूर है। मूसा ने मन की शक्ति को उसके द्वारा सिद्ध किया, जिसे पुरुषों ने चमत्कार कहा; तब यहोशू, एलिय्याह और एलीशा ने किया। संकेत और चमत्कार के साथ ईसाई युग की शुरुआत हुई।

1. 139 : 4-9

From beginning to end, the Scriptures are full of accounts of the triumph of Spirit, Mind, over matter. Moses proved the power of Mind by what men called miracles; so did Joshua, Elijah, and Elisha. The Christian era was ushered in with signs and wonders.

2. 200 : 4-7

मूसा ने एक राष्ट्र की बात की बजाय आत्मा में ईश्वर की आराधना के लिए उन्नत किया, और अमर मन द्वारा दी जाने वाली भव्य मानव क्षमताओं को चित्रित किया।

2. 200 : 4-7

Moses advanced a nation to the worship of God in Spirit instead of matter, and illustrated the grand human capacities of being bestowed by immortal Mind.

3. 587 : 5-8

परमेश्वर। मैं जो महान हूं; सर्व-ज्ञान, सर्व-दर्शन, सर्व-कार्य, सर्व-ज्ञान, सर्व-प्रिय और शाश्वत; सिद्धांत; मन; अन्त: मन; आत्मा; जिंदगी; सत्य; प्रेम; सभी पदार्थ; बुद्धि।

3. 587 : 5-8

God. The great I am; the all-knowing, all-seeing, all-acting, all-wise, all-loving, and eternal; Principle; Mind; Soul; Spirit; Life; Truth; Love; all substance; intelligence.

4. 468 : 21-24

आत्मा, मन, आत्मा या ईश्वर का पर्यायवाची एकमात्र वास्तविक पदार्थ है। व्यक्ति सहित आध्यात्मिक ब्रह्मांड, एक यौगिक विचार है, वह आत्मा के दिव्य पदार्थ को दर्शाता है।

4. 468 : 21-24

Spirit, the synonym of Mind, Soul, or God, is the only real substance. The spiritual universe, including individual man, is a compound idea, reflecting the divine substance of Spirit.

5. 467 : 3 (“तुम)-10

"दूसरों को ईश्वर करके न मानना॥" यह "मैं" आत्मा है। T इसलिए आज्ञा का यह अर्थ है: आपके पास कोई बुद्धि नहीं है, कोई जीवन नहीं है, कोई पदार्थ नहीं है, कोई सत्य नहीं है, कोई प्रेम नहीं है, इसके अलावा जो आध्यात्मिक है। दूसरा उसके जैसा है, "तू अपने पड़ोसी से अपने जैसा प्रेम रखना।" यह अच्छी तरह समझा जाना चाहिए कि सभी पुरुषों का एक मन, एक ईश्वर और पिता, एक जीवन, सत्य और प्रेम होता है।

5. 467 : 3 (“Thou)-10

"Thou shalt have no other gods before me." This me is Spirit. Therefore the command means this: Thou shalt have no intelligence, no life, no substance, no truth, no love, but that which is spiritual. The second is like unto it, "Thou shalt love thy neighbor as thyself." It should be thoroughly understood that all men have one Mind, one God and Father, one Life, Truth, and Love.

6. 301 : 17-20

जैसा कि ईश्वर पदार्थ है और मनुष्य ईश्वरीय छवि और समानता है, मनुष्य को आत्मा के पदार्थ की इच्छा करनी चाहिए, केवल पदार्थ की, न कि पदार्थ की और वास्तव में उसने ऐसा किया है।

6. 301 : 17-20

As God is substance and man is the divine image and likeness, man should wish for, and in reality has, only the substance of good, the substance of Spirit, not matter.

7. 335 : 12-15

आत्मा एकमात्र पदार्थ है, अदृश्य और अविभाज्य अनंत भगवान। आध्यात्मिक और शाश्वत चीजें पर्याप्त हैं। चीजें सामग्री और अस्थायी असाध्य हैं।

7. 335 : 12-15

Spirit is the only substance, the invisible and indivisible infinite God. Things spiritual and eternal are substantial. Things material and temporal are insubstantial.

8. 480 : 1-5

जब क्रिएस्टियन साइंस में आत्मा का पदार्थ दिखाई देता है, तो पदार्थ की कुछ भी मान्यता नहीं होती है। जहां परमात्मा की आत्मा है, और जहां परमात्मा नहीं है वहां कोई भी जगह नहीं है, तो बुराई कुछ भी नहीं है, - आत्मा के विपरीत।

8. 480 : 1-5

When the substance of Spirit appears in Christian Science, the nothingness of matter is recognized. Where the spirit of God is, and there is no place where God is not, evil becomes nothing, — the opposite of the something of Spirit.

9. 410 : 9-13

शास्त्र कहते हैं, "नुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है जीवित रहेगा" यह दिखाना कि सत्य ही मनुष्य का वास्तविक जीवन है; लेकिन मानव जाति इस शिक्षण को व्यावहारिक बनाने का विरोध करती है।

9. 410 : 9-13

The Scriptures say, "Man shall not live by bread alone, but by every word that proceedeth out of the mouth of God," showing that Truth is the actual life of man; but mankind objects to making this teaching practical.

10. 183 : 21-25

डिवाइन माइंड सही ढंग से मनुष्य की संपूर्ण आज्ञाकारिता, स्नेह और शक्ति की माँग करता है। किसी भी कम निष्ठा के लिए कोई आरक्षण नहीं किया जाता है। सत्य का पालन मनुष्य को शक्ति और सामर्थ्य देता है। त्रुटि के अधीन होने से शक्ति का नुकसान होता है।

10. 183 : 21-25

Divine Mind rightly demands man's entire obedience, affection, and strength. No reservation is made for any lesser loyalty. Obedience to Truth gives man power and strength. Submission to error superinduces loss of power.

11. 167 : 11-12, 17-19

हम दो स्वामी की सेवा नहीं कर सकते हैं और न ही दिव्य विज्ञान को भौतिक इंद्रियों के साथ देख सकते हैं। …एक ईश्वर के पास और आत्मा की शक्ति का लाभ उठाने के लिए, आपको ईश्वर से प्रेम करना चाहिए।

11. 167 : 11-12, 17-19

We cannot serve two masters nor perceive divine Science with the material senses. … To have one God and avail yourself of the power of Spirit, you must love God supremely.

12. 326 : 8-11, 20-21

सभी प्रकृति मनुष्य को ईश्वर का प्यार सिखाती है, लेकिन मनुष्य ईश्वर से प्रेम नहीं कर सकता है और आध्यात्मिक चीजों पर अपना पूरा प्यार कायम कर सकता है, जबकि सामग्री से प्रेम कर सकता है या आध्यात्मिक से अधिक उस पर भरोसा कर सकता है।

सच्चे इरादों के साथ काम करने और प्रार्थना करने से, आपके पिता आपके लिए रास्ता खोलेंगे।

12. 326 : 8-11, 20-21

All nature teaches God's love to man, but man cannot love God supremely and set his whole affections on spiritual things, while loving the material or trusting in it more than in the spiritual.

Working and praying with true motives, your Father will open the way.

13. 346 : 29-32

भौतिक विश्वासों को आध्यात्मिक समझ के लिए जगह बनाने के लिए निष्कासित किया जाना चाहिए। हम एक ही समय में परमेश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते; लेकिन क्या कमजोर नश्वर यही करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं?

13. 346 : 29-32

Material beliefs must be expelled to make room for spiritual understanding. We cannot serve both God and mammon at the same time; but is not this what frail mortals are trying to do?

14. 451 : 2-4

ईसाई वैज्ञानिकों को भौतिक दुनिया से बाहर आने और अलग होने के लिए धर्मत्यागी आदेश के निरंतर दबाव में रहना चाहिए।

14. 451 : 2-4

Christian Scientists must live under the constant pressure of the apostolic command to come out from the material world and be separate.

15. 530 : 5-12

दिव्य विज्ञान में, मनुष्य ईश्वर के द्वारा कायम है,होने का दिव्य सिद्धांत। परमेश्वर के आदेश पर पृथ्वी, मनुष्य के उपयोग के लिए भोजन लाती है। यह जानकर, यीशु ने एक बार कहा था, "से कहता हूं, कि अपने प्राण के लिये यह चिन्ता न करना कि हम क्या खाएंगे?" — अपने निर्माता के विशेषाधिकार पर नहीं मानते हुए, लेकिन सभी के पिता और माता को पहचान कर, जो मनुष्य को खिलाने और कपड़े पहनने में सक्षम है, जैसे वह गेंदे के साथ करता है।

15. 530 : 5-12

In divine Science, man is sustained by God, the divine Principle of being. The earth, at God's command, brings forth food for man's use. Knowing this, Jesus once said, "Take no thought for your life, what ye shall eat, or what ye shall drink," — presuming not on the prerogative of his creator, but recognizing God, the Father and Mother of all, as able to feed and clothe man as He doth the lilies.

16. 494 : 10-15

ईश्वरीय प्रेम हमेशा से मिला है और हमेशा हर मानवीय आवश्यकता को पूरा करेगा। यह कल्पना करना ठीक नहीं है कि यीशु ने दिव्य शक्ति का चयन केवल संख्या के लिए या सीमित समय के लिए ठीक करने के लिए किया, क्योंकि सभी मानव जाति के लिए और सभी समयों में, दिव्य प्रेम सभी अच्छे की आपूर्ति करता है।

कृपा का चमत्कार प्रेम का कोई चमत्कार नहीं है।

16. 494 : 10-15

Divine Love always has met and always will meet every human need. It is not well to imagine that Jesus demonstrated the divine power to heal only for a select number or for a limited period of time, since to all mankind and in every hour, divine Love supplies all good.

The miracle of grace is no miracle to Love.

17. 206 : 15-18

मनुष्य के साथ भगवान के वैज्ञानिक संबंध में, हम पाते हैं कि जो कुछ भी एक को आशीर्वाद देता है, वह सभी को आशीर्वाद देता है, जैसा कि यीशु ने आत्मा को दिखाया, भौतिक नहीं, आपूर्ति का स्रोत होने के नाते, रोटियों और मछलियों के साथ।

17. 206 : 15-18

In the scientific relation of God to man, we find that whatever blesses one blesses all, as Jesus showed with the loaves and the fishes, — Spirit, not matter, being the source of supply.

18. 369 : 5-13

जिस अनुपात में मनुष्य को सभी वस्तुएं मनुष्य के रूप में खो देती हैं, उसी अनुपात में मनुष्य इसका स्वामी बन जाता है। वह तथ्यों की एक दिव्य भावना में प्रवेश करता है, और यीशु के धर्मशास्त्र को समझने के रूप में बीमारों को ठीक करने, मृतकों को ऊपर उठाने और लहर पर चलने के रूप में प्रदर्शित करता है। इन सभी कर्मों से यीशु का विश्वास इस बात पर है कि सामग्री भौतिक है, यह विश्वास है कि यह जीवन का मध्यस्थ या अस्तित्व के किसी भी रूप का निर्माणकर्ता हो सकता है।

18. 369 : 5-13

In proportion as matter loses to human sense all entity as man, in that proportion does man become its master. He enters into a diviner sense of the facts, and comprehends the theology of Jesus as demonstrated in healing the sick, raising the dead, and walking over the wave. All these deeds manifested Jesus' control over the belief that matter is substance, that it can be the arbiter of life or the constructor of any form of existence.

19. 340 : 4-14

सभोपदेशक की पुस्तक में यह पाठ ईसाई विज्ञान के विचारों को व्यक्त करता है, विशेषकर जब कर्तव्य शब्द, जो मूल में नहीं है, को छोड़ दिया जाता है: "सब कुछ सुना गया; अन्त की बात यह है कि परमेश्वर का भय मान और उसकी आज्ञाओं का पालन कर; क्योंकि मनुष्य का सम्पूर्ण कर्त्तव्य यही है।" दूसरे शब्दों में: आइए सुनते हैं पूरे मामले का निष्कर्ष: परमेश्वर से प्रेम करो और उसकी आज्ञाओं का पालन करो: क्‍योंकि सारा मनुष्‍य अपने स्वरूप और समानता में यही है। ईश्वरीय प्रेम अनंत है। इसलिए जो कुछ भी वास्तव में मौजूद है वह ईश्वर में है और उनके प्रेम को प्रकट करता है।

19. 340 : 4-14

This text in the book of Ecclesiastes conveys the Christian Science thought, especially when the word duty, which is not in the original, is omitted: "Let us hear the conclusion of the whole matter: Fear God, and keep His commandments: for this is the whole duty of man." In other words: Let us hear the conclusion of the whole matter: love God and keep His commandments: for this is the whole of man in His image and likeness. Divine Love is infinite. Therefore all that really exists is in and of God, and manifests His love.

20. 264 : 13-19

जैसा कि नश्वर भगवान और मनुष्य के बारे में अधिक सही दृष्टिकोण प्राप्त करते हैं, सृष्टि की बहुपक्षीय वस्तुएं, जो पहले अदृश्य थीं, दृश्यमान हो जाएंगी। जब हम महसूस करते हैं कि जीवन आत्मा है, तो कभी भी नहीं, न ही इस मामले में, यह समझ आत्म-पूर्णता में विस्तारित होगी, सभी को ईश्वर में मिल जाएगी, अच्छा होगा, और किसी अन्य चेतना की आवश्यकता नहीं होगी।

20. 264 : 13-19

As mortals gain more correct views of God and man, multitudinous objects of creation, which before were invisible, will become visible. When we realize that Life is Spirit, never in nor of matter, this understanding will expand into self-completeness, finding all in God, good, and needing no other consciousness.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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