रविवार 12 मई, 2024



विषयआदम और पतित आदमी

SubjectAdam And Fallen Man

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: यूहन्ना 3: 7

"तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है।"



Golden Text: John 3 : 7

Ye must be born again.




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उत्तरदायी अध्ययन: इफिसियों 4: 1, 2, 14, 15, 22-24


1     सोमैं जो प्रभु में बन्धुआ हूं तुम से बिनती करता हूं, कि जिस बुलाहट से तुम बुलाए गए थे, उसके योग्य चाल चलो।

2     अर्थात सारी दीनता और नम्रता सहित, और धीरज धरकर प्रेम से एक दूसरे की सह लो।

14     ताकि हम आगे को बालक न रहें, जो मनुष्यों की ठग-विद्या और चतुराई से उन के भ्रम की युक्तियों की, और उपदेश की, हर एक बयार से उछाले, और इधर-उधर घुमाए जाते हों।

15     वरन प्रेम में सच्चाई से चलते हुए, सब बातों में उस में जो सिर है, अर्थात मसीह में बढ़ते जाएं।

22     कि तुम अगले चालचलन के पुराने मनुष्यत्व को जो भरमाने वाली अभिलाषाओं के अनुसार भ्रष्ट होता जाता है, उतार डालो।

23     और अपने मन के आत्मिक स्वभाव में नये बनते जाओ।

24     और नये मनुष्यत्व को पहिन लो, जो परमेश्वर के अनुसार सत्य की धामिर्कता, और पवित्रता में सृजा गया है॥

Responsive Reading: Ephesians 4 : 1, 2, 14, 15, 22-24

1.     I therefore, the prisoner of the Lord, beseech you that ye walk worthy of the vocation wherewith ye are called,

2.     With all lowliness and meekness, with longsuffering, forbearing one another in love;

14.     That we henceforth be no more children, tossed to and fro, and carried about with every wind of doctrine, by the sleight of men, and cunning craftiness, whereby they lie in wait to deceive;

15.     But speaking the truth in love, may grow up into him in all things, which is the head, even Christ:

22.     That ye put off concerning the former conversation the old man, which is corrupt according to the deceitful lusts;

23.     And be renewed in the spirit of your mind;

24.     And that ye put on the new man, which after God is created in righteousness and true holiness.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. उत्पत्ति 1: 1, 26 (से :), 27, 28 (से 1st,), 31 (से 1st.)

1     आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।

26     फिर परमेश्वर ने कहा, हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएं।

27     तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की।

28     और परमेश्वर ने उन को आशीष दी।

31     तब परमेश्वर ने जो कुछ बनाया था, सब को देखा, तो क्या देखा, कि वह बहुत ही अच्छा है।

1. Genesis 1 : 1, 26 (to :), 27, 28 (to 1st ,), 31 (to 1st .)

1     In the beginning God created the heaven and the earth.

26     And God said, Let us make man in our image, after our likeness:

27     So God created man in his own image, in the image of God created he him; male and female created he them.

28     And God blessed them,

31     And God saw every thing that he had made, and, behold, it was very good.

2. उत्पत्ति 2: 1, 6, 7

1     योंआकाश और पृथ्वी और उनकी सारी सेना का बनाना समाप्त हो गया।

6     तौभी कोहरा पृथ्वी से उठता था जिस से सारी भूमि सिंच जाती थी

7     और यहोवा परमेश्वर ने आदम को भूमि की मिट्टी से रचा और उसके नथनों में जीवन का श्वास फूंक दिया; और आदम जीवता प्राणी बन गया।

2. Genesis 2 : 1, 6, 7

1     Thus the heavens and the earth were finished, and all the host of them.

6     But there went up a mist from the earth, and watered the whole face of the ground.

7     And the Lord God formed man of the dust of the ground, and breathed into his nostrils the breath of life; and man became a living soul.

3. यशायाह 25: 1, 6, 7

1     हेयहोवा, तू मेरा परमेश्वर है; मैं तुझे सराहूंगा, मैं तेरे नाम का धन्यवाद करूंगा; क्योंकि तू ने आश्चर्यकर्म किए हैं, तू ने प्राचीनकाल से पूरी सच्चाई के साथ युक्तियां की हैं।

6     सेनाओं का यहोवा इसी पर्वत पर सब देशों के लोगों के लिये ऐसी जेवनार करेगा जिस में भांति भांति का चिकना भोजन और निथरा हुआ दाखमधु होगा; उत्तम से उत्तम चिकना भोजन और बहुत ही निथरा हुआ दाखमधु होगा।

7     और जो पर्दा सब देशों के लोगों पर पड़ा है, जो घूंघट सब अन्यजातियों पर लटका हुआ है, उसे वह इसी पर्वत पर नाश करेगा।

3. Isaiah 25 : 1, 6, 7

1     O Lord, thou art my God; I will exalt thee, I will praise thy name; for thou hast done wonderful things; thy counsels of old are faithfulness and truth.

6     And in this mountain shall the Lord of hosts make unto all people a feast of fat things, a feast of wines on the lees, of fat things full of marrow, of wines on the lees well refined.

7     And he will destroy in this mountain the face of the covering cast over all people, and the vail that is spread over all nations.

4. यूहन्ना 1: 6-13

6     एक मनुष्य परमेश्वर की ओर से आ उपस्थित हुआ जिस का नाम यूहन्ना था।

7     यह गवाही देने आया, कि ज्योति की गवाही दे, ताकि सब उसके द्वारा विश्वास लाएं।

8     वह आप तो वह ज्योति न था, परन्तु उस ज्योति की गवाही देने के लिये आया था।

9     सच्ची ज्योति जो हर एक मनुष्य को प्रकाशित करती है, जगत में आनेवाली थी।

10     वह जगत में था, और जगत उसके द्वारा उत्पन्न हुआ, और जगत ने उसे नहीं पहिचाना।

11     वह अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया।

12     परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उस ने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं।

13     वे न तो लोहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।

4. John 1 : 6-13

6     There was a man sent from God, whose name was John.

7     The same came for a witness, to bear witness of the Light, that all men through him might believe.

8     He was not that Light, but was sent to bear witness of that Light.

9     That was the true Light, which lighteth every man that cometh into the world.

10     He was in the world, and the world was made by him, and the world knew him not.

11     He came unto his own, and his own received him not.

12     But as many as received him, to them gave he power to become the sons of God, even to them that believe on his name:

13     Which were born, not of blood, nor of the will of the flesh, nor of the will of man, but of God.

5. यूहन्ना 3: 14-17

14     और जिस रीति से मूसा ने जंगल में सांप को ऊंचे पर चढ़ाया, उसी रीति से अवश्य है कि मनुष्य का पुत्र भी ऊंचे पर चढ़ाया जाए।

15     ताकि जो कोई विश्वास करे उस में अनन्त जीवन पाए॥

16     क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।

17     परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिये नहीं भेजा, कि जगत पर दंड की आज्ञा दे परन्तु इसलिये कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए।

5. John 3 : 14-17

14     And as Moses lifted up the serpent in the wilderness, even so must the Son of man be lifted up:

15     That whosoever believeth in him should not perish, but have eternal life.

16     For God so loved the world, that he gave his only begotten Son, that whosoever believeth in him should not perish, but have everlasting life.

17     For God sent not his Son into the world to condemn the world; but that the world through him might be saved.

6. 2 कुरिन्थियों 3: 12-18

12     सो ऐसी आशा रखकर हम हियाव के साथ बोलते हैं।

13     और मूसा की नाईं नहीं, जिस ने अपने मुंह पर परदा डाला था ताकि इस्त्राएली उस घटने वाली वस्तु के अन्त को न देखें।

14     परन्तु वे मतिमन्द हो गए, क्योंकि आज तक पुराने नियम के पढ़ते समय उन के हृदयों पर वही परदा पड़ा रहता है; पर वह मसीह में उठ जाता है।

15     और आज तक जब कभी मूसा की पुस्तक पढ़ी जाती है, तो उन के हृदय पर परदा पड़ा रहता है।

16     परन्तु जब कभी उन का हृदय प्रभु की ओर फिरेगा, तब वह परदा उठ जाएगा।

17     प्रभु तो आत्मा है: और जहां कहीं प्रभु का आत्मा है वहां स्वतंत्रता है।

18     परन्तु जब हम सब के उघाड़े चेहरे से प्रभु का प्रताप इस प्रकार प्रगट होता है, जिस प्रकार दर्पण में, तो प्रभु के द्वारा जो आत्मा है, हम उसी तेजस्वी रूप में अंश अंश कर के बदलते जाते हैं॥

6. II Corinthians 3 : 12-18

12     Seeing then that we have such hope, we use great plainness of speech:

13     And not as Moses, which put a vail over his face, that the children of Israel could not stedfastly look to the end of that which is abolished:

14     But their minds were blinded: for until this day remaineth the same vail untaken away in the reading of the old testament; which vail is done away in Christ.

15     But even unto this day, when Moses is read, the vail is upon their heart.

16     Nevertheless when it shall turn to the Lord, the vail shall be taken away.

17     Now the Lord is that Spirit: and where the Spirit of the Lord is, there is liberty.

18     But we all, with open face beholding as in a glass the glory of the Lord, are changed into the same image from glory to glory, even as by the Spirit of the Lord.

7. रोमियो 5: 1, 2, 14, 17-21

1     सो जब हम विश्वास से धर्मी ठहरे, तो अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल रखें।

2     जिस के द्वारा विश्वास के कारण उस अनुग्रह तक, जिस में हम बने हैं, हमारी पहुंच भी हुई, और परमेश्वर की महिमा की आशा पर घमण्ड करें।

14     तौभी आदम से लेकर मूसा तक मृत्यु ने उन लोगों पर भी राज्य किया, जिन्हों ने उस आदम के अपराध की नाईं जो उस आने वाले का चिन्ह है, पाप न किया।

17     क्योंकि जब एक मनुष्य के अपराध के कराण मृत्यु ने उस एक ही के द्वारा राज्य किया, तो जो लोग अनुग्रह और धर्म रूपी वरदान बहुतायत से पाते हैं वे एक मनुष्य के, अर्थात यीशु मसीह के द्वारा अवश्य ही अनन्त जीवन में राज्य करेंगे।

18     इसलिये जैसा एक अपराध सब मनुष्यों के लिये दण्ड की आज्ञा का कारण हुआ, वैसा ही एक धर्म का काम भी सब मनुष्यों के लिये जीवन के निमित धर्मी ठहराए जाने का कारण हुआ।

19     क्योंकि जैसा एक मनुष्य के आज्ञा न मानने से बहुत लोग पापी ठहरे, वैसे ही एक मनुष्य के आज्ञा मानने से बहुत लोग धर्मी ठहरेंगे।

20     और व्यवस्था बीच में आ गई, कि अपराध बहुत हो, परन्तु जहां पाप बहुत हुआ, वहां अनुग्रह उस से भी कहीं अधिक हुआ।

21     कि जैसा पाप ने मृत्यु फैलाते हुए राज्य किया, वैसा ही हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा अनुग्रह भी अनन्त जीवन के लिये धर्मी ठहराते हुए राज्य करे॥

7. Romans 5 : 1, 2, 14, 17-21

1     Therefore being justified by faith, we have peace with God through our Lord Jesus Christ:

2     By whom also we have access by faith into this grace wherein we stand, and rejoice in hope of the glory of God.

14     Nevertheless death reigned from Adam to Moses, even over them that had not sinned after the similitude of Adam’s transgression, who is the figure of him that was to come.

17     For if by one man’s offence death reigned by one; much more they which receive abundance of grace and of the gift of righteousness shall reign in life by one, Jesus Christ.)

18     Therefore as by the offence of one judgment came upon all men to condemnation; even so by the righteousness of one the free gift came upon all men unto justification of life.

19     For as by one man’s disobedience many were made sinners, so by the obedience of one shall many be made righteous.

20     Moreover the law entered, that the offence might abound. But where sin abounded, grace did much more abound:

21     That as sin hath reigned unto death, even so might grace reign through righteousness unto eternal life by Jesus Christ our Lord.

8. 1 कुरिन्थियों 15: 22

22     और जैसे आदम में सब मरते हैं, वैसा ही मसीह में सब जिलाए जाएंगे।

8. I Corinthians 15 : 22

22     For as in Adam all die, even so in Christ shall all be made alive.

9. 2 कुरिन्थियों 4: 1, 3, 4, 6

1     इसलिये जब हम पर ऐसी दया हुई, कि हमें यह सेवा मिली, तो हम हियाव नहीं छोड़ते।

3     परन्तु यदि हमारे सुसमाचार पर परदा पड़ा है, तो यह नाश होने वालों ही के लिये पड़ा है।

4     और उन अविश्वासियों के लिये, जिन की बुद्धि को इस संसार के ईश्वर ने अन्धी कर दी है, ताकि मसीह जो परमेश्वर का प्रतिरूप है, उसके तेजोमय सुसमाचार का प्रकाश उन पर न चमके।

6     इसलिये कि परमेश्वर ही है, जिस ने कहा, कि अन्धकार में से ज्योति चमके; और वही हमारे हृदयों में चमका, कि परमेश्वर की महिमा की पहिचान की ज्योति यीशु मसीह के चेहरे से प्रकाशमान हो॥

9. II Corinthians 4 : 1, 3, 4, 6

1     Therefore seeing we have this ministry, as we have received mercy, we faint not;

3     But if our gospel be hid, it is hid to them that are lost:

4     In whom the god of this world hath blinded the minds of them which believe not, lest the light of the glorious gospel of Christ, who is the image of God, should shine unto them.

6     For God, who commanded the light to shine out of darkness, hath shined in our hearts, to give the light of the knowledge of the glory of God in the face of Jesus Christ.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 275: 10-15

वास्तविकता और उसके विज्ञान में होने के क्रम को समझने के लिए, आपको परमेश्वर को उस सभी के दिव्य सिद्धांत के रूप में फिर से शुरू करना चाहिए जो वास्तव में है। आत्मा, जीवन, सत्य, प्रेम, एक के रूप में गठबंधन, - और भगवान के लिए शास्त्र के नाम हैं। सभी पदार्थ, बुद्धि, ज्ञान, अस्तित्व, अमरता, कारण और प्रभाव ईश्वर के हैं।

1. 275 : 10-15

To grasp the reality and order of being in its Science, you must begin by reckoning God as the divine Principle of all that really is. Spirit, Life, Truth, Love, combine as one, — and are the Scriptural names for God. All substance, intelligence, wisdom, being, immortality, cause, and effect belong to God.

2. 63: 5 (में)-11

विज्ञान में मनुष्य आत्मा की संतान है। सुंदर, अच्छा और शुद्ध उसके वंश का गठन करते हैं। उसका मूल, नश्वर की तरह, पाशविक वृत्ति में नहीं है, और न ही वह बुद्धि तक पहुँचने से पहले भौतिक परिस्थितियों से गुजरता है। आत्मा उसका मूल और होने का परम स्रोत है; परमेश्वर उसका पिता है, और जीवन उसके होने का नियम है।

2. 63 : 5 (In)-11

In Science man is the offspring of Spirit. The beautiful, good, and pure constitute his ancestry. His origin is not, like that of mortals, in brute instinct, nor does he pass through material conditions prior to reaching intelligence. Spirit is his primitive and ultimate source of being; God is his Father, and Life is the law of his being.

3. 295: 8-15

नश्वर मन आध्यात्मिक को भौतिक में बदल देगा, और फिर इस त्रुटि की नश्वरता से बचने के लिए मनुष्य के मूल स्व को पुनर्प्राप्त करेगा। ईश्वर की स्वयं की छवि में बनाए गए नश्वर अमर की तरह नहीं हैं; लेकिन अनंत आत्मा सभी होने के नाते, नश्वर चेतना वैज्ञानिक तथ्य के लिए अंतिम पैदावार होगी और गायब हो जाएगी, और सही, और हमेशा के लिए होने का वास्तविक अर्थ प्रकट होगा।

3. 295 : 8-15

Mortal mind would transform the spiritual into the material, and then recover man's original self in order to escape from the mortality of this error. Mortals are not like immortals, created in God's own image; but infinite Spirit being all, mortal consciousness will at last yield to the scientific fact and disappear, and the real sense of being, perfect and forever intact, will appear.

4. 288: 27-28, 31-6

विज्ञान अमर मानव की गौरवशाली संभावनाओं को प्रकट करता है, नश्वर इंद्रियों द्वारा हमेशा के लिए असीमित।

शाश्वत सत्य को नष्ट कर देता है जो लगता है कि मनुष्यों ने त्रुटि से सीखा है, और भगवान के बच्चे के रूप में मनुष्य का वास्तविक अस्तित्व प्रकाश में आता है। सत्य का प्रदर्शन शाश्वत जीवन है। नश्वर मनुष्य कभी भी त्रुटि, पाप, बीमारी, और मृत्यु में विश्वास की लौकिक दुर्बलता से नहीं उठ सकता, जब तक कि वह यह न जान ले कि ईश्वर ही एकमात्र जीवन है। यह विश्वास कि जीवन और संवेदना शरीर में हैं, मनुष्य को ईश्वर की छवि के रूप में समझने की समझ से दूर होना चाहिए।

4. 288 : 27-28, 31-6

Science reveals the glorious possibilities of immortal man, forever unlimited by the mortal senses.

The eternal Truth destroys what mortals seem to have learned from error, and man's real existence as a child of God comes to light. Truth demonstrated is eternal life. Mortal man can never rise from the temporal débris of error, belief in sin, sickness, and death, until he learns that God is the only Life. The belief that life and sensation are in the body should be overcome by the understanding of what constitutes man as the image of God.

5. 580: 21-27

एडम नाम झूठे दंभ का प्रतिनिधित्व करता है कि जीवन शाश्वत नहीं है, लेकिन शुरुआत और अंत है; कि अनंत परिमित में प्रवेश करता है, वह बुद्धि अ-बुद्धि में प्रवेश करती है, और वह आत्मा भौतिक अर्थों में बसता है; उस अमर मन का परिणाम होता है, और नश्वर मन में पदार्थ; एक ईश्वर और निर्माता ने जो बनाया, उसमें प्रवेश किया और फिर पदार्थ की नास्तिकता में गायब हो गया।

5. 580 : 21-27

The name Adam represents the false supposition that Life is not eternal, but has beginning and end; that the infinite enters the finite, that intelligence passes into non-intelligence, and that Soul dwells in material sense; that immortal Mind results in matter, and matter in mortal mind; that the one God and creator entered what He created, and then disappeared in the atheism of matter.

6. 214: 9-14

आदम, जिसे शास्त्रों में धूल से निर्मित रूप में दर्शाया गया है, मानव मन के लिए एक वस्तु-पाठ है। भौतिक इन्द्रियाँ, आदम की तरह, पदार्थ में उत्पन्न होती हैं और धूल में लौट जाती हैं, - अबुद्धिमान सिद्ध होती हैं। वे अंदर आते ही बाहर चले जाते हैं, क्योंकि वे अभी भी त्रुटि हैं, न कि होने का सत्य।

6. 214 : 9-14

Adam, represented in the Scriptures as formed from dust, is an object-lesson for the human mind. The material senses, like Adam, originate in matter and return to dust, — are proved non-intelligent. They go out as they came in, for they are still the error, not the truth of being.

7. 521: 21-29

उत्पत्ति 2: 6.     तौभी कोहरा पृथ्वी से उठता था जिस से सारी भूमि सिंच जाती थी।

दैवीय सृष्टि के विज्ञान और सत्य को पहले से ही विचार किए गए श्लोकों में प्रस्तुत किया गया है, और अब विपरीत त्रुटि, सृष्टि के एक भौतिक दृष्टिकोण को निर्धारित किया जाना है। उत्पत्ति के दूसरे अध्याय में ईश्वर और ब्रह्माण्ड के इस भौतिक दृष्टिकोण का विवरण है, एक कथन जो पहले दर्ज किए गए वैज्ञानिक सत्य के बिल्कुल विपरीत है।

7. 521 : 21-29

Genesis ii. 6. But there went up a mist from the earth, and watered the whole face of the ground.

The Science and truth of the divine creation have been presented in the verses already considered, and now the opposite error, a material view of creation, is to be set forth. The second chapter of Genesis contains a statement of this material view of God and the universe, a statement which is the exact opposite of scientific truth as before recorded.

8. 522: 5-11

पहला रिकॉर्ड भगवान को सभी शक्ति और सरकार प्रदान करता है, और मनुष्य को भगवान की पूर्णता और शक्ति से संपन्न करता है। दूसरा रिकॉर्ड कालानुक्रमिक मनुष्य के रूप में उत्परिवर्तित और नश्वर, - जैसा कि देवता से टूट कर और स्वयं की कक्षा में परिक्रमा करते हुए। अस्तित्व, देवत्व से अलग, विज्ञान असंभव के रूप में समझाता है।

8. 522 : 5-11

The first record assigns all might and government to God, and endows man out of God's perfection and power. The second record chronicles man as mutable and mortal, — as having broken away from Deity and as revolving in an orbit of his own. Existence, separate from divinity, Science explains as impossible.

9. 523: 7-13

पदार्थ की रचना एक धुंध या झूठे दावे से, या रहस्यवाद से उत्पन्न होती है, न कि उस आकाश, या समझ से, जिसे परमेश्वर सच्चे और झूठे के बीच खड़ा करता है। गलती में सब कुछ नीचे से आता है, ऊपर से नहीं। सब कुछ भौतिक मिथक है, आत्मा के प्रतिबिंब के बजाय।

9. 523 : 7-13

The creations of matter arise from a mist or false claim, or from mystification, and not from the firmament, or understanding, which God erects between the true and false. In error everything comes from beneath, not from above. All is material myth, instead of the reflection of Spirit.

10. 557: 22-27

लोकप्रिय धर्मशास्त्र मनुष्य के इतिहास को ऐसे लेता है मानो उसने भौतिक रूप से सही शुरुआत की, लेकिन तुरंत मानसिक पाप में गिर गया; जबकि प्रकट धर्म मन के विज्ञान और इसकी संरचनाओं को पुराने नियम के पहले अध्याय के अनुसार घोषित करता है, जब ईश्वर, मन, ने कहा और यह किया गया था।

10. 557 : 22-27

Popular theology takes up the history of man as if he began materially right, but immediately fell into mental sin; whereas revealed religion proclaims the Science of Mind and its formations as being in accordance with the first chapter of the Old Testament, when God, Mind, spake and it was done.

11. 282: 28-31

जो कुछ भी मनुष्य के पाप को दर्शाता है, या भगवान के विपरीत, या भगवान की अनुपस्थिति, एडम का सपना है, जो न तो माइंड है और न ही मनुष्य है, क्योंकि यह पिता की भीख नहीं है।

11. 282 : 28-31

Whatever indicates the fall of man or the opposite of God or God's absence, is the Adam-dream, which is neither Mind nor man, for it is not begotten of the Father.

12. 338: 30 (एडम)-32

आदम आदर्श नहीं था जिसके लिए पृथ्वी धन्य थी। आदर्श व्यक्ति का नियत समय में पता चला था, और उसे ईसा मसीह के रूप में जाना जाता था।

12. 338 : 30 (Adam)-32

Adam was not the ideal man for whom the earth was blessed. The ideal man was revealed in due time, and was known as Christ Jesus.

13. 30: 19-25

सत्य के व्यक्तिगत आदर्श के रूप में, ईसा मसीह सत्य और जीवन के तरीके को इंगित करने के लिए, सभी गलतियों, बीमारी, और मृत्यु - को रबिनिकल त्रुटि और फटकार के लिए आया था। आत्मा और भौतिक अर्थ, सत्य और त्रुटि के बीच अंतर दिखाते हुए, इस आदर्श को यीशु के संपूर्ण सांसारिक जीवन के दौरान प्रदर्शित किया गया था।

13. 30 : 19-25

As the individual ideal of Truth, Christ Jesus came to rebuke rabbinical error and all sin, sickness, and death, — to point out the way of Truth and Life. This ideal was demonstrated throughout the whole earthly career of Jesus, showing the difference between the offspring of Soul and of material sense, of Truth and of error.

14. 476: 28-5

जब यीशु ने परमेश्वर के बच्चों की बात की, न कि पुरुषों के बच्चों की, तो उन्होंने कहा, "परमेश्वर का राज्य तुम्हारे बीच में है;" इसका मतलब है, सत्य और प्रेम वास्तविक मनुष्य में राज्य करता है, यह दर्शाता है कि भगवान की छवि में आदमी बेदाग और शाश्वत है। यीशु ने विज्ञान में सिद्ध पुरुष को सही ठहराया, जो उसे दिखाई दिया जहां पाप करने वाला नश्वर मनुष्य नश्वर प्रतीत होता है। इस सिद्ध पुरुष में उद्धारकर्ता ने परमेश्वर की अपनी समानता को देखा, और मनुष्य के इस सही दृष्टिकोण ने बीमारों को चंगा किया। इस प्रकार यीशु ने सिखाया कि ईश्वर का राज्य अक्षुण्ण, सार्वभौमिक है, और वह मनुष्य शुद्ध और पवित्र है।

14. 476 : 28-5

When speaking of God's children, not the children of men, Jesus said, "The kingdom of God is within you;" that is, Truth and Love reign in the real man, showing that man in God's image is unfallen and eternal. Jesus beheld in Science the perfect man, who appeared to him where sinning mortal man appears to mortals. In this perfect man the Saviour saw God's own likeness, and this correct view of man healed the sick. Thus Jesus taught that the kingdom of God is intact, universal, and that man is pure and holy.

15. 276: 19-24

जब हम विज्ञान में सीखते हैं कि स्वर्ग में हमारे पिता भी कैसे परिपूर्ण हैं, तो विचार को नए और स्वस्थ चैनलों में बदल दिया गया है, - सामंजस्यपूर्ण मनुष्य सहित ब्रह्मांड के सिद्धांत के लिए अमरता और भौतिकता से दूर चीजों के चिंतन की ओर।

15. 276 : 19-24

When we learn in Science how to be perfect even as our Father in heaven is perfect, thought is turned into new and healthy channels, — towards the contemplation of things immortal and away from materiality to the Principle of the universe, including harmonious man.

16. 171: 4-11

भौतिकता के आध्यात्मिक विपरीत के विवेक के माध्यम से, यहां तक कि मसीह, सत्य के माध्यम से, मनुष्य दिव्य विज्ञान की कुंजी के साथ स्वर्ग के द्वार को फिर से खोल देगा जो मानव मान्यताओं ने बंद कर दिया है, और खुद को निष्कलंक, ईमानदार, शुद्ध और स्वतंत्र पाएगा, नहीं उसे अपने जीवन या मौसम की संभावनाओं के लिए पंचांगों से परामर्श लेने की आवश्यकता है, यह जानने के लिए कि वह कितना आदमी है, मस्तिष्क विज्ञान का अध्ययन करने की आवश्यकता नहीं है।

16. 171 : 4-11

Through discernment of the spiritual opposite of materiality, even the way through Christ, Truth, man will reopen with the key of divine Science the gates of Paradise which human beliefs have closed, and will find himself unfallen, upright, pure, and free, not needing to consult almanacs for the probabilities either of his life or of the weather, not needing to study brainology to learn how much of a man he is.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6