रविवार 12 मई, 2019 |

रविवार 12 मई, 2019



विषयआदम और पतित आदमी

SubjectAdam and Fallen Man

वर्ण पाठ: भजन संहिता 34 : 22

यहोवा अपने दासों का प्राण मोल लेकर बचा लेता है; और जितने उसके शरणागत हैं उन में से कोई भी दोषी न ठहरेगा॥



Golden Text: Psalm 34 : 22

The Lord redeemeth the soul of his servants: and none of them that trust in him shall be desolate.




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भजन संहिता 103 : 1-5 • भजन संहिता 19 : 14


1     हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह; और जो कुछ मुझ में है, वह उसके पवित्र नाम को धन्य कहे!

2     हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह, और उसके किसी उपकार को न भूलना।

3     वही तो तेरे सब अधर्म को क्षमा करता, और तेरे सब रोगों को चंगा करता है,

4     वही तो तेरे प्राण को नाश होने से बचा लेता है, और तेरे सिर पर करूणा और दया का मुकुट बान्धता है,

5     वही तो तेरी लालसा को उत्तम पदार्थों से तृप्त करता है, जिस से तेरी जवानी उकाब की नाईं नई हो जाती है॥

14     मेरे मुंह के वचन और मेरे हृदय का ध्यान तेरे सम्मुख ग्रहण योग्य हों, हे यहोवा परमेश्वर, मेरी चट्टान और मेरे उद्धार करने वाले!

Responsive Reading: Psalm 103 : 1-5 ; Psalm 19 : 14

1.     Bless the Lord, O my soul: and all that is within me, bless his holy name.

2.     Bless the Lord, O my soul, and forget not all his benefits:

3.     Who forgiveth all thine iniquities; who healeth all thy diseases;

4.     Who redeemeth thy life from destruction; who crowneth thee with lovingkindness and tender mercies;

5.     Who satisfieth thy mouth with good things; so that thy youth is renewed like the eagle’s.

14.     Let the words of my mouth, and the meditation of my heart, be acceptable in thy sight, O Lord, my strength, and my redeemer.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. यशायाह 52 : 9, 10

9     हे यरूशलेम के खण्डहरों, एक संग उमंग में आकर जयजयकार करो; क्योंकि यहोवा ने अपनी प्रजा को शान्ति दी है, उसने यरूशलेम को छुड़ा लिया है।

10     यहोवा ने सारी जातियों के साम्हने अपनी पवित्र भुजा प्रगट की है; और पृथ्वी के दूर दूर देशों के सब लोग हमारे परमेश्वर का किया हुआ उद्धार निश्चय देख लेंगे॥

1. Isaiah 52 : 9, 10

9     Break forth into joy, sing together, ye waste places of Jerusalem: for the Lord hath comforted his people, he hath redeemed Jerusalem.

10     The Lord hath made bare his holy arm in the eyes of all the nations; and all the ends of the earth shall see the salvation of our God.

2. उत्पत्ति 1: 27 (परमेश्वर), 28 (से :)

27     तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की।

28     और परमेश्वर ने उन को आशीष दी: और उन से कहा, फूलो-फलो, और पृथ्वी में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो;

2. Genesis 1 : 27 (God), 28 (to :)

27     God created man in his own image, in the image of God created he him; male and female created he them.

28     And God blessed them, and God said unto them, Be fruitful, and multiply, and replenish the earth, and subdue it:

3. उत्पत्ति 2 : 6-8 (से ;), 16, 17, 21, 22

6     तौभी कोहरा पृथ्वी से उठता था जिस से सारी भूमि सिंच जाती थी

7     और यहोवा परमेश्वर ने आदम को भूमि की मिट्टी से रचा और उसके नथनों में जीवन का श्वास फूंक दिया; और आदम जीवता प्राणी बन गया।

8     और यहोवा परमेश्वर ने पूर्व की ओर अदन देश में एक वाटिका लगाई;

16     तब यहोवा परमेश्वर ने आदम को यह आज्ञा दी, कि तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है:

17     पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाए उसी दिन अवश्य मर जाएगा॥

21     तब यहोवा परमेश्वर ने आदम को भारी नीन्द में डाल दिया, और जब वह सो गया तब उसने उसकी एक पसली निकाल कर उसकी सन्ती मांस भर दिया।

22     और यहोवा परमेश्वर ने उस पसली को जो उसने आदम में से निकाली थी, स्त्री बना दिया; और उसको आदम के पास ले आया।

3. Genesis 2 : 6-8 (to ;), 16, 17, 21, 22

6     But there went up a mist from the earth, and watered the whole face of the ground.

7     And the Lord God formed man of the dust of the ground, and breathed into his nostrils the breath of life; and man became a living soul.

8     And the Lord God planted a garden eastward in Eden;

16     And the Lord God commanded the man, saying, Of every tree of the garden thou mayest freely eat:

17     But of the tree of the knowledge of good and evil, thou shalt not eat of it: for in the day that thou eatest thereof thou shalt surely die.

21     And the Lord God caused a deep sleep to fall upon Adam, and he slept: and he took one of his ribs, and closed up the flesh instead thereof;

22     And the rib, which the Lord God had taken from man, made he a woman, and brought her unto the man.

4. उत्पत्ति 3 : 1-6, 9, 12, 13

1     यहोवा परमेश्वर ने जितने बनैले पशु बनाए थे, उन सब में सर्प धूर्त था, और उसने स्त्री से कहा, क्या सच है, कि परमेश्वर ने कहा, कि तुम इस बाटिका के किसी वृक्ष का फल न खाना?

2     स्त्री ने सर्प से कहा, इस बाटिका के वृक्षों के फल हम खा सकते हैं।

3     पर जो वृक्ष बाटिका के बीच में है, उसके फल के विषय में परमेश्वर ने कहा है कि न तो तुम उसको खाना और न उसको छूना, नहीं तो मर जाओगे।

4     तब सर्प ने स्त्री से कहा, तुम निश्चय न मरोगे,

5     वरन परमेश्वर आप जानता है, कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आंखें खुल जाएंगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे।

6     सो जब स्त्री ने देखा कि उस वृक्ष का फल खाने में अच्छा, और देखने में मनभाऊ, और बुद्धि देने के लिये चाहने योग्य भी है, तब उसने उस में से तोड़कर खाया; और अपने पति को भी दिया, और उसने भी खाया।

9     तब यहोवा परमेश्वर ने पुकार कर आदम से पूछा, तू कहां है?

12     आदम ने कहा जिस स्त्री को तू ने मेरे संग रहने को दिया है उसी ने उस वृक्ष का फल मुझे दिया, और मैं ने खाया।

13     तब यहोवा परमेश्वर ने स्त्री से कहा, तू ने यह क्या किया है? स्त्री ने कहा, सर्प ने मुझे बहका दिया तब मैं ने खाया।

4. Genesis 3 : 1-6, 9, 12, 13

1     Now the serpent was more subtil than any beast of the field which the Lord God had made. And he said unto the woman, Yea, hath God said, Ye shall not eat of every tree of the garden?

2     And the woman said unto the serpent, We may eat of the fruit of the trees of the garden:

3     But of the fruit of the tree which is in the midst of the garden, God hath said, Ye shall not eat of it, neither shall ye touch it, lest ye die.

4     And the serpent said unto the woman, Ye shall not surely die:

5     For God doth know that in the day ye eat thereof, then your eyes shall be opened, and ye shall be as gods, knowing good and evil.

6     And when the woman saw that the tree was good for food, and that it was pleasant to the eyes, and a tree to be desired to make one wise, she took of the fruit thereof, and did eat, and gave also unto her husband with her; and he did eat.

9     And the Lord God called unto Adam, and said unto him, Where art thou?

12     And the man said, The woman whom thou gavest to be with me, she gave me of the tree, and I did eat.

13     And the Lord God said unto the woman, What is this that thou hast done? And the woman said, The serpent beguiled me, and I did eat.

5. लूका 4 : 1 (से 1st ,)

1     फिर यीशु पवित्रआत्मा से भरा हुआ, यरदन से लैटा;

5. Luke 4 : 1 (to 1st ,)

1     And Jesus being full of the Holy Ghost returned from Jordan,

6. लूका 7 : 36-50

36     फिर किसी फरीसी ने उस से बिनती की, कि मेरे साथ भोजन कर; सो वह उस फरीसी के घर में जाकर भोजन करने बैठा।

37     और देखो, उस नगर की एक पापिनी स्त्री यह जानकर कि वह फरीसी के घर में भोजन करने बैठा है, संगमरमर के पात्र में इत्र लाई।

38     और उसके पांवों के पास, पीछे खड़ी होकर, रोती हुई, उसके पांवों को आंसुओं से भिगाने और अपने सिर के बालों से पोंछने लगी और उसके पांव बारबार चूमकर उन पर इत्र मला।

39     यह देखकर, वह फरीसी जिस ने उसे बुलाया था, अपने मन में सोचने लगा, यदि यह भविष्यद्वक्ता होता तो जान लेता, कि यह जो उसे छू रही है, वह कौन और कैसी स्त्री है? क्योंकि वह तो पापिनी है।

40     यह सुन यीशु ने उसके उत्तर में कहा; कि हे शमौन मुझे तुझ से कुछ कहना है वह बोला, हे गुरू कह।

41     किसी महाजन के दो देनदार थे, एक पांच सौ, और दूसरा पचास दीनार धारता था।

42     जब कि उन के पास पटाने को कुछ न रहा, तो उस ने दोनो को क्षमा कर दिया: सो उन में से कौन उस से अधिक प्रेम रखेगा।

43     शमौन ने उत्तर दिया, मेरी समझ में वह, जिस का उस ने अधिक छोड़ दिया: उस ने उस से कहा, तू ने ठीक विचार किया है।

44     और उस स्त्री की ओर फिरकर उस ने शमौन से कहा; क्या तू इस स्त्री को देखता है मैं तेरे घर में आया परन्तु तू ने मेरे पांव धाने के लिये पानी न दिया, पर इस ने मेरे पांव आंसुओं से भिगाए, और अपने बालों से पोंछा!

45     तू ने मुझे चूमा न दिया, पर जब से मैं आया हूं तब से इस ने मेरे पांवों का चूमना न छोड़ा।

46     तू ने मेरे सिर पर तेल नहीं मला; पर इस ने मेरे पांवों पर इत्र मला है।

47     इसलिये मैं तुझ से कहता हूं; कि इस के पाप जो बहुत थे, क्षमा हुए, क्योंकि इस ने बहुत प्रेम किया; पर जिस का थोड़ा क्षमा हुआ है, वह थोड़ा प्रेम करता है।

48     और उस ने स्त्री से कहा, तेरे पाप क्षमा हुए।

49     तब जो लोग उसके साथ भोजन करने बैठे थे, वे अपने अपने मन में सोचने लगे, यह कौन है जो पापों को भी क्षमा करता है?

50     पर उस ने स्त्री से कहा, तेरे विश्वास ने तुझे बचा लिया है, कुशल से चली जा॥

6. Luke 7 : 36-50

36     And one of the Pharisees desired him that he would eat with him. And he went into the Pharisee’s house, and sat down to meat.

37     And, behold, a woman in the city, which was a sinner, when she knew that Jesus sat at meat in the Pharisee’s house, brought an alabaster box of ointment,

38     And stood at his feet behind him weeping, and began to wash his feet with tears, and did wipe them with the hairs of her head, and kissed his feet, and anointed them with the ointment.

39     Now when the Pharisee which had bidden him saw it, he spake within himself, saying, This man, if he were a prophet, would have known who and what manner of woman this is that toucheth him: for she is a sinner.

40     And Jesus answering said unto him, Simon, I have somewhat to say unto thee. And he saith, Master, say on.

41     There was a certain creditor which had two debtors: the one owed five hundred pence, and the other fifty.

42     And when they had nothing to pay, he frankly forgave them both. Tell me therefore, which of them will love him most?

43     Simon answered and said, I suppose that he, to whom he forgave most. And he said unto him, Thou hast rightly judged.

44     And he turned to the woman, and said unto Simon, Seest thou this woman? I entered into thine house, thou gavest me no water for my feet: but she hath washed my feet with tears, and wiped them with the hairs of her head.

45     Thou gavest me no kiss: but this woman since the time I came in hath not ceased to kiss my feet.

46     M     y head with oil thou didst not anoint: but this woman hath anointed my feet with ointment.

47     Wherefore I say unto thee, Her sins, which are many, are forgiven; for she loved much: but to whom little is forgiven, the same loveth little.

48     And he said unto her, Thy sins are forgiven.

49     And they that sat at meat with him began to say within themselves, Who is this that forgiveth sins also?

50     And he said to the woman, Thy faith hath saved thee; go in peace.

7. I पतरस 1 : 18 (तुझे पता है)-21

18     ... तुम जानते हो, कि तुम्हारा निकम्मा चाल-चलन जो बाप दादों से चला आता है उस से तुम्हारा छुटकारा चान्दी सोने अर्थात नाशमान वस्तुओं के द्वारा नहीं हुआ।

19     पर निर्दोष और निष्कलंक मेम्ने अर्थात मसीह के बहुमूल्य लोहू के द्वारा हुआ।

20     उसका ज्ञान तो जगत की उत्पत्ति के पहिले ही से जाना गया था, पर अब इस अन्तिम युग में तुम्हारे लिये प्रगट हुआ।

21     जो उसके द्वारा उस परमेश्वर पर विश्वास करते हो, जिस ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, और महिमा दी; कि तुम्हारा विश्वास और आशा परमेश्वर पर हो।

7. I Peter 1 : 18 (ye know)-21

18     …ye know that ye were not redeemed with corruptible things, as silver and gold, from your vain conversation received by tradition from your fathers;

19     But with the precious blood of Christ, as of a lamb without blemish and without spot:

20     Who verily was foreordained before the foundation of the world, but was manifest in these last times for you,

21     Who by him do believe in God, that raised him up from the dead, and gave him glory; that your faith and hope might be in God.

8. I कुरिन्थियों 15 : 22

22     और जैसे आदम में सब मरते हैं, वैसा ही मसीह में सब जिलाए जाएंगे।

8. I Corinthians 15 : 22

22     For as in Adam all die, even so in Christ shall all be made alive.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 591: 5-7

आदमी। अनंत आत्मा का यौगिक विचार; भगवान की आध्यात्मिक छवि और समानता; मन का पूर्ण प्रतिनिधित्व।

1. 591 : 5-7

Man.The compound idea of infinite Spirit; the spiritual image and likeness of God; the full representation of Mind.

2. 258 : 9-24

मनुष्य अंदर एक मन के साथ एक भौतिक रूप से अधिक है, जिसे अमर होने के लिए अपने वातावरण से बचना चाहिए। मनुष्य अनंतता को दर्शाता है, और यह प्रतिबिंब भगवान का सही विचार है।

ईश्वर मनुष्य में अनंत विचार व्यक्त करता है जो हमेशा अपने आप को विकसित करता है, एक व्यापक आधार से ऊंचा और ऊंचा होता है। मन सत्य की अनंतता में मौजूद है। हम ईश्वर के बारे में मनुष्य की सच्ची ईश्वरीय छवि और समानता के रूप में नहीं जानते हैं।

अनंत सिद्धांत अनंत विचार और आध्यात्मिक व्यक्तित्व द्वारा परिलक्षित होता है, लेकिन तथाकथित इंद्रियों की सामग्री का सिद्धांत या उसके विचार का कोई संज्ञान नहीं है। मानव क्षमताएँ बढ़ जाती हैं और अनुपात में परिपूर्ण हो जाती हैं क्योंकि मानवता मनुष्य और ईश्वर की सच्ची अवधारणा को प्राप्त करती है।

2. 258 : 9-24

Man is more than a material form with a mind inside, which must escape from its environments in order to be immortal. Man reflects infinity, and this reflection is the true idea of God.

God expresses in man the infinite idea forever developing itself, broadening and rising higher and higher from a boundless basis. Mind manifests all that exists in the infinitude of Truth. We know no more of man as the true divine image and likeness, than we know of God.

The infinite Principle is reflected by the infinite idea and spiritual individuality, but the material so-called senses have no cognizance of either Principle or its idea. The human capacities are enlarged and perfected in proportion as humanity gains the true conception of man and God.

3. 502: 9-14 (से.)

आध्यात्मिक रूप से अनुसरण किया जाता है, उत्पत्ति की पुस्तक भगवान की असत्य छवि का इतिहास है, जिसे एक पापी नश्वर नाम दिया गया है। सही तरीके से देखे जाने का यह विक्षेप भगवान के उचित प्रतिबिंब और मनुष्य की आध्यात्मिक वास्तविकता का सुझाव देने का कार्य करता है, जैसा कि उत्पत्ति के पहले अध्याय में दिया गया है।

3. 502 : 9-14 (to .)

Spiritually followed, the book of Genesis is the history of the untrue image of God, named a sinful mortal. This deflection of being, rightly viewed, serves to suggest the proper reflection of God and the spiritual actuality of man, as given in the first chapter of Genesis.

4. 92 : 11-20

पुरानी बाइबल की तस्वीरों में हम ज्ञान और वृक्ष के चारों ओर एक सर्प को देख रहे हैं जो आदम और हव्वा से बात कर रहा है। यह सांप का प्रतिनिधित्व करता है हमारे पहले माता-पिता को अच्छे और बुरे का ज्ञान देने के लिए, इसका अर्थ है आत्मा से बदले हुए पदार्थ या बुराई से प्राप्त ज्ञान। नश्वर मनुष्य की सामान्य अवधारणा के लिए चित्रण अभी भी ग्राफिक रूप से सटीक है — भगवान के आदमी की एक बरछी — यह मानवीय ज्ञान या कामुकता का एक बहुत बड़ा हिस्सा है, जो भौतिक अर्थों का एक मात्र हिस्सा है।

4. 92 : 11-20

In old Scriptural pictures we see a serpent coiled around the tree of knowledge and speaking to Adam and Eve. This represents the serpent in the act of commending to our first parents the knowledge of good and evil, a knowledge gained from matter, or evil, instead of from Spirit. The portrayal is still graphically accurate, for the common conception of mortal man — a burlesque of God’s man — is an outgrowth of human knowledge or sensuality, a mere offshoot of material sense.

5. 481 : 12-23

ज्ञान का निषिद्ध फल, जिसके विरुद्ध ज्ञान मनुष्य को चेतावनी देता है, त्रुटि की गवाही है, अस्तित्व को मृत्यु की दया पर होना, और अच्छाई और बुराई को कम करने में सक्षम होना। इस विषय में पवित्रशास्त्र का महत्व है “भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष,” — भौतिक विश्वास की यह वृद्धि, जिसके बारे में कहा जाता है: “क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाए उसी दिन अवश्य मर जाएगा॥” मानव परिकल्पनाएं पहले बीमारी, पाप और मृत्यु की वास्तविकता को मानती हैं, और फिर उनकी स्वीकार की गई वास्तविकता के कारण इन बुराइयों की आवश्यकता को मानती हैं। ये मानवीय फैसले सभी कलह के कारक हैं।

5. 481 : 12-23

The forbidden fruit of knowledge, against which wisdom warns man, is the testimony of error, declaring existence to be at the mercy of death, and good and evil to be capable of commingling. This is the significance of the Scripture concerning this “tree of the knowledge of good and evil,” — this growth of material belief, of which it is said: “In the day that thou eatest thereof thou shalt surely die.” Human hypotheses first assume the reality of sickness, sin, and death, and then assume the necessity of these evils because of their admitted actuality. These human verdicts are the procurers of all discord.

6. 306 : 30-6

आध्यात्मिक रूप से बनाया गया ईश्वर का मनुष्य भौतिक और नश्वर नहीं है।

सभी मानव कलह के जनक एडम-स्वप्न थे, गहरी नींद, जिसमें इस भ्रम की उत्पत्ति हुई कि जीवन और बुद्धिमत्ता किस पदार्थ से आगे बढ़ी और गुजर गई। यह नास्तिक त्रुटि, या तथाकथित नाग, अभी भी सत्य के विपरीत पर जोर देता है, कह रहा है, “तुम परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे;” इसका मतलब है, मैं सत्य के रूप में वास्तविक और शाश्वत के रूप में त्रुटि करूंगा।

6. 306 : 30-6

God’s man, spiritually created, is not material and mortal.

The parent of all human discord was the Adam-dream, the deep sleep, in which originated the delusion that life and intelligence proceeded from and passed into matter. This pantheistic error, or so-called serpent, insists still upon the opposite of Truth, saying, “Ye shall be as gods;” that is, I will make error as real and eternal as Truth.

7. 533: 26-7

मनुष्य को त्रुटि के अपने ज्ञान के रूप में जांच कर, सत्य महिला को उसकी गलती कबूल करने की मांग करता है। वह कहती है, “सर्प ने मुझे बहका दिया तब मैं ने खाया;” जितना यह कहा जाता है कि नम्र तपस्या में, “मेरी गलती के लिए न तो मनुष्य और न ही भगवान जिम्मेदार होंगे।” वह पहले ही जान चुकी है कि कॉरपोरल सेंस सर्प है। इसलिए वह पहली बार मनुष्य की भौतिक उत्पत्ति में विश्वास को त्यागने और आध्यात्मिक निर्माण करने के लिए। इसके बाद महिला को यीशु की माँ बनने और पुनर्जीवित उद्धारकर्ता को देखने के लिए सक्षम किया गया, जो जल्द ही ईश्वर की रचना करने वाले मृत्युहीन व्यक्ति को प्रकट करने वाली थी। इस महिला ने अपने सच्चे अर्थों में पवित्रशास्त्र की व्याख्या करने के लिए पहली बार सक्षम किया, जो मनुष्य की आध्यात्मिक उत्पत्ति को प्रकट करता है।

7. 533 : 26-7

Truth, cross-questioning man as to his knowledge of error, finds woman the first to confess her fault. She says, “The serpent beguiled me, and I did eat;” as much as to say in meek penitence, “Neither man nor God shall father my fault.” She has already learned that corporeal sense is the serpent. Hence she is first to abandon the belief in the material origin of man and to discern spiritual creation. This hereafter enabled woman to be the mother of Jesus and to behold at the sepulchre the risen Saviour, who was soon to manifest the deathless man of God’s creating. This enabled woman to be first to interpret the Scriptures in their true sense, which reveals the spiritual origin of man.

8. 282: 28-3

जो कुछ भी मनुष्य के पाप को दर्शाता है, या भगवान के विपरीत, या भगवान की अनुपस्थिति, एडम का सपना है, जो न तो माइंड है और न ही मनुष्य है, क्योंकि यह पिता की भीख नहीं है। रूपांतरण का नियम गलती से इसके विपरीत, सत्य से प्रभावित होता है; लेकिन सत्य प्रकाश है जो त्रुटि को दूर करता है। जैसा कि नश्वर आत्मा को समझना शुरू करते हैं, वे इस विश्वास को छोड़ देते हैं कि भगवान के अलावा कोई भी वास्तविक अस्तित्व है।

8. 282 : 28-3

Whatever indicates the fall of man or the opposite of God or God’s absence, is the Adam-dream, which is neither Mind nor man, for it is not begotten of the Father. The rule of inversion infers from error its opposite, Truth; but Truth is the light which dispels error. As mortals begin to understand Spirit, they give up the belief that there is any true existence apart from God.

9. 151: 23-30

वह दिव्य मन जिसने मनुष्य को अपनी छवि और समानता बनाए रखी। मानव मन भगवान के विपरीत है और उसे बंद करना चाहिए, जैसा कि संत पॉल ने घोषणा की है। वह सब जो वास्तव में मौजूद है, वह दिव्य मन और उसका विचार है, और इस मन में संपूर्ण प्राणी सामंजस्यपूर्ण और शाश्वत है। इस तथ्य को देखना और स्वीकार करना, इस शक्ति को प्राप्त करना और सत्य की अग्रणीता का पालन करना सीधा और संकीर्ण तरीका है।

9. 151 : 23-30

The divine Mind that made man maintains His own image and likeness. The human mind is opposed to God and must be put off, as St. Paul declares. All that really exists is the divine Mind and its idea, and in this Mind the entire being is found harmonious and eternal. The straight and narrow way is to see and acknowledge this fact, yield to this power, and follow the leadings of truth.

10. 259: 6 (में)-21

दिव्य विज्ञान में, मनुष्य भगवान की सच्ची छवि है। मसीह यीशु में ईश्वरीय प्रकृति को सर्वश्रेष्ठ रूप से व्यक्त किया गया था, विचार जो मनुष्य को पतित, बीमार, पापी और मरने के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वैज्ञानिक होने और दैवीय उपचार की मसीह की समझ में एक आदर्श सिद्धांत और विचार शामिल हैं, पूर्ण ईश्वर और पूर्ण मनुष्य, विचार और प्रदर्शन के आधार के रूप में।

यदि मनुष्य एक बार परिपूर्ण था, लेकिन अब अपनी पूर्णता खो चुका है, तब मनुष्यों ने ईश्वर की प्रतिवर्त छवि को कभी नहीं माना। खोई हुई छवि कोई छवि नहीं है। सच्ची समानता दिव्य प्रतिबिंब में खो नहीं सकती। इसे समझते हुए, यीशु ने कहा: “इसलिये चाहिये कि तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है”॥

10. 259 : 6 (In)-21

In divine Science, man is the true image of God. The divine nature was best expressed in Christ Jesus, who threw upon mortals the truer reflection of God and lifted their lives higher than their poor thought-models would allow, — thoughts which presented man as fallen, sick, sinning, and dying. The Christlike understanding of scientific being and divine healing includes a perfect Principle and idea, — perfect God and perfect man, — as the basis of thought and demonstration.

If man was once perfect but has now lost his perfection, then mortals have never beheld in man the reflex image of God. The lost image is no image. The true likeness cannot be lost in divine reflection. Understanding this, Jesus said: “Be ye therefore perfect, even as your Father which is in heaven is perfect.”

11. 269: 3-8

माना जाता है कि मन और पदार्थ का सह-अस्तित्व और अच्छे और बुरे का मेल सांप के दर्शन से हुआ है। यीशु के प्रदर्शनों ने गेहूँ के ढेर को हिलाया और एकता और अच्छे, असत्य, कुछ भी नहीं, बुराई की वास्तविकता को उजागर किया।

11. 269 : 3-8

From first to last the supposed coexistence of Mind and matter and the mingling of good and evil have resulted from the philosophy of the serpent. Jesus’ demonstrations sift the chaff from the wheat, and unfold the unity and the reality of good, the unreality, the nothingness, of evil.

12. 171: 4-8 (से 4th,)

भौतिकता के आध्यात्मिक विपरीत के माध्यम से, यहां तक कि मसीह, सत्य के माध्यम से भी, मनुष्य दिव्य विज्ञान की कुंजी के साथ स्वर्ग के द्वार को फिर से खोल देगा, जिसके बारे में मनुष्यों का मानना है कि वे बंद थे, और वह खुद को बेदाग, ईमानदार, शुद्ध और स्वतंत्र पाएंगे,

12. 171 : 4-8 (to 4th ,)

Through discernment of the spiritual opposite of materiality, even the way through Christ, Truth, man will reopen with the key of divine Science the gates of Paradise which human beliefs have closed, and will find himself unfallen, upright, pure, and free.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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