रविवार 12 जनवरी, 2020 |

रविवार 12 जनवरी, 2020



विषयधर्मविधि

SubjectSacrament

वर्ण पाठ: I शमूएल 15: 22

क्या यहोवा होमबलियों, और मेलबलियों से उतना प्रसन्न होता है, जितना कि अपनी बात के माने जाने से प्रसन्न होता है? सुन मानना तो बलि चढ़ाने और कान लगाना मेढ़ों की चर्बी से उत्तम है।



Golden Text: I Samuel 15: 22

Hath the Lord as great delight in burnt offerings and sacrifices, as in obeying the voice of the Lord? Behold, to obey is better than sacrifice, and to hearken than the fat of rams.




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यिर्मयाह 7: 21-24, यिर्मयाह 11: 2-4


21     सेनाओं का यहोवा जो इस्राएल का परमेश्वर है, यों कहता है।

22     क्योंकि जिस समय मैं ने तुम्हारे पूर्वजों को मिस्र देश में से निकाला, उस समय मैं ने उन्हें होमबलि और मेलबलि के विष्य कुछ आज्ञा न दी थी।

23     परन्तु मैं ने तो उन को यह आज्ञा दी कि मेरे वचन को मानो, तब मैं तुम्हारा परमेश्वर हूंगा, और तुम मेरी प्रजा ठहरोगे; और जिस मार्ग की मैं तुम्हें आज्ञा दूं उसी में चलो, तब तुम्हारा भला होगा।

24     पर उन्होंने मेरी न सुनी और न मेरी बातों पर कान लगाया; वे अपनी ही युक्तियों और अपने बुरे मन के हठ पर चलते रहे और पीछे हट गए पर आगे न बढ़े।

2     इस वाचा के वचन सुनो, और यहूदा के पुरुषों और यरूशलेम के रहने वालों से कहो।

3     उन से कहो, इस्राएल का परमेश्वर यहोवा यों कहता है, श्रापित है वह मनुष्य, जो इस वाचा के वचन न माने

4     जिसे मैं ने तुम्हारे पुरखाओं के साथ लोहे की भट्ठी अर्थात मिस्र देश में से निकालने के समय, यह कहके बान्धी थी, मेरी सुनो, और जितनी आज्ञाएं मैं तुम्हें देता हूँ उन सभों का पालन करो। इस से तुम मेरी प्रजा ठहरोगे, और मैं तुम्हारा परमेश्वर ठहरूंगा;

Responsive Reading: Jeremiah 7: 21-24, Jeremiah 11: 2-4

21.     Thus saith the Lord of hosts, the God of Israel;

22.     I spake not unto your fathers, nor commanded them in the day that I brought them out of the land of Egypt, concerning burnt offerings or sacrifices:

23.     But this thing commanded I them, saying, Obey my voice, and I will be your God, and ye shall be my people: and walk ye in all the ways that I have commanded you, that it may be well unto you.

24.     But they hearkened not, nor inclined their ear, but walked in the counsels and in the imagination of their evil heart, and went backward, and not forward.

2.     Hear ye the words of this covenant, and speak unto the men of Judah, and to the inhabitants of Jerusalem;

3.     And say thou unto them, Thus saith the Lord God of Israel; Cursed be the man that obeyeth not the words of this covenant,

4.     Which I commanded your fathers in the day that I brought them forth out of the land of Egypt, from the iron furnace, saying, Obey my voice, and do them, according to all which I command you: so shall ye be my people, and I will be your God.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. निर्गमन 19 : 3-6

3     तब मूसा पर्वत पर परमेश्वर के पास चढ़ गया, और यहोवा ने पर्वत पर से उसको पुकार कर कहा, याकूब के घराने से ऐसा कह, और इस्त्राएलियों को मेरा यह वचन सुना,

4     कि तुम ने देखा है कि मैं ने मिस्रियोंसे क्या क्या किया; तुम को मानो उकाब पक्षी के पंखों पर चढ़ाकर अपने पास ले आया हूं।

5     इसलिये अब यदि तुम निश्चय मेरी मानोगे, और मेरी वाचा का पालन करोगे, तो सब लोगों में से तुम ही मेरा निज धन ठहरोगे; समस्त पृथ्वी तो मेरी है।

6     और तुम मेरी दृष्टि में याजकों का राज्य और पवित्र जाति ठहरोगे। जो बातें तुझे इस्त्राएलियों से कहनी हैं वे ये ही हैं।

1. Exodus 19 : 3-6

3     And Moses went up unto God, and the Lord called unto him out of the mountain, saying, Thus shalt thou say to the house of Jacob, and tell the children of Israel;

4     Ye have seen what I did unto the Egyptians, and how I bare you on eagles’ wings, and brought you unto myself.

5     Now therefore, if ye will obey my voice indeed, and keep my covenant, then ye shall be a peculiar treasure unto me above all people: for all the earth is mine:

6     And ye shall be unto me a kingdom of priests, and an holy nation. These are the words which thou shalt speak unto the children of Israel.

2. व्यवस्थाविवरण 4 : 39, 40

39     सो आज जान ले, और अपने मन में सोच भी रख, कि ऊपर आकाश में और नीचे पृथ्वी पर यहोवा ही परमेश्वर है; और कोई दूसरा नहीं।

40     और तू उसकी विधियों और आज्ञाओं को जो मैं आज तुझे सुनाता हूं मानना, इसलिये कि तेरा और तेरे पीछे तेरे वंश का भी भला हो, और जो देश तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे देता है उस में तेरे दिन बहुत वरन सदा के लिये हों।

2. Deuteronomy 4 : 39, 40

39     Know therefore this day, and consider it in thine heart, that the Lord he is God in heaven above, and upon the earth beneath: there is none else.

40     Thou shalt keep therefore his statutes, and his commandments, which I command thee this day, that it may go well with thee, and with thy children after thee, and that thou mayest prolong thy days upon the earth, which the Lord thy God giveth thee, for ever.

3. मरकुस 1 : 14, 15, 21-27

14     यूहन्ना के पकड़वाए जाने के बाद यीशु ने गलील में आकर परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार प्रचार किया।

15     और कहा, समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है; मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो॥

21     और वे कफरनहूम में आए, और वह तुरन्त सब्त के दिन सभा के घर में जाकर उपदेश करने लगा।

22     और लोग उसके उपदेश से चकित हुए; क्योंकि वह उन्हें शास्त्रियों की नाईं नहीं, परन्तु अधिकारी की नाई उपदेश देता था।

23     और उसी समय, उन की सभा के घर में एक मनुष्य था, जिस में एक अशुद्ध आत्मा थी।

24     उस ने चिल्लाकर कहा, हे यीशु नासरी, हमें तुझ से क्या काम?क्या तू हमें नाश करने आया है? मैं तुझे जानता हूं, तू कौन है? परमेश्वर का पवित्र जन!

25     यीशु ने उसे डांटकर कहा, चुप रह; और उस में से निकल जा।

26     तब अशुद्ध आत्मा उस को मरोड़कर, और बड़े शब्द से चिल्लाकर उस में से निकल गई।

27     इस पर सब लोग आश्चर्य करते हुए आपस में वाद-विवाद करने लगे कि यह क्या बात है? यह तो कोई नया उपदेश है! वह अधिकार के साथ अशुद्ध आत्माओं को भी आज्ञा देता है, और वे उस की आज्ञा मानती हैं।

3. Mark 1 : 14, 15, 21-27

14     Now after that John was put in prison, Jesus came into Galilee, preaching the gospel of the kingdom of God,

15     And saying, The time is fulfilled, and the kingdom of God is at hand: repent ye, and believe the gospel.

21     And they went into Capernaum; and straightway on the sabbath day he entered into the synagogue, and taught.

22     And they were astonished at his doctrine: for he taught them as one that had authority, and not as the scribes.

23     And there was in their synagogue a man with an unclean spirit; and he cried out,

24     Saying, Let us alone; what have we to do with thee, thou Jesus of Nazareth? art thou come to destroy us? I know thee who thou art, the Holy One of God.

25     And Jesus rebuked him, saying, Hold thy peace, and come out of him.

26     And when the unclean spirit had torn him, and cried with a loud voice, he came out of him.

27     And they were all amazed, insomuch that they questioned among themselves, saying, What thing is this? what new doctrine is this? for with authority commandeth he even the unclean spirits, and they do obey him.

4. यूहन्ना 14 : 9 (तक कहा), 12, 13, 15

9     यीशु कहा।

12     मैं तुम से सच सच कहता हूं, कि जो मुझ पर विश्वास रखता है, ये काम जो मैं करता हूं वह भी करेगा, वरन इन से भी बड़े काम करेगा, क्योंकि मैं पिता के पास जाता हूं।

13     और जो कुछ तुम मेरे नाम से मांगोगे, वही मैं करूंगा कि पुत्र के द्वारा पिता की महिमा हो।

15     यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे।

4. John 14 : 9 (to saith), 12, 13, 15

9     Jesus saith

12     Verily, verily, I say unto you, He that believeth on me, the works that I do shall he do also; and greater works than these shall he do; because I go unto my Father.

13     And whatsoever ye shall ask in my name, that will I do, that the Father may be glorified in the Son.

15     If ye love me, keep my commandments.

5. मरकुस 14 : 1, 16, 17, 22-25

1     दो दिन के बाद फसह और अखमीरी रोटी का पर्व्व होनेवाला था: और महायाजक और शास्त्री इस बात की खोज में थे कि उसे क्योंकर छल से पकड़ कर मार डालें।

16     सो चेले निकलकर नगर में आये और जैसा उस ने उन से कहा था, वैसा ही पाया, और फसह तैयार किया॥

17     जब सांझ हुई, तो वह बारहों के साथ आया।

22     और जब वे खा ही रहे थे तो उस ने रोटी ली, और आशीष मांगकर तोड़ी, और उन्हें दी, और कहा, लो, यह मेरी देह है।

23     फिर उस ने कटोरा लेकर धन्यवाद किया, और उन्हें दिया; और उन सब ने उस में से पीया।

24     और उस ने उन से कहा, यह वाचा का मेरा वह लोहू है, जो बहुतों के लिये बहाया जाता है।

25     मैं तुम से सच कहता हूं, कि दाख का रस उस दिन तक फिर कभी न पीऊंगा, जब तक परमेश्वर के राज्य में नया न पीऊं॥

5. Mark 14 : 1, 16, 17, 22-25

1     After two days was the feast of the passover, and of unleavened bread: and the chief priests and the scribes sought how they might take him by craft, and put him to death.

16     And his disciples went forth, and came into the city, and found as he had said unto them: and they made ready the passover.

17     And in the evening he cometh with the twelve.

22     And as they did eat, Jesus took bread, and blessed, and brake it, and gave to them, and said, Take, eat: this is my body.

23     And he took the cup, and when he had given thanks, he gave it to them: and they all drank of it.

24     And he said unto them, This is my blood of the new testament, which is shed for many.

25     Verily I say unto you, I will drink no more of the fruit of the vine, until that day that I drink it new in the kingdom of God.

6. यूहन्ना 19 : 1, 17, 18 (से 1st ,)

1     इस पर पीलातुस ने यीशु को लेकर कोड़े लगवाए।

17     और वह अपना क्रूस उठाए हुए उस स्थान तक बाहर गया, जो खोपड़ी का स्थान कहलाता है और इब्रानी में गुलगुता।

18     वहां उन्होंने उसे को क्रूस प।

6. John 19 : 1, 17, 18 (to 1st ,)

1     Then Pilate therefore took Jesus, and scourged him.

17     And he bearing his cross went forth into a place called the place of a skull, which is called in the Hebrew Golgotha:

18     Where they crucified him,

7. यूहन्ना 21 : 1 (से ;), 14-17

1     इन बातों के बाद यीशु ने अपने आप को तिबिरियास झील के किनारे चेलों पर प्रगट किया रीति से प्रगट किया।

14     और इस यह तीसरी बार है, कि यीशु ने मरे हुओं में से जी उठने के बाद चेलों को दर्शन दिए॥

15     भोजन करने के बाद यीशु ने शमौन पतरस से कहा, हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू इन से बढ़कर मुझ से प्रेम रखता है? उस ने उस से कहा, हां प्रभु तू तो जानता है, कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूं: उस ने उस से कहा, मेरे मेमनों को चरा।

16     उस ने फिर दूसरी बार उस से कहा, हे शमौन यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है? उस ने उन से कहा, हां, प्रभु तू जानता है, कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूं: उस ने उस से कहा, मेरी भेड़ों की रखवाली कर।

17     उस ने तीसरी बार उस से कहा, हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रीति रखता है? पतरस उदास हुआ, कि उस ने उसे तीसरी बार ऐसा कहा; कि क्या तू मुझ से प्रीति रखता है? और उस से कहा, हे प्रभु, तू तो सब कुछ जानता है: तू यह जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूं: यीशु ने उस से कहा, मेरी भेड़ों को चरा।

7. John 21 : 1 (to ;), 14-17

1     After these things Jesus shewed himself again to the disciples at the sea of Tiberias;

14     This is now the third time that Jesus shewed himself to his disciples, after that he was risen from the dead.

15     So when they had dined, Jesus saith to Simon Peter, Simon, son of Jonas, lovest thou me more than these? He saith unto him, Yea, Lord; thou knowest that I love thee. He saith unto him, Feed my lambs.

16     He saith to him again the second time, Simon, son of Jonas, lovest thou me? He saith unto him, Yea, Lord; thou knowest that I love thee. He saith unto him, Feed my sheep.

17     He saith unto him the third time, Simon, son of Jonas, lovest thou me? Peter was grieved because he said unto him the third time, Lovest thou me? And he said unto him, Lord, thou knowest all things; thou knowest that I love thee. Jesus saith unto him, Feed my sheep.

8. रोमियो 6 : 16-18

16     क्या तुम नहीं जानते, कि जिस की आज्ञा मानने के लिये तुम अपने आप को दासों की नाईं सौंप देते हो, उसी के दास हो: और जिस की मानते हो, चाहे पाप के, जिस का अन्त मृत्यु है, चाहे आज्ञा मानने के, जिस का अन्त धामिर्कता है

17     परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, कि तुम जो पाप के दास थे तौभी मन से उस उपदेश के मानने वाले हो गए, जिस के सांचे में ढाले गए थे।

18     और पाप से छुड़ाए जाकर धर्म के दास हो गए।

8. Romans 6 : 16-18

16     Know ye not, that to whom ye yield yourselves servants to obey, his servants ye are to whom ye obey; whether of sin unto death, or of obedience unto righteousness?

17     But God be thanked, that ye were the servants of sin, but ye have obeyed from the heart that form of doctrine which was delivered you.

18     Being then made free from sin, ye became the servants of righteousness.

9. II कुरिन्थियों 10 : 3-5

3     क्योंकि यद्यपि हम शरीर में चलते फिरते हैं, तौभी शरीर के अनुसार नहीं लड़ते।

4     क्योंकि हमारी लड़ाई के हथियार शारीरिक नहीं, पर गढ़ों को ढा देने के लिये परमेश्वर के द्वारा सामर्थी हैं।

5     सो हम कल्पनाओं को, और हर एक ऊंची बात को, जो परमेश्वर की पहिचान के विरोध में उठती है, खण्डन करते हैं; और हर एक भावना को कैद करके मसीह का आज्ञाकारी बना देते हैं।

9. II Corinthians 10 : 3-5

3     For though we walk in the flesh, we do not war after the flesh:

4     (For the weapons of our warfare are not carnal, but mighty through God to the pulling down of strong holds;)

5     Casting down imaginations, and every high thing that exalteth itself against the knowledge of God, and bringing into captivity every thought to the obedience of Christ;



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 295 : 5-8

भगवान मनुष्य सहित ब्रह्मांड का निर्माण और संचालन करता है। ब्रह्मांड आध्यात्मिक विचारों से भरा है, जिसे वह विकसित करता है, और वे मन के आज्ञाकारी हैं जो उन्हें बनाता है।

1. 295 : 5-8

God creates and governs the universe, including man. The universe is filled with spiritual ideas, which He evolves, and they are obedient to the Mind that makes them.

2. 183 : 21-29

डिवाइन माइंड सही ढंग से मनुष्य की संपूर्ण आज्ञाकारिता, स्नेह और शक्ति की माँग करता है। किसी भी कम निष्ठा के लिए कोई आरक्षण नहीं किया जाता है। सत्य का पालन मनुष्य को शक्ति और सामर्थ्य देता है। त्रुटि के अधीन होने से शक्ति का नुकसान होता है।

सत्य वास्तविक आध्यात्मिक कानून के साथ सभी बुराइयों और भौतिकवादी तरीकों को निकालता है, — वह कानून जो अंधे को दृष्टि देता है, बहरे को सुनता है, गूंगे को आवाज देता है, पैर को लंगड़ा करता है।

2. 183 : 21-29

Divine Mind rightly demands man’s entire obedience, affection, and strength. No reservation is made for any lesser loyalty. Obedience to Truth gives man power and strength. Submission to error superinduces loss of power.

Truth casts out all evils and materialistic methods with the actual spiritual law, — the law which gives sight to the blind, hearing to the deaf, voice to the dumb, feet to the lame.

3. 7 : 17-20

भगवान की अज्ञानता अब विश्वास के रास्ते का पत्थर नहीं है। आज्ञाकारिता का एकमात्र ज़मानता उसी की एक सही आशंका है जिसे जानने के लिए जीवन अनन्त है।

3. vii : 17-20

Ignorance of God is no longer the steppingstone to faith. The only guarantee of obedience is a right apprehension of Him whom to know aright is Life eternal.

4. 140 : 7-13

भौतिक रूप से नहीं बल्कि आध्यात्मिक रूप से हम उसे दिव्य मन, जीवन, सत्य और प्रेम के रूप में जानते हैं। जब हम ईश्वरीय प्रकृति को समझ लेते हैं और उसी रूप से प्रेम करते हैं, तो हम उस अनुपात को स्वीकार करेंगे और उसका पालन करेंगे, जो कि नगरपालिका से अधिक नहीं, बल्कि हमारे ईश्वर के सान्निध्य में आनन्दित होगा। तब धर्म हृदय का होगा, मस्तिष्क का नहीं।

4. 140 : 7-13

Not materially but spiritually we know Him as divine Mind, as Life, Truth, and Love. We shall obey and adore in proportion as we apprehend the divine nature and love Him understandingly, warring no more over the corporeality, but rejoicing in the affluence of our God. Religion will then be of the heart and not of the head.

5. 182 : 18-22

शरीर की मन की सरकार को सामग्री के तथाकथित कानूनों का समर्थन करना चाहिए। भौतिक कानून का पालन करने से आध्यात्मिक कानून का पूर्ण पालन होता है, — वह कानून जो भौतिक स्थितियों पर काबू पाता है और सामग्री को मन के पैरों के नीचे रखता है।

5. 182 : 18-22

Mind’s government of the body must supersede the so-called laws of matter. Obedience to material law prevents full obedience to spiritual law, — the law which overcomes material conditions and puts matter under the feet of Mind.

6. 25 : 13-31

यीशु ने प्रदर्शन के द्वारा जीवन का मार्ग सिखाया, कि हम समझ सकते हैं कि यह दिव्य सिद्धांत कैसे बीमारों को चंगा करता है, त्रुटि को जन्म देता है, और मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है। यीशु ने ईश्वर के आदर्श को किसी भी ऐसे व्यक्ति की तुलना में बेहतर प्रस्तुत किया जिसकी उत्पत्ति कम आध्यात्मिक थी। परमेश्वर की आज्ञाकारिता के द्वारा, उसने आध्यात्मिक रूप से सभी दूसरों के सिद्धांत का प्रदर्शन किया। अत: उसके पालन की शक्ति, "यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे।"

यद्यपि पाप और बीमारी पर अपने नियंत्रण का प्रदर्शन, किसी भी तरह से महान शिक्षक ने दूसरों को अपने स्वयं के पवित्रता के अपेक्षित प्रमाण देने से राहत नहीं दी। उन्होंने उनके मार्गदर्शन के लिए काम किया, ताकि वे इस शक्ति का प्रदर्शन कर सकें, जैसा कि उन्होंने किया और इसके दिव्य सिद्धांत को समझा। शिक्षक के प्रति विश्वास और सभी भावनात्मक प्रेम हम उस पर पूरा कर सकते हैं, कभी भी हमें उसका अनुकरण करने वाला नहीं बनाएंगे। हमें इसी तरह से जाना चाहिए और करना चाहिए, अन्यथा हम उन महान आशीषों में सुधार नहीं कर रहे हैं जो हमारे मास्टर ने काम किया था और हमारे लिए सबसे अच्छा था। मसीह की दिव्यता को यीशु की मानवता में प्रकट किया गया था।

6. 25 : 13-31

Jesus taught the way of Life by demonstration, that we may understand how this divine Principle heals the sick, casts out error, and triumphs over death. Jesus presented the ideal of God better than could any man whose origin was less spiritual. By his obedience to God, he demonstrated more spiritually than all others the Principle of being. Hence the force of his admonition, “If ye love me, keep my commandments.”

Though demonstrating his control over sin and disease, the great Teacher by no means relieved others from giving the requisite proofs of their own piety. He worked for their guidance, that they might demonstrate this power as he did and understand its divine Principle. Implicit faith in the Teacher and all the emotional love we can bestow on him, will never alone make us imitators of him. We must go and do likewise, else we are not improving the great blessings which our Master worked and suffered to bestow upon us. The divinity of the Christ was made manifest in the humanity of Jesus.

7. 20 : 14-23

यीशु ने हमारी दुर्बलताओं को लिया; वह नश्वर विश्वास की त्रुटि जानता था, और "उसकी धारियों द्वारा [त्रुटि की अस्वीकृति द्वारा] हम ठीक हो गए हैं।" "तुच्छ जाना जाता और मनुष्यों का त्यागा हुआ था," शाप के लिए आशीर्वाद वापस करके, उसने नश्वर को खुद के विपरीत, यहां तक कि भगवान की प्रकृति को सिखाया; और जब त्रुटि ने सत्य की शक्ति को महसूस किया, तो महापुरुष ने क्रॉस और क्रॉस का इंतजार किया। फिर भी उन्होंने यह नहीं कहा कि ईश्वरीय आदेश का पालन करना और ईश्वर पर भरोसा रखना, यह जानते हुए भी पाप से पवित्रता के मार्ग को बदलना और पीछे हटाना है।

7. 20 : 14-23

Jesus bore our infirmities; he knew the error of mortal belief, and “with his stripes [the rejection of error] we are healed.” “Despised and rejected of men,” returning blessing for cursing, he taught mortals the opposite of themselves, even the nature of God; and when error felt the power of Truth, the scourge and the cross awaited the great Teacher. Yet he swerved not, well knowing that to obey the divine order and trust God, saves retracing and traversing anew the path from sin to holiness.

8. 32 : 15-2

"जब वे खा रहे थे, तो यीशु ने रोटी ली, और आशीष मांग कर तोड़ी, और चेलों को देकर कहा, लो, खाओ; यह मेरी देह है। फिर उस ने कटोरा लेकर, धन्यवाद किया, और उन्हें देकर कहा, तुम सब इस में से पीओ।"

सच्ची भावना आध्यात्मिक रूप से खो जाती है, अगर संस्कार रोटी और शराब के उपयोग तक ही सीमित है। चेलों ने खाया था, फिर भी यीशु ने प्रार्थना की और उन्हें रोटी दी। यह एक शाब्दिक अर्थ में मूर्खतापूर्ण होता; लेकिन इसके आध्यात्मिक संकेत में, यह प्राकृतिक और सुंदर था। जीसस ने प्रार्थना की; वह आध्यात्मिक विचारों के साथ अपने दिल को ताज़ा करने के लिए भौतिक इंद्रियों से पीछे हट गया।

फसह, जो यीशु ने अपने क्रूस पर चढ़ने से पहले रात को निसान के महीने में अपने शिष्यों के साथ खाया था, एक दुखद अवसर था, दिन के अंत में लिया गया एक उदास भोजन, छाया के साथ एक शानदार कैरियर के धुंधलेपन में तेजी से गिर रहा था; और इस भोजन ने हमेशा के लिए यीशु के कर्मकांड या रियायतों को समाप्त कर दिया।

8. 32 : 15-2

“As they were eating, Jesus took bread, and blessed it and brake it, and gave it to the disciples, and said, Take, eat; this is my body. And he took the cup, and gave thanks, and gave it to them saying, Drink ye all of it.”

The true sense is spiritually lost, if the sacrament is confined to the use of bread and wine. The disciples had eaten, yet Jesus prayed and gave them bread. This would have been foolish in a literal sense; but in its spiritual signification, it was natural and beautiful. Jesus prayed; he withdrew from the material senses to refresh his heart with brighter, with spiritual views.

The Passover, which Jesus ate with his disciples in the month Nisan on the night before his crucifixion, was a mournful occasion, a sad supper taken at the close of day, in the twilight of a glorious career with shadows fast falling around; and this supper closed forever Jesus’ ritualism or concessions to matter.

9. 31: 12-22 (से.)

सबसे पहले ईसाई कर्तव्यों की सूची में, उन्होंने अपने अनुयायियों को सत्य और प्रेम की उपचार शक्ति सिखाई। उन्होंने मृत समारोहों के लिए कोई महत्व नहीं दिया। यह जीवित मसीह है, व्यावहारिक सत्य है, जो यीशु को उन सभी लोगों के लिए "पुनरुत्थान और जीवन" बनाता है जो उसे विलेख में पालन करते हैं। उनकी कीमती उपदेशों का पालन करते हुए, — उनके प्रदर्शन के बाद अब तक हम इसे स्वीकार करते हैं, — हम उसके प्याले को पीते हैं, हम उसकी रोटी का हिस्सा बनाते हैं, उसकी पवित्रता से बपतिस्मा लेते हैं: और अंत में हम मृत्यु के ऊपर विजय प्राप्त करने वाले दिव्य सिद्धांत की पूर्ण समझ में, उसके साथ बैठेंगे।

9. 31 : 12-22 (to .)

First in the list of Christian duties, he taught his followers the healing power of Truth and Love. He attached no importance to dead ceremonies. It is the living Christ, the practical Truth, which makes Jesus “the resurrection and the life” to all who follow him in deed. Obeying his precious precepts, — following his demonstration so far as we apprehend it, — we drink of his cup, partake of his bread, are baptized with his purity; and at last we shall rest, sit down with him, in a full understanding of the divine Principle which triumphs over death.

10. 14 : 5-11

हम "दो स्वामी की सेवा नहीं कर सकते।" "प्रभु के साथ वर्तमान" होना, केवल भावनात्मक परमानंद या विश्वास नहीं है, बल्कि वास्तविक प्रदर्शन और जीवन की समझ है जैसा कि क्राइस्टियन साइंस में सामने आया है। "प्रभु के साथ" होना ईश्वर के कानून का पालन करना है, परमात्मा द्वारा पूर्ण रूप से शासित होना, - आत्मा द्वारा, पदार्थ द्वारा नहीं।

10. 14 : 5-11

We cannot “serve two masters.” To be “present with the Lord” is to have, not mere emotional ecstasy or faith, but the actual demonstration and understanding of Life as revealed in Christian Science. To be “with the Lord” is to be in obedience to the law of God, to be absolutely governed by divine Love, — by Spirit, not by matter.

11. 458 : 23-31

ईसाई वैज्ञानिक वैज्ञानिक ईश्वरीय कानून को दर्शाता है, इस प्रकार यह स्वयं के लिए एक कानून बन जाता है। वह किसी आदमी को हिंसा नहीं करता। न ही वह झूठा अभियुक्त है। साइंटिस्ट बुद्धिमानी से अपने पाठ्यक्रम को आकार देते हैं, और ईश्वरीय मन की अग्रणी का अनुसरण करने में ईमानदार और सुसंगत हैं। उसे जीवित रहने के साथ-साथ उपचार और शिक्षा के माध्यम से साबित करना होगा कि मसीह का मार्ग एकमात्र ऐसा है जिसके द्वारा नश्वर लोगों को पाप और बीमारी से बचाया जाता है।

11. 458 : 23-31

The Christianly scientific man reflects the divine law, thus becoming a law unto himself. He does violence to no man. Neither is he a false accuser. The Christian Scientist wisely shapes his course, and is honest and consistent in following the leadings of divine Mind. He must prove, through living as well as healing and teaching, that Christ’s way is the only one by which mortals are radically saved from sin and sickness.

12. 34 : 10-17

अगर कभी संस्कार का हिस्सा बनने वाले सभी लोगों ने यीशु की पीड़ाओं को याद किया और उनके प्याले को पीया, तो उन्होंने दुनिया में क्रांति ला दी। यदि सभी जो भौतिक प्रतीकों के माध्यम से अपने स्मरणोत्सव की तलाश करते हैं, तो क्रूस को उठाएंगे, बीमारों को चंगा करेंगे, बुराइयों को बाहर निकालेंगे, और गरीबों को मसीह, या सत्य का उपदेश देंगे, - ग्रहणशील विचार, - वे सहस्त्राब्दी में लाएंगे।

12. 34 : 10-17

If all who ever partook of the sacrament had really commemorated the sufferings of Jesus and drunk of his cup, they would have revolutionized the world. If all who seek his commemoration through material symbols will take up the cross, heal the sick, cast out evils, and preach Christ, or Truth, to the poor, — the receptive thought, — they will bring in the millennium.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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