रविवार 12 अप्रैल, 2020 |

रविवार 12 अप्रैल, 2020



विषयक्या पाप, बीमारी और मृत्यु वास्तविक हैं?

SubjectAre Sin, Disease, and Death Real?

वर्ण पाठ: हबक्कूक 1 : 12, 13

हे मेरे प्रभु यहोवा, हे तेरी आंखें ऐसी शुद्ध हैं कि तू बुराई को देख ही नहीं सकता, और उत्पात को देखकर चुप नहीं रह सकता



Golden Text: Habakkuk 1 : 12, 13

O Lord, Thou art of purer eyes than to behold evil, and canst not look on iniquity.




PDF Downloads:


पाठ के ऑडियो के लिए यहां क्लिक करें

YouTube पर सुनने के लिए यहां क्लिक करें

████████████████████████████████████████████████████████████████████████


भजन संहिता 103 : 2, 3 • भजन संहिता 19: 12, 13 • भजन संहिता 116: 3-5


2     हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह, और उसके किसी उपकार को न भूलना।

3     वही तो तेरे सब अधर्म को क्षमा करता, और तेरे सब रोगों को चंगा करता है।

12     अपनी भूलचूक को कौन समझ सकता है? मेरे गुप्त पापों से तू मुझे पवित्र कर।

13     तू अपने दास को ढिठाई के पापों से भी बचाए रख; वह मुझ पर प्रभुता करने न पाएं! तब मैं सिद्ध हो जाऊंगा, और बड़े अपराधों से बचा रहूंगा॥

3     मृत्यु की रस्सियां मेरे चारोंओर थीं; मैं अधोलोक की सकेती में पड़ा था; मुझे संकट और शोक भोगना पड़ा।

4     तब मैं ने यहोवा से प्रार्थना की, कि हे यहोवा बिनती सुन कर मेरे प्राण को बचा ले!

5     यहोवा अनुग्रहकारी और धर्मी है; और हमारा परमेश्वर दया करने वाला है।

Responsive Reading: Psalm 103 : 2, 3 • Psalm 19 : 12, 13 • Psalm 116 : 3-5

2.     Bless the Lord, O my soul, and forget not all his benefits:

3.     Who forgiveth all thine iniquities; who healeth all thy diseases.

12.     Who can understand his errors? cleanse thou me from secret faults.

13.     Keep back thy servant also from presumptuous sins; let them not have dominion over me: then shall I be upright, and I shall be innocent from the great transgression.

3.     The sorrows of death compassed me, and the pains of hell gat hold upon me: I found trouble and sorrow.

4.     Then called I upon the name of the Lord; O Lord, I beseech thee, deliver my soul.

5.     Gracious is the Lord, and righteous; yea, our God is merciful.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. उत्पत्ति 3 : 1-13

1     यहोवा परमेश्वर ने जितने बनैले पशु बनाए थे, उन सब में सर्प धूर्त था, और उसने स्त्री से कहा, क्या सच है, कि परमेश्वर ने कहा, कि तुम इस बाटिका के किसी वृक्ष का फल न खाना?

2     स्त्री ने सर्प से कहा, इस बाटिका के वृक्षों के फल हम खा सकते हैं।

3     पर जो वृक्ष बाटिका के बीच में है, उसके फल के विषय में परमेश्वर ने कहा है कि न तो तुम उसको खाना और न उसको छूना, नहीं तो मर जाओगे।

4     तब सर्प ने स्त्री से कहा, तुम निश्चय न मरोगे,

5     वरन परमेश्वर आप जानता है, कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आंखें खुल जाएंगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे।

6     सो जब स्त्री ने देखा कि उस वृक्ष का फल खाने में अच्छा, और देखने में मनभाऊ, और बुद्धि देने के लिये चाहने योग्य भी है, तब उसने उस में से तोड़कर खाया; और अपने पति को भी दिया, और उसने भी खाया।

7     तब उन दोनों की आंखे खुल गई, और उन को मालूम हुआ कि वे नंगे है; सो उन्होंने अंजीर के पत्ते जोड़ जोड़ कर लंगोट बना लिये।

8     तब यहोवा परमेश्वर जो दिन के ठंडे समय बाटिका में फिरता था उसका शब्द उन को सुनाई दिया। तब आदम और उसकी पत्नी बाटिका के वृक्षों के बीच यहोवा परमेश्वर से छिप गए।

9     तब यहोवा परमेश्वर ने पुकार कर आदम से पूछा, तू कहां है?

10     उसने कहा, मैं तेरा शब्द बारी में सुन कर डर गया क्योंकि मैं नंगा था; इसलिये छिप गया।

11     उसने कहा, किस ने तुझे चिताया कि तू नंगा है? जिस वृक्ष का फल खाने को मैं ने तुझे बर्जा था, क्या तू ने उसका फल खाया है?

12     आदम ने कहा जिस स्त्री को तू ने मेरे संग रहने को दिया है उसी ने उस वृक्ष का फल मुझे दिया, और मैं ने खाया।

13     तब यहोवा परमेश्वर ने स्त्री से कहा, तू ने यह क्या किया है? स्त्री ने कहा, सर्प ने मुझे बहका दिया तब मैं ने खाया।

1. Genesis 3 : 1-13

1     Now the serpent was more subtil than any beast of the field which the Lord God had made. And he said unto the woman, Yea, hath God said, Ye shall not eat of every tree of the garden?

2     And the woman said unto the serpent, We may eat of the fruit of the trees of the garden:

3     But of the fruit of the tree which is in the midst of the garden, God hath said, Ye shall not eat of it, neither shall ye touch it, lest ye die.

4     And the serpent said unto the woman, Ye shall not surely die:

5     For God doth know that in the day ye eat thereof, then your eyes shall be opened, and ye shall be as gods, knowing good and evil.

6     And when the woman saw that the tree was good for food, and that it was pleasant to the eyes, and a tree to be desired to make one wise, she took of the fruit thereof, and did eat, and gave also unto her husband with her; and he did eat.

7     And the eyes of them both were opened, and they knew that they were naked; and they sewed fig leaves together, and made themselves aprons.

8     And they heard the voice of the Lord God walking in the garden in the cool of the day: and Adam and his wife hid themselves from the presence of the Lord God amongst the trees of the garden.

9     And the Lord God called unto Adam, and said unto him, Where art thou?

10     And he said, I heard thy voice in the garden, and I was afraid, because I was naked; and I hid myself.

11     And he said, Who told thee that thou wast naked? Hast thou eaten of the tree, whereof I commanded thee that thou shouldest not eat?

12     And the man said, The woman whom thou gavest to be with me, she gave me of the tree, and I did eat.

13     And the Lord God said unto the woman, What is this that thou hast done? And the woman said, The serpent beguiled me, and I did eat.

2. मत्ती 9 : 35

35     और यीशु सब नगरों और गांवों में फिरता रहा और उन की सभाओं में उपदेश करता, और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और हर प्रकार की बीमारी और दुर्बलता को दूर करता रहा।

2. Matthew 9 : 35

35     And Jesus went about all the cities and villages, teaching in their synagogues, and preaching the gospel of the kingdom, and healing every sickness and every disease among the people.

3. मत्ती 8 : 5-10, 13

5     और जब वह कफरनहूम में आया तो एक सूबेदार ने उसके पास आकर उस से बिनती की।

6     कि हे प्रभु, मेरा सेवक घर में झोले का मारा बहुत दुखी पड़ा है।

7     उस ने उस से कहा; मैं आकर उसे चंगा करूंगा।

8     सूबेदार ने उत्तर दिया; कि हे प्रभु मैं इस योग्य नहीं, कि तू मेरी छत के तले आए, पर केवल मुख से कह दे तो मेरा सेवक चंगा हो जाएगा।

9     क्योंकि मैं भी पराधीन मनुष्य हूं, और सिपाही मेरे हाथ में हैं, और जब एक से कहता हूं, जा, तो वह जाता है; और दूसरे को कि आ, तो वह आता है; और अपने दास से कहता हूं, कि यह कर, तो वह करता है।

10     यह सुनकर यीशु ने अचम्भा किया, और जो उसके पीछे आ रहे थे उन से कहा; मैं तुम से सच कहता हूं, कि मैं ने इस्राएल में भी ऐसा विश्वास नहीं पाया।

13     और यीशु ने सूबेदार से कहा, जा; जैसा तेरा विश्वास है, वैसा ही तेरे लिये हो: और उसका सेवक उसी घड़ी चंगा हो गया॥

3. Matthew 8 : 5-10, 13

5     And when Jesus was entered into Capernaum, there came unto him a centurion, beseeching him,

6     And saying, Lord, my servant lieth at home sick of the palsy, grievously tormented.

7     And Jesus saith unto him, I will come and heal him.

8     The centurion answered and said, Lord, I am not worthy that thou shouldest come under my roof: but speak the word only, and my servant shall be healed.

9     For I am a man under authority, having soldiers under me: and I say to this man, Go, and he goeth; and to another, Come, and he cometh; and to my servant, Do this, and he doeth it.

10     When Jesus heard it, he marvelled, and said to them that followed, Verily I say unto you, I have not found so great faith, no, not in Israel.

13     And Jesus said unto the centurion, Go thy way; and as thou hast believed, so be it done unto thee. And his servant was healed in the selfsame hour.

4. मत्ती 27 : 1, 33 (से 1st ,), 35 (वे) (से 1st ,), 57-60

1     जब भोर हुई, तो सब महायाजकों और लोगों के पुरनियों ने यीशु के मार डालने की सम्मति की।

33     गुलगुता स्थान कहलाता है पहुंचकर।

35     ... तब उन्होंने उसे क्रूस पर चढ़ाय।

57     जब सांझ हुई तो यूसुफ नाम अरिमतियाह का एक धनी मनुष्य जो आप ही यीशु का चेला था आया: उस ने पीलातुस के पास जाकर यीशु की लोथ मांगी।

58     इस पर पीलातुस ने दे देने की आज्ञा दी।

59     यूसुफ ने लोथ को लेकर उसे उज्ज़वल चादर में लपेटा।

60     और उसे अपनी नई कब्र में रखा, जो उस ने चट्टान में खुदवाई थी, और कब्र के द्वार पर बड़ा पत्थर लुढ़काकर चला गया।

4. Matthew 27 : 1, 33 (to 1st ,), 35 (they) (to 1st ,), 57-60

1     When the morning was come, all the chief priests and elders of the people took counsel against Jesus to put him to death:

33     And when they were come unto a place called Golgotha,

35     …they crucified him.

57     When the even was come, there came a rich man of Arimathæa, named Joseph, who also himself was Jesus’ disciple:

58     He went to Pilate, and begged the body of Jesus. Then Pilate commanded the body to be delivered.

59     And when Joseph had taken the body, he wrapped it in a clean linen cloth,

60     And laid it in his own new tomb, which he had hewn out in the rock: and he rolled a great stone to the door of the sepulchre, and departed.

5. मत्ती 28 : 1-10

1     सब्त के दिन के बाद सप्ताह के पहिले दिन पह फटते ही मरियम मगदलीनी और दूसरी मरियम कब्र को देखने आईं।

2     और देखो एक बड़ा भुईंडोल हुआ, क्योंकि प्रभु का एक दूत स्वर्ग से उतरा, और पास आकर उसने पत्थर को लुढ़का दिया, और उस पर बैठ गया।

3     उसका रूप बिजली का सा और उसका वस्त्र पाले की नाईं उज्ज़्वल था।

4     उसके भय से पहरूए कांप उठे, और मृतक समान हो गए।

5     स्वर्गदूत ने स्त्र्यिों से कहा, कि तुम मत डरो: मै जानता हूँ कि तुम यीशु को जो क्रुस पर चढ़ाया गया था ढूंढ़ती हो।

6     वह यहाँ नहीं है, परन्तु अपने वचन के अनुसार जी उठा है; आओ, यह स्थान देखो, जहाँ प्रभु पड़ा था।

7     और शीघ्र जाकर उसके चेलों से कहो, कि वह मृतकों में से जी उठा है; और देखो वह तुम से पहिले गलील को जाता है, वहाँ उसका दर्शन पाओगे, देखो, मैं ने तुम से कह दिया।

8     और वे भय और बड़े आनन्द के साथ कब्र से शीघ्र लौटकर उसके चेलों को समाचार देने के लिये दौड़ गई।

9     और देखो, यीशु उन्हें मिला और कहा; ‘सलाम’और उन्होंने पास आकर और उसके पाँव पकड़कर उस को दणडवत किया।

10     तब यीशु ने उन से कहा, मत डरो; मेरे भाईयों से जाकर कहो, कि गलील को चलें जाएं वहाँ मुझे देखेंगे॥

5. Matthew 28 : 1-10

1     In the end of the sabbath, as it began to dawn toward the first day of the week, came Mary Magdalene and the other Mary to see the sepulchre.

2     And, behold, there was a great earthquake: for the angel of the Lord descended from heaven, and came and rolled back the stone from the door, and sat upon it.

3     His countenance was like lightning, and his raiment white as snow:

4     And for fear of him the keepers did shake, and became as dead men.

5     And the angel answered and said unto the women, Fear not ye: for I know that ye seek Jesus, which was crucified.

6     He is not here: for he is risen, as he said. Come, see the place where the Lord lay.

7     And go quickly, and tell his disciples that he is risen from the dead; and, behold, he goeth before you into Galilee; there shall ye see him: lo, I have told you.

8     And they departed quickly from the sepulchre with fear and great joy; and did run to bring his disciples word.

9     And as they went to tell his disciples, behold, Jesus met them, saying, All hail. And they came and held him by the feet, and worshipped him.

10     Then said Jesus unto them, Be not afraid: go tell my brethren that they go into Galilee, and there shall they see me.

6. प्रकाशित वाक्य 21 : 4, 5

4     और वह उन की आंखोंसे सब आंसू पोंछ डालेगा; और इस के बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहिली बातें जाती रहीं।

5     और जो सिंहासन पर बैठा था, उस ने कहा, कि देख, मैं सब कुछ नया कर देता हूं: फिर उस ने कहा, कि लिख ले, क्योंकि ये वचन विश्वास के योग्य और सत्य हैं।

6. Revelation 21 : 4, 5

4     And God shall wipe away all tears from their eyes; and there shall be no more death, neither sorrow, nor crying, neither shall there be any more pain: for the former things are passed away.

5     And he that sat upon the throne said, Behold, I make all things new. And he said unto me, Write: for these words are true and faithful.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 475 : 28-31

मनुष्य पाप, बीमारी और मृत्यु के लिए अक्षम है। वास्तविक मनुष्य पवित्रता से विदा नहीं कर सकता, न ही परमेश्वर, जिसके द्वारा मनुष्य का विकास किया गया है, पाप करने की क्षमता या स्वतंत्रता प्रदान करता है।

1. 475 : 28-31

Man is incapable of sin, sickness, and death. The real man cannot depart from holiness, nor can God, by whom man is evolved, engender the capacity or freedom to sin.

2. 472 : 24 (सब)-15

सारी वास्तविकता ईश्वर और उसकी रचना, सामंजस्य और शाश्वत में है। वह जो बनाता है वह अच्छा है, और जो कुछ भी बना है, उसके द्वारा बनाया गया है। इसलिये पाप, बीमारी, या मृत्यु का एकमात्र वास्तविकता यह भयानक तथ्य है कि अवास्तविकता मानव को वास्तविक लगती है, विश्वास को गलत करती है, जब तक कि भगवान उनके भेस को बंद नहीं करते। वे सत्य नहीं हैं, क्योंकि वे भगवान के नहीं हैं। हम क्रिश्चियन साइंस में सीखते हैं कि नश्वर मन या शरीर के सभी अंतर्ज्ञान भ्रम हैं, न तो वास्तविकता और न ही पहचान के बावजूद वास्तविक और समान प्रतीत होते हैं।

मन का विज्ञान सभी बुराई का निपटारा करता है। सत्य, ईश्वर, त्रुटि का जनक नहीं है। पाप, बीमारी और मृत्यु को त्रुटि के प्रभावों के रूप में वर्गीकृत किया जाना है। मसीह पाप के विश्वास को नष्ट करने के लिए आया था। ईश्वर-तत्त्व सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान है। ईश्वर हर जगह है, और उसके बिना कुछ भी मौजूद नहीं है या उसकी कोई शक्ति नहीं है। मसीह एक आदर्श सत्य है, जो क्रायश्चियन साइंस के माध्यम से बीमारी और पाप को ठीक करने के लिए आता है, और ईश्वर को सभी शक्ति प्रदान करता है। यीशु उस व्यक्ति का नाम है जिसने बीमारों और पापों का उपचार करके और मृत्यु की शक्ति को नष्ट करके, मसीह को प्रस्तुत किया, जो कि अन्य सभी पुरुषों की तुलना में अधिक परमेश्वर का सच्चा विचार है।

2. 472 : 24 (All)-15

All reality is in God and His creation, harmonious and eternal. That which He creates is good, and He makes all that is made. Therefore the only reality of sin, sickness, or death is the awful fact that unrealities seem real to human, erring belief, until God strips off their disguise. They are not true, because they are not of God. We learn in Christian Science that all inharmony of mortal mind or body is illusion, possessing neither reality nor identity though seeming to be real and identical.

The Science of Mind disposes of all evil. Truth, God, is not the father of error. Sin, sickness, and death are to be classified as effects of error. Christ came to destroy the belief of sin. The God-principle is omnipresent and omnipotent. God is everywhere, and nothing apart from Him is present or has power. Christ is the ideal Truth, that comes to heal sickness and sin through Christian Science, and attributes all power to God. Jesus is the name of the man who, more than all other men, has presented Christ, the true idea of God, healing the sick and the sinning and destroying the power of death.

3. 394 : 28-14

हमें याद रखना चाहिए कि जीवन ईश्वर है, और यह कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है। क्रिश्चियन साइंस को न समझकर, बीमारों को आम तौर पर इस पर बहुत कम विश्वास होता है जब तक कि वे इसके लाभकारी प्रभाव को महसूस नहीं करते हैं। इससे पता चलता है कि विश्वास ऐसे मामलों में मरहम लगाने वाला नहीं है। बीमार अनजाने में इसके खिलाफ होने के बजाय दुख का पक्ष लेते हैं। वे इसकी वास्तविकता को स्वीकार करते हैं, जबकि उन्हें इससे इनकार करना चाहिए। उन्हें धोखेबाज इंद्रियों की गवाही के विरोध में प्रार्थना करनी चाहिए, और भगवान के लिए मनुष्य की अमरता और शाश्वत समानता को बनाए रखना चाहिए।

महान एग्जम्पलर की तरह, मरहम लगाने वाले को बीमारी के बारे में बोलना चाहिए, क्योंकि आत्मा को कॉरपोरेट इंद्रियों के झूठे सबूतों को साबित करने और मृत्यु दर और बीमारी पर अपने दावों को साबित करने के लिए छोड़ देना चाहिए। एक ही सिद्धांत पाप और बीमारी दोनों को ठीक करता है। जब दैवीय विज्ञान एक कार्तिक मन में विश्वास को खत्म कर देता है, और भगवान में विश्वास पाप में और उपचार के भौतिक तरीकों में सभी विश्वासों को नष्ट कर देता है, तो पाप, बीमारी और मृत्यु गायब हो जाएगी।

3. 394 : 28-14

We should remember that Life is God, and that God is omnipotent. Not understanding Christian Science, the sick usually have little faith in it till they feel its beneficent influence. This shows that faith is not the healer in such cases. The sick unconsciously argue for suffering, instead of against it. They admit its reality, whereas they should deny it. They should plead in opposition to the testimony of the deceitful senses, and maintain man's immortality and eternal likeness to God.

Like the great Exemplar, the healer should speak to disease as one having authority over it, leaving Soul to master the false evidences of the corporeal senses and to assert its claims over mortality and disease. The same Principle cures both sin and sickness. When divine Science overcomes faith in a carnal mind, and faith in God destroys all faith in sin and in material methods of healing, then sin, disease, and death will disappear.

4. 400 : 20-23

जब हम अशांत मन को संबोधित करके और शरीर को कोई ध्यान न देकर बीमारी को दूर करते हैं, तो हम यह साबित करते हैं कि अकेला विचार ही दुख पैदा करता है। नश्वर मन सभी पर शासन करता है जो नश्वर है।

4. 400 : 20-23

When we remove disease by addressing the disturbed mind, giving no heed to the body, we prove that thought alone creates the suffering. Mortal mind rules all that is mortal.

5. 184 : 3-5

सत्य बीमारी, पाप और मृत्यु को विनियमित करने के लिए कोई कानून नहीं बनाता है, क्योंकि ये सत्य के लिए अज्ञात हैं और इन्हें वास्तविकता के रूप में मान्यता नहीं दी जानी चाहिए।

5. 184 : 3-5

Truth makes no laws to regulate sickness, sin, and death, for these are unknown to Truth and should not be recognized as reality.

6. 533 : 21-5

भगवान के प्रति बहुत अप्रिय, मृत्यु पहले से ही हड्डी और मांस के तेजी से बिगड़ने में पाया जाता है जो एडम से ईव बनाने के लिए आया था। भौतिक जीवन और बुद्धिमत्ता में विश्वास हर कदम पर बदतर होता जा रहा है, लेकिन त्रुटि का एक महत्वपूर्ण दिन है और इसके अंत तक कई गुना बढ़ जाता है।

मनुष्य को त्रुटि के अपने ज्ञान के रूप में जांच कर, सत्य महिला को उसकी गलती कबूल करने की मांग करता है। वह कहती है, “सर्प ने मुझे बहका दिया तब मैं ने खाया;” जितना यह कहा जाता है कि नम्र तपस्या में, “मेरी गलती के लिए न तो मनुष्य और न ही भगवान जिम्मेदार होंगे।” वह पहले ही जान चुकी है कि कॉरपोरल सेंस सर्प है। इसलिए वह पहली बार मनुष्य की भौतिक उत्पत्ति में विश्वास को त्यागने और आध्यात्मिक निर्माण करने के लिए। इसके बाद महिला को यीशु की माँ बनने और पुनर्जीवित उद्धारकर्ता को देखने के लिए सक्षम किया गया, जो जल्द ही ईश्वर की रचना करने वाले मृत्युहीन व्यक्ति को प्रकट करने वाली थी।

6. 533 : 21-5

Materiality, so obnoxious to God, is already found in the rapid deterioration of the bone and flesh which came from Adam to form Eve. The belief in material life and intelligence is growing worse at every step, but error has its suppositional day and multiplies until the end thereof.

Truth, cross-questioning man as to his knowledge of error, finds woman the first to confess her fault. She says, "The serpent beguiled me, and I did eat;" as much as to say in meek penitence, "Neither man nor God shall father my fault." She has already learned that corporeal sense is the serpent. Hence she is first to abandon the belief in the material origin of man and to discern spiritual creation. This hereafter enabled woman to be the mother of Jesus and to behold at the sepulchre the risen Saviour, who was soon to manifest the deathless man of God's creating.

7. 45 : 13-21

अपने शारीरिक दफन के तीन दिन बाद उन्होंने अपने शिष्यों के साथ बात की। अत्याचारी लोग अमर सत्य और प्रेम को एक कब्र में छिपाने में असफल रहे। भगवान की जय हो, और संघर्षशील दिलों को शांति मिले! मसीह ने मानव आशा और विश्वास के द्वार से पत्थर को लुढ़का दिया, और ईश्वर में जीवन के रहस्योद्घाटन और प्रदर्शन के माध्यम से, उन्हें मनुष्य के आध्यात्मिक विचार और उनके दिव्य सिद्धांत, प्रेम के साथ संभवतया एक-मानसिक रूप से उन्नत किया।

7. 45 : 13-21

Three days after his bodily burial he talked with his disciples. The persecutors had failed to hide immortal Truth and Love in a sepulchre.

Glory be to God, and peace to the struggling hearts! Christ hath rolled away the stone from the door of human hope and faith, and through the revelation and demonstration of life in God, hath elevated them to possible at-one-ment with the spiritual idea of man and his divine Principle, Love.

8. 34 : 20-28

उनका पुनरुत्थान भी उनका पुनरुत्थान था। इससे उन्हें खुद को और दूसरों को आध्यात्मिक नीरसता से दूर रखने और ईश्वर में असीम संभावनाओं की धारणा में अंधे होने में मदद मिली। उन्हें इस जल्दी की आवश्यकता थी, जल्द ही उनके प्रिय मास्टर वास्तविकता के आध्यात्मिक क्षेत्र में फिर से उठेंगे, और उनकी आशंका से बहुत ऊपर उठेंगे। अपने विश्वासयोग्य के लिए पुरस्कार के रूप में, वह उस परिवर्तन में भौतिक अर्थों के लिए गायब हो जाएगा जिसे तब से उदगम कहा जाता है।

8. 34 : 20-28

His resurrection was also their resurrection. It helped them to raise themselves and others from spiritual dulness and blind belief in God into the perception of infinite possibilities. They needed this quickening, for soon their dear Master would rise again in the spiritual realm of reality, and ascend far above their apprehension. As the reward for his faithfulness, he would disappear to material sense in that change which has since been called the ascension.

9. 426 : 16-32

जब यह जान लिया जाता है कि बीमारी जीवन को नष्ट नहीं कर सकती है, और मृत्यु से पाप या बीमारी से मृत्यु को बचाया नहीं जाता है, तो यह समझ जीवन के नएपन में बदल जाएगी। यह या तो मरने या कब्र से डरने की इच्छा में महारत हासिल करेगा, और इस तरह नश्वर अस्तित्व को नष्ट करने वाले महान भय को नष्ट कर देगा।

मृत्यु में सभी विश्वासों का त्याग और इसके डंक के डर से स्वास्थ्य और नैतिकता के स्तर को अपने वर्तमान उत्थान से बहुत ऊपर उठाया जा सकता है, और हमें ईश्वर में जीवन के प्रति असीम विश्वास के साथ ईसाई धर्म के बैनर को धारण करने में सक्षम करेगा। पाप मौत लाया, और पाप के गायब होने के साथ मौत गायब हो जाएगी। मनुष्य अमर है, और शरीर मर नहीं सकता, क्योंकि पदार्थ के पास समर्पण करने के लिए कोई जीवन नहीं है। पदार्थ, मृत्यु, बीमारी, और पाप नाम की मानवीय अवधारणाएँ नष्ट हो सकती हैं।

9. 426 : 16-32

When it is learned that disease cannot destroy life, and that mortals are not saved from sin or sickness by death, this understanding will quicken into newness of life. It will master either a desire to die or a dread of the grave, and thus destroy the great fear that besets mortal existence.

The relinquishment of all faith in death and also of the fear of its sting would raise the standard of health and morals far beyond its present elevation, and would enable us to hold the banner of Christianity aloft with unflinching faith in God, in Life eternal. Sin brought death, and death will disappear with the disappearance of sin. Man is immortal, and the body cannot die, because matter has no life to surrender. The human concepts named matter, death, disease, sickness, and sin are all that can be destroyed.

10. 248 : 29-32

निःस्वार्थता, अच्छाई, दया, न्याय, स्वास्थ्य, पवित्रता, प्रेम - स्वर्ग का राज्य - हमारे भीतर राज करो, और पाप, बीमारी, और मृत्यु तब तक कम हो जाएगी जब तक वे अंततः गायब नहीं हो जाते।

10. 248 : 29-32

Let unselfishness, goodness, mercy, justice, health, holiness, love — the kingdom of heaven — reign within us, and sin, disease, and death will diminish until they finally disappear.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


████████████████████████████████████████████████████████████████████████