रविवार 11 दिसंबर, 2022



विषयभगवान मनुष्य के संरक्षक हैं

SubjectGod The Preserver Of Man

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: भजन संहिता 107: 14

"उसने उन को अन्धियारे और मृत्यु की छाया में से निकाल लिया; और उन के बन्धनों को तोड़ डाला।"



Golden Text: Psalm 107 : 14

He brought them out of darkness and the shadow of death, and brake their bands in sunder.




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उत्तरदायी अध्ययन: भजन संहिता 27: 1, 3-5, 8, 11, 13, 14


1     यहोवा परमेश्वर मेरी ज्योति और मेरा उद्धार है; मैं किस से डरूं? यहोवा मेरे जीवन का दृढ़ गढ़ ठहरा है, मैं किस का भय खाऊं?

3     चाहे सेना भी मेरे विरुद्ध छावनी डाले, तौभी मैं न डरूंगा; चाहे मेरे विरुद्ध लड़ाई ठन जाए, उस दशा में भी मैं हियाव बान्धे निशचिंत रहूंगा॥

4     एक वर मैं ने यहोवा से मांगा है, उसी के यत्न में लगा रहूंगा; कि मैं जीवन भर यहोवा के भवन में रहने पाऊं, जिस से यहोवा की मनोहरता पर दृष्टि लगाए रहूं, और उसके मन्दिर में ध्यान किया करूं॥

5     क्योंकि वह तो मुझे विपत्ति के दिन में अपने मण्डप में छिपा रखेगा; अपने तम्बू के गुप्त स्थान में वह मुझे छिपा लेगा, और चट्टान पर चढ़ाएगा।

8     तू ने कहा है, कि मेरे दर्शन के खोजी हो। इसलिये मेरा मन तुझ से कहता है, कि हे यहोवा, तेरे दर्शन का मैं खोजी रहूंगा।

11     हे यहोवा, अपने मार्ग में मेरी अगुवाई कर, और मेरे द्रोहियों के कारण मुझ को चौरस रास्ते पर ले चल।

13     यदि मुझे विश्वास न होता कि जीवितों की पृथ्वी पर यहोवा की भलाई को देखूंगा, तो मैं मूर्च्छित हो जाता।

14     यहोवा की बाट जोहता रह; हियाव बान्ध और तेरा हृदय दृढ़ रहे; हां, यहोवा ही की बाट जोहता रह!

Responsive Reading: Psalm 27 : 1, 3-5, 8, 11, 13, 14

1.     The Lord is my light and my salvation; whom shall I fear? the Lord is the strength of my life; of whom shall I be afraid?

3.     Though an host should encamp against me, my heart shall not fear: though war should rise against me, in this will I be confident.

4.     One thing have I desired of the Lord, that will I seek after; that I may dwell in the house of the Lord all the days of my life, to behold the beauty of the Lord, and to inquire in his temple.

5.     For in the time of trouble he shall hide me in his pavilion: in the secret of his tabernacle shall he hide me; he shall set me up upon a rock.

8.     When thou saidst, Seek ye my face; my heart said unto thee, Thy face, Lord, will I seek.

11.     Teach me thy way, O Lord, and lead me in a plain path, because of mine enemies.

13.     I had fainted, unless I had believed to see the goodness of the Lord in the land of the living.

14.     Wait on the Lord: be of good courage, and he shall strengthen thine heart: wait, I say, on the Lord.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 37: 39 (मोक्ष)

39     ... धर्मियों की मुक्ति यहोवा की ओर से होती है; संकट के समय वह उनका दृढ़ गढ़ है।

1. Psalm 37 : 39 (the salvation)

39     …the salvation of the righteous is of the Lord: he is their strength in the time of trouble.

2. दानिय्येल 6: 1, 2 (से :), 3, 4 (से 2nd ;), 5-8 (से 5th ,), 9-12 (से 7th ,), 13, 14 (से :), 15-17 (से 2nd ,), 18 (से :), 19-23, 25-27

1     दारा को यह अच्छा लगा कि अपने राज्य के ऊपर एक सौ बीस ऐसे अधिपति ठहराए, जो पूरे राज्य में अधिकार रखें।

2     और उनके ऊपर उसने तीन अध्यक्ष, जिन में से दानिय्येल एक था।

3     जब यह देखा गया कि दानिय्येल में उत्तम आत्मा रहती है, तब उसको उन अध्यक्षों और अधिपतियों से अधिक प्रतिष्ठा मिली; वरन राजा यह भी सोचता था कि उसको सारे राज्य के ऊपर ठहराए।

4     तब अध्यक्ष और अधिपति राजकार्य के विषय में दानिय्येल के विरुद्ध दोष ढूंढ़ने लगे; परन्तु वह विश्वासयोग्य था, और उसके काम में कोई भूल वा दोष न निकला, और वे ऐसा कोई अपराध वा दोष न पा सके।

5     तब वे लोग कहने लगे, हम उस दानिय्येल के परमेश्वर की व्यवस्था को छोड़ और किसी विषय में उसके विरुद्ध कोई दोष न पा सकेंगे॥

6     तब वे अध्यक्ष और अधिपति राजा के पास उतावली से आए, और उस से कहा, हे राजा दारा, तू युगयुग जीवित रहे।

7     राज्य के सारे अध्यक्षों ने, और हाकिमों, अधिपतियों, न्यायियों, और गवर्नरों ने भी आपास में सम्मति की है, कि राजा ऐसी आज्ञा दे और ऐसी कड़ी आज्ञा निकाले, कि तीस दिन तक जो कोई, हे राजा, तुझे छोड़ किसी और मनुष्य वा देवता से बिनती करे, वह सिंहों की मान्द में डाल दिया जाए।

8     इसलिये अब हे राजा, ऐसी आज्ञा दे, और इस पत्र पर हस्ताक्षर कर, जिस से यह बात मादियों और फारसियों की अटल व्यवस्था के अनुसार अदल-बदल न हो सके।

9     तब दारा राजा ने उस आज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया॥

10     जब दानिय्येल को मालूम हुआ कि उस पत्र पर हस्ताक्षर किया गया है, तब वह अपने घर में गया जिसकी उपरौठी कोठरी की खिड़कियां यरूशलेम के सामने खुली रहती थीं, और अपनी रीति के अनुसार जैसा वह दिन में तीन बार अपने परमेश्वर के साम्हने घुटने टेक कर प्रार्थना और धन्यवाद करता था, वैसा ही तब भी करता रहा।

11     तब उन पुरूषों ने उतावली से आकर दानिय्येल को अपने परमेश्वर के सामने बिनती करते और गिड़गिड़ाते हुए पाया।

12     सो वे राजा के पास जा कर, उसकी राजआज्ञा के विषय में उस से कहने लगे, हे राजा, क्या तू ने ऐसे आज्ञापत्र पर हस्ताक्षर नहीं किया कि तीस दिन तक जो कोई तुझे छोड़ किसी मनुष्य वा देवता से बिनती करेगा, वह सिंहों की मान्द में डाल दिया जाएगा? राजा ने उत्तर दिया, हां, मादियों और फारसियों की अटल व्यवस्था के अनुसार यह बात स्थिर है।

13     तब उन्होंने राजा से कहा, यहूदी बंधुओं में से जो दानिय्येल है, उसने, हे राजा, न तो तेरी ओर कुछ ध्यान दिया, और न तेरे हस्ताक्षर किए हुए आज्ञापत्र की ओर; वह दिन में तीन बार बिनती किया करता है॥

14     यह वचन सुनकर, राजा बहुत उदास हुआ, और दानिय्येल के बचाने के उपाय सोचने लगा।

15     तब वे पुरूष राजा के पास उतावली से आकर कहने लगे, हे राजा, यह जान रख, कि मादियों और फारसियों में यह व्यवस्था है कि जो जो मनाही वा आज्ञा राजा ठहराए, वह नहीं बदल सकती॥

16     तब राजा ने आज्ञा दी, और दानिय्येल लाकर सिंहों की मान्द में डाल दिया गया। उस समय राजा ने दानिय्येल से कहा, तेरा परमेश्वर जिसकी तू नित्य उपासना करता है, वही तुझे बचाए!

17     तब एक पत्थर लाकर उस गड़हे के मुंह पर रखा गया, और राजा ने उस पर अपनी अंगूठी से।

18     तब राजा अपने महल में चला गया, और उस रात को बिना भोजन पड़ा रहा॥

19     भोर को पौ फटते ही राजा उठा, और सिंहों के गड़हे की ओर फुर्ती से चला गया।

20     जब राजा गड़हे के निकट आया, तब शोक भरी वाणी से चिल्लाने लगा और दानिय्येल से कहा, हे दानिय्येल, हे जीवते परमेश्वर के दास, क्या तेरा परमेश्वर जिसकी तू नित्य उपासना करता है, तुझे सिंहों से बचा सका है?

21     तब दानिय्येल ने राजा से कहा, हे राजा, तू युगयुग जीवित रहे!

22     मेरे परमेश्वर ने अपना दूत भेज कर सिंहों के मुंह को ऐसा बन्द कर रखा कि उन्होंने मेरी कुछ भी हानि नहीं की; इसका कारण यह है, कि मैं उसके साम्हने निर्दोष पाया गया; और हे राजा, तेरे सम्मुख भी मैं ने कोई भूल नहीं की।

23     तब राजा ने बहुत आनन्दित हो कर, दानिय्येल को गड़हे में से निकालने की आज्ञा दी। सो दानिय्येल गड़हे में से निकाला गया, और उस पर हानि का कोई चिन्ह न पाया गया, क्योंकि वह अपने परमेश्वर पर विश्वास रखता था।

25     तब दारा राजा ने सारी पृथ्वी के रहने वाले देश-देश और जाति-जाति के सब लोगों, और भिन्न-भिन्न भाषा बोलने वालों के पास यह लिखा, तुम्हारा बहुत कुशल हो।

26     मैं यह आज्ञा देता हूं कि जहां जहां मेरे राज्य का अधिकार है, वहां के लोग दानिय्येल के परमेश्वर के सम्मुख कांपते और थरथराते रहें, क्योंकि जीवता और युगानयुग तक रहने वाला परमेश्वर वही है; उसका राज्य अविनाशी और उसकी प्रभुता सदा स्थिर रहेगी।

27     जिसने दानिय्येल को सिंहों से बचाया है, वही बचाने और छुड़ाने वाला है; और स्वर्ग में और पृथ्वी पर चिन्हों और चमत्कारों का प्रगट करने वाला है।

2. Daniel 6 : 1, 2 (to :), 3, 4 (to 2nd ;), 5-8 (to 5th ,), 9-12 (to 7th ,), 13, 14 (to :), 15-17 (to 2nd ,), 18 (to :), 19-23, 25-27

1     It pleased Darius to set over the kingdom an hundred and twenty princes, which should be over the whole kingdom;

2     And over these three presidents; of whom Daniel was first:

3     Then this Daniel was preferred above the presidents and princes, because an excellent spirit was in him; and the king thought to set him over the whole realm.

4     Then the presidents and princes sought to find occasion against Daniel concerning the kingdom; but they could find none occasion nor fault;

5     Then said these men, We shall not find any occasion against this Daniel, except we find it against him concerning the law of his God.

6     Then these presidents and princes assembled together to the king, and said thus unto him, King Darius, live for ever.

7     All the presidents of the kingdom, the governors, and the princes, the counsellors, and the captains, have consulted together to establish a royal statute, and to make a firm decree, that whosoever shall ask a petition of any God or man for thirty days, save of thee, O king, he shall be cast into the den of lions.

8     Now, O king, establish the decree, and sign the writing, that it be not changed,

9     Wherefore king Darius signed the writing and the decree.

10     Now when Daniel knew that the writing was signed, he went into his house; and his windows being open in his chamber toward Jerusalem, he kneeled upon his knees three times a day, and prayed, and gave thanks before his God, as he did aforetime.

11     Then these men assembled, and found Daniel praying and making supplication before his God.

12     Then they came near, and spake before the king concerning the king’s decree; Hast thou not signed a decree, that every man that shall ask a petition of any God or man within thirty days, save of thee, O king, shall be cast into the den of lions? The king answered and said, The thing is true,

13     Then answered they and said before the king, That Daniel, which is of the children of the captivity of Judah, regardeth not thee, O king, nor the decree that thou hast signed, but maketh his petition three times a day.

14     Then the king, when he heard these words, was sore displeased with himself, and set his heart on Daniel to deliver him:

15     Then these men assembled unto the king, and said unto the king, Know, O king, that the law of the Medes and Persians is, That no decree nor statute which the king establisheth may be changed.

16     Then the king commanded, and they brought Daniel, and cast him into the den of lions. Now the king spake and said unto Daniel, Thy God whom thou servest continually, he will deliver thee.

17     And a stone was brought, and laid upon the mouth of the den; and the king sealed it with his own signet,

18     Then the king went to his palace, and passed the night fasting:

19     Then the king arose very early in the morning, and went in haste unto the den of lions.

20     And when he came to the den, he cried with a lamentable voice unto Daniel: and the king spake and said to Daniel, O Daniel, servant of the living God, is thy God, whom thou servest continually, able to deliver thee from the lions?

21     Then said Daniel unto the king, O king, live for ever.

22     My God hath sent his angel, and hath shut the lions’ mouths, that they have not hurt me: forasmuch as before him innocency was found in me; and also before thee, O king, have I done no hurt.

23     Then was the king exceeding glad for him, and commanded that they should take Daniel up out of the den. So Daniel was taken up out of the den, and no manner of hurt was found upon him, because he believed in his God.

25     Then king Darius wrote unto all people, nations, and languages, that dwell in all the earth; Peace be multiplied unto you.

26     I make a decree, That in every dominion of my kingdom men tremble and fear before the God of Daniel: for he is the living God, and stedfast for ever, and his kingdom that which shall not be destroyed, and his dominion shall be even unto the end.

27     He delivereth and rescueth, and he worketh signs and wonders in heaven and in earth, who hath delivered Daniel from the power of the lions.

3. भजन संहिता 91: 1, 2, 14-16

1     जोपरमप्रधान के छाए हुए स्थान में बैठा रहे, वह सर्वशक्तिमान की छाया में ठिकाना पाएगा।

2     मैं यहोवा के विषय कहूंगा, कि वह मेरा शरणस्थान और गढ़ है; वह मेरा परमेश्वर है, मैं उस पर भरोसा रखूंगा।

14     उसने जो मुझ से स्नेह किया है, इसलिये मैं उसको छुड़ाऊंगा; मैं उसको ऊंचे स्थान पर रखूंगा, क्योंकि उसने मेरे नाम को जान लिया है।

15     जब वह मुझ को पुकारे, तब मैं उसकी सुनूंगा; संकट में मैं उसके संग रहूंगा, मैं उसको बचा कर उसकी महिमा बढ़ाऊंगा।

16     मैं उसको दीर्घायु से तृप्त करूंगा, और अपने किए हुए उद्धार का दर्शन दिखाऊंगा॥

3. Psalm 91 : 1, 2, 14-16

1     He that dwelleth in the secret place of the most High shall abide under the shadow of the Almighty.

2     I will say of the Lord, He is my refuge and my fortress: my God; in him will I trust.

14     Because he hath set his love upon me, therefore will I deliver him: I will set him on high, because he hath known my name.

15     He shall call upon me, and I will answer him: I will be with him in trouble; I will deliver him, and honour him.

16     With long life will I satisfy him, and shew him my salvation.

4. प्रकाशित वाक्य 1: 8

8     प्रभु परमेश्वर वह जो है, और जो था, और जो आने वाला है; जो सर्वशक्तिमान है: यह कहता है, कि मैं ही अल्फा और ओमेगा हूं॥

4. Revelation 1 : 8

8     I am Alpha and Omega, the beginning and the ending, saith the Lord, which is, and which was, and which is to come, the Almighty.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 290 : 1-2

जीवन वह चिरस्थायी “मैं हूं” है, वह अस्तित्व जो था और है और रहेगा, जिसे कोई मिटा नहीं सकता।

1. 290 : 1-2

Life is the everlasting I am, the Being who was and is and shall be, whom nothing can erase.

2. 139 : 4-9

शुरुआत से लेकर अंत तक, पवित्रशास्त्र आत्मा, मन की बात की विजय से भरपूर है। मूसा ने मन की शक्ति को उसके द्वारा सिद्ध किया, जिसे पुरुषों ने चमत्कार कहा; तब यहोशू, एलिय्याह और एलीशा ने किया। संकेत और चमत्कार के साथ ईसाई युग की शुरुआत हुई।

2. 139 : 4-9

From beginning to end, the Scriptures are full of accounts of the triumph of Spirit, Mind, over matter. Moses proved the power of Mind by what men called miracles; so did Joshua, Elijah, and Elisha. The Christian era was ushered in with signs and wonders.

3. 23 : 21-3

हिब्रू, ग्रीक, लैटिन और अंग्रेजी में, विश्वास और तत्संबंधी शब्द इन दो परिभाषाओं, विश्वास और भरोसेमंदता हैं। एक प्रकार का विश्वास दूसरों के कल्याण पर विश्वास करता है। एक और तरह का विश्वास ईश्वरीय प्रेम को समझता है और कैसे डर और कांपने के साथ "खुद के उद्धार का काम करना है।" "हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूं, मेरे अविश्वास का उपाय कर।" एक अंध विश्वास की लाचारी व्यक्त करता है; जबकि निषेधाज्ञा, "विश्वास... तो तू और उद्धार पाएगा।"! आत्मनिर्भर भरोसेमंदता की मांग करता है, जिसमें आध्यात्मिक समझ शामिल है और सभी को ईश्वर तक पहुंचाता है।

विश्वास करने के लिए इब्रानी क्रिया का अर्थ दृढ़ या स्थिर होना भी है। यह निश्चित रूप से सत्य और प्रेम पर लागू होता है जिसे समझा और अभ्यास किया जाता है। अधर्म में दृढ़ता पाप, बीमारी और मृत्यु से कभी नहीं बचाएगी।

3. 23 : 21-3

In Hebrew, Greek, Latin, and English, faith and the words corresponding thereto have these two definitions, trustfulness and trustworthiness. One kind of faith trusts one's welfare to others. Another kind of faith understands divine Love and how to work out one's "own salvation, with fear and trembling." "Lord, I believe; help thou mine unbelief!" expresses the helplessness of a blind faith; whereas the injunction, "Believe ... and thou shalt be saved!" demands self-reliant trustworthiness, which includes spiritual understanding and confides all to God.

The Hebrew verb to believe means also to be firm or to be constant. This certainly applies to Truth and Love understood and practised. Firmness in error will never save from sin, disease, and death.

4. 243 : 4-15

दैवीय प्रेम, जिसने जहरीली सांप को हानिरहित बना दिया, जिसने उबलते हुए तेल से पुरुषों को ज्वलंत भट्ठी से, शेर के जबड़े से, हर उम्र में बीमार और पाप और विजय से मृत्यु तक पहुंचाया। इसने नायाब शक्ति और प्रेम के साथ यीशु के प्रदर्शनों को ताज पहनाया। लेकिन भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों के प्राचीन प्रदर्शनों की पुष्टि करने और उन्हें दोहराने के लिए उसी "मन ... जो मसीह यीशु में भी था" हमेशा विज्ञान के पत्र के साथ होना चाहिए। उन अजूबों को आज अधिक दोहराया नहीं जाता है, आध्यात्मिक विकास की कमी के कारण इच्छा की कमी से इतना नहीं उठता है।

4. 243 : 4-15

The divine Love, which made harmless the poisonous viper, which delivered men from the boiling oil, from the fiery furnace, from the jaws of the lion, can heal the sick in every age and triumph over sin and death. It crowned the demonstrations of Jesus with unsurpassed power and love. But the same "Mind ... which was also in Christ Jesus" must always accompany the letter of Science in order to confirm and repeat the ancient demonstrations of prophets and apostles. That those wonders are not more commonly repeated to-day, arises not so much from lack of desire as from lack of spiritual growth.

5. 534 : 18-5

रोमियों को लिखी अपनी पत्री में पौलुस कहता है: "क्योंकि शरीर पर मन लगाना तो परमेश्वर से बैर रखना है, क्योंकि न तो परमेश्वर की व्यवस्था के आधीन है, और न हो सकता है। और जो शारीरिक दशा में है, वे परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते। परन्तु जब कि परमेश्वर का आत्मा तुम में बसता है, तो तुम शारीरिक दशा में नहीं।"

पवित्रशास्त्र के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक अर्थों का उतना अधिक मानसिक विरोध होगा जितना ईसाई युग की शुरुआत के बाद से नहीं हुआ है। सर्प, भौतिक ज्ञान, स्त्री की एड़ी काटेगा, - प्रेम के आध्यात्मिक विचार को नष्ट करने के लिए संघर्ष करेगा; और स्त्री, यह विचार, वासना के सिर को कुचल देगा। आध्यात्मिक विचार ने क्रिश्चियन साइंस में समझ को एक आधार दिया है। सत्य के बीज और त्रुटि के बीज, विश्वास और समझ के, - हां, आत्मा के बीज और पदार्थ के बीज - ये गेहूँ और तारे हैं जो समय अलग होंगे, एक को जलाना है, दूसरा होना है स्वर्गीय स्थानों में प्राप्त किया।

5. 534 : 18-5

Paul says in his epistle to the Romans: "The carnal mind is enmity against God; for it is not subject to the law of God, neither indeed can be. So then they that are in the flesh cannot please God. But ye are not in the flesh, but in the Spirit, if so be that the spirit of God dwell in you."

There will be greater mental opposition to the spiritual, scientific meaning of the Scriptures than there has ever been since the Christian era began. The serpent, material sense, will bite the heel of the woman, — will struggle to destroy the spiritual idea of Love; and the woman, this idea, will bruise the head of lust. The spiritual idea has given the understanding a foothold in Christian Science. The seed of Truth and the seed of error, of belief and of understanding, — yea, the seed of Spirit and the seed of matter, — are the wheat and tares which time will separate, the one to be burned, the other to be garnered into heavenly places.

6. 514 : 10-30

नैतिक साहस "यहूदा के गोत्र का शेर है," मानसिक दायरे के राजा। मुक्त और निडर यह जंगल में घूमता है। यह खुले मैदान में निहित है, या "हरे चरागाहों में रहता है, ... शांत पानी के बगल में।" दिव्य से मानव के लिए लाक्षणिक संचरण में, परिश्रम, मुस्तैदी और दृढ़ता की तुलना "एक हजार पहाड़ियों पर मवेशियों" से की जाती है। वे कठोर संकल्प का सामान ले जाते हैं, और उच्चतम उद्देश्य के साथ तालमेल रखते हैं। कोमलता आत्मा द्वारा प्रदान की गई सभी शक्तियों के साथ है। यशायाह द्वारा चित्रित सहस्राब्दी संपत्ति के गवाह के रूप में भगवान द्वारा बनाई गई व्यक्तित्व मांसाहारी नहीं है: —

भेडिय़ा भेड़ के बच्चे के संग रहा करेगा,

और चीता बकरी के बच्चे के साथ बैठा रहेगा, और बछड़ा और जवान सिंह;

और पाला पोसा हुआ बैल तीनों इकट्ठे रहेंगे, और एक छोटा लड़का उनकी अगुवाई करेगा।

उस नियंत्रण को समझते हुए जिसे प्यार ने सभी पर रखा था, डैनियल शेरों की मांद में सुरक्षित महसूस करता था, और पॉल ने वाइपर को हानिरहित साबित कर दिया। ईश्वर के सभी प्राणी जो विज्ञान के सामंजस्य में चलते हैं, हानिरहित, उपयोगी और अविनाशी हैं।

6. 514 : 10-30

Moral courage is "the lion of the tribe of Juda," the king of the mental realm. Free and fearless it roams in the forest. Undisturbed it lies in the open field, or rests in "green pastures, ... beside the still waters." In the figurative transmission from the divine thought to the human, diligence, promptness, and perseverance are likened to "the cattle upon a thousand hills." They carry the baggage of stern resolve, and keep pace with highest purpose. Tenderness accompanies all the might imparted by Spirit. The individuality created by God is not carnivorous, as witness the millennial estate pictured by Isaiah: —

The wolf also shall dwell with the lamb,
And the leopard shall lie down with the kid;
And the calf and the young lion, and the fatling together;
And a little child shall lead them.

Understanding the control which Love held over all, Daniel felt safe in the lions' den, and Paul proved the viper to be harmless. All of God's creatures moving in the harmony of Science, are harmless, useful, indestructible.

7. 143 : 26-31

मन भव्य रचनाकार है, और इसके अलावा कोई शक्ति नहीं हो सकती है जो कि मन से ली गई है। यदि माइंड पहले कालानुक्रमिक था, पहले संभावित रूप से है, और पहले अनंत काल तक होना चाहिए, तो माइंड को उसके पवित्र नाम के कारण गौरव, सम्मान, प्रभुत्व और हमेशा की शक्ति प्रदान करें।

7. 143 : 26-31

Mind is the grand creator, and there can be no power except that which is derived from Mind. If Mind was first chronologically, is first potentially, and must be first eternally, then give to Mind the glory, honor, dominion, and power everlastingly due its holy name.

8. 151 : 21-30

मानव मन को मारने या ठीक करने की कोई शक्ति नहीं है, और इसका भगवान के आदमी पर कोई नियंत्रण नहीं है। वह दिव्य मन जिसने मनुष्य को बनाया, वह अपनी छवि और समानता को बनाए रखता है। मानव मन भगवान के विपरीत है और इसे बंद करना चाहिए, जैसा कि सेंट पॉल ने घोषित किया है। वह सब जो वास्तव में मौजूद है, वह दिव्य मन और उसका विचार है, और इस मन में संपूर्ण प्राणी सामंजस्यपूर्ण और शाश्वत पाया जाता है। सीधे और संकीर्ण तरीके से इस तथ्य को देखना और स्वीकार करना है, इस शक्ति से उपजें, और सच्चाई के अग्रणी का पालन करें।

8. 151 : 21-30

The human mind has no power to kill or to cure, and it has no control over God's man. The divine Mind that made man maintains His own image and likeness. The human mind is opposed to God and must be put off, as St. Paul declares. All that really exists is the divine Mind and its idea, and in this Mind the entire being is found harmonious and eternal. The straight and narrow way is to see and acknowledge this fact, yield to this power, and follow the leadings of truth.

9. 134 : 14-26

मानव निर्मित सिद्धांत लुप्त हो रहे हैं। मुसीबत के समय में वे मजबूत नहीं हुए हैं। मसीह-शक्ति से रहित, वे कैसे मसीह के सिद्धांतों या अनुग्रह के चमत्कारों का वर्णन कर सकते हैं? ईसाई उपचार की संभावना से इनकार ईसाई धर्म को उसी तत्व से लूटता है, जिसने इसे पहली शताब्दी में दैवीय शक्ति और इसकी आश्चर्यजनक और अप्रतिम सफलता दी।

सच्चा लोगो प्रदर्शनकारी क्रिश्चियन साइंस है, सद्भाव का प्राकृतिक नियम जो कलह को खत्म करता है, इसलिए नहीं कि यह विज्ञान अलौकिक या अप्राकृतिक है, न ही क्योंकि यह ईश्वरीय नियम का उल्लंघन है, लेकिन क्योंकि यह भगवान का अपरिवर्तनीय नियम है, अच्छा है।

9. 134 : 14-26

Man-made doctrines are waning. They have not waxed strong in times of trouble. Devoid of the Christ-power, how can they illustrate the doctrines of Christ or the miracles of grace? Denial of the possibility of Christian healing robs Christianity of the very element, which gave it divine force and its astonishing and unequalled success in the first century.

The true Logos is demonstrably Christian Science, the natural law of harmony which overcomes discord, — not because this Science is supernatural or preternatural, nor because it is an infraction of divine law, but because it is the immutable law of God, good.

10. 487 : 27-1

यह समझ कि जीवन ईश्वर है, आत्मा, जीवन की मृत्यु रहित वास्तविकता, उसकी सर्वशक्तिमानता और अमरता में हमारे विश्वास को मजबूत करके हमारे दिनों को लंबा कर देती है।

यह विश्वास एक समझे हुए सिद्धांत पर निर्भर करता है। यह सिद्धांत संपूर्ण रोगग्रस्त बनाता है, और चीजों के स्थायी और सामंजस्यपूर्ण चरणों को सामने लाता है।

10. 487 : 27-1

The understanding that Life is God, Spirit, lengthens our days by strengthening our trust in the deathless reality of Life, its almightiness and immortality.

This faith relies upon an understood Principle. This Principle makes whole the diseased, and brings out the enduring and harmonious phases of things.

11. 568 : 24-30

एक पाप पर जीत के लिए, हम धन्यवाद देते हैं और मेजबानों के भगवान की महिमा करते हैं। सभी पापों पर शक्तिशाली विजय के बारे में हम क्या कहें? एक ऊँचा गीत, जो पहले से कहीं अधिक मधुर उच्च स्वर्ग तक पहुँच गया है, अब अधिक स्पष्ट और मसीह के महान हृदय के निकट आता है; क्‍योंकि दोष लगाने वाला वहां नहीं है, और प्रेम उसके आदिम और चिरस्थायी तनाव को दूर करता है।

11. 568 : 24-30

For victory over a single sin, we give thanks and magnify the Lord of Hosts. What shall we say of the mighty conquest over all sin? A louder song, sweeter than has ever before reached high heaven, now rises clearer and nearer to the great heart of Christ; for the accuser is not there, and Love sends forth her primal and everlasting strain.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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