रविवार 11 जून, 2023



विषयभगवान मनुष्य के संरक्षक हैं

SubjectGod The Preserver Of Man

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: भजन संहिता 46: 1

"परमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है, संकट में अति सहज से मिलने वाला सहायक।"



Golden Text: Psalm 46 : 1

God is our refuge and strength, a very present help in trouble.




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उत्तरदायी अध्ययन: भजन संहिता 46: 2-6, 10


2     इस कारण हम को कोई भय नहीं चाहे पृथ्वी उलट जाए, और पहाड़ समुद्र के बीच में डाल दिए जाएं;

3     चाहे समुद्र गरजे और फेन उठाए, और पहाड़ उसकी बाढ़ से कांप उठें॥

4     एक नदी है जिसकी नहरों से परमेश्वर के नगर में अर्थात परमप्रधान के पवित्र निवास भवन में आनन्द होता है।

5     परमेश्वर उस नगर के बीच में है, वह कभी टलने का नहीं; पौ फटते ही परमेश्वर उसकी सहायता करता है।

6     जाति जाति के लोग झल्ला उठे, राज्य राज्य के लोग डगमगाने लगे; वह बोल उठा, और पृथ्वी पिघल गई।

10     चुप हो जाओ, और जान लो, कि मैं ही परमेश्वर हूं। मैं जातियों में महान हूं, मैं पृथ्वी भर में महान हूं!

Responsive Reading: Psalm 46 : 2-6, 10

2.     Therefore will not we fear, though the earth be removed, and though the mountains be carried into the midst of the sea;

3.     Though the waters thereof roar and be troubled, though the mountains shake with the swelling thereof.

4.     There is a river, the streams whereof shall make glad the city of God, the holy place of the tabernacles of the most High.

5.     God is in the midst of her; she shall not be moved: God shall help her, and that right early.

6.     The heathen raged, the kingdoms were moved: he uttered his voice, the earth melted.

10.     Be still, and know that I am God: I will be exalted among the heathen, I will be exalted in the earth.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 31: 23 (से : 2nd,)

23     हे यहोवा के सब भक्तों उससे प्रेम रखो! यहोवा सच्चे लोगों की तो रक्षा करता है, परन्तु जो अहंकार करता है, उसको वह भली भांति बदला देता है।

1. Psalm 31 : 23 (to 2nd ,)

23     O love the Lord, all ye his saints: for the Lord preserveth the faithful,

2. यशायाह 35: 3-5, 10

3     ढीले हाथों को दृढ़ करो और थरथराते हुए घुटनों को स्थिर करो।

4     घबराने वालों से कहो, हियाव बान्धो, मत डरो! देखो, तुम्हारा परमेश्वर पलटा लेने और प्रतिफल देने को आ रहा है। हां, परमेश्वर आकर तुम्हारा उद्धार करेगा॥

5     तब अन्धों की आंखे खोली जाएंगी और बहिरों के कान भी खोले जाएंगे;

10     और यहोवा के छुड़ाए हुए लोग लौटकर जयजयकार करते हुए सिय्योन में आएंगे; और उनके सिर पर सदा का आनन्द होगा; वे हर्ष और आनन्द पाएंगे और शोक और लम्बी सांस का लेना जाता रहेगा॥

2. Isaiah 35 : 3-5, 10

3     Strengthen ye the weak hands, and confirm the feeble knees.

4     Say to them that are of a fearful heart, Be strong, fear not: behold, your God will come with vengeance, even God with a recompence; he will come and save you.

5     Then the eyes of the blind shall be opened, and the ears of the deaf shall be unstopped.

10     And the ransomed of the Lord shall return, and come to Zion with songs and everlasting joy upon their heads: they shall obtain joy and gladness, and sorrow and sighing shall flee away.

3. योएल 2 : 12, 13, 25 (से 1st ,), 26 (से :), 32

12     तौभी यहोवा की यह वाणी है, अभी भी सुनो, उपवास के साथ रोते-पीटते अपने पूरे मन से फिरकर मेरे पास आओ।

13     अपने वस्त्र नहीं, अपने मन ही को फाड़ कर अपने परमेश्वर यहोवा की ओर फिरो; क्योंकि वह अनुग्रहकारी, दयालु, विलम्ब से क्रोध करने वाला, करूणानिधान और दु:ख देकर पछतानेहारा है।

25     और जितने वर्ष टिड्डियां खाती यीं मैं तुझे फेर दूंगा॥

26     तुम पेट भरकर खाओगे, और तृप्त होगे, और अपने परमेश्वर यहोवा के नाम की स्तुति करोगे, जिसने तुम्हारे लिये आश्चर्य के काम किए हैं। और मेरी प्रजा की आशा फिर कभी न टूटेगी।

32     उस समय जो कोई यहोवा से प्रार्थना करेगा, वह छुटकारा पाएगा; और यहोवा के वचन के अनुसार सिय्योन पर्वत पर, और यरूशलेम में जिन बचे हुओं को यहोवा बुलाएगा, वे उद्धार पाएंगे॥

3. Joel 2 : 12, 13, 25 (to 1st ,), 26 (to :), 32

12     Therefore also now, saith the Lord, turn ye even to me with all your heart, and with fasting, and with weeping, and with mourning:

13     And rend your heart, and not your garments, and turn unto the Lord your God: for he is gracious and merciful, slow to anger, and of great kindness, and repenteth him of the evil.

25     And I will restore to you the years that the locust hath eaten,

26     And ye shall eat in plenty, and be satisfied, and praise the name of the Lord your God, that hath dealt wondrously with you:

32     And it shall come to pass, that whosoever shall call on the name of the Lord shall be delivered: for in mount Zion and in Jerusalem shall be deliverance, as the Lord hath said, and in the remnant whom the Lord shall call.

4. 2 राजा 4: 8 (से 1st .), 9 (से 3rd ,), 10 (से 1st ,), 10 (और यह होगा), 11, 12 (से 1st ,), 14 (क्या), 15 (और जब), 16 (से 1st .), 17-21, 25 (से 1st .), 25 (उन्होंने कहा) (से 1st ,), 26, 30, 32, 33, 34 (और वह फैला), 35 (और बच्चा छींका), 37

8     फिर एक दिन की बात है कि एलीशा शूनेम को गया, जहां एक कुलीन स्त्री थी, और उसने उसे रोटी खाने के लिये बिनती कर के विवश किया। और जब जब वह उधर से जाता, तब तब वह वहां रोटी खाने को उतरता था।

9     और उस स्त्री ने अपने पति से कहा, सुन यह जो बार बार हमारे यहां से हो कर जाया करता है वह मुझे परमेश्वर का कोई पवित्र भक्त जान पड़ता है।

10     तो हम भीत पर एक छोटी उपरौठी कोठरी बनाएं ... कि जब जब वह हमारे यहां आए, तब तब उसी में टिका करे।

11     एक दिन की बात है, कि वह वहां जा कर उस उपरौठी कोठरी में टिका और उसी में लेट गया।

12     और उसने अपने सेवक गेहजी से कहा।

14     इसके लिये क्या किया जाए? गेहजी ने उत्तर दिया, निश्चय उसके कोई लड़का नहीं, और उसका पति बूढ़ा है।

15     और जब उसने उसे बुलाया, तब वह द्वार में खड़ी हुई।

16     तब उसने कहा, बसन्त ऋतु में दिन पूरे होने पर तू एक बेटा छाती से लगाएगी।

17     और स्त्री को गर्भ रहा, और वसन्त ऋतु का जो समय एलीशा ने उस से कहा था, उसी समय जब दिन पूरे हुए, तब उसके पुत्र उत्पन्न हुआ।

18     और जब लड़का बड़ा हो गया, तब एक दिन वह अपने पिता के पास लवने वालों के निकट निकल गया।

19     और उसने अपने पिता से कहा, आह! मेरा सिर, आह! मेरा सिर। तब पिता ने अपने सेवक से कहा, इस को इसकी माता के पास ले जा।

20     वह उसे उठा कर उसकी माता के पास ले गया, फिर वह दोपहर तक उसके घुटनों पर बैठा रहा, तब मर गया।

21     तब उसने चढ़ कर उसको परमेश्वर के भक्त की खाट पर लिटा दिया, और निकल कर किवाड़ बन्द किया, तब उतर गई।

25     तो वह चलते चलते कर्मेल पर्वत को परमेश्वर के भक्त के निकट पहुंची। ... परमेश्वर के भक्त ने अपने सेवक गेहजी से कहा।

26     अब उस से मिलने को दौड़ जा, और उस से पूछ, कि तू कुशल से है? तेरा पति भी कुशल से है? और लड़का भी कुशल से है? पूछने पर स्त्री ने उत्तर दिया, हां, कुशल से हैं।

30     तब लड़के की मां ने एलीशा से कहा, यहोवा के और तेरे जीवन की शपथ मैं तुझे न छोड़ूंगी। तो वह उठ कर उसके पीछे पीछे चला।

32     जब एलीशा घर में आया, तब क्या देखा, कि लड़का मरा हुआ उसकी खाट पर पड़ा है।

33     तब उसने अकेला भीतर जा कर किवाड़ बन्द किया, और यहोवा से प्रार्थना की।

34     ... और वह लड़के पर पसर गया, तब लड़के की देह गर्म होने लगी।

35     ... लड़के ने सात बार छींका, और अपनी आंखें खोलीं।

37     वह भीतर गई, और उसके पावों पर गिर भूमि तक झुककर दण्डवत किया; फिर अपने बेटे को उठा कर निकल गई।

4. II Kings 4 : 8 (to 1st .), 9 (to 3rd ,), 10 (to 1st ,), 10 (and it shall), 11, 12 (to 1st ,), 14 (What), 15 (And when), 16 (to 1st .), 7-21, 25 (to 1st .), 25 (he said) (to 1st ,), 26, 30, 32, 33, 34 (and he stretched), 35 (and the child sneezed), 37

8     And it fell on a day, that Elisha passed to Shunem, where was a great woman; and she constrained him to eat bread.

9     And she said unto her husband, Behold now, I perceive that this is an holy man of God,

10     Let us make a little chamber, … and it shall be, when he cometh to us, that he shall turn in thither.

11     And it fell on a day, that he came thither, and he turned into the chamber, and lay there.

12     And he said to Gehazi his servant,

14     What then is to be done for her? And Gehazi answered, Verily she hath no child, and her husband is old.

15     And when he had called her, she stood in the door.

16     And he said, About this season, according to the time of life, thou shalt embrace a son.

17     And the woman conceived, and bare a son at that season that Elisha had said unto her, according to the time of life.

18     And when the child was grown, it fell on a day, that he went out to his father to the reapers.

19     And he said unto his father, My head, my head. And he said to a lad, Carry him to his mother.

20     And when he had taken him, and brought him to his mother, he sat on her knees till noon, and then died.

21     And she went up, and laid him on the bed of the man of God, and shut the door upon him, and went out.

25     So she went and came unto the man of God to mount Carmel. … he said to Gehazi his servant,

26     Run now, I pray thee, to meet her, and say unto her, Is it well with thee? is it well with thy husband? is it well with the child? And she answered, It is well.

30     And the mother of the child said, As the Lord liveth, and as thy soul liveth, I will not leave thee. And he arose, and followed her.

32     And when Elisha was come into the house, behold, the child was dead, and laid upon his bed.

33     He went in therefore, and shut the door upon them twain, and prayed unto the Lord.

34     …and he stretched himself upon the child; and the flesh of the child waxed warm.

35     …and the child sneezed seven times, and the child opened his eyes.

37     Then she went in, and fell at his feet, and bowed herself to the ground, and took up her son, and went out.

5. 2 राजा 6: 25 (से :)

25     तब शोमरोन में बड़ा अकाल पड़ा ।

5. II Kings 6 : 25 (to :)

25     And there was a great famine in Samaria:

6. 2 राजा 8: 1-5, 6 (इसलिए)

1     जिस स्त्री के बेटे को एलीशा ने जिलाया था, उस से उसने कहा था कि अपने घराने समेत यहां से जा कर जहां कहीं तू रह सके वहां रह; क्योंकि यहोवा की इच्छा है कि अकाल पड़े, और वह इस देश में सात वर्ष तक बना रहेगा।

2     परमेश्वर के भक्त के इस वचन के अनुसार वह स्त्री अपने घराने समेत पलिश्तियों के देश में जा कर सात वर्ष रही।

3     सात वर्ष के बीतने पर वह पलिश्तियों के देश से लौट आई, और अपने घर और भूमि के लिये दोहाई देने को राजा के पास गई।

4     राजा परमेश्वर के भक्त के सेवक गेहजी से बातें कर रहा था, और उसने कहा कि जो बड़े बड़े काम एलीशा ने किये हैं उन्हें मुझ से वर्णन कर।

5     जब वह राजा से यह वर्णन कर ही रहा था कि एलीशा ने एक मुर्दे को जिलाया, तब जिस स्त्री के बेटे को उसने जिलाया था वही आकर अपने घर और भूमि के लिये दोहाई देने लगी। तब गेहजी ने कहा, हे मेरे प्रभु! हे राजा! यह वही स्त्री है और यही उसका बेटा है जिसे एलीशा ने जिलाया था।

6 तब राजा ने एक हाकिम को यह कह कर उसके साथ कर दिया कि जो कुछ इसका था वरन जब से इस ने देश को छोड़ दिया तब से इसके खेत की जितनी आमदनी अब तक हुई हो सब इसे फेर दे।

6. II Kings 8 : 1-5, 6 (So)

1     Then spake Elisha unto the woman, whose son he had restored to life, saying, Arise, and go thou and thine household, and sojourn wheresoever thou canst sojourn: for the Lord hath called for a famine; and it shall also come upon the land seven years.

2     And the woman arose, and did after the saying of the man of God: and she went with her household, and sojourned in the land of the Philistines seven years.

3     And it came to pass at the seven years’ end, that the woman returned out of the land of the Philistines: and she went forth to cry unto the king for her house and for her land.

4     And the king talked with Gehazi the servant of the man of God, saying, Tell me, I pray thee, all the great things that Elisha hath done.

5     And it came to pass, as he was telling the king how he had restored a dead body to life, that, behold, the woman, whose son he had restored to life, cried to the king for her house and for her land. And Gehazi said, My lord, O king, this is the woman, and this is her son, whom Elisha restored to life.

6     So the king appointed unto her a certain officer, saying, Restore all that was hers, and all the fruits of the field since the day that she left the land, even until now.

7. यशायाह 54: 14, 17

14     तू धामिर्कता के द्वारा स्थिर होगी; तू अन्धेर से बचेगी, क्योंकि तुझे डरना न पड़ेगा; और तू भयभीत होने से बचेगी, क्योंकि भय का कारण तेरे पास न आएगा।

17     जितने हथियार तेरी हानि के लिये बनाए जाएं, उन में से कोई सफल न होगा, और, जितने लोग मुद्दई हो कर तुझ पर नालिश करें उन सभों से तू जीत जाएगा। यहोवा के दासों का यही भाग होगा, और वे मेरे ही कारण धर्मी ठहरेंगे, यहोवा की यही वाणी है॥

7. Isaiah 54 : 14, 17

14     In righteousness shalt thou be established: thou shalt be far from oppression; for thou shalt not fear: and from terror; for it shall not come near thee.

17     No weapon that is formed against thee shall prosper; and every tongue that shall rise against thee in judgment thou shalt condemn. This is the heritage of the servants of the Lord, and their righteousness is of me, saith the Lord.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 530 : 5-6

दिव्य विज्ञान में, मनुष्य ईश्वर के द्वारा कायम है,होने का दिव्य सिद्धांत।

1. 530 : 5-6

In divine Science, man is sustained by God, the divine Principle of being.

2. 139 : 4-9

शुरुआत से लेकर अंत तक, पवित्रशास्त्र आत्मा, मन की बात की विजय से भरपूर है। मूसा ने मन की शक्ति को उसके द्वारा सिद्ध किया, जिसे पुरुषों ने चमत्कार कहा; तब यहोशू, एलिय्याह और एलीशा ने किया। संकेत और चमत्कार के साथ ईसाई युग की शुरुआत हुई।

2. 139 : 4-9

From beginning to end, the Scriptures are full of accounts of the triumph of Spirit, Mind, over matter. Moses proved the power of Mind by what men called miracles; so did Joshua, Elijah, and Elisha. The Christian era was ushered in with signs and wonders.

3. 494 : 10-19

ईश्वरीय प्रेम हमेशा से मिला है और हमेशा हर मानवीय आवश्यकता को पूरा करेगा। यह कल्पना करना ठीक नहीं है कि यीशु ने दिव्य शक्ति का चयन केवल संख्या के लिए या सीमित समय के लिए ठीक करने के लिए किया, क्योंकि सभी मानव जाति के लिए और सभी समयों में, दिव्य प्रेम सभी अच्छे की आपूर्ति करता है।

कृपा का चमत्कार प्रेम का कोई चमत्कार नहीं है। यीशु ने शारीरिक शक्ति के साथ-साथ आत्मा की असीम क्षमता की अक्षमता का प्रदर्शन किया, इस प्रकार मानव भावना को अपने स्वयं के दोषों से भागने में मदद करने और दिव्य विज्ञान में सुरक्षा की तलाश करने के लिए।

3. 494 : 10-19

Divine Love always has met and always will meet every human need. It is not well to imagine that Jesus demonstrated the divine power to heal only for a select number or for a limited period of time, since to all mankind and in every hour, divine Love supplies all good.

The miracle of grace is no miracle to Love. Jesus demonstrated the inability of corporeality, as well as the infinite ability of Spirit, thus helping erring human sense to flee from its own convictions and seek safety in divine Science.

4. 476 : 28-5

जब यीशु ने परमेश्वर के बच्चों की बात की, न कि पुरुषों के बच्चों की, तो उन्होंने कहा, "परमेश्वर का राज्य तुम्हारे बीच में है;" इसका मतलब है, सत्य और प्रेम वास्तविक मनुष्य में राज्य करता है, यह दर्शाता है कि भगवान की छवि में आदमी बेदाग और शाश्वत है। यीशु ने विज्ञान में सिद्ध पुरुष को सही ठहराया, जो उसे दिखाई दिया जहां पाप करने वाला नश्वर मनुष्य नश्वर प्रतीत होता है। इस सिद्ध पुरुष में उद्धारकर्ता ने परमेश्वर की अपनी समानता को देखा, और मनुष्य के इस सही दृष्टिकोण ने बीमारों को चंगा किया। इस प्रकार यीशु ने सिखाया कि ईश्वर का राज्य अक्षुण्ण, सार्वभौमिक है, और वह मनुष्य शुद्ध और पवित्र है।

4. 476 : 28-5

When speaking of God's children, not the children of men, Jesus said, "The kingdom of God is within you;" that is, Truth and Love reign in the real man, showing that man in God's image is unfallen and eternal. Jesus beheld in Science the perfect man, who appeared to him where sinning mortal man appears to mortals. In this perfect man the Saviour saw God's own likeness, and this correct view of man healed the sick. Thus Jesus taught that the kingdom of God is intact, universal, and that man is pure and holy.

5. 470 : 32-5

साइंस में ईश्वर और मनुष्य के संबंध, ईश्वरीय सिद्धांत और विचार अविनाशी हैं; और विज्ञान जानता है कि कोई चूक नहीं हुई है और न ही सद्भाव में लौटा लेकिन यह ईश्वरीय आदेश या आध्यात्मिक कानून रखता है, जिसमें भगवान और वह जो कुछ भी बनाता है वह परिपूर्ण और शाश्वत है, अपने सनातन इतिहास में अपरिवर्तित रहा है।

5. 470 : 32-5

The relations of God and man, divine Principle and idea, are indestructible in Science; and Science knows no lapse from nor return to harmony, but holds the divine order or spiritual law, in which God and all that He creates are perfect and eternal, to have remained unchanged in its eternal history.

6. 471 : 13-21

दिव्य विज्ञान के तथ्यों को स्वीकार किया जाना चाहिए, - हालांकि इन तथ्यों के रूप में सबूत बुराई, पदार्थ द्वारा, या भौतिक अर्थों द्वारा समर्थित नहीं हैं, - क्योंकि ईश्वर और मनुष्य सह-अस्तित्व का प्रमाण आध्यात्मिक अर्थ से पूरी तरह से कायम है। मनुष्य है, और हमेशा के लिए भगवान का प्रतिबिंब रहा है। भगवान अनंत हैं, इसलिए हमेशा मौजूद हैं, और कोई अन्य शक्ति या उपस्थिति नहीं है। इसलिए ब्रह्मांड की आध्यात्मिकता ही सृष्टि का एकमात्र तथ्य है। "परमेश्वर सच्चा और हर एक मनुष्य [सामग्री] झूठा ठहरे!"

6. 471 : 13-21

The facts of divine Science should be admitted, — although the evidence as to these facts is not supported by evil, by matter, or by material sense, — because the evidence that God and man coexist is fully sustained by spiritual sense. Man is, and forever has been, God's reflection. God is infinite, therefore ever present, and there is no other power nor presence. Hence the spirituality of the universe is the only fact of creation. "Let God be true, but every [material] man a liar."

7. 131 : 6-11

जब एक बार ईश्वरीय विज्ञान द्वारा मिथ्या प्रमाण को नष्ट कर दिया जाता है, तो वह भौतिक इंद्रियों से पहले गायब हो जाता है। इसी तरह कामुक मनुष्य का आत्मा के विज्ञान और इस शास्त्र के महत्व का विरोध है, "शरीर पर मन लगाना तो परमेश्वर से बैर रखना है।" बाइबल का केंद्रीय तथ्य शारीरिक शक्ति पर आध्यात्मिक की श्रेष्ठता है।

7. 131 : 6-11

When once destroyed by divine Science, the false evidence before the corporeal senses disappears. Hence the opposition of sensuous man to the Science of Soul and the significance of the Scripture, "The carnal mind is enmity against God." The central fact of the Bible is the superiority of spiritual over physical power.

8. 410 : 14-21

ईश्वर में हमारी आस्था का हर परीक्षण हमें मजबूत बनाता है। आत्मा से पार पाने के लिए भौतिक स्थिति जितनी कठिन लगती है, उतनी ही मजबूत हमारे विश्वास और हमारे प्रेम को शुद्ध करना चाहिए। प्रेरित यूहन्ना कहता है: "प्रेम में भय नहीं होता, वरन सिद्ध प्रेम भय को दूर कर देता है, ... जो भय करता है, वह प्रेम में सिद्ध नहीं हुआ।" यहाँ क्रिश्चियन साइंस की एक निश्चित और प्रेरित घोषणा है।

8. 410 : 14-21

Every trial of our faith in God makes us stronger. The more difficult seems the material condition to be overcome by Spirit, the stronger should be our faith and the purer our love. The Apostle John says: "There is no fear in Love, but perfect Love casteth out fear. ... He that feareth is not made perfect in Love." Here is a definite and inspired proclamation of Christian Science.

9. 66 : 10-16

परीक्षण परमेश्वर की देखभाल के प्रमाण हैं। भौतिक विकास की उम्मीदों की मिट्टी में बोए गए बीज से आध्यात्मिक विकास अंकुरण नहीं करता है, लेकिन जब ये क्षय होता है, तो प्रेम आत्मा के ऊंचे उत्साह का प्रचार करता है, जिसमें पृथ्वी का कोई दाग नहीं होता है। अनुभव के प्रत्येक क्रमिक चरण में ईश्वरीय अच्छाई और प्रेम के नए विचार सामने आते हैं।

9. 66 : 10-16

Trials are proofs of God's care. Spiritual development germinates not from seed sown in the soil of material hopes, but when these decay, Love propagates anew the higher joys of Spirit, which have no taint of earth. Each successive stage of experience unfolds new views of divine goodness and love.

10. 540 : 11-16

नैतिक रासायनिककरण में, जब बुराई, भ्रम के लक्षण बढ़ जाते हैं, तो हम अपनी अज्ञानता में सोच सकते हैं कि भगवान ने बुराई को मिटा दिया है; लेकिन हमें यह जानना चाहिए कि ईश्वर का कानून तथाकथित पाप और उसके प्रभावों को उजागर करता है, केवल यह कि सत्य बुराई की सभी भावना और पाप करने की शक्ति को नष्ट कर सकता है।

10. 540 : 11-16

In moral chemicalization, when the symptoms of evil, illusion, are aggravated, we may think in our ignorance that the Lord hath wrought an evil; but we ought to know that God's law uncovers so-called sin and its effects, only that Truth may annihilate all sense of evil and all power to sin.

11. 285 : 27-31

जैसा कि नश्वर तक पहुँचते हैं, क्रिश्चियन साइंस के ज्ञान के माध्यम से, एक उच्च भावना, वे सीखने की तलाश करेंगे, न कि पदार्थ से, बल्कि ईश्वरीय सिद्धांत से, ईश्वर, मसीह, सत्य, को उपचार और बचत शक्ति के रूप में कैसे प्रदर्शित करें।

11. 285 : 27-31

As mortals reach, through knowledge of Christian Science, a higher sense, they will seek to learn, not from matter, but from the divine Principle, God, how to demonstrate the Christ, Truth, as the healing and saving power.

12. 304 : 9-15

यह क्रिश्चियन साइंस का सिद्धांत है: उस दिव्य प्रेम को उसकी अभिव्यक्ति, या वस्तु से वंचित नहीं किया जा सकता है; वह आनन्द दुःख में नहीं बदल सकता, क्योंकि दुःख आनन्द का स्वामी नहीं है; वह अच्छाई कभी बुराई पैदा नहीं कर सकती; वह पदार्थ कभी भी मन उत्पन्न नहीं कर सकता है और न ही जीवन का परिणाम मृत्यु है। पूर्ण पुरुष - भगवान द्वारा शासित, उनका सिद्ध सिद्धांत - पाप रहित और शाश्वत है।

12. 304 : 9-15

This is the doctrine of Christian Science: that divine Love cannot be deprived of its manifestation, or object; that joy cannot be turned into sorrow, for sorrow is not the master of joy; that good can never produce evil; that matter can never produce mind nor life result in death. The perfect man — governed by God, his perfect Principle — is sinless and eternal.

13. 469 : 13 (यह)-17

त्रुटि का नाश करने वाला महान सत्य है कि भगवान, अच्छा, एकमात्र दिमाग है, और यह कि अनंत मन के विपरीत - जिसे शैतान या बुराई कहा जाता है - मन नहीं है, सत्य नहीं है, बल्कि त्रुटि, बुद्धि या वास्तविकता के बिना है।

13. 469 : 13 (The)-17

The exterminator of error is the great truth that God, good, is the only Mind, and that the supposititious opposite of infinite Mind — called devil or evil — is not Mind, is not Truth, but error, without intelligence or reality.

14. 393 : 8-10 (से 2nd .), 12-15

मन शारीरिक इंद्रियों का स्वामी है, और बीमारी, पाप और मृत्यु को जीत सकता है। इस ईश्वर प्रदत्त अधिकार का प्रयोग करें। ... आत्मा के सामर्थ्य में वृद्धि का विरोध करना अच्छा है। ईश्वर ने मनुष्य को इसके लिए सक्षम बनाया है, और कुछ भी मनुष्य में दिव्य रूप से दी गई क्षमता और शक्ति को नष्ट नहीं कर सकता है।

14. 393 : 8-10 (to 2nd .), 12-15

Mind is the master of the corporeal senses, and can conquer sickness, sin, and death. Exercise this God-given authority. … Rise in the strength of Spirit to resist all that is unlike good. God has made man capable of this, and nothing can vitiate the ability and power divinely bestowed on man.

15. 248 : 29-4

निःस्वार्थता, अच्छाई, दया, न्याय, स्वास्थ्य, पवित्रता, प्रेम - स्वर्ग का राज्य - हमारे भीतर राज करो, और पाप, बीमारी, और मृत्यु तब तक कम हो जाएगी जब तक वे अंततः गायब नहीं हो जाते।

आइए विज्ञान को स्वीकार करते हैं, भाव-गवाही के आधार पर सभी सिद्धांतों को त्यागें, अपूर्ण मॉडल और भ्रामक आदर्श छोड़ दें; और इसलिए हमें एक ईश्वर, एक मन, और वह एक परिपूर्ण, उत्कृष्टता के अपने मॉडल का निर्माण करने दें।

15. 248 : 29-4

Let unselfishness, goodness, mercy, justice, health, holiness, love — the kingdom of heaven — reign within us, and sin, disease, and death will diminish until they finally disappear.

Let us accept Science, relinquish all theories based on sense-testimony, give up imperfect models and illusive ideals; and so let us have one God, one Mind, and that one perfect, producing His own models of excellence.

16. 340 : 23-29

एक अनंत भगवान, अच्छा, पुरुषों और देशों को एकजुट करता है; मनुष्य के भाईचारे का गठन करता है; युद्ध समाप्त करता है; पवित्रशास्त्र पूरा करता है कि, "अपने पड़ोसी से अपने जैसा प्रेम करो;" बुतपरस्ती और ईसाई मूर्तिपूजा का सत्यानाश करता है, — सामाजिक, नागरिक, आपराधिक, राजनीतिक और धार्मिक क्षेत्रों में जो कुछ भी गलत है; लिंगों को बराबर करता है; मनुष्य पर शाप की घोषणा करता है, और कुछ भी नहीं छोड़ता है जो पाप कर सकता है, पीड़ित हो सकता है, दंडित हो सकता है या नष्ट हो सकता है।

16. 340 : 23-29

One infinite God, good, unifies men and nations; constitutes the brotherhood of man; ends wars; fulfils the Scripture, "Love thy neighbor as thyself;" annihilates pagan and Christian idolatry, — whatever is wrong in social, civil, criminal, political, and religious codes; equalizes the sexes; annuls the curse on man, and leaves nothing that can sin, suffer, be punished or destroyed.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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