रविवार 11 अप्रैल, 2021



विषयक्या पाप, बीमारी और मृत्यु वास्तविक हैं?

SubjectAre Sin, Disease, and Death Real?

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: भजन संहिता 91 : 9, 10

"हे यहोवा, तू मेरा शरण स्थान ठहरा है। तू ने जो परमप्रधान को अपना धाम मान लिया है, इसलिये कोई विपत्ति तुझ पर न पड़ेगी, न कोई दु: ख तेरे डेरे के निकट आएगा॥"



Golden Text:

Psalm 91 : 9, 10

Because thou hast made the Lord, which is my refuge, even the most High, thy habitation; there shall no evil befall thee, neither shall any plague come nigh thy dwelling.




PDF Downloads:


पाठ के ऑडियो के लिए यहां क्लिक करें

YouTube पर सुनने के लिए यहां क्लिक करें

████████████████████████████████████████████████████████████████████████


उत्तरदायी अध्ययन: भजन संहिता 91 : 11-16


11     क्योंकि वह अपने दूतों को तेरे निमित्त आज्ञा देगा, कि जहां कहीं तू जाए वे तेरी रक्षा करें।

12     वे तुझ को हाथों हाथ उठा लेंगे, ऐसा न हो कि तेरे पांवों में पत्थर से ठेस लगे।

13     तू सिंह और नाग को कुचलेगा, तू जवान सिंह और अजगर को लताड़ेगा।

14     उसने जो मुझ से स्नेह किया है, इसलिये मैं उसको छुड़ाऊंगा; मैं उसको ऊंचे स्थान पर रखूंगा, क्योंकि उसने मेरे नाम को जान लिया है।

15     जब वह मुझ को पुकारे, तब मैं उसकी सुनूंगा; संकट में मैं उसके संग रहूंगा, मैं उसको बचा कर उसकी महिमा बढ़ाऊंगा।

16     मैं उसको दीर्घायु से तृप्त करूंगा, और अपने किए हुए उद्धार का दर्शन दिखाऊंगा॥

Responsive Reading:

Psalm 91 : 11-16

11.     For he shall give his angels charge over thee, to keep thee in all thy ways.

12.     They shall bear thee up in their hands, lest thou dash thy foot against a stone.

13.     Thou shalt tread upon the lion and adder: the young lion and the dragon shalt thou trample under feet.

14.     Because he hath set his love upon me, therefore will I deliver him: I will set him on high, because he hath known my name.

15.     He shall call upon me, and I will answer him: I will be with him in trouble; I will deliver him, and honour him.

16.     With long life will I satisfy him, and shew him my salvation.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. उत्पत्ति 1: 1, 26 (से :), 27, 28 (से :), 31 (से 1st .)

1     आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।

26     फिर परमेश्वर ने कहा, हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएं; और वे समुद्र की मछलियों, और आकाश के पक्षियों, और घरेलू पशुओं, और सारी पृथ्वी पर, और सब रेंगने वाले जन्तुओं पर जो पृथ्वी पर रेंगते हैं, अधिकार रखें।

27     तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की।

28     और परमेश्वर ने उन को आशीष दी: और उन से कहा, फूलो-फलो, और पृथ्वी में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो; और समुद्र की मछलियों, तथा आकाश के पक्षियों, और पृथ्वी पर रेंगने वाले सब जन्तुओ पर अधिकार रखो।

31     तब परमेश्वर ने जो कुछ बनाया था, सब को देखा, तो क्या देखा, कि वह बहुत ही अच्छा है।

1. Genesis 1 : 1, 26 (to :), 27, 28 (to :), 31 (to 1st .)

1     In the beginning God created the heaven and the earth.

26     And God said, Let us make man in our image, after our likeness:

27     So God created man in his own image, in the image of God created he him; male and female created he them.

28     And God blessed them, and God said unto them, Be fruitful, and multiply, and replenish the earth, and subdue it:

31     And God saw every thing that he had made, and, behold, it was very good.

2. भजन संहिता 68 : 20

20     वही हमारे लिये बचाने वाला ईश्वर ठहरा; यहोवा प्रभु मृत्यु से भी बचाता है॥

2. Psalm 68 : 20

20     He that is our God is the God of salvation; and unto God the Lord belong the issues from death.

3. यूहन्ना 8: 1-11

1     परन्तु यीशु जैतून के पहाड़ पर गया।

2     और भोर को फिर मन्दिर में आया, और सब लोग उसके पास आए; और वह बैठकर उन्हें उपदेश देने लगा।

3     तब शास्त्री और फरीसी एक स्त्री को लाए, जो व्यभिचार में पकड़ी गई थी, और उस को बीच में खड़ी करके यीशु से कहा।

4     हे गुरू, यह स्त्री व्यभिचार करते ही पकड़ी गई है।

5     व्यवस्था में मूसा ने हमें आज्ञा दी है कि ऐसी स्त्रियों को पत्थरवाह करें: सो तू इस स्त्री के विषय में क्या कहता है?

6     उन्होंने उस को परखने के लिये यह बात कही ताकि उस पर दोष लगाने के लिये कोई बात पाएं, परन्तु यीशु झुककर उंगली से भूमि पर लिखने लगा।

7     जब वे उस से पूछते रहे, तो उस ने सीधे होकर उन से कहा, कि तुम में जो निष्पाप हो, वही पहिले उस को पत्थर मारे।

8     और फिर झुककर भूमि पर उंगली से लिखने लगा।

9     परन्तु वे यह सुनकर बड़ों से लेकर छोटों तक एक एक करके निकल गए, और यीशु अकेला रह गया, और स्त्री वहीं बीच में खड़ी रह गई।

10     यीशु ने सीधे होकर उस से कहा, हे नारी, वे कहां गए? क्या किसी ने तुझ पर दंड की आज्ञा न दी।

11     उस ने कहा, हे प्रभु, किसी ने नहीं: यीशु ने कहा, मैं भी तुझ पर दंड की आज्ञा नहीं देता; जा, और फिर पाप न करना॥

3. John 8 : 1-11

1     Jesus went unto the mount of Olives.

2     And early in the morning he came again into the temple, and all the people came unto him; and he sat down, and taught them.

3     And the scribes and Pharisees brought unto him a woman taken in adultery; and when they had set her in the midst,

4     They say unto him, Master, this woman was taken in adultery, in the very act.

5     Now Moses in the law commanded us, that such should be stoned: but what sayest thou?

6     This they said, tempting him, that they might have to accuse him. But Jesus stooped down, and with his finger wrote on the ground, as though he heard them not.

7     So when they continued asking him, he lifted up himself, and said unto them, He that is without sin among you, let him first cast a stone at her.

8     And again he stooped down, and wrote on the ground.

9     And they which heard it, being convicted by their own conscience, went out one by one, beginning at the eldest, even unto the last: and Jesus was left alone, and the woman standing in the midst.

10     When Jesus had lifted up himself, and saw none but the woman, he said unto her, Woman, where are those thine accusers? hath no man condemned thee?

11     She said, No man, Lord. And Jesus said unto her, Neither do I condemn thee: go, and sin no more.

4. रोमियो 6: 12-14, 23

12     इसलिये पाप तुम्हारे मरनहार शरीर में राज्य न करे, कि तुम उस की लालसाओं के आधीन रहो।

13     और न अपने अंगो को अधर्म के हथियार होने के लिये पाप को सौंपो, पर अपने आप को मरे हुओं में से जी उठा हुआ जानकर परमेश्वर को सौंपो, और अपने अंगो को धर्म के हथियार होने के लिये परमेश्वर को सौंपो।

14     और तुम पर पाप की प्रभुता न होगी, क्योंकि तुम व्यवस्था के आधीन नहीं वरन अनुग्रह के आधीन हो॥

23     क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है॥

4. Romans 6 : 12-14, 23

12     Let not sin therefore reign in your mortal body, that ye should obey it in the lusts thereof.

13     Neither yield ye your members as instruments of unrighteousness unto sin: but yield yourselves unto God, as those that are alive from the dead, and your members as instruments of righteousness unto God.

14     For sin shall not have dominion over you: for ye are not under the law, but under grace.

23     For the wages of sin is death; but the gift of God is eternal life through Jesus Christ our Lord.

5. यूहन्ना 9: 1-3, 6, 7

1     फिर जाते हुए उस ने एक मनुष्य को देखा, जो जन्म का अन्धा था।

2     और उसके चेलों ने उस से पूछा, हे रब्बी, किस ने पाप किया था कि यह अन्धा जन्मा, इस मनुष्य ने, या उसके माता पिता ने?

3     यीशु ने उत्तर दिया, कि न तो इस ने पाप किया था, न इस के माता पिता ने: परन्तु यह इसलिये हुआ, कि परमेश्वर के काम उस में प्रगट हों।

6     यह कहकर उस ने भूमि पर थूका और उस थूक से मिट्टी सानी, और वह मिट्टी उस अन्धे की आंखों पर लगाकर।

7     उस से कहा; जा शीलोह के कुण्ड में धो ले, (जिस का अर्थ भेजा हुआ है) सो उस ने जाकर धोया, और देखता हुआ लौट आया।

5. John 9 : 1-3, 6, 7

1     And as Jesus passed by, he saw a man which was blind from his birth.

2     And his disciples asked him, saying, Master, who did sin, this man, or his parents, that he was born blind?

3     Jesus answered, Neither hath this man sinned, nor his parents: but that the works of God should be made manifest in him.

6     When he had thus spoken, he spat on the ground, and made clay of the spittle, and he anointed the eyes of the blind man with the clay,

7     And said unto him, Go, wash in the pool of Siloam, (which is by interpretation, Sent.) He went his way therefore, and washed, and came seeing.

6. मत्ती 5 : 2, 17, 18

2     और वह अपना मुंह खोलकर उन्हें यह उपदेश देने लगा,

17     यह न समझो, कि मैं व्यवस्था था भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों को लोप करने आया हूं।

18     लोप करने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूं, क्योंकि मैं तुम से सच कहता हूं, कि जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएं, तब तक व्यवस्था से एक मात्रा या बिन्दु भी बिना पूरा हुए नहीं टलेगा।

6. Matthew 5 : 2, 17, 18

2     And he opened his mouth, and taught them, saying,

17     Think not that I am come to destroy the law, or the prophets: I am not come to destroy, but to fulfil.

18     For verily I say unto you, Till heaven and earth pass, one jot or one tittle shall in no wise pass from the law, till all be fulfilled.

7. प्रेरितों के काम 4 : 33

33     और प्रेरित बड़ी सामर्थ से प्रभु यीशु के जी उठने की गवाही देते रहे और उन सब पर बड़ा अनुग्रह था।

7. Acts 4 : 33

33     And with great power gave the apostles witness of the resurrection of the Lord Jesus: and great grace was upon them all.

8. प्रेरितों के काम 5: 12, 14-16

12     और प्रेरितों के हाथों से बहुत चिन्ह और अद्भुत काम लोगों के बीच में दिखाए जाते थे, (और वे सब एक चित्त होकर सुलैमान के ओसारे में इकट्ठे हुआ करते थे।

14     और विश्वास करने वाले बहुतेरे पुरूष और स्त्रियां प्रभु की कलीसिया में और भी अधिक आकर मिलते रहे।)

15     यहां तक कि लोग बीमारों को सड़कों पर ला लाकर, खाटों और खटोलों पर लिटा देते थे, कि जब पतरस आए, तो उस की छाया ही उन में से किसी पर पड़ जाए।

16     और यरूशलेम के आस पास के नगरों से भी बहुत लोग बीमारों और अशुद्ध आत्माओं के सताए हुओं का ला लाकर, इकट्ठे होते थे, और सब अच्छे कर दिए जाते थे॥

8. Acts 5 : 12, 14-16

12     And by the hands of the apostles were many signs and wonders wrought among the people; (and they were all with one accord in Solomon’s porch.

14     And believers were the more added to the Lord, multitudes both of men and women.)

15     Insomuch that they brought forth the sick into the streets, and laid them on beds and couches, that at the least the shadow of Peter passing by might overshadow some of them.

16     There came also a multitude out of the cities round about unto Jerusalem, bringing sick folks, and them which were vexed with unclean spirits: and they were healed every one.

9. प्रेरितों के काम 20 : 7-12

7     सप्ताह के पहिले दिन जब हम रोटी तोड़ने के लिये इकट्ठे हुए, तो पौलुस ने जो दूसरे दिन चले जाने पर था, उन से बातें की, और आधी रात तक बातें करता रहा।

8     जिस अटारी पर हम इकट्ठे थे, उस में बहुत दीये जल रहे थे।

9     और यूतुखुस नाम का एक जवान खिड़की पर बैठा हुआ गहरी नींद से झुक रहा था, और जब पौलुस देर तक बातें करता रहा तो वह नींद के झोंके में तीसरी अटारी पर से गिर पड़ा, और मरा हुआ उठाया गया।

10     परन्तु पौलुस उतरकर उस से लिपट गया, और गले लगाकर कहा; घबराओ नहीं; क्योंकि उसका प्राण उसी में है।

11     और ऊपर जाकर रोटी तोड़ी और खाकर इतनी देर तक उन से बातें करता रहा, कि पौ फट गई; फिर वह चला गया।

12     और वे उस लड़के को जीवित ले आए, और बहुत शान्ति पाई॥

9. Acts 20 : 7-12

7     And upon the first day of the week, when the disciples came together to break bread, Paul preached unto them, ready to depart on the morrow; and continued his speech until midnight.

8     And there were many lights in the upper chamber, where they were gathered together.

9     And there sat in a window a certain young man named Eutychus, being fallen into a deep sleep: and as Paul was long preaching, he sunk down with sleep, and fell down from the third loft, and was taken up dead.

10     And Paul went down, and fell on him, and embracing him said, Trouble not yourselves; for his life is in him.

11     When he therefore was come up again, and had broken bread, and eaten, and talked a long while, even till break of day, so he departed.

12     And they brought the young man alive, and were not a little comforted.

10. प्रेरितों के काम 26 : 8

8     जब कि परमेश्वर मरे हुओं को जिलाता है, तो तुम्हारे यहां यह बात क्यों विश्वास के योग्य नहीं समझी जाती?

10. Acts 26 : 8

8     Why should it be thought a thing incredible with you, that God should raise the dead?

11. लूका 1 : 37

37     क्योंकि जो वचन परमेश्वर की ओर से होता है वह प्रभावरिहत नहीं होता।

11. Luke 1 : 37

37     For with God nothing shall be impossible.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 521 : 5-6

जो कुछ भी बनाया गया है वह भगवान का काम है, और सब अच्छा है।

1. 521 : 5-6

All that is made is the work of God, and all is good.

2. 519 : 3-6

अन्यथा, वह कैसे हो सकता है, क्योंकि आध्यात्मिक निर्माण उनके अनंत आत्म-नियंत्रण और अमर ज्ञान का प्रकोप था?

2. 519 : 3-6

How could He be otherwise, since the spiritual creation was the outgrowth, the emanation, of His infinite self-containment and immortal wisdom?

3. 525 : 20-29

सब कुछ भगवान ने अच्छा या योग्य बनाया। जो कुछ भी वैधता या द्वेषपूर्ण है, उसने नहीं बनाया, - इसलिए यह असत्य है। उत्पत्ति के विज्ञान में हमने पढ़ा कि उसने वह सब कुछ देखा जो उसने बनाया था, "और देखा तो बहुत अच्छा था।" शारीरिक इंद्रियां अन्यथा घोषित करती हैं; और अगर हम सत्य के रिकॉर्ड के रूप में त्रुटि के इतिहास के लिए एक ही ध्यान देते हैं, तो पाप और मृत्यु का पवित्र अभिलेख भौतिक इंद्रियों के झूठे निष्कर्ष का पक्षधर है। पाप, बीमारी और मृत्यु को वास्तविकता से रहित समझना चाहिए क्योंकि वे अच्छे, ईश्वर के हैं।

3. 525 : 20-29

Everything good or worthy, God made. Whatever is valueless or baneful, He did not make, — hence its unreality. In the Science of Genesis we read that He saw everything which He had made, "and, behold, it was very good." The corporeal senses declare otherwise; and if we give the same heed to the history of error as to the records of truth, the Scriptural record of sin and death favors the false conclusion of the material senses. Sin, sickness, and death must be deemed as devoid of reality as they are of good, God.

4. 472 : 9-12

बीमारी, पाप, और मृत्यु, धार्मिक होने के नाते, परमेश्वर में उत्पन्न नहीं होते हैं और न ही उनकी सरकार के होते हैं। उनका कानून, ठीक ही समझा जाता है, उन्हें नष्ट कर देता है। यीशु ने इन कथनों के प्रमाण प्रस्तुत किए।

4. 472 : 9-12

Sickness, sin, and death, being inharmonious, do not originate in God nor belong to His government. His law, rightly understood, destroys them. Jesus furnished proofs of these statements.

5. 11 : 9-21

क्रिश्चियन साइंस के फिजिकल हीलिंग अब परिणाम है, यीशु के समय के अनुसार, ईश्वरीय सिद्धांत के संचालन से, इससे पहले कि पाप और बीमारी मानवीय चेतना में अपनी वास्तविकता खो देते हैं और स्वाभाविक रूप से गायब हो जाते हैं और आवश्यक रूप से अंधेरा प्रकाश और पाप को सुधार के लिए जगह देता है। अब, अतीत की तरह, ये शक्तिशाली कार्य अलौकिक नहीं हैं, बल्कि सर्वोच्च प्राकृतिक हैं। वे इमैनुअल, या "भगवान हमारे साथ है," का संकेत हैं — मानवीय चेतना में मौजूद एक दिव्य प्रभाव और खुद को दोहराते हुए, अब जैसा कि वादा किया गया था, आ रहा है,

कि बन्धुओं को छुटकारे का और

अन्धों को दृष्टि पाने का सुसमाचार

प्रचार करूं और कुचले हुओं को छुड़ाऊं।

5. xi : 9-21

The physical healing of Christian Science results now, as in Jesus' time, from the operation of divine Principle, before which sin and disease lose their reality in human consciousness and disappear as naturally and as necessarily as darkness gives place to light and sin to reformation. Now, as then, these mighty works are not supernatural, but supremely natural. They are the sign of Immanuel, or "God with us," — a divine influence ever present in human consciousness and repeating itself, coming now as was promised aforetime,

To preach deliverance to the captives [of sense],
And recovering of sight to the blind,
To set at liberty them that are bruised.

6. 206 : 26-31

भगवान ने बीमारी और मौत भेजने के बजाय, उन्हें नष्ट कर दिया, और प्रकाश अमरता में लाया। सर्वव्यापी और अनंत मन ने सभी को बनाया और सभी को शामिल किया। यह मन गलतियाँ नहीं करता है और बाद में उन्हें सही करता है। ईश्वर मनुष्य को पाप करने, बीमार होने या मरने के लिए प्रेरित नहीं करता है।

6. 206 : 26-31

Instead of God sending sickness and death, He destroys them, and brings to light immortality. Omnipotent and infinite Mind made all and includes all. This Mind does not make mistakes and subsequently correct them. God does not cause man to sin, to be sick, or to die.

7. 302 : 8-13, 19-24

जब भगवान सब और अनंत काल के हैं, तब यह असंभव है कि मनुष्य को वास्तविक रूप से खोना चाहिए। यह धारणा कि मन पदार्थ में है, और तथाकथित सुख और पीड़ा, जन्म, पाप, बीमारी, और पदार्थ की मृत्यु, वास्तविक हैं, एक नश्वर विश्वास है; और यह विश्वास वह सब है जो कभी खो जाएगा।

मनुष्य के पूर्ण, यहाँ तक कि पिता के रूप में भी पूर्ण होने का विज्ञान बताता है, क्योंकि आध्यात्मिक मनुष्य का आत्मा या मन, ईश्वर है, जो सभी का दिव्य सिद्धांत है, और क्योंकि यह वास्तविक व्यक्ति आत्मा के बजाय आत्मा के नियम द्वारा शासित है, न कि पदार्थ के तथाकथित नियमों द्वारा।

7. 302 : 8-13, 19-24

It is impossible that man should lose aught that is real, when God is all and eternally his. The notion that mind is in matter, and that the so-called pleasures and pains, the birth, sin, sickness, and death of matter, are real, is a mortal belief; and this belief is all that will ever be lost.

The Science of being reveals man as perfect, even as the Father is perfect, because the Soul, or Mind, of the spiritual man is God, the divine Principle of all being, and because this real man is governed by Soul instead of sense, by the law of Spirit, not by the so-called laws of matter.

8. 207 : 10-14

हमें सीखना चाहिए कि बुराई अस्तित्व का भ्रामक और असत्य है। बुराई सर्वोच्च नहीं है; अच्छा असहाय नहीं है; न तो पदार्थ के प्राथमिक, और आत्मा के कानून के तथाकथित कानून हैं। इस पाठ के बिना, हम पूर्ण पिता, या मनुष्य के दिव्य सिद्धांत की दृष्टि खो देते हैं।

8. 207 : 10-14

Evil is not supreme; good is not helpless; nor are the so-called laws of matter primary, and the law of Spirit secondary. Without this lesson, we lose sight of the perfect Father, or the divine Principle of man.

9. 147 : 32-6

यीशु ने कभी भी बीमारी को खतरनाक या चंगा करने की बात नहीं की। जब उनके छात्र उनके पास एक ऐसा मामला लाए, जिसे वे ठीक करने में विफल रहे, तो उन्होंने उनसे कहा, "ओ विश्वासहीन पीढ़ी," यह कहते हुए कि चंगा करने की अपेक्षित शक्ति मन में थी। उन्होंने कोई दवा नहीं निर्धारित की, भौतिक कानूनों के लिए कोई आज्ञाकारिता का आग्रह नहीं किया, लेकिन उनके लिए प्रत्यक्ष अवज्ञा का कार्य किया।

9. 147 : 32-6

Jesus never spoke of disease as dangerous or as difficult to heal. When his students brought to him a case they had failed to heal, he said to them, "O faithless generation," implying that the requisite power to heal was in Mind. He prescribed no drugs, urged no obedience to material laws, but acted in direct disobedience to them.

10. 476 : 32-4

यीशु ने विज्ञान में सिद्ध पुरुष को सही ठहराया, जो उसे दिखाई दिया जहां पाप करने वाला नश्वर मनुष्य नश्वर प्रतीत होता है। इस सिद्ध पुरुष में उद्धारकर्ता ने परमेश्वर की अपनी समानता को देखा, और मनुष्य के इस सही दृष्टिकोण ने बीमारों को चंगा किया।

10. 476 : 32-4

Jesus beheld in Science the perfect man, who appeared to him where sinning mortal man appears to mortals. In this perfect man the Saviour saw God's own likeness, and this correct view of man healed the sick.

11. 26 : 14-18, 28-30

ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम ने पाप, बीमारी और मृत्यु पर यीशु को अधिकार दिया। उनका मिशन आकाशीय विज्ञान को प्रकट करना था, यह साबित करने के लिए कि ईश्वर क्या है और वह मनुष्य के लिए क्या करता है।

हमारे मास्टर ने कोई विचार, सिद्धांत या विश्वास नहीं सिखाया। यह सभी वास्तविक लोगों का दिव्य सिद्धांत था जो उन्होंने सिखाया और अभ्यास किया।

11. 26 : 14-18, 28-30

Divine Truth, Life, and Love gave Jesus authority over sin, sickness, and death. His mission was to reveal the Science of celestial being, to prove what God is and what He does for man.

Our Master taught no mere theory, doctrine, or belief. It was the divine Principle of all real being which he taught and practised.

12. 231 : 20-29

अपने आप को पाप से श्रेष्ठ बनाने के लिए, क्योंकि परमेश्वर ने आपको इससे श्रेष्ठ बनाया है और मनुष्य को नियंत्रित करता है, सच्चा ज्ञान है। पाप से डरने के लिए प्रेम की शक्ति और ईश्वर के मनुष्य के संबंध में होने के दिव्य विज्ञान को गलत समझना है, - अपनी सरकार पर संदेह करना और उसकी सर्वशक्तिमान देखभाल पर अविश्वास करना। अपने आप को बीमारी और मौत से बेहतर पकड़ना भी उतना ही बुद्धिमानी है, और ईश्वरीय विज्ञान के अनुसार है। उनसे डरना असंभव है, जब आप भगवान को पूरी तरह से समझ लेते हैं और जानते हैं कि वे उनकी रचना का हिस्सा नहीं हैं।

12. 231 : 20-29

To hold yourself superior to sin, because God made you superior to it and governs man, is true wisdom. To fear sin is to misunderstand the power of Love and the divine Science of being in man's relation to God, — to doubt His government and distrust His omnipotent care. To hold yourself superior to sickness and death is equally wise, and is in accordance with divine Science. To fear them is impossible, when you fully apprehend God and know that they are no part of His creation.

13. 494 : 30-3

हमारे मास्टर ने शैतानों (बुराइयों) को बाहर निकाल दिया और बीमारों को चंगा किया। उनके अनुयायियों के बारे में यह भी कहा जाना चाहिए, कि वे भय और सभी बुराईयों को अपने और दूसरों से दूर करते हैं और बीमारों को ठीक करते हैं। जब भी मनुष्य ईश्वर द्वारा शासित होगा, ईश्वर मनुष्य के माध्यम से बीमारों को चंगा करेगा। सत्य ने त्रुटि को अब बाहर कर दिया जैसा कि उन्नीस सदियों पहले हुआ था।

13. 494 : 30-3

Our Master cast out devils (evils) and healed the sick. It should be said of his followers also, that they cast fear and all evil out of themselves and others and heal the sick. God will heal the sick through man, whenever man is governed by God. Truth casts out error now as surely as it did nineteen centuries ago.

14. 495 : 6-16

यदि बीमारी सच है या सत्य का विचार है, तो आप बीमारी को नष्ट नहीं कर सकते हैं, और यह कोशिश करना बेतुका होगा। तब बीमारी और त्रुटि को वर्गीकृत करें जैसा कि हमारे मास्टर ने किया था, जब उन्होंने बीमारों की बात की थी, "जिसे शैतान ने बाध्य किया," और मानव विश्वास पर कार्य करने वाली सत्य की जीवन-शक्ति में त्रुटि के लिए एक संप्रभु मारक पाते हैं, एक शक्ति जो जेल के दरवाज़े को इस तरह से खोलती है, और बंदी को शारीरिक और नैतिक रूप से मुक्त करती है।

जब बीमारी या पाप का भ्रम आपको झकझोरता है, ईश्वर और उसके विचार के प्रति दृढ़ रहना अपने विचार में पालन करने के लिए उसकी समानता के अलावा कुछ भी अनुमति न दें।

14. 495 : 6-16

If sickness is true or the idea of Truth, you cannot destroy sickness, and it would be absurd to try. Then classify sickness and error as our Master did, when he spoke of the sick, "whom Satan hath bound," and find a sovereign antidote for error in the life-giving power of Truth acting on human belief, a power which opens the prison doors to such as are bound, and sets the captive free physically and morally.

When the illusion of sickness or sin tempts you, cling steadfastly to God and His idea. Allow nothing but His likeness to abide in your thought.

15. 391 : 7-9

रोग के उद्दीप्त या उन्नत चरणों में अंधे और शांत प्रस्तुत करने के बजाय, उनके खिलाफ विद्रोह में वृद्धि।

15. 391 : 7-9

Instead of blind and calm submission to the incipient or advanced stages of disease, rise in rebellion against them.

16. 390 : 20-26

विचार पर बढ़ने के लिए पाप या बीमारी का कोई दावा नहीं है। इसे एक घृणित दृढ़ विश्वास के साथ खारिज कर दें कि यह नाजायज है, क्योंकि आप जानते हैं कि ईश्वर पाप से अधिक बीमारी का लेखक नहीं है। आपके पास पाप या बीमारी की आवश्यकता का समर्थन करने के लिए उसका कोई कानून नहीं है, लेकिन आपके पास उस आवश्यकता को नकारने और बीमार को ठीक करने के लिए दिव्य अधिकार है।

16. 390 : 20-26

Suffer no claim of sin or of sickness to grow upon the thought. Dismiss it with an abiding conviction that it is illegitimate, because you know that God is no more the author of sickness than He is of sin. You have no law of His to support the necessity either of sin or sickness, but you have divine authority for denying that necessity and healing the sick.

17. 393 : 8-15

मन शारीरिक इंद्रियों का स्वामी है, और बीमारी, पाप और मृत्यु को जीत सकता है। इस ईश्वर प्रदत्त अधिकार का प्रयोग करें। अपने शरीर पर अधिकार कर लो, और उसकी भावना और कार्य को नियंत्रित करो। आत्मा के सामर्थ्य में वृद्धि का विरोध करना अच्छा है। ईश्वर ने मनुष्य को इसके लिए सक्षम बनाया है, और कुछ भी मनुष्य में दिव्य रूप से दी गई क्षमता और शक्ति को नष्ट नहीं कर सकता है।

17. 393 : 8-15

Mind is the master of the corporeal senses, and can conquer sickness, sin, and death. Exercise this God-given authority. Take possession of your body, and govern its feeling and action. Rise in the strength of Spirit to resist all that is unlike good. God has made man capable of this, and nothing can vitiate the ability and power divinely bestowed on man.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


████████████████████████████████████████████████████████████████████████