रविवार 11 अगस्त, 2019 |

रविवार 11 अगस्त, 2019



विषयआत्मा

SubjectSpirit

वर्ण पाठ: अय्यूब 32 : 8

परन्तु मनुष्य में आत्मा तो है ही, और सर्वशक्तिमान अपनी दी हुई सांस से उन्हें समझने की शक्ति देता है।



Golden Text: Job 32 : 8

There is a spirit in man: and the inspiration of the Almighty giveth them understanding.




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I कुरिन्थियों 2 : 9-15


9     परन्तु जैसा लिखा है, कि जो आंख ने नहीं देखी, और कान ने नहीं सुना, और जो बातें मनुष्य के चित्त में नहीं चढ़ीं वे ही हैं, जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखने वालों के लिये तैयार की हैं।

10     परन्तु परमेश्वर ने उन को अपने आत्मा के द्वारा हम पर प्रगट किया; क्योंकि आत्मा सब बातें, वरन परमेश्वर की गूढ़ बातें भी जांचता है।

11     मनुष्यों में से कौन किसी मनुष्य की बातें जानता है, केवल मनुष्य की आत्मा जो उस में है? वैसे ही परमेश्वर की बातें भी कोई नहीं जानता, केवल परमेश्वर का आत्मा।

12     परन्तु हम ने संसार की आत्मा नहीं, परन्तु वह आत्मा पाया है, जो परमेश्वर की ओर से है, कि हम उन बातों को जानें, जो परमेश्वर ने हमें दी हैं।

13     जिन को हम मनुष्यों के ज्ञान की सिखाई हुई बातों में नहीं, परन्तु आत्मा की सिखाई हुई बातों में, आत्मिक बातें आत्मिक बातों से मिला मिला कर सुनाते हैं।

14     परन्तु शारीरिक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता, क्योंकि वे उस की दृष्टि में मूर्खता की बातें हैं, और न वह उन्हें जान सकता है क्योंकि उन की जांच आत्मिक रीति से होती है।

15     आत्मिक जन सब कुछ जांचता है, परन्तु वह आप किसी से जांचा नहीं जाता।

Responsive Reading: I Corinthians 2 : 9-15

9.     As it is written, Eye hath not seen, nor ear heard, neither have entered into the heart of man, the things which God hath prepared for them that love him.

10.     But God hath revealed them unto us by his Spirit: for the Spirit searcheth all things, yea, the deep things of God.

11.     For what man knoweth the things of a man, save the spirit of man which is in him? even so the things of God knoweth no man, but the Spirit of God.

12.     Now we have received, not the spirit of the world, but the spirit which is of God; that we might know the things that are freely given to us of God.

13.     Which things also we speak, not in the words which man’s wisdom teacheth, but which the Holy Ghost teacheth; comparing spiritual things with spiritual.

14.     But the natural man receiveth not the things of the Spirit of God: for they are foolishness unto him: neither can he know them, because they are spiritually discerned.

15.     But he that is spiritual judgeth all things, yet he himself is judged of no man.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. यशायाह 42 : 1, 5-7

1     मेरे दास को देखो जिसे मैं संभाले हूं, मेरे चुने हुए को, जिस से मेरा जी प्रसन्न है; मैं ने उस पर अपना आत्मा रखा है, वह अन्यजातियों के लिये न्याय प्रगट करेगा।

5     ईश्वर जो आकाश का सृजने और तानने वाला है, जो उपज सहित पृथ्वी का फैलाने वाला और उस पर के लोगों को सांस और उस पर के चलने वालों को आत्मा देने वाला यहावो है, वह यों कहता है:

6     मुझ यहोवा ने तुझ को धर्म से बुला लिया है; मैं तेरा हाथ थाम कर तेरी रक्षा करूंगा; मैं तुझे प्रजा के लिये वाचा और जातियों के लिये प्रकाश ठहराऊंगा; कि तू अन्धों की आंखें खोले,

7     बंधुओं को बन्दीगृह से निकाले और जो अन्धियारे में बैठे हैं उन को काल कोठरी से निकाले।

1. Isaiah 42 : 1, 5-7

1     Behold my servant, whom I uphold; mine elect, in whom my soul delighteth; I have put my spirit upon him: he shall bring forth judgment to the Gentiles.

5     Thus saith God the Lord, he that created the heavens, and stretched them out; he that spread forth the earth, and that which cometh out of it; he that giveth breath unto the people upon it, and spirit to them that walk therein:

6     I the Lord have called thee in righteousness, and will hold thine hand, and will keep thee, and give thee for a covenant of the people, for a light of the Gentiles;

7     To open the blind eyes, to bring out the prisoners from the prison, and them that sit in darkness out of the prison house.

2. प्रेरितों के काम 3 : 1-8

1     पतरस और यूहन्ना तीसरे पहर प्रार्थना के समय मन्दिर में जा रहे थे।

2     और लोग एक जन्म के लंगड़े को ला रहे थे, जिस को वे प्रति दिन मन्दिर के उस द्वार पर जो सुन्दर कहलाता है, बैठा देते थे, कि वह मन्दिर में जाने वालों से भीख मांगे।

3     जब उस ने पतरस और यूहन्ना को मन्दिर में जाते देखा, तो उन से भीख मांगी।

4     पतरस ने यूहन्ना के साथ उस की ओर ध्यान से देखकर कहा, हमारी ओर देख।

5     सो वह उन से कुछ पाने की आशा रखते हुए उन की ओर ताकने लगा।

6     तब पतरस ने कहा, चान्दी और सोना तो मेरे पास है नहीं; परन्तु जो मेरे पास है, वह तुझे देता हूं: यीशु मसीह नासरी के नाम से चल फिर।

7     और उस ने उसका दाहिना हाथ पकड़ के उसे उठाया: और तुरन्त उसके पावों और टखनों में बल आ गया।

8     और वह उछलकर खड़ा हो गया, और चलने फिरने लगा और चलता; और कूदता, और परमेश्वर की स्तुति करता हुआ उन के साथ मन्दिर में गया।

2. Acts 3 : 1-8

1     Now Peter and John went up together into the temple at the hour of prayer, being the ninth hour.

2     And a certain man lame from his mother’s womb was carried, whom they laid daily at the gate of the temple which is called Beautiful, to ask alms of them that entered into the temple;

3     Who seeing Peter and John about to go into the temple asked an alms.

4     And Peter, fastening his eyes upon him with John, said, Look on us.

5     And he gave heed unto them, expecting to receive something of them.

6     Then Peter said, Silver and gold have I none; but such as I have give I thee: In the name of Jesus Christ of Nazareth rise up and walk.

7     And he took him by the right hand, and lifted him up: and immediately his feet and ancle bones received strength.

8     And he leaping up stood, and walked, and entered with them into the temple, walking, and leaping, and praising God.

3. प्रेरितों के काम 4 : 5, 6 (इकट्ठे हुए थे)-14, 18, 23, 24, 29, 30, 31 (और वे थे)

5     दूसरे दिन ऐसा हुआ कि उन के सरदार और पुरिनये और शास्त्री।

6     ... सब यरूशलेम में इकट्ठे हुए।

7     और उन्हें बीच में खड़ा करके पूछने लगे, कि तुम ने यह काम किस सामर्थ से और किस नाम से किया है?

8     तब पतरस ने पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर उन से कहा।

9      े लोगों के सरदारों और पुरनियों, इस दुर्बल मनुष्य के साथ जो भलाई की गई है, यदि आज हम से उसके विषय में पूछ पाछ की जाती है, कि वह क्योंकर अच्छा हुआ।

10     तो तुम सब और सारे इस्त्राएली लोग जान लें कि यीशु मसीह नासरी के नाम से जिसे तुम ने क्रूस पर चढ़ाया, और परमेश्वर ने मरे हुओं में से जिलाया, यह मनुष्य तुम्हारे साम्हने भला चंगा खड़ा है।

11     यह वही पत्थर है जिसे तुम राजमिस्त्रियों ने तुच्छ जाना और वह कोने के सिरे का पत्थर हो गया।

12     और किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं; क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिस के द्वारा हम उद्धार पा सकें॥

13     जब उन्होंने पतरस और यूहन्ना का हियाव देखा, ओर यह जाना कि ये अनपढ़ और साधारण मनुष्य हैं, तो अचम्भा किया; फिर उन को पहचाना, कि ये यीशु के साथ रहे हैं।

14     और उस मनुष्य को जो अच्छा हुआ था, उन के साथ खड़े देखकर, वे विरोध में कुछ न कह सके।

18     तब उन्हें बुलाया और चितौनी देकर यह कहा, कि यीशु के नाम से कुछ भी न बोलना और न सिखलाना।

23     वे छूटकर अपने साथियों के पास आए, और जो कुछ महायाजकों और पुरनियों ने उन से कहा था, उन को सुना दिया।

24     यह सुनकर, उन्होंने एक चित्त होकर ऊंचे शब्द से परमेश्वर से कहा, हे स्वामी, तू वही है जिस ने स्वर्ग और पृथ्वी और समुद्र और जो कुछ उन में है बनाया।

29     अब, हे प्रभु, उन की धमकियों को देख; और अपने दासों को यह वरदान दे, कि तेरा वचन बड़े हियाव से सुनाएं।

30     और चंगा करने के लिये तू अपना हाथ बढ़ा; कि चिन्ह और अद्भुत काम तेरे पवित्र सेवक यीशु के नाम से किए जाएं।

31     ...और वे सब पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गए, और परमेश्वर का वचन हियाव से सुनाते रहे॥

3. Acts 4 : 5, 6 (were gathered)-14, 18, 23, 24, 29, 30, 31 (and they were)

5     And it came to pass on the morrow, that their rulers, and elders, and scribes,

6     …were gathered together at Jerusalem.

7     And when they had set them in the midst, they asked, By what power, or by what name, have ye done this?

8     Then Peter, filled with the Holy Ghost, said unto them, Ye rulers of the people, and elders of Israel,

9     If we this day be examined of the good deed done to the impotent man, by what means he is made whole;

10     Be it known unto you all, and to all the people of Israel, that by the name of Jesus Christ of Nazareth, whom ye crucified, whom God raised from the dead, even by him doth this man stand here before you whole.

11     This is the stone which was set at nought of you builders, which is become the head of the corner.

12     Neither is there salvation in any other: for there is none other name under heaven given among men, whereby we must be saved.

13     Now when they saw the boldness of Peter and John, and perceived that they were unlearned and ignorant men, they marvelled; and they took knowledge of them, that they had been with Jesus.

14     And beholding the man which was healed standing with them, they could say nothing against it.

18     And they called them, and commanded them not to speak at all nor teach in the name of Jesus.

23     And being let go, they went to their own company, and reported all that the chief priests and elders had said unto them.

24     And when they heard that, they lifted up their voice to God with one accord, and said, Lord, thou art God, which hast made heaven, and earth, and the sea, and all that in them is:

29     And now, Lord, behold their threatenings: and grant unto thy servants, that with all boldness they may speak thy word,

30     By stretching forth thine hand to heal; and that signs and wonders may be done by the name of thy holy child Jesus.

31     …and they were all filled with the Holy Ghost, and they spake the word of God with boldness.

4. रोमियो 8: 1, 2, 6-9 (से 1st.)

1     सो अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं: क्योंकि वे शरीर के अनुसार नहीं वरन आत्मा के अनुसार चलते हैं।

2     क्योंकि जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की, और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया।

6     शरीर पर मन लगाना तो मृत्यु है, परन्तु आत्मा पर मन लगाना जीवन और शान्ति है।

7     क्योंकि शरीर पर मन लगाना तो परमेश्वर से बैर रखना है, क्योंकि न तो परमेश्वर की व्यवस्था के आधीन है, और न हो सकता है।

8     और जो शारीरिक दशा में है, वे परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते।

9     परन्तु जब कि परमेश्वर का आत्मा तुम में बसता है, तो तुम शारीरिक दशा में नहीं, परन्तु आत्मिक दशा में हो। यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका जन नहीं।

4. Romans 8 : 1, 2, 6-9 (to 1st .)

1     There is therefore now no condemnation to them which are in Christ Jesus, who walk not after the flesh, but after the Spirit.

2     For the law of the Spirit of life in Christ Jesus hath made me free from the law of sin and death.

6     For to be carnally minded is death; but to be spiritually minded is life and peace.

7     Because the carnal mind is enmity against God: for it is not subject to the law of God, neither indeed can be.

8     So then they that are in the flesh cannot please God.

9     But ye are not in the flesh, but in the Spirit, if so be that the Spirit of God dwell in you.

5. II कुरिन्थियों 4 : 6

6     इसलिये कि परमेश्वर ही है, जिस ने कहा, कि अन्धकार में से ज्योति चमके; और वही हमारे हृदयों में चमका, कि परमेश्वर की महिमा की पहिचान की ज्योति यीशु मसीह के चेहरे से प्रकाशमान हो॥

5. II Corinthians 4 : 6

6     For God, who commanded the light to shine out of darkness, hath shined in our hearts, to give the light of the knowledge of the glory of God in the face of Jesus Christ.

6. गलातियों 5 : 1, 13 (से ;), 16, 22, 23

1     मसीह ने स्वतंत्रता के लिये हमें स्वतंत्र किया है; सो इसी में स्थिर रहो, और दासत्व के जूए में फिर से न जुतो॥

13     हे भाइयों, तुम स्वतंत्र होने के लिये बुलाए गए हो परन्तु ऐसा न हो,

16     पर मैं कहता हूं, आत्मा के अनुसार चलो, तो तुम शरीर की लालसा किसी रीति से पूरी न करोगे।

22     पर आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, मेल, धीरज,

23     और कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम हैं; ऐसे ऐसे कामों के विरोध में कोई भी व्यवस्था नहीं।

6. Galatians 5 : 1, 13 (to ;), 16, 22, 23

1     Stand fast therefore in the liberty wherewith Christ hath made us free, and be not entangled again with the yoke of bondage.

13     For, brethren, ye have been called unto liberty;

16     This I say then, Walk in the Spirit, and ye shall not fulfil the lust of the flesh.

22     But the fruit of the Spirit is love, joy, peace, longsuffering, gentleness, goodness, faith,

23     Meekness, temperance: against such there is no law.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 594 : 19 (से 1st ;), 20 (परमेश्वर)-21

आत्मा। दिव्य पदार्थ; … परमेश्वर; जो केवल परिपूर्ण, चिरस्थायी, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, अनंत है।

1. 594 : 19 (to 1st ;), 20 (God)-21

Spirit. Divine substance; … God; that only which is perfect, everlasting, omnipresent, omnipotent, infinite.

2. 93 : 22-25

क्राइस्टियन साइंस में, आत्मा, एक व्यक्तिवाचक संज्ञा के रूप में, सर्वोच्च व्यक्ति का नाम है। इसका मतलब मात्रा और गुणवत्ता है, और यह विशेष रूप से भगवान पर लागू होता है।

2. 93 : 22-25

In Christian Science, Spirit, as a proper noun, is the name of the Supreme Being. It means quantity and quality, and applies exclusively to God.

3. 124: 25-26 (से 1st.)

आत्मा सभी चीजों का जीवन, पदार्थ और निरंतरता है।

3. 124 : 25-26 (to 1st .)

Spirit is the life, substance, and continuity of all things.

4. 487 : 25-29

प्रेरित याकूब ने कहा, "तू अपना विश्वास मुझे कर्म बिना तो दिखा; और मैं अपना विश्वास अपने कर्मों के द्वारा तुझे दिखाऊंगा।" यह समझ कि जीवन ईश्वर है, आत्मा, जीवन की मृत्युहीन वास्तविकता, हमारे सर्वशक्तिमानता और अमरता में हमारे विश्वास को मजबूत करके हमारे दिनों को लंबा कर देती है।

4. 487 : 25-29

The Apostle James said, "Show me thy faith without thy works, and I will show thee my faith by my works." The understanding that Life is God, Spirit, lengthens our days by strengthening our trust in the deathless reality of Life, its almightiness and immortality.

5. 26 : 10-18

मसीह आत्मा था जिसे यीशु ने अपने बयानों में निहित किया था: "मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं;" "मैं और पिता एक हैं।" यह मसीह, या यीशु की दिव्यता, उसकी दिव्य प्रकृति थी, जो उसे अनुप्राणित करती थी। ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम ने पाप, बीमारी और मृत्यु पर यीशु को अधिकार दिया। उनका मिशन आकाशीय विज्ञान को प्रकट करना था, यह साबित करने के लिए कि ईश्वर क्या है और वह मनुष्य के लिए क्या करता है।

5. 26 : 10-18

The Christ was the Spirit which Jesus implied in his own statements: "I am the way, the truth, and the life;" "I and my Father are one." This Christ, or divinity of the man Jesus, was his divine nature, the godliness which animated him. Divine Truth, Life, and Love gave Jesus authority over sin, sickness, and death. His mission was to reveal the Science of celestial being, to prove what God is and what He does for man.

6. 141 : 13-21

बीमारों और पापों को ठीक करने में, यीशु ने इस तथ्य को विस्तार से बताया कि उपचार के प्रभाव ने ईश्वरीय सिद्धांत और मसीह-आत्मा की समझ का पालन किया, जो शारीरिक यीशु को नियंत्रित करता था। इस सिद्धांत के लिए कोई राजवंश, कोई सनकी एकाधिकार नहीं है। इसका एकमात्र ताज सिर अमर संप्रभुता है। इसका एकमात्र पुजारी आध्यात्मिक व्यक्ति है। बाइबल घोषणा करती है कि सभी विश्वासी "राज्य और पिता के लिए एक पुजारी" थे।

6. 141 : 13-21

In healing the sick and sinning, Jesus elaborated the fact that the healing effect followed the understanding of the divine Principle and of the Christ-spirit which governed the corporeal Jesus. For this Principle there is no dynasty, no ecclesiastical monopoly. Its only crowned head is immortal sovereignty. Its only priest is the spiritualized man. The Bible declares that all believers are made "kings and priests unto God."

7. 232 : 9-12, 16-25

शास्त्र हमें सूचित करता है कि "भगवान से सब कुछ हो सकता है," — आत्मा के लिए सभी अच्छाई संभव है; लेकिन हमारे प्रचलित सिद्धांत व्यावहारिक रूप से इससे इनकार करते हैं, और केवल सामग्री के माध्यम से उपचार को संभव बनाते हैं।

हमारे काल में ईसाइयत फिर से ईश्वरीय सिद्धांत की शक्ति का प्रदर्शन कर रही है, जैसा कि उन्नीस सौ साल पहले हुआ था, बीमारों के इलाज और मृत्यु पर विजय पाने से। यीशु ने कभी नहीं सिखाया कि ड्रग्स, भोजन, हवा और व्यायाम एक आदमी को स्वस्थ बना सकते हैं, या कि वे मानव जीवन को नष्ट कर सकते हैं; न ही उसने अपने अभ्यास से इन त्रुटियों का वर्णन किया। उन्होंने मन के प्रति सद्भाव का उल्लेख किया, सामग्री के लिए नहीं, और कभी भी ईश्वर के वाक्य को प्रभावित करने की कोशिश नहीं की, जिसने पाप, बीमारी और मृत्यु की ईश्वर की निंदा को सील कर दिया।

7. 232 : 9-12, 16-25

Scripture informs us that "with God all things are possible," — all good is possible to Spirit; but our prevalent theories practically deny this, and make healing possible only through matter.

In our age Christianity is again demonstrating the power of divine Principle, as it did over nineteen hundred years ago, by healing the sick and triumphing over death. Jesus never taught that drugs, food, air, and exercise could make a man healthy, or that they could destroy human life; nor did he illustrate these errors by his practice. He referred man's harmony to Mind, not to matter, and never tried to make of none effect the sentence of God, which sealed God's condemnation of sin, sickness, and death.

8. 284 : 21 (यह)-32

भौतिक इंद्रियाँ ईश्वर का कोई प्रमाण नहीं प्राप्त कर सकती हैं। वे न तो आत्मा को आंख से देख सकते हैं और न ही उसे कान के माध्यम से सुन सकते हैं, और न ही वे आत्मा को महसूस कर सकते हैं, स्वाद ले सकते हैं, न ही उसे सूंघ सकते हैं। यहां तक कि अधिक सूक्ष्म और गलत भौतिक तत्व इन इंद्रियों के संज्ञान से आगे हैं, और केवल उन प्रभावों के द्वारा जाना जाता है जो आमतौर पर उनके लिए जिम्मेदार हैं।

क्रिश्चियन साइंस के अनुसार, मनुष्य की एकमात्र वास्तविक भावना आध्यात्मिक है, जो दिव्य मन से निकलती है। विचार ईश्वर से मनुष्य की ओर जाता है, लेकिन न तो संवेदना और न ही रिपोर्ट भौतिक शरीर से मन तक जाती है। अंतर्मन हमेशा ईश्वर से लेकर उसके विचार, मनुष्य तक होता है।

8. 284 : 21 (The)-32

The physical senses can obtain no proof of God. They can neither see Spirit through the eye nor hear it through the ear, nor can they feel, taste, or smell Spirit. Even the more subtile and misnamed material elements are beyond the cognizance of these senses, and are known only by the effects commonly attributed to them.

According to Christian Science, the only real senses of man are spiritual, emanating from divine Mind. Thought passes from God to man, but neither sensation nor report goes from material body to Mind. The intercommunication is always from God to His idea, man.

9. 505 : 16-17, 20-28

आत्मा उस समझ को प्रदान करती है जो चेतना को बढ़ाती है और सभी सत्य की ओर ले जाती है। … आध्यात्मिक भावना आध्यात्मिक अच्छाई की समझ है। समझ वास्तविक और असत्य के बीच सीमांकन की रेखा है। आध्यात्मिक समझ मन, जीवन, सत्य और प्रेम को प्रकट करती है, — और क्रिश्चियन साइंस में ब्रह्मांड का आध्यात्मिक प्रमाण देते हुए, दिव्य भावना को प्रदर्शित करता है।

यह समझ बौद्धिक नहीं है, विद्वानों की प्राप्ति का परिणाम नहीं है; यह प्रकाश में लाई गई सभी चीजों की वास्तविकता है।

9. 505 : 16-17, 20-28

Spirit imparts the understanding which uplifts consciousness and leads into all truth. … Spiritual sense is the discernment of spiritual good. Understanding is the line of demarcation between the real and unreal. Spiritual understanding unfolds Mind, — Life, Truth, and Love, — and demonstrates the divine sense, giving the spiritual proof of the universe in Christian Science.

This understanding is not intellectual, is not the result of scholarly attainments; it is the reality of all things brought to light.

10. 241 : 13-14, 24-30

बाइबल आत्मा के नवीकरण द्वारा शरीर के परिवर्तन को सिखाती है।

हमें होरेब की ऊँचाई तक पहुँचने का प्रयास करना चाहिए जहाँ परमेश्वर प्रगट होता है; और सभी आध्यात्मिक भवन की आधारशिला पवित्रता है। आत्मा का बपतिस्मा, मांस की सभी अशुद्धियों के शरीर को धोना, यह दर्शाता है कि शुद्ध हृदय ईश्वर को देखता है और आध्यात्मिक जीवन और उसके प्रदर्शन के करीब पहुंच रहा है।

10. 241 : 13-14, 24-30

The Bible teaches transformation of the body by the renewal of Spirit.

We should strive to reach the Horeb height where God is revealed; and the corner-stone of all spiritual building is purity. The baptism of Spirit, washing the body of all the impurities of flesh, signifies that the pure in heart see God and are approaching spiritual Life and its demonstration.

11. 264 : 15-27

जब हम महसूस करते हैं कि जीवन आत्मा है, तो कभी भी भौतिकता में नहीं, यह समझ ईश्वर में, अच्छी, और किसी अन्य चेतना की आवश्यकता को खोजने के द्वारा, आत्म-पूर्णता में विस्तारित हो जाएगी।

आत्मा और उसके स्वरूप ही होने का एकमात्र यथार्थ हैं। आत्मा के माइक्रोस्कोप के तहत पदार्थ गायब हो जाता है। सत्य से पाप का नाश होता है, और बीमारी और मृत्यु को यीशु ने दूर किया, जिन्होंने उन्हें त्रुटि का रूप दिया। आध्यात्मिक जीवन और आशीर्वाद ही प्रमाण हैं, जिसके द्वारा हम सच्चे अस्तित्व को पहचान सकते हैं और उस अकथनीय शांति को महसूस कर सकते हैं जो आध्यात्मिक प्रेम को अवशोषित करने से आती है।

11. 264 : 15-27

When we realize that Life is Spirit, never in nor of matter, this understanding will expand into self-completeness, finding all in God, good, and needing no other consciousness.

Spirit and its formations are the only realities of being. Matter disappears under the microscope of Spirit. Sin is unsustained by Truth, and sickness and death were overcome by Jesus, who proved them to be forms of error. Spiritual living and blessedness are the only evidences, by which we can recognize true existence and feel the unspeakable peace which comes from an all-absorbing spiritual love.

12. 265 : 10-15

किसी भी तरह से, आत्मा के लिए मामले को त्यागने का यह वैज्ञानिक अर्थ है, मनुष्य को देवता में अवशोषण और उसकी पहचान के नुकसान का सुझाव देता है, लेकिन यह व्यक्ति की व्यापकता, विचार और कर्म के व्यापक क्षेत्र, एक अधिक विस्तृत प्रेम, एक उच्च और अधिक स्थायी शांति पर निर्भर करता है।

12. 265 : 10-15

This scientific sense of being, forsaking matter for Spirit, by no means suggests man's absorption into Deity and the loss of his identity, but confers upon man enlarged individuality, a wider sphere of thought and action, a more expansive love, a higher and more permanent peace.

13. 324 : 13 (Be)-18

चौकस, शांत और सतर्क रहें। जिस मार्ग से यह समझ पैदा होती है कि ईश्वर ही एकमात्र जीवन है, सीधा और संकीर्ण है। यह मांस के साथ एक युद्ध है, जिसमें हमें पाप, बीमारी, और मृत्यु पर विजय प्राप्त करनी चाहिए, या तो इसके बाद, या - निश्चित रूप से इससे पहले कि हम आत्मा के लक्ष्य तक पहुँच सकें, या परमेश्वर में जीवन पा सकें।

13. 324 : 13 (Be)-18

Be watchful, sober, and vigilant. The way is straight and narrow, which leads to the understanding that God is the only Life. It is a warfare with the flesh, in which we must conquer sin, sickness, and death, either here or hereafter, — certainly before we can reach the goal of Spirit, or life in God.

14. 390 : 12-18, 32-2

जब रोग के पहले लक्षण दिखाई देते हैं, तो दिव्य विज्ञान के साथ सामग्री इंद्रियों की गवाही का विवाद करें। न्याय की अपनी उच्च भावना को नश्वर राय की झूठी प्रक्रिया को नष्ट करने दें, जिसे आप कानून का नाम देते हैं, और फिर आप एक बीमारी तक ही सीमित नहीं होंगे और न ही अंतिम भुगतान के भुगतान में पीड़ित होने की स्थिति में, जो कि अंतिम दंड है, जो त्रुटि की मांग करता है।

नश्वर मन, राजकोषीय सामग्री और आत्मा के वर्चस्व के खिलाफ उकसाने की दलीलों को उखाड़ फेंकने के लिए, आप सत्य की आत्मा की चेतना में उठते हैं।

14. 390 : 12-18, 32-2

When the first symptoms of disease appear, dispute the testimony of the material senses with divine Science. Let your higher sense of justice destroy the false process of mortal opinions which you name law, and then you will not be confined to a sick-room nor laid upon a bed of suffering in payment of the last farthing, the last penalty demanded by error.

Rise in the conscious strength of the spirit of Truth to overthrow the plea of mortal mind, alias matter, arrayed against the supremacy of Spirit.

15. 391 : 29-32

मानसिक रूप से शरीर से हर शिकायत का खंडन करते हैं, और जीवन की सच्ची चेतना को प्रेम के रूप में जन्म देते हैं, - जैसा कि सभी शुद्ध हैं, और आत्मा के फल को प्रभावित करते हैं।

15. 391 : 29-32

Mentally contradict every complaint from the body, and rise to the true consciousness of Life as Love, — as all that is pure, and bearing the fruits of Spirit.

16. 393 : 10 (उपयोग)-15

इस ईश्वर प्रदत्त अधिकार का प्रयोग करें। अपने शरीर पर अधिकार कर लो, और उसकी भावना और क्रिया पर शासन करो। आत्मा के सामर्थ्य में वृद्धि का विरोध करना अच्छा है। ईश्वर ने मनुष्य को इसके लिए सक्षम बनाया है, और कुछ भी नहीं कर सकता है और मनुष्य में दिव्य रूप से दी जाने वाली शक्ति को नष्ट कर सकता है।

16. 393 : 10 (Exercise)-15

Exercise this God-given authority. Take possession of your body, and govern its feeling and action. Rise in the strength of Spirit to resist all that is unlike good. God has made man capable of this, and nothing can vitiate the ability and power divinely bestowed on man.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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