रविवार 10 सितंबर, 2023



विषयपदार्थ

SubjectSubstance

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: लूका 15: 31

"पुत्र, तू सर्वदा मेरे साथ है; और जो कुछ मेरा है वह सब तेरा ही है।"



Golden Text: Luke 15 : 31

Son, thou art ever with me, and all that I have is thine.




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उत्तरदायी अध्ययन: मत्ती 25: 34 • लूका 12: 31, 32 • मत्ती 6: 9-13


34     हे मेरे पिता के धन्य लोगों, आओ, उस राज्य के अधिकारी हो जाओ, जो जगत के आदि से तुम्हारे लिये तैयार किया हुआ है।

31     उसके राज्य की खोज में रहो।

32     क्योंकि तुम्हारे पिता को यह भाया है, कि तुम्हें राज्य दे।

9     सो तुम इस रीति से प्रार्थना किया करो; “हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पवित्र माना जाए।

10     तेरा राज्य आए; तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो।

11     हमारी दिन भर की रोटी आज हमें दे।

12     और जिस प्रकार हम ने अपने अपराधियों को क्षमा किया है, वैसे ही तू भी हमारे अपराधों को क्षमा कर।

13     और हमें परीक्षा में न ला, परन्तु बुराई से बचा; क्योंकि राज्य और पराक्रम और महिमा सदा तेरे ही हैं। आमीन।

Responsive Reading: Matthew 25 : 34   •   Luke 12 : 31, 32   •   Matthew 6 : 9-13

34.     Come, ye blessed of my Father, inherit the kingdom prepared for you from the foundation of the world:

31.     Seek ye the kingdom of God;

32.     For it is your Father’s good pleasure to give you the kingdom.

9.     After this manner therefore pray ye: Our Father which art in heaven, Hallowed be thy name.

10.     Thy kingdom come. Thy will be done in earth, as it is in heaven.

11.     Give us this day our daily bread.

12.     And forgive us our debts, as we forgive our debtors.

13.     And lead us not into temptation, but deliver us from evil: For thine is the kingdom, and the power, and the glory, for ever. Amen.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. यशायाह 64: 4, 8

4     क्योंकि प्राचीनकाल ही से तुझे छोड़ कोई और ऐसा परमेश्वर न तो कभी देखा गया और न कान से उसकी चर्चा सुनी गई जो अपनी बाट जोहने वालों के लिये काम करे।

8     तौभी, हे यहोवा, तू हमार पिता है; देख, हम तो मिट्टी है, और तू हमारा कुम्हार है; हम सब के सब तेरे हाथ के काम हैं।

1. Isaiah 64 : 4, 8

4     For since the beginning of the world men have not heard, nor perceived by the ear, neither hath the eye seen, O God, beside thee, what he hath prepared for him that waiteth for him.

8     But now, O Lord, thou art our father; we are the clay, and thou our potter; and we all are the work of thy hand.

2. भजन संहिता 139: 14-16 (से 1st,), 23, 24

14     मैं तेरा धन्यवाद करूंगा, इसलिये कि मैं भयानक और अद्भुत रीति से रचा गया हूं। तेरे काम तो आश्चर्य के हैं, और मैं इसे भली भांति जानता हूं।

15     जब मैं गुप्त में बनाया जाता, और पृथ्वी के नीचे स्थानों में रचा जाता था, तब मेरी हडि्डयां तुझ से छिपी न थीं।

16     तेरी आंखों ने मेरे बेडौल तत्व को देखा।

23     हे ईश्वर, मुझे जांच कर जान ले! मुझे परख कर मेरी चिन्ताओं को जान ले!

24     और देख कि मुझ में कोई बुरी चाल है कि नहीं, और अनन्त के मार्ग में मेरी अगुवाई कर!

2. Psalm 139 : 14-16 (to 1st ,), 23, 24

14     I will praise thee; for I am fearfully and wonderfully made: marvellous are thy works; and that my soul knoweth right well.

15     My substance was not hid from thee, when I was made in secret, and curiously wrought in the lowest parts of the earth.

16     Thine eyes did see my substance,

23     Search me, O God, and know my heart: try me, and know my thoughts:

24     And see if there be any wicked way in me, and lead me in the way everlasting.

3. लूका 4: 14

14     यीशु आत्मा की सामर्थ से भरा हुआ गलील को लौटा, और उस की चर्चा आस पास के सारे देश में फैल गई।

3. Luke 4 : 14

14     And Jesus returned in the power of the Spirit into Galilee: and there went out a fame of him through all the region round about.

4. लूका 5: 12, 13

12     जब वह किसी नगर में था, तो देखो, वहां कोढ़ से भरा हुआ एक मनुष्य था, और वह यीशु को देखकर मुंह के बल गिरा, और बिनती की; कि हे प्रभु यदि तू चाहे हो मुझे शुद्ध कर सकता है।

13     उस ने हाथ बढ़ाकर उसे छूआ और कहा मैं चाहता हूं तू शुद्ध हो जा: और उसका कोढ़ तुरन्त जाता रहा।

4. Luke 5 : 12, 13

12     And it came to pass, when he was in a certain city, behold a man full of leprosy: who seeing Jesus fell on his face, and besought him, saying, Lord, if thou wilt, thou canst make me clean.

13     And he put forth his hand, and touched him, saying, I will: be thou clean. And immediately the leprosy departed from him.

5. लूका 15: 1, 11-13, 17-22, 24 (से 1st.)

1     सब चुंगी लेने वाले और पापी उसके पास आया करते थे ताकि उस की सुनें।

11     फिर उस ने कहा, किसी मनुष्य के दो पुत्र थे।

12     उन में से छुटके ने पिता से कहा कि हे पिता संपत्ति में से जो भाग मेरा हो, वह मुझे दे दीजिए। उस ने उन को अपनी संपत्ति बांट दी।

13     और बहुत दिन न बीते थे कि छुटका पुत्र सब कुछ इकट्ठा करके एक दूर देश को चला गया और वहां कुकर्म में अपनी संपत्ति उड़ा दी।

17     जब वह अपने आपे में आया, तब कहने लगा, कि मेरे पिता के कितने ही मजदूरों को भोजन से अधिक रोटी मिलती है, और मैं यहां भूखा मर रहा हूं।

18     मैं अब उठकर अपने पिता के पास जाऊंगा और उस से कहूंगा कि पिता जी मैं ने स्वर्ग के विरोध में और तेरी दृष्टि में पाप किया है।

19     अब इस योग्य नहीं रहा कि तेरा पुत्र कहलाऊं, मुझे अपने एक मजदूर की नाईं रख ले।

20     तब वह उठकर, अपने पिता के पास चला: वह अभी दूर ही था, कि उसके पिता ने उसे देखकर तरस खाया, और दौड़कर उसे गले लगाया, और बहुत चूमा।

21     पुत्र ने उस से कहा; पिता जी, मैं ने स्वर्ग के विरोध में और तेरी दृष्टि में पाप किया है; और अब इस योग्य नहीं रहा, कि तेरा पुत्र कहलाऊं।

22     परन्तु पिता ने अपने दासों से कहा; फट अच्छे से अच्छा वस्त्र निकालकर उसे पहिनाओ, और उसके हाथ में अंगूठी, और पांवों में जूतियां पहिनाओ।

24     क्योंकि मेरा यह पुत्र मर गया था, फिर जी गया है: खो गया था, अब मिल गया है।

5. Luke 15 : 1, 11-13, 17-22, 24 (to 1st .)

1     Then drew near unto him all the publicans and sinners for to hear him.

11     And he said, A certain man had two sons:

12     And the younger of them said to his father, Father, give me the portion of goods that falleth to me. And he divided unto them his living.

13     And not many days after the younger son gathered all together, and took his journey into a far country, and there wasted his substance with riotous living.

17     And when he came to himself, he said, How many hired servants of my father’s have bread enough and to spare, and I perish with hunger!

18     I will arise and go to my father, and will say unto him, Father, I have sinned against heaven, and before thee,

19     And am no more worthy to be called thy son: make me as one of thy hired servants.

20     And he arose, and came to his father. But when he was yet a great way off, his father saw him, and had compassion, and ran, and fell on his neck, and kissed him.

21     And the son said unto him, Father, I have sinned against heaven, and in thy sight, and am no more worthy to be called thy son.

22     But the father said to his servants, Bring forth the best robe, and put it on him; and put a ring on his hand, and shoes on his feet:

24     For this my son was dead, alive again; he was lost, and is found.

6. 1 ;यूहन्ना 5: 3 (से,), 14, 19, 20

3     और परमेश्वर का प्रेम यह है।

14     और हमें उसके साम्हने जो हियाव होता है, वह यह है; कि यदि हम उस की इच्छा के अनुसार कुछ मांगते हैं, तो हमारी सुनता है।

19     हम जानते हैं, कि हम परमेश्वर से हैं, और सारा संसार उस दुष्ट के वश में पड़ा है।

20     और यह भी जानते हैं, कि परमेश्वर का पुत्र आ गया है और उस ने हमें समझ दी है, कि हम उस सच्चे को पहचानें, और हम उस में जो सत्य है, अर्थात उसके पुत्र यीशु मसीह में रहते हैं: सच्चा परमेश्वर और अनन्त जीवन यही है।

6. I John 5 : 3 (to ,), 14, 19, 20

3     For this is the love of God,

14     And this is the confidence that we have in him, that, if we ask any thing according to his will, he heareth us:

19     And we know that we are of God, and the whole world lieth in wickedness.

20     And we know that the Son of God is come, and hath given us an understanding, that we may know him that is true, and we are in him that is true, even in his Son Jesus Christ. This is the true God, and eternal life.

7. यूहन्ना 6: 16, 17 (से 1st.), 19, 20, 24, 26-29, 33, 34

16     फिर जब संध्या हुई, तो उसके चेले झील के किनारे गए।

17     और नाव पर चढ़कर झील के पार कफरनहूम को जाने लगे: उस समय अन्धेरा हो गया था, और यीशु अभी तक उन के पास नहीं आया था।

19     सो जब वे खेते खेते तीन चार मील के लगभग निकल गए, तो उन्होंने यीशु को झील पर चलते, और नाव के निकट आते देखा, और डर गए।

20     परन्तु उस ने उन से कहा, कि मैं हूं; डरो मत।

24     सो जब भीड़ ने देखा, कि यहां न यीशु है, और न उसके चेले, तो वे भी छोटी छोटी नावों पर चढ़ के यीशु को ढूंढ़ते हुए कफरनहूम को पहुंचे।

26     यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, कि मैं तुम से सच सच कहता हूं, तुम मुझे इसलिये नहीं ढूंढ़ते हो कि तुम ने अचम्भित काम देखे, परन्तु इसलिये कि तुम रोटियां खाकर तृप्त हुए।

27     नाशमान भोजन के लिये परिश्रम न करो, परन्तु उस भोजन के लिये जो अनन्त जीवन तक ठहरता है, जिसे मनुष्य का पुत्र तुम्हें देगा, क्योंकि पिता, अर्थात परमेश्वर ने उसी पर छाप कर दी है।

28     उन्होंने उस से कहा, परमेश्वर के कार्य करने के लिये हम क्या करें?

29     यीशु ने उन्हें उत्तर दिया; परमेश्वर का कार्य यह है, कि तुम उस पर, जिसे उस ने भेजा है, विश्वास करो।

33     क्योंकि परमेश्वर की रोटी वही है, जो स्वर्ग से उतरकर जगत को जीवन देती है।

34     तब उन्होंने उस से कहा, हे प्रभु, यह रोटी हमें सर्वदा दिया कर।

7. John 6 : 16, 17 (to 1st .), 19, 20, 24, 26-29, 33, 34

16     And when even was now come, his disciples went down unto the sea,

17     And entered into a ship, and went over the sea toward Capernaum.

19     So when they had rowed about five and twenty or thirty furlongs, they see Jesus walking on the sea, and drawing nigh unto the ship: and they were afraid.

20     But he saith unto them, It is I; be not afraid.

24     When the people therefore saw that Jesus was not there, neither his disciples, they also took shipping, and came to Capernaum, seeking for Jesus.

26     Jesus answered them and said, Verily, verily, I say unto you, Ye seek me, not because ye saw the miracles, but because ye did eat of the loaves, and were filled.

27     Labour not for the meat which perisheth, but for that meat which endureth unto everlasting life, which the Son of man shall give unto you: for him hath God the Father sealed.

28     Then said they unto him, What shall we do, that we might work the works of God?

29     Jesus answered and said unto them, This is the work of God, that ye believe on him whom he hath sent.

33     For the bread of God is he which cometh down from heaven, and giveth life unto the world.

34     Then said they unto him, Lord, evermore give us this bread.

8. यिर्मयाह 31: 3, 11, 12, 25, 33 (बाद), 34 (से 2nd :)

3     यहोवा ने मुझे दूर से दर्शन देकर कहा है। मैं तुझ से सदा प्रेम रखता आया हूँ; इस कारण मैं ने तुझ पर अपनी करुणा बनाए रखी है।

11     क्योंकि यहोवा ने याकूब को छुड़ा लिया, और उस शत्रु के पंजे से जो उस से अधिक बलवन्त है, उसे छुटकारा दिया है।

12     इसलिये वे सिय्योन की चोटी पर आकर जयजयकार करेंगे, और यहोवा से अनाज, नया दाखमधु, टटका तेल, भेड़-बकरियां और गाय-बैलों के बच्चे आदि उत्तम उत्तम दान पाने के लिये तांता बान्ध कर चलेंगे; और उनका प्राण सींची हुई बारी के समान होगा, और वे फिर कभी उदास न होंगे।

25     क्योंकि मैं ने थके हुए लोगों का प्राण तृप्त किया, और उदास लोगों के प्राण को भर दिया है।

33     परन्तु जो वाचा मैं उन दिनों के बाद इस्राएल के घराने से बान्धूंगा, वह यह है: मैं अपनी व्यवस्था उनके मन में समवाऊंगा, और उसे उनके हृदय पर लिखूंगा; और मैं उनका परमेश्वर ठहरूंगा, और वे मेरी प्रजा ठहरेंगे, यहोवा की यह वाणी है।

34     और तब उन्हें फिर एक दूसरे से यह न कहना पड़ेगा कि यहोवा को जानो, क्योंकि, यहोवा की यह वाणी है कि छोटे से ले कर बड़े तक, सब के सब मेरा ज्ञान रखेंगे।<

8. Jeremiah 31 : 3, 11, 12, 25, 33 (After), 34 (to 2nd :)

3     The Lord hath appeared of old unto me, saying, Yea, I have loved thee with an everlasting love: therefore with lovingkindness have I drawn thee.

11     For the Lord hath redeemed Jacob, and ransomed him from the hand of him that was stronger than he.

12     Therefore they shall come and sing in the height of Zion, and shall flow together to the goodness of the Lord, for wheat, and for wine, and for oil, and for the young of the flock and of the herd: and their soul shall be as a watered garden; and they shall not sorrow any more at all.

25     For I have satiated the weary soul, and I have replenished every sorrowful soul.

33     After those days, saith the Lord, I will put my law in their inward parts, and write it in their hearts; and will be their God, and they shall be my people.

34     And they shall teach no more every man his neighbour, and every man his brother, saying, Know the Lord: for they shall all know me, from the least of them unto the greatest of them, saith the Lord:



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 330: 11 (ईश्वर)-18

ईश्वर अनंत है, एकमात्र जीवन, पदार्थ, आत्मा या आत्मा है, मनुष्य सहित ब्रह्मांड की एकमात्र बुद्धि है। आँख ने न तो परमेश्वर को देखा है, और न उसकी छवि और समानता को देखा है। न तो भगवान और न ही पूर्ण मनुष्य को भौतिक इंद्रियों द्वारा पहचाना जा सकता है। आत्मा की वैयक्तिकता, या अनंत, अज्ञात है, और इस प्रकार इसका ज्ञान या तो मानव अनुमान या दिव्य विज्ञान के रहस्योद्घाटन पर छोड़ दिया गया है।

1. 330 : 11 (God)-18

God is infinite, the only Life, substance, Spirit, or Soul, the only intelligence of the universe, including man. Eye hath neither seen God nor His image and likeness. Neither God nor the perfect man can be discerned by the material senses. The individuality of Spirit, or the infinite, is unknown, and thus a knowledge of it is left either to human conjecture or to the revelation of divine Science.

2. 43: 28-4

विज्ञान यीशु ने सिखाया और जीना चाहिए, जीवन, पदार्थ और बुद्धि के बारे में सभी भौतिक विश्वासों पर विजय प्राप्त करना चाहिए, और इस तरह की मान्यताओं से बढ़ती हुई बहुपक्षीय त्रुटियां।

प्यार नफरत पर विजय चाहिए। सत्य और जीवन को जीत और त्रुटि और मृत्यु पर रोकना होगा, इससे पहले कि काँटे को एक मुकुट के लिए अलग रखा जा सके, बीडक्शन कहता है, "अच्छा काम अच्छा एवं विश्वसनीय सेवक," और आत्मा की सर्वोच्चता का प्रदर्शन किया जाए।

2. 43 : 28-4

The Science Jesus taught and lived must triumph over all material beliefs about life, substance, and intelligence, and the multitudinous errors growing from such beliefs.

Love must triumph over hate. Truth and Life must seal the victory over error and death, before the thorns can be laid aside for a crown, the benediction follow, "Well done, good and faithful servant," and the supremacy of Spirit be demonstrated.

3. 241: 31-5

"ऊंट का सुई के नाके में से निकल जाना सहज है" पापपूर्ण विश्वासों के लिए स्वर्ग और शाश्वत सद्भाव के राज्य में प्रवेश करने के लिए। पश्चाताप, आध्यात्मिक बपतिस्मा, और उत्थान के माध्यम से, नश्वर अपने भौतिक विश्वासों और झूठी व्यक्तित्व को बंद कर देते हैं। यह केवल समय का सवाल है "कि छोटे से ले कर बड़े तक, सब के सब मेरा ज्ञान रखेंगे।"

3. 241 : 31-5

It is "easier for a camel to go through the eye of a needle," than for sinful beliefs to enter the kingdom of heaven, eternal harmony. Through repentance, spiritual baptism, and regeneration, mortals put off their material beliefs and false individuality. It is only a question of time when "they shall all know Me [God], from the least of them unto the greatest."

4. 242: 9-14

स्वर्ग के लिए एक रास्ता है, सद्भाव; और ईश्वरीय विज्ञान में मसीह हमें इस मार्ग को दिखाता है। कोई और वास्तविकता नहीं है, अच्छे ईश्वर और उसके प्रतिबिंब को जानने और इंद्रियों के दर्द और सुख से श्रेष्ठ होने के अलावा जीवन की कोई अन्य चेतना नहीं है।

4. 242 : 9-14

There is but one way to heaven, harmony, and Christ in divine Science shows us this way. It is to know no other reality — to have no other consciousness of life — than good, God and His reflection, and to rise superior to the so-called pain and pleasure of the senses.

5. 16: 20-23 (से ठीक करता है), 27, 29, 31

जैसे ही हम सभी भौतिक कामुकता और पाप से ऊपर उठते हैं, हम स्वर्ग से जन्मी आकांक्षा और आध्यात्मिक चेतना तक पहुंच सकते हैं, जिसका संकेत भगवान की प्रार्थना में दिया गया है और जो तुरंत ठीक कर देता है।…

हमारे पिता-माता भगवान, सभी सामंजस्यपूर्ण,

मनमोहक

तेरा राज्य आ गया; तू हमेशा मौजूद है।.

5. 16 : 20-23 (to heals), 27, 29, 31

Only as we rise above all material sensuousness and sin, can we reach the heaven-born aspiration and spiritual consciousness, which is indicated in the Lord's Prayer and which instantaneously heals ....

Our Father-Mother God, all-harmonious,

Adorable One.

Thy kingdom is come; Thou art ever-present.

6. 17: 2-3, 5, 7, 10-11, 14-15

जैसा कि स्वर्ग में पृथ्वी पर भी है, हमें यह जानने में सक्षम करें, कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है, सर्वोच्च है।

ज के लिए हमें अनुग्रह दें; कृपया प्रसिद्द स्नेह खिलाएँ;

और प्यार प्यार में परिलक्षित होता है;

और परमेश्वर हमें प्रलोभन में नहीं ले जाता है, बल्कि हमें पाप, बीमारी और मृत्यु से बचाता है।

क्योंकि परमेश्वर अनंत है, सर्व-शक्ति है, सभी जीवन, सत्य, प्रेम, सभी पर शासक है, और सभी में है।

6. 17 : 2-3, 5, 7, 10-11, 14-15

Enable us to know, — as in heaven, so on earth, — God is omnipotent, supreme.

Give us grace for to-day; feed the famished affections;

And Love is reflected in love;

And God leadeth us not into temptation, but delivereth us from sin, disease, and death.

For God is infinite, all-power, all Life, Truth, Love, over all, and All.

7. 13: 20-32

यदि हम एक साकार व्यक्ति के रूप में ईश्वर से प्रार्थना करते हैं, तो यह हमें उन मानवीय संदेहों और भयों को त्यागने से रोक देगा जो इस तरह के विश्वास में शामिल होते हैं, और इसलिए हम अनंत, निराकार प्रेम द्वारा किए गए चमत्कारों को नहीं समझ सकते हैं, जिसके लिए सभी चीजें संभव हैं। दैवीय सिद्धांत, प्रेम के बारे में मानवीय अज्ञानता के कारण, सभी के पिता को एक साकार निर्माता के रूप में दर्शाया गया है; इसलिए मनुष्य स्वयं को केवल भौतिक मानते हैं और मनुष्य को ईश्वर की छवि या प्रतिबिंब तथा मनुष्य के शाश्वत निराकार अस्तित्व से अनभिज्ञ हैं। त्रुटि की दुनिया सत्य की दुनिया से अनभिज्ञ है, - मनुष्य के अस्तित्व की वास्तविकता से अनभिज्ञ है, - क्योंकि संवेदना की दुनिया आत्मा में जीवन के बारे में नहीं जानती है, न कि शरीर में।

7. 13 : 20-32

If we pray to God as a corporeal person, this will prevent us from relinquishing the human doubts and fears which attend such a belief, and so we cannot grasp the wonders wrought by infinite, incorporeal Love, to whom all things are possible. Because of human ignorance of the divine Principle, Love, the Father of all is represented as a corporeal creator; hence men recognize themselves as merely physical, and are ignorant of man as God's image or reflection and of man's eternal incorporeal existence. The world of error is ignorant of the world of Truth, — blind to the reality of man's existence, — for the world of sensation is not cognizant of life in Soul, not in body.

8. 243: 25-29

सत्य में त्रुटि की कोई चेतना नहीं है। प्रेम में घृणा का भाव नहीं होता। जीवन का मृत्यु से कोई संबंध नहीं है। सत्य, जीवन और प्रेम अपने से भिन्न हर चीज के विनाश का नियम हैं, क्योंकि वे ईश्वर के अलावा कुछ भी घोषित नहीं करते हैं।

8. 243 : 25-29

Truth has no consciousness of error. Love has no sense of hatred. Life has no partnership with death. Truth, Life, and Love are a law of annihilation to everything unlike themselves, because they declare nothing except God.

9. 468: 18-19 (से,)

सत्य, जीवन और प्रेम पदार्थ हैं,

9. 468 : 18-19 (to ,)

Truth, Life, and Love are substance,

10. 301: 6-20

स्वयं के लिए, नश्वर और भौतिक व्यक्ति पदार्थ प्रतीत होता है, लेकिन पदार्थ की उसकी भावना में त्रुटि शामिल है और इसलिए सामग्री, लौकिक है।

दूसरी ओर, अमर, आध्यात्मिक व्यक्ति वास्तव में पर्याप्त है, और शाश्वत पदार्थ, या आत्मा को दर्शाता है, जो मनुष्यों के लिए आशा है। वह परमात्मा को दर्शाता है, जो एकमात्र वास्तविक और शाश्वत इकाई है। यह प्रतिबिंब नश्वर अर्थ को पारलौकिक लगता है, क्योंकि आध्यात्मिक मनुष्य की पर्याप्तता नश्वर दृष्टि को पार कर जाती है और यह केवल दिव्य विज्ञान के माध्यम से प्रकट होती है।

जैसा कि ईश्वर पदार्थ है और मनुष्य ईश्वरीय छवि और समानता है, मनुष्य को आत्मा के पदार्थ की इच्छा करनी चाहिए, केवल पदार्थ की, न कि पदार्थ की और वास्तव में उसने ऐसा किया है।

10. 301 : 6-20

To himself, mortal and material man seems to be substance, but his sense of substance involves error and therefore is material, temporal.

On the other hand, the immortal, spiritual man is really substantial, and reflects the eternal substance, or Spirit, which mortals hope for. He reflects the divine, which constitutes the only real and eternal entity. This reflection seems to mortal sense transcendental, because the spiritual man's substantiality transcends mortal vision and is revealed only through divine Science.

As God is substance and man is the divine image and likeness, man should wish for, and in reality has, only the substance of good, the substance of Spirit, not matter.

11. 369: 5-13

जिस अनुपात में मनुष्य को सभी वस्तुएं मनुष्य के रूप में खो देती हैं, उसी अनुपात में मनुष्य इसका स्वामी बन जाता है। वह तथ्यों की एक दिव्य भावना में प्रवेश करता है, और यीशु के धर्मशास्त्र को समझने के रूप में बीमारों को ठीक करने, मृतकों को ऊपर उठाने और लहर पर चलने के रूप में प्रदर्शित करता है। इन सभी कर्मों से यीशु का विश्वास इस बात पर है कि सामग्री भौतिक है, यह विश्वास है कि यह जीवन का मध्यस्थ या अस्तित्व के किसी भी रूप का निर्माणकर्ता हो सकता है।

11. 369 : 5-13

In proportion as matter loses to human sense all entity as man, in that proportion does man become its master. He enters into a diviner sense of the facts, and comprehends the theology of Jesus as demonstrated in healing the sick, raising the dead, and walking over the wave. All these deeds manifested Jesus' control over the belief that matter is substance, that it can be the arbiter of life or the constructor of any form of existence.

12. 275: 10-12

वास्तविकता और उसके विज्ञान में होने के क्रम को समझने के लिए, आपको परमेश्वर को उस सभी के दिव्य सिद्धांत के रूप में फिर से शुरू करना चाहिए जो वास्तव में है।

12. 275 : 10-12

To grasp the reality and order of being in its Science, you must begin by reckoning God as the divine Principle of all that really is.

13. 414: 26-29 (से,)

अस्तित्व की सत्यता को ध्यान में रखें, - वह मनुष्य ईश्वर की छवि और समानता है, जिसमें सभी अस्तित्व दर्द रहित और स्थायी हैं। याद रखें कि मनुष्य की पूर्णता वास्तविक और अप्राप्य है,

13. 414 : 26-29 (to ,)

Keep in mind the verity of being, — that man is the image and likeness of God, in whom all being is painless and permanent. Remember that man's perfection is real and unimpeachable,

14. 259: 4 (क्योंकि)-5

... क्योंकि यह सभी पदार्थों के योग का प्रतिनिधित्व करता है।

14. 259 : 4 (for)-5

...for he represents infinite Mind, the sum of all substance.

15. 264: 28-31

जब हम क्रिश्चियन साइंस में रास्ता सीखते हैं और मनुष्य के आध्यात्मिक होने को पहचानते हैं, तो हम भगवान की रचना को समझेंगे और समझेंगे, - पृथ्वी और स्वर्ग और मनुष्य की सभी महिमा।

15. 264 : 28-31

When we learn the way in Christian Science and recognize man's spiritual being, we shall behold and understand God's creation, — all the glories of earth and heaven and man.

16. 295: 12 (अनंत)-15

... अनंत आत्मा सभी होने के नाते, नश्वर चेतना वैज्ञानिक तथ्य के लिए अंतिम पैदावार होगी और गायब हो जाएगी, और सही, और हमेशा के लिए होने का वास्तविक अर्थ प्रकट होगा।<

16. 295 : 12 (infinite)-15

...infinite Spirit being all, mortal consciousness will at last yield to the scientific fact and disappear, and the real sense of being, perfect and forever intact, will appear.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6