रविवार 10 मार्च, 2024



विषयआदमी

SubjectMan

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: यूहन्ना 14: 10

"पिता मुझ में रहकर अपने काम करता है।"



Golden Text: John 14 : 10

The Father that dwelleth in me, he doeth the works.




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उत्तरदायी अध्ययन: प्रेरितों के काम 17: 22-28


22     तब पौलुस ने अरियुपगुस के बीच में खड़ा होकर कहा; हे अथेने के लोगों मैं देखता हूं, कि तुम हर बात में देवताओं के बड़े मानने वाले हो।

23     क्योंकि मैं फिरते हुए तुम्हारी पूजने की वस्तुओं को देख रहा था, तो एक ऐसी वेदी भी पाई, जिस पर लिखा था, कि अनजाने ईश्वर के लिये। सो जिसे तुम बिना जाने पूजते हो, मैं तुम्हें उसका समाचार सुनाता हूं।

24     जिस परमेश्वर ने पृथ्वी और उस की सब वस्तुओं को बनाया, वह स्वर्ग और पृथ्वी का स्वामी होकर हाथ के बनाए हुए मन्दिरों में नहीं रहता।

25     न किसी वस्तु का प्रयोजन रखकर मनुष्यों के हाथों की सेवा लेता है, क्योंकि वह तो आप ही सब को जीवन और स्वास और सब कुछ देता है।

26     उस ने एक ही मूल से मनुष्यों की सब जातियां सारी पृथ्वी पर रहने के लिये बनाईं हैं; और उन के ठहराए हुए समय, और निवास के सिवानों को इसलिये बान्धा है।

27     कि वे परमेश्वर को ढूंढ़ें, कदाचित उसे टटोल कर पा जाएं तौभी वह हम में से किसी से दूर नहीं!

28     क्योंकि हम उसी में जीवित रहते, और चलते-फिरते, और स्थिर रहते हैं; जैसे तुम्हारे कितने कवियों ने भी कहा है, कि हम तो उसी के वंश भी हैं।

Responsive Reading: Acts 17 : 22-28

22.     Then Paul stood in the midst of Mars’ hill, and said, Ye men of Athens, I perceive that in all things ye are too superstitious.

23.     For as I passed by, and beheld your devotions, I found an altar with this inscription, TO THE UNKNOWN GOD. Whom therefore ye ignorantly worship, him declare I unto you.

24.     God that made the world and all things therein, seeing that he is Lord of heaven and earth, dwelleth not in temples made with hands;

25.     Neither is worshipped with men’s hands, as though he needed any thing, seeing he giveth to all life, and breath, and all things;

26.     And hath made of one blood all nations of men for to dwell on all the face of the earth, and hath determined the times before appointed, and the bounds of their habitation;

27.     That they should seek the Lord, if haply they might feel after him, and find him, though he be not far from every one of us:

28.     For in him we live, and move, and have our being; as certain also of your own poets have said, For we are also his offspring.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. यशायाह 43: 1 (अब), 10, 11, 21

1     …हेइस्राएल तेरा रचने वाला और हे याकूब तेरा सृजनहार यहोवा अब यों कहता है, मत डर, क्योंकि मैं ने तुझे छुड़ा लिया है; मैं ने तुझे नाम ले कर बुलाया है, तू मेरा ही है।

10     यहोवा की वाणी है कि तुम मेरे साक्षी हो और मेरे दास हो, जिन्हें मैं ने इसलिये चुना है कि समझ कर मेरी प्रतीति करो और यह जान लो कि मैं वही हूं। मुझ से पहिले कोई ईश्वर न हुआ और न मेरे बाद कोई होगा।

11     मैं ही यहोवा हूं और मुझे छोड़ कोई उद्धारकर्ता नहीं।

21     इस प्रजा को मैं ने अपने लिये बनाया है कि वे मेरा गुणानुवाद करें॥

1. Isaiah 43 : 1 (now), 10, 11, 21

1 ...now thus saith the Lord that created thee, O Jacob, and he that formed thee, O Israel, Fear not: for I have redeemed thee, I have called thee by thy name; thou art mine.

10     Ye are my witnesses, saith the Lord, and my servant whom I have chosen: that ye may know and believe me, and understand that I am he: before me there was no God formed, neither shall there be after me.

11     I, even I, am the Lord; and beside me there is no saviour.

21     This people have I formed for myself; they shall shew forth my praise.

2. मत्ती 9: 35-38

35     और यीशु सब नगरों और गांवों में फिरता रहा और उन की सभाओं में उपदेश करता, और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और हर प्रकार की बीमारी और दुर्बलता को दूर करता रहा।

36     जब उस ने भीड़ को देखा तो उस को लोगों पर तरस आया, क्योंकि वे उन भेड़ों की नाईं जिनका कोई रखवाला न हो, व्याकुल और भटके हुए से थे।

37     तब उस ने अपने चेलों से कहा, पक्के खेत तो बहुत हैं पर मजदूर थोड़े हैं।

38     इसलिये खेत के स्वामी से बिनती करो कि वह अपने खेत काटने के लिये मजदूर भेज दे॥

2. Matthew 9 : 35-38

35     And Jesus went about all the cities and villages, teaching in their synagogues, and preaching the gospel of the kingdom, and healing every sickness and every disease among the people.

36     But when he saw the multitudes, he was moved with compassion on them, because they fainted, and were scattered abroad, as sheep having no shepherd.

37     Then saith he unto his disciples, The harvest truly is plenteous, but the labourers are few;

38     Pray ye therefore the Lord of the harvest, that he will send forth labourers into his harvest.

3. मत्ती 10: 1, 5-8

1     फिर उस ने अपने बारह चेलों को पास बुलाकर, उन्हें अशुद्ध आत्माओं पर अधिकार दिया, कि उन्हें निकालें और सब प्रकार की बीमारियों और सब प्रकार की दुर्बलताओं को दूर करें॥

5     इन बारहों को यीशु ने यह आज्ञा देकर भेजा कि अन्यजातियों की ओर न जाना, और सामरियों के किसी नगर में प्रवेश न करना।

6     परन्तु इस्राएल के घराने ही की खोई हुई भेड़ों के पास जाना।

7     और चलते चलते प्रचार कर कहो कि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।

8     बीमारों को चंगा करो: मरे हुओं को जिलाओ: कोढिय़ों को शुद्ध करो: दुष्टात्माओं को निकालो: तुम ने सेंतमेंत पाया है, सेंतमेंत दो।

3. Matthew 10 : 1, 5-8

1     And when he had called unto him his twelve disciples, he gave them power against unclean spirits, to cast them out, and to heal all manner of sickness and all manner of disease.

5     These twelve Jesus sent forth, and commanded them, saying, Go not into the way of the Gentiles, and into any city of the Samaritans enter ye not:

6     But go rather to the lost sheep of the house of Israel.

7     And as ye go, preach, saying, The kingdom of heaven is at hand.

8     Heal the sick, cleanse the lepers, raise the dead, cast out devils: freely ye have received, freely give.

4. मत्ती 11: 1-6

1     जब यीशु अपने बारह चेलों को आज्ञा दे चुका, तो वह उन के नगरों में उपदेश और प्रचार करने को वहां से चला गया॥

2     यूहन्ना ने बन्दीगृह में मसीह के कामों का समाचार सुनकर अपने चेलों को उस से यह पूछने भेजा।

3     कि क्या आनेवाला तू ही है: या हम दूसरे की बाट जोहें?

4     यीशु ने उत्तर दिया, कि जो कुछ तुम सुनते हो और देखते हो, वह सब जाकर यूहन्ना से कह दो।

5     कि अन्धे देखते हैं और लंगड़े चलते फिरते हैं; कोढ़ी शुद्ध किए जाते हैं और बहिरे सुनते हैं, मुर्दे जिलाए जाते हैं; और कंगालों को सुसमाचार सुनाया जाता है।

6     और धन्य है वह, जो मेरे कारण ठोकर न खाए।

4. Matthew 11 : 1-6

1     And it came to pass, when Jesus had made an end of commanding his twelve disciples, he departed thence to teach and to preach in their cities.

2     Now when John had heard in the prison the works of Christ, he sent two of his disciples,

3     And said unto him, Art thou he that should come, or do we look for another?

4     Jesus answered and said unto them, Go and shew John again those things which ye do hear and see:

5     The blind receive their sight, and the lame walk, the lepers are cleansed, and the deaf hear, the dead are raised up, and the poor have the gospel preached to them.

6     And blessed is he, whosoever shall not be offended in me.

5. यूहन्ना 5: 1-9, 14-19, 30

1     इन बातों के पीछे यहूदियों का एक पर्व हुआ और यीशु यरूशलेम को गया॥

2     यरूशलेम में भेड़-फाटक के पास एक कुण्ड है जो इब्रानी भाषा में बेतहसदा कहलाता है, और उसके पांच ओसारे हैं।

3     इन में बहुत से बीमार, अन्धे, लंगड़े और सूखे अंग वाले पानी के हिलने की आशा में पड़े रहते थे।

4     क्योंकि नियुक्ति समय पर परमेश्वर के स्वर्गदूत कुण्ड में उतरकर पानी को हिलाया करते थे: पानी हिलते ही जो कोई पहिले उतरता वह चंगा हो जाता था चाहे उसकी कोई बीमारी क्यों न हो।

5     वहां एक मनुष्य था, जो अड़तीस वर्ष से बीमारी में पड़ा था।

6     यीशु ने उसे पड़ा हुआ देखकर और जानकर कि वह बहुत दिनों से इस दशा में पड़ा है, उस से पूछा, क्या तू चंगा होना चाहता है?

7     उस बीमार ने उस को उत्तर दिया, कि हे प्रभु, मेरे पास कोई मनुष्य नहीं, कि जब पानी हिलाया जाए, तो मुझे कुण्ड में उतारे; परन्तु मेरे पहुंचते पहुंचते दूसरा मुझ से पहिले उतर पड़ता है।

8     यीशु ने उस से कहा, उठ, अपनी खाट उठाकर चल फिर।

9     वह मनुष्य तुरन्त चंगा हो गया, और अपनी खाट उठाकर चलने फिरने लगा।

14     इन बातों के बाद वह यीशु को मन्दिर में मिला, तब उस ने उस से कहा, देख, तू तो चंगा हो गया है; फिर से पाप मत करना, ऐसा न हो कि इस से कोई भारी विपत्ति तुझ पर आ पड़े।

15     उस मनुष्य ने जाकर यहूदियों से कह दिया, कि जिस ने मुझे चंगा किया, वह यीशु है।

16     इस कारण यहूदी यीशु को सताने लगे, क्योंकि वह ऐसे ऐसे काम सब्त के दिन करता था।

17     इस पर यीशु ने उन से कहा, कि मेरा पिता अब तक काम करता है, और मैं भी काम करता हूं।

19     इस पर यीशु ने उन से कहा, मैं तुम से सच सच कहता हूं, पुत्र आप से कुछ नहीं कर सकता, केवल वह जो पिता को करते देखता है, क्योंकि जिन जिन कामों को वह करता है उन्हें पुत्र भी उसी रीति से करता है।

30     मैं अपने आप से कुछ नहीं कर सकता; जैसा सुनता हूं, वैसा न्याय करता हूं, और मेरा न्याय सच्चा है; क्योंकि मैं अपनी इच्छा नहीं, परन्तु अपने भेजने वाले की इच्छा चाहता हूं।

5. John 5 : 1-9, 14-19, 30

1     After this there was a feast of the Jews; and Jesus went up to Jerusalem.

2     Now there is at Jerusalem by the sheep market a pool, which is called in the Hebrew tongue Bethesda, having five porches.

3     In these lay a great multitude of impotent folk, of blind, halt, withered, waiting for the moving of the water.

4     For an angel went down at a certain season into the pool, and troubled the water: whosoever then first after the troubling of the water stepped in was made whole of whatsoever disease he had.

5     And a certain man was there, which had an infirmity thirty and eight years.

6     When Jesus saw him lie, and knew that he had been now a long time in that case, he saith unto him, Wilt thou be made whole?

7     The impotent man answered him, Sir, I have no man, when the water is troubled, to put me into the pool: but while I am coming, another steppeth down before me.

8     Jesus saith unto him, Rise, take up thy bed, and walk.

9     And immediately the man was made whole, and took up his bed, and walked: and on the same day was the sabbath.

14     Afterward Jesus findeth him in the temple, and said unto him, Behold, thou art made whole: sin no more, lest a worse thing come unto thee.

15     The man departed, and told the Jews that it was Jesus, which had made him whole.

16     And therefore did the Jews persecute Jesus, and sought to slay him, because he had done these things on the sabbath day.

17     But Jesus answered them, My Father worketh hitherto, and I work.

18     Therefore the Jews sought the more to kill him, because he not only had broken the sabbath, but said also that God was his Father, making himself equal with God.

19     Then answered Jesus and said unto them, Verily, verily, I say unto you, The Son can do nothing of himself, but what he seeth the Father do: for what things soever he doeth, these also doeth the Son likewise.

30     I can of mine own self do nothing: as I hear, I judge: and my judgment is just; because I seek not mine own will, but the will of the Father which hath sent me.

6. यूहन्ना 10: 30-34 (से 1st,), 37, 38

30     मैं और पिता एक हैं।

31     यहूदियों ने उसे पत्थरवाह करने को फिर पत्थर उठाए।

32     इस पर यीशु ने उन से कहा, कि मैं ने तुम्हें अपने पिता की ओर से बहुत से भले काम दिखाए हैं, उन में से किस काम के लिये तुम मुझे पत्थरवाह करते हो?

33     यहूदियों ने उस को उत्तर दिया, कि भले काम के लिये हम तुझे पत्थरवाह नहीं करते, परन्तु परमेश्वर की निन्दा के कारण और इसलिये कि तू मनुष्य होकर अपने आप को परमेश्वर बनाता है।

34     यीशु ने उन्हें उत्तर दिया।

37     यदि मैं अपने पिता के काम नहीं करता, तो मेरी प्रतीति न करो।

38     परन्तु यदि मैं करता हूं, तो चाहे मेरी प्रतीति न भी करो, परन्तु उन कामों की तो प्रतीति करो, ताकि तुम जानो, और समझो, कि पिता मुझ में है, और मैं पिता में हूं।

6. John 10 : 30-34 (to 1st ,), 37, 38

30     I and my Father are one.

31     Then the Jews took up stones again to stone him.

32     Jesus answered them, Many good works have I shewed you from my Father; for which of those works do ye stone me?

33     The Jews answered him, saying, For a good work we stone thee not; but for blasphemy; and because that thou, being a man, makest thyself God.

34     Jesus answered them,

37     If I do not the works of my Father, believe me not.

38     But if I do, though ye believe not me, believe the works: that ye may know, and believe, that the Father is in me, and I in him.

7. मत्ती 15: 32 (से 2nd,)

32     यीशु ने अपने चेलों को बुलाकर कहा।

7. Matthew 15 : 32 (to 2nd ,)

32     Then Jesus called his disciples unto him, and said,

8. यूहन्ना 15: 1-5

1     सच्ची दाखलता मैं हूं; और मेरा पिता किसान है।

2     जो डाली मुझ में है, और नहीं फलती, उसे वह काट डालता है, और जो फलती है, उसे वह छांटता है ताकि और फले।

3     तुम तो उस वचन के कारण जो मैं ने तुम से कहा है, शुद्ध हो।

4     तुम मुझ में बने रहो, और मैं तुम में: जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे, तो अपने आप से नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझ में बने न रहो तो नहीं फल सकते।

5     मैं दाखलता हूं: तुम डालियां हो; जो मुझ में बना रहता है, और मैं उस में, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।

8. John 15 : 1-5

1     I am the true vine, and my Father is the husbandman.

2     Every branch in me that beareth not fruit he taketh away: and every branch that beareth fruit, he purgeth it, that it may bring forth more fruit.

3     Now ye are clean through the word which I have spoken unto you.

4     Abide in me, and I in you. As the branch cannot bear fruit of itself, except it abide in the vine; no more can ye, except ye abide in me.

5     I am the vine, ye are the branches: He that abideth in me, and I in him, the same bringeth forth much fruit: for without me ye can do nothing.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 361: 16-20

जैसे पानी की एक बूंद सागर के साथ है, सूर्य के साथ प्रकाश की एक किरण, यहां तक कि भगवान और मनुष्य, पिता और पुत्र, अस्तित्व में एक हैं। शास्त्र कहता है: "क्योंकि हम उसी में जीवित रहते, और चलते-फिरते, और स्थिर रहते हैं."

1. 361 : 16-20

As a drop of water is one with the ocean, a ray of light one with the sun, even so God and man, Father and son, are one in being. The Scripture reads: "For in Him we live, and move, and have our being."

2. 475: 5 केवल, 13-22

सवाल। -मनुष्य क्या है?

आदमी विचार है, प्रेम की छवि; वह काया नहीं है। वह ईश्वर का यौगिक विचार है, जिसमें सभी सही विचार शामिल हैं; भगवान की छवि और समानता को दर्शाता है कि सभी के लिए सामान्य शब्द; विज्ञान में पाई जाने वाली सचेत पहचान, जिसमें मनुष्य ईश्वर या मन का प्रतिबिंब है, और इसलिए शाश्वत है; जो परमात्मा से अलग नहीं है; जिसे देवता से एक भी गुण नहीं मिला है; जो अपने आप में कोई जीवन, बुद्धिमत्ता और न ही रचनात्मक शक्ति रखता है, बल्कि आध्यात्मिक रूप से वह सब कुछ दर्शाता है जो उसके निर्माता का है।

2. 475 : 5 only, 13-22

Question. — What is man?

Man is idea, the image, of Love; he is not physique. He is the compound idea of God, including all right ideas; the generic term for all that reflects God’s image and likeness; the conscious identity of being as found in Science, in which man is the reflection of God, or Mind, and therefore is eternal; that which has no separate mind from God; that which has not a single quality underived from Deity; that which possesses no life, intelligence, nor creative power of his own, but reflects spiritually all that belongs to his Maker.

3. 18: 1-3

प्रायश्चित परमेश्वर के साथ मनुष्य की एकता का उदाहरण है, जिससे मनुष्य ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम को दर्शाता है।

3. 18 : 1-3

Atonement is the exemplification of man's unity with God, whereby man reflects divine Truth, Life, and Love.

4. 26: 10-18

मसीह आत्मा था जिसे यीशु ने अपने बयानों में निहित किया था: "मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं;" "मैं और पिता एक हैं।" यह मसीह, या यीशु की दिव्यता, उसकी दिव्य प्रकृति थी, जो उसे अनुप्राणित करती थी। ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम ने पाप, बीमारी और मृत्यु पर यीशु को अधिकार दिया। उनका मिशन आकाशीय विज्ञान को प्रकट करना था, यह साबित करने के लिए कि ईश्वर क्या है और वह मनुष्य के लिए क्या करता है।

4. 26 : 10-18

The Christ was the Spirit which Jesus implied in his own statements: "I am the way, the truth, and the life;" "I and my Father are one." This Christ, or divinity of the man Jesus, was his divine nature, the godliness which animated him. Divine Truth, Life, and Love gave Jesus authority over sin, sickness, and death. His mission was to reveal the Science of celestial being, to prove what God is and what He does for man.

5. 27: 1-9

यीशु ने जॉन द बैप्टिस्ट को एक संदेश भेजा, एक प्रश्न से परे जो यह साबित करने के लिए था कि मसीह आया था: "कि जो कुछ तुम सुनते हो और देखते हो, वह सब जाकर यूहन्ना से कह दो। कि अन्धे देखते हैं और लंगड़े चलते फिरते हैं; कोढ़ी शुद्ध किए जाते हैं और बहिरे सुनते हैं, मुर्दे जिलाए जाते हैं; और कंगालों को सुसमाचार सुनाया जाता है।" दूसरे शब्दों में: जॉन को बताएं कि दैवीय शक्ति का प्रदर्शन क्या है, और वह तुरंत महसूस करेगा कि ईश्वर मसीहाई काम में एक शक्ति है।

5. 27 : 1-9

Jesus sent a message to John the Baptist, which was intended to prove beyond a question that the Christ had come: "Go your way, and tell John what things ye have seen and heard; how that the blind see, the lame walk, the lepers are cleansed, the deaf hear, the dead are raised, to the poor the gospel is preached." In other words: Tell John what the demonstration of divine power is, and he will at once perceive that God is the power in the Messianic work.

6. 37: 20-25

हो सकता है कि आज के ईसाई उस करियर के अधिक व्यावहारिक महत्व को अपनाएं! यह संभव है, - हाँ, यह प्रत्येक बच्चे, पुरुष और महिला का कर्तव्य और विशेषाधिकार है, - कि उन्हें कुछ हद तक स्वास्थ्य और पवित्रता के सत्य और जीवन के प्रदर्शन द्वारा मास्टर के उदाहरण का पालन करना चाहिए।

6. 37 : 20-25

May the Christians of to-day take up the more practical import of that career! It is possible, — yea, it is the duty and privilege of every child, man, and woman, — to follow in some degree the example of the Master by the demonstration of Truth and Life, of health and holiness.

7. 38: 10-20

ईश ने कहा: "और विश्वास करने वालों में ये चिन्ह होंगे कि; ... वे बीमारों पर हाथ रखेंगे, और वे चंगे हो जाएंगे।" उस पर कौन विश्वास करता है? वह अपने शिष्यों को संबोधित कर रहा था, फिर भी उसने यह नहीं कहा, "आपके लिए ये चिन्ह होंगे कि", लेकिन उनके लिए — आने वाले समय में "वे जो विश्वास करते हैं"। यहाँ हाथ शब्द का प्रयोग रूपक के रूप में किया गया है, जैसा कि पाठ में है, "यहोवा का दहिना हाथ महान हुआ है।" यह आध्यात्मिक शक्ति को व्यक्त करता है; अन्यथा आध्यात्मिक रूप से उपचार नहीं किया जा सकता था। एक अन्य समय में यीशु ने प्रार्थना की, केवल बारहों के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए जिन्हें "उनके वचन के माध्यम से" विश्वास करना चाहिए।

7. 38 : 10-20

Jesus said: "These signs shall follow them that believe; ... they shall lay hands on the sick, and they shall recover." Who believes him? He was addressing his disciples, yet he did not say, "These signs shall follow you," but them — "them that believe" in all time to come. Here the word hands is used metaphorically, as in the text, "The right hand of the Lord is exalted." It expresses spiritual power; otherwise the healing could not have been done spiritually. At another time Jesus prayed, not for the twelve only, but for as many as should believe "through their word."

8. 91: 5-8

आइए हम खुद को इस विश्वास से मुक्त करें कि मनुष्य ईश्वर से अलग हो जाता है, और केवल ईश्वरीय सिद्धांत, जीवन और प्रेम का पालन करता है। यहाँ सभी सच्चे आध्यात्मिक विकास के लिए प्रस्थान का महान बिंदु है।

8. 91 : 5-8

Let us rid ourselves of the belief that man is separated from God, and obey only the divine Principle, Life and Love. Here is the great point of departure for all true spiritual growth.

9. 90: 24-32

स्वयं के लिए प्रवेश यह है कि मनुष्य ईश्वर की अपनी समानता है जो मनुष्य को अनंत विचार के लिए स्वतंत्र करता है। यह विश्वास मृत्यु पर दरवाजा बंद कर देता है, और इसे अमरता की ओर विस्तृत करता है। आत्मा की समझ और मान्यता अंत में आनी चाहिए, और हम दिव्य सिद्धांत की आशंका के माध्यम से होने के रहस्यों को सुलझाने में हमारे समय में सुधार कर सकते हैं। वर्तमान में हम जानते हैं कि मनुष्य क्या नहीं है, लेकिन हम निश्चित रूप से यह जानते हैं जब मनुष्य भगवान को दर्शाता है।

9. 90 : 24-32

The admission to one's self that man is God's own likeness sets man free to master the infinite idea. This conviction shuts the door on death, and opens it wide towards immortality. The understanding and recognition of Spirit must finally come, and we may as well improve our time in solving the mysteries of being through an apprehension of divine Principle. At present we know not what man is, but we certainly shall know this when man reflects God.

10. 295: 16-24

नश्वर के माध्यम से भगवान की अभिव्यक्ति खिड़की के कांच के माध्यम से गुजरते हुए प्रकाश है। प्रकाश और कांच कभी नहीं पिघलते हैं, लेकिन सामग्री के रूप में, कांच दीवारों की तुलना में कम अपारदर्शी है। नश्वर मन जिसके माध्यम से सत्य सबसे अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट होता है, वह है जिसने सत्य के लिए एक बेहतर पारदर्शिता बनने के लिए बहुत अधिक भौतिकता - बहुत त्रुटि - खो दी है। फिर, जैसे बादल पतले वाष्प में पिघलता है, यह अब सूरज को छिपाता नहीं है।

10. 295 : 16-24

The manifestation of God through mortals is as light passing through the window-pane. The light and the glass never mingle, but as matter, the glass is less opaque than the walls. The mortal mind through which Truth appears most vividly is that one which has lost much materiality — much error — in order to become a better transparency for Truth. Then, like a cloud melting into thin vapor, it no longer hides the sun.

11. 302: 3-24

भौतिक शरीर और मन लौकिक हैं, लेकिन वास्तविक मनुष्य आध्यात्मिक और शाश्वत है। असली आदमी की पहचान नहीं खोई है, लेकिन इस स्पष्टीकरण के माध्यम से पाया जाता है।; इसके लिए अस्तित्व और सभी पहचान के प्रति सचेत अविभाजित है और अपरिवर्तित रहता है। जब भगवान सब और अनंत काल के हैं, तब यह असंभव है कि मनुष्य को वास्तविक रूप से खोना चाहिए। यह धारणा कि मन पदार्थ में है, और तथाकथित सुख और पीड़ा, जन्म, पाप, बीमारी, और पदार्थ की मृत्यु, वास्तविक हैं, एक नश्वर विश्वास है; और यह विश्वास वह सब है जो कभी खो जाएगा।

मनुष्य की हमारी परिभाषा को जारी रखते हुए, हमें याद रखना चाहिए कि सामंजस्यपूर्ण और अमर आदमी हमेशा के लिए अस्तित्व में है, और किसी भी जीवन, पदार्थ और बुद्धि के नश्वर भ्रम से परे और हमेशा मौजूद है। यह कथन तथ्य पर आधारित है, काल्पनिक नहीं। मनुष्य के पूर्ण, यहाँ तक कि पिता के रूप में भी पूर्ण होने का विज्ञान बताता है, क्योंकि आध्यात्मिक मनुष्य का आत्मा या मन, ईश्वर है, जो सभी का दिव्य सिद्धांत है, और क्योंकि यह वास्तविक व्यक्ति आत्मा के बजाय आत्मा के नियम द्वारा शासित है, न कि पदार्थ के तथाकथित नियमों द्वारा।

11. 302 : 3-24

The material body and mind are temporal, but the real man is spiritual and eternal. The identity of the real man is not lost, but found through this explanation; for the conscious infinitude of existence and of all identity is thereby discerned and remains unchanged. It is impossible that man should lose aught that is real, when God is all and eternally his. The notion that mind is in matter, and that the so-called pleasures and pains, the birth, sin, sickness, and death of matter, are real, is a mortal belief; and this belief is all that will ever be lost.

Continuing our definition of man, let us remember that harmonious and immortal man has existed forever, and is always beyond and above the mortal illusion of any life, substance, and intelligence as existent in matter. This statement is based on fact, not fable. The Science of being reveals man as perfect, even as the Father is perfect, because the Soul, or Mind, of the spiritual man is God, the divine Principle of all being, and because this real man is governed by Soul instead of sense, by the law of Spirit, not by the so-called laws of matter.

12. 481: 2-6

मनुष्य ईश्वर, आत्मा, और कुछ नहीं के लिए सहायक है। ईश्वर का होना अनंत, स्वतंत्रता, सद्भाव और असीम आनंद है। "और जहां कहीं प्रभु का आत्मा है वहां स्वतंत्रता है।" योर के द्वीपसमूह की तरह, मनुष्य स्वतंत्र है "पवित्रतम में प्रवेश करने के लिए," - भगवान का क्षेत्र।

12. 481 : 2-6

Man is tributary to God, Spirit, and to nothing else. God's being is infinity, freedom, harmony, and boundless bliss. "Where the Spirit of the Lord is, there is liberty." Like the archpriests of yore, man is free "to enter into the holiest," — the realm of God.

13. 14: 6-11

"प्रभु के साथ वर्तमान" होना, केवल भावनात्मक परमानंद या विश्वास नहीं है, बल्कि वास्तविक प्रदर्शन और जीवन की समझ है जैसा कि क्राइस्टियन साइंस में सामने आया है। "प्रभु के साथ" होना ईश्वर के कानून का पालन करना है, परमात्मा द्वारा पूर्ण रूप से शासित होना, - आत्मा द्वारा, पदार्थ द्वारा नहीं।

13. 14 : 6-11

To be "present with the Lord" is to have, not mere emotional ecstasy or faith, but the actual demonstration and understanding of Life as revealed in Christian Science. To be "with the Lord" is to be in obedience to the law of God, to be absolutely governed by divine Love, — by Spirit, not by matter.

14. 496: 9-19

हम सभी को यह सीखना चाहिए कि जीवन ईश्वर है। अपने आप से पूछें: क्या मैं उस जीवन को जी रहा हूं जो सर्वोच्च भलाई के लिए है? क्या मैं सत्य और प्रेम की उपचार शक्ति का प्रदर्शन कर रहा हूँ? यदि ऐसा है, तो रास्ता उज्जवल हो जाएगा "पूरे दिन तक।" आपका फल यह साबित करेगा कि परमेश्वर की समझ मनुष्य को क्या लाती है। शाश्वत रूप से इस विचार पर दृढ़ रहें, - कि यह आध्यात्मिक विचार है, पवित्र आत्मा और मसीह, जो आपको वैज्ञानिक निश्चितता के साथ, अपने ईश्वरीय सिद्धांत, प्रेम, अंतर्निहित, अतिव्यापी, और सभी को शामिल करने के आधार पर प्रदर्शित करने में सक्षम बनाता है।

14. 496 : 9-19

We all must learn that Life is God. Ask yourself: Am I living the life that approaches the supreme good? Am I demonstrating the healing power of Truth and Love? If so, then the way will grow brighter "unto the perfect day." Your fruits will prove what the understanding of God brings to man. Hold perpetually this thought, — that it is the spiritual idea, the Holy Ghost and Christ, which enables you to demonstrate, with scientific certainty, the rule of healing, based upon its divine Principle, Love, underlying, overlying, and encompassing all true being.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6