रविवार 10 मई, 2020 |

रविवार 10 मई, 2020



विषयआदम और पतित आदमी

SubjectAdam and Fallen Man

वर्ण पाठ: 1 कुरिन्थियों 15 : 22

और जैसे आदम में सब मरते हैं, वैसा ही मसीह में सब जिलाए जाएंगे।



Golden Text: I Corinthians 15 : 22

For as in Adam all die, even so in Christ shall all be made alive.




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रोमियो 5 : 17-21


17     क्योंकि जब एक मनुष्य के अपराध के कराण मृत्यु ने उस एक ही के द्वारा राज्य किया, तो जो लोग अनुग्रह और धर्म रूपी वरदान बहुतायत से पाते हैं वे एक मनुष्य के, अर्थात यीशु मसीह के द्वारा अवश्य ही अनन्त जीवन में राज्य करेंगे।

18     इसलिये जैसा एक अपराध सब मनुष्यों के लिये दण्ड की आज्ञा का कारण हुआ, वैसा ही एक धर्म का काम भी सब मनुष्यों के लिये जीवन के निमित धर्मी ठहराए जाने का कारण हुआ।

19     क्योंकि जैसा एक मनुष्य के आज्ञा न मानने से बहुत लोग पापी ठहरे, वैसे ही एक मनुष्य के आज्ञा मानने से बहुत लोग धर्मी ठहरेंगे।

20     और व्यवस्था बीच में आ गई, कि अपराध बहुत हो, परन्तु जहां पाप बहुत हुआ, वहां अनुग्रह उस से भी कहीं अधिक हुआ।

21     कि जैसा पाप ने मृत्यु फैलाते हुए राज्य किया, वैसा ही हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा अनुग्रह भी अनन्त जीवन के लिये धर्मी ठहराते हुए राज्य करे॥

Responsive Reading: Romans 5 : 17-21

17.     For if by one man’s offence death reigned by one; much more they which receive abundance of grace and of the gift of righteousness shall reign in life by one, Jesus Christ.

18.     Therefore as by the offence of one judgment came upon all men to condemnation; even so by the righteousness of one the free gift came upon all men unto justification of life.

19.     For as by one man’s disobedience many were made sinners, so by the obedience of one shall many be made righteous.

20.     Moreover the law entered, that the offence might abound. But where sin abounded, grace did much more abound:

21.     That as sin hath reigned unto death, even so might grace reign through righteousness unto eternal life by Jesus Christ our Lord.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 33 : 6-9

6     आकाशमण्डल यहोवा के वचन से, और उसके सारे गण उसके मुंह ही श्वास से बने।

7     वह समुद्र का जल ढेर की नाईं इकट्ठा करता; वह गहिरे सागर को अपने भण्डार में रखता है॥

8     सारी पृथ्वी के लोग यहोवा से डरें, जगत के सब निवासी उसका भय मानें!

9     क्योंकि जब उसने कहा, तब हो गया; जब उसने आज्ञा दी, तब वास्तव में वैसा ही हो गया॥

1. Psalm 33 : 6-9

6     By the word of the Lord were the heavens made; and all the host of them by the breath of his mouth.

7     He gathereth the waters of the sea together as an heap: he layeth up the depth in storehouses.

8     Let all the earth fear the Lord: let all the inhabitants of the world stand in awe of him.

9     For he spake, and it was done; he commanded, and it stood fast.

2. उत्पत्ति 1: 26-28 (से 1st,), 31 (से 1st.)

26     फिर परमेश्वर ने कहा, हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएं; और वे समुद्र की मछलियों, और आकाश के पक्षियों, और घरेलू पशुओं, और सारी पृथ्वी पर, और सब रेंगने वाले जन्तुओं पर जो पृथ्वी पर रेंगते हैं, अधिकार रखें।

27     तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की।

28     और परमेश्वर ने उन को आशीष दी।

31     तब परमेश्वर ने जो कुछ बनाया था, सब को देखा, तो क्या देखा, कि वह बहुत ही अच्छा है।

2. Genesis 1 : 26-28 (to 1st ,), 31 (to 1st .)

26     And God said, Let us make man in our image, after our likeness: and let them have dominion over the fish of the sea, and over the fowl of the air, and over the cattle, and over all the earth, and over every creeping thing that creepeth upon the earth.

27     So God created man in his own image, in the image of God created he him; male and female created he them.

28     And God blessed them,

31     And God saw every thing that he had made, and, behold, it was very good.

3. उत्पत्ति 3 : 1-13, 16, 17

1     यहोवा परमेश्वर ने जितने बनैले पशु बनाए थे, उन सब में सर्प धूर्त था, और उसने स्त्री से कहा, क्या सच है, कि परमेश्वर ने कहा, कि तुम इस बाटिका के किसी वृक्ष का फल न खाना?

2     स्त्री ने सर्प से कहा, इस बाटिका के वृक्षों के फल हम खा सकते हैं।

3     पर जो वृक्ष बाटिका के बीच में है, उसके फल के विषय में परमेश्वर ने कहा है कि न तो तुम उसको खाना और न उसको छूना, नहीं तो मर जाओगे।

4     तब सर्प ने स्त्री से कहा, तुम निश्चय न मरोगे,

5     वरन परमेश्वर आप जानता है, कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आंखें खुल जाएंगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे।

6     सो जब स्त्री ने देखा कि उस वृक्ष का फल खाने में अच्छा, और देखने में मनभाऊ, और बुद्धि देने के लिये चाहने योग्य भी है, तब उसने उस में से तोड़कर खाया; और अपने पति को भी दिया, और उसने भी खाया।

7     तब उन दोनों की आंखे खुल गई, और उन को मालूम हुआ कि वे नंगे है; सो उन्होंने अंजीर के पत्ते जोड़ जोड़ कर लंगोट बना लिये।

8     तब यहोवा परमेश्वर जो दिन के ठंडे समय बाटिका में फिरता था उसका शब्द उन को सुनाई दिया। तब आदम और उसकी पत्नी बाटिका के वृक्षों के बीच यहोवा परमेश्वर से छिप गए।

9     तब यहोवा परमेश्वर ने पुकार कर आदम से पूछा, तू कहां है?

10     उसने कहा, मैं तेरा शब्द बारी में सुन कर डर गया क्योंकि मैं नंगा था; इसलिये छिप गया।

11     उसने कहा, किस ने तुझे चिताया कि तू नंगा है? जिस वृक्ष का फल खाने को मैं ने तुझे बर्जा था, क्या तू ने उसका फल खाया है?

12     आदम ने कहा जिस स्त्री को तू ने मेरे संग रहने को दिया है उसी ने उस वृक्ष का फल मुझे दिया, और मैं ने खाया।

13     तब यहोवा परमेश्वर ने स्त्री से कहा, तू ने यह क्या किया है? स्त्री ने कहा, सर्प ने मुझे बहका दिया तब मैं ने खाया।

16     फिर स्त्री से उसने कहा, मैं तेरी पीड़ा और तेरे गर्भवती होने के दु:ख को बहुत बढ़ाऊंगा; तू पीड़ित हो कर बालक उत्पन्न करेगी; और तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा।

17     और आदम से उसने कहा, तू ने जो अपनी पत्नी की बात सुनी, और जिस वृक्ष के फल के विषय मैं ने तुझे आज्ञा दी थी कि तू उसे न खाना उसको तू ने खाया है, इसलिये भूमि तेरे कारण शापित है: तू उसकी उपज जीवन भर दु: ख के साथ खाया करेगा।

3. Genesis 3 : 1-13, 16, 17

1     Now the serpent was more subtil than any beast of the field which the Lord God had made. And he said unto the woman, Yea, hath God said, Ye shall not eat of every tree of the garden?

2     And the woman said unto the serpent, We may eat of the fruit of the trees of the garden:

3     But of the fruit of the tree which is in the midst of the garden, God hath said, Ye shall not eat of it, neither shall ye touch it, lest ye die.

4     And the serpent said unto the woman, Ye shall not surely die:

5     For God doth know that in the day ye eat thereof, then your eyes shall be opened, and ye shall be as gods, knowing good and evil.

6     And when the woman saw that the tree was good for food, and that it was pleasant to the eyes, and a tree to be desired to make one wise, she took of the fruit thereof, and did eat, and gave also unto her husband with her; and he did eat.

7     And the eyes of them both were opened, and they knew that they were naked; and they sewed fig leaves together, and made themselves aprons.

8     And they heard the voice of the Lord God walking in the garden in the cool of the day: and Adam and his wife hid themselves from the presence of the Lord God amongst the trees of the garden.

9     And the Lord God called unto Adam, and said unto him, Where art thou?

10     And he said, I heard thy voice in the garden, and I was afraid, because I was naked; and I hid myself.

11     And he said, Who told thee that thou wast naked? Hast thou eaten of the tree, whereof I commanded thee that thou shouldest not eat?

12     And the man said, The woman whom thou gavest to be with me, she gave me of the tree, and I did eat.

13     And the Lord God said unto the woman, What is this that thou hast done? And the woman said, The serpent beguiled me, and I did eat.

16     Unto the woman he said, I will greatly multiply thy sorrow and thy conception; in sorrow thou shalt bring forth children; and thy desire shall be to thy husband, and he shall rule over thee.

17     And unto Adam he said, Because thou hast hearkened unto the voice of thy wife, and hast eaten of the tree, of which I commanded thee, saying, Thou shalt not eat of it: cursed is the ground for thy sake; in sorrow shalt thou eat of it all the days of thy life.

4. इब्रानियों 3 : 12, 13

12     हे भाइयो, चौकस रहो, कि तुम में ऐसा बुरा और अविश्वासी मन न हो, जो जीवते परमेश्वर से दूर हट जाए।

13     वरन जिस दिन तक आज का दिन कहा जाता है, हर दिन एक दूसरे को समझाते रहो, ऐसा न हो, कि तुम में से कोई जन पाप के छल में आकर कठोर हो जाए।

4. Hebrews 3 : 12, 13

12     Take heed, brethren, lest there be in any of you an evil heart of unbelief, in departing from the living God.

13     But exhort one another daily, while it is called To day; lest any of you be hardened through the deceitfulness of sin.

5. मत्ती 8 : 5-8, 10, 13

5     और जब वह कफरनहूम में आया तो एक सूबेदार ने उसके पास आकर उस से बिनती की।

6     कि हे प्रभु, मेरा सेवक घर में झोले का मारा बहुत दुखी पड़ा है।

7     उस ने उस से कहा; मैं आकर उसे चंगा करूंगा।

8     सूबेदार ने उत्तर दिया; कि हे प्रभु मैं इस योग्य नहीं, कि तू मेरी छत के तले आए, पर केवल मुख से कह दे तो मेरा सेवक चंगा हो जाएगा।

10     यह सुनकर यीशु ने अचम्भा किया, और जो उसके पीछे आ रहे थे उन से कहा; मैं तुम से सच कहता हूं, कि मैं ने इस्राएल में भी ऐसा विश्वास नहीं पाया।

13     और यीशु ने सूबेदार से कहा, जा; जैसा तेरा विश्वास है, वैसा ही तेरे लिये हो: और उसका सेवक उसी घड़ी चंगा हो गया॥

5. Matthew 8 : 5-8, 10, 13

5     And when Jesus was entered into Capernaum, there came unto him a centurion, beseeching him,

6     And saying, Lord, my servant lieth at home sick of the palsy, grievously tormented.

7     And Jesus saith unto him, I will come and heal him.

8     The centurion answered and said, Lord, I am not worthy that thou shouldest come under my roof: but speak the word only, and my servant shall be healed.

10     When Jesus heard it, he marvelled, and said to them that followed, Verily I say unto you, I have not found so great faith, no, not in Israel.

13     And Jesus said unto the centurion, Go thy way; and as thou hast believed, so be it done unto thee. And his servant was healed in the selfsame hour.

6. इफिसियों 5 : 14 (जाग)

14     हे सोने वाले जाग और मुर्दों में से जी उठ; तो मसीह की ज्योति तुझ पर चमकेगी॥

6. Ephesians 5 : 14 (Awake)

14     Awake thou that sleepest, and arise from the dead, and Christ shall give thee light.

7. प्रेरितों के काम 17 : 24, 26-28

24     जिस परमेश्वर ने पृथ्वी और उस की सब वस्तुओं को बनाया, वह स्वर्ग और पृथ्वी का स्वामी होकर हाथ के बनाए हुए मन्दिरों में नहीं रहता।

26     उस ने एक ही मूल से मनुष्यों की सब जातियां सारी पृथ्वी पर रहने के लिये बनाईं हैं; और उन के ठहराए हुए समय, और निवास के सिवानों को इसलिये बान्धा है।

27     कि वे परमेश्वर को ढूंढ़ें, कदाचित उसे टटोल कर पा जाएं तौभी वह हम में से किसी से दूर नहीं!

28     क्योंकि हम उसी में जीवित रहते, और चलते-फिरते, और स्थिर रहते हैं; जैसे तुम्हारे कितने कवियों ने भी कहा है, कि हम तो उसी के वंश भी हैं।

7. Acts 17 : 24, 26-28

24     God that made the world and all things therein, seeing that he is Lord of heaven and earth, dwelleth not in temples made with hands;

26     And hath made of one blood all nations of men for to dwell on all the face of the earth, and hath determined the times before appointed, and the bounds of their habitation;

27     That they should seek the Lord, if haply they might feel after him, and find him, though he be not far from every one of us:

28     For in him we live, and move, and have our being; as certain also of your own poets have said, For we are also his offspring.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 29 : 14-16

क्रिश्चियन साइंस में निर्देश देने वाले लोग इस शानदार धारणा तक पहुँच चुके हैं कि ईश्वर ही मनुष्य का एकमात्र लेखक है।

1. 29 : 14-16

Those instructed in Christian Science have reached the glorious perception that God is the only author of man.

2. 332 : 4 (पिता)-8

पिता-माता देवता का नाम है, जो उनकी आध्यात्मिक रचना के उनके कोमल संबंधों को इंगित करता है। जैसा कि प्रेरित ने इसे उन शब्दों में व्यक्त किया है जो उसने एक क्लासिक कवि से मंजूर होने के साथ उद्धृत किए थे: "क्योंकि हम भी उसकी संतान हैं।"

2. 332 : 4 (Father)-8

Father-Mother is the name for Deity, which indicates His tender relationship to His spiritual creation. As the apostle expressed it in words which he quoted with approbation from a classic poet: "For we are also His offspring."

3. 242 : 9-14

स्वर्ग के लिए एक रास्ता है, सद्भाव; और ईश्वरीय विज्ञान में मसीह हमें इस मार्ग को दिखाता है। कोई और वास्तविकता नहीं है, अच्छे ईश्वर और उसके प्रतिबिंब को जानने और इंद्रियों के दर्द और सुख से श्रेष्ठ होने के अलावा जीवन की कोई अन्य चेतना नहीं है।

3. 242 : 9-14

There is but one way to heaven, harmony, and Christ in divine Science shows us this way. It is to know no other reality — to have no other consciousness of life — than good, God and His reflection, and to rise superior to the so-called pain and pleasure of the senses.

4. 502 : 22-5

उत्पत्ति 1:1. आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।

अनंत की कोई शुरुआत नहीं है। इस शब्द की शुरुआत ही एकमात्र के संकेत के लिए की जाती है, - यानी, ब्रह्मांड सहित ईश्वर और मनुष्य की अनंत सत्यता और एकता। रचनात्मक सिद्धांत - जीवन, सत्य और प्रेम - ईश्वर है। ब्रह्मांड ईश्वर को दर्शाता है। लेकिन एक रचनाकार और एक रचना है। इस रचना में आध्यात्मिक विचारों और उनकी पहचानों का खुलासा होता है, जो अनंत मन में समाहित हैं और हमेशा के लिए परिलक्षित होते हैं। ये विचार अनंत से लेकर अनंत तक हैं, और उच्चतम विचार ईश्वर के पुत्र और पुत्रियाँ हैं।

4. 502 : 22-5

Genesis i. 1. In the beginning God created the heaven and the earth.

The infinite has no beginning. This word beginning is employed to signify the only, — that is, the eternal verity and unity of God and man, including the universe. The creative Principle — Life, Truth, and Love — is God. The universe reflects God. There is but one creator and one creation. This creation consists of the unfolding of spiritual ideas and their identities, which are embraced in the infinite Mind and forever reflected. These ideas range from the infinitesimal to infinity, and the highest ideas are the sons and daughters of God.

5. 282 : 28-31

जो कुछ भी मनुष्य के पाप को दर्शाता है, या भगवान के विपरीत, या भगवान की अनुपस्थिति, एडम का सपना है, जो न तो माइंड है और न ही मनुष्य है, क्योंकि यह पिता की भीख नहीं है।

5. 282 : 28-31

Whatever indicates the fall of man or the opposite of God or God's absence, is the Adam-dream, which is neither Mind nor man, for it is not begotten of the Father.

6. 338 : 27-32

यहोवा ने घोषणा की कि जमीन पर कब्जा कर लिया गया था; और इस आधार से, या सामग्री, आदम को बनाया गया था, फिर भी "मनुष्य के लिए" भगवान ने पृथ्वी को आशीर्वाद दिया था। इससे यह अनुसरण करता है कि आदम आदर्श नहीं था जिसके लिए पृथ्वी धन्य थी। आदर्श व्यक्ति का नियत समय में पता चला था, और उसे ईसा मसीह के रूप में जाना जाता था।

6. 338 : 27-32

Jehovah declared the ground was accursed; and from this ground, or matter, sprang Adam, notwithstanding God had blessed the earth "for man's sake." From this it follows that Adam was not the ideal man for whom the earth was blessed. The ideal man was revealed in due time, and was known as Christ Jesus.

7. 302 : 19-24, 31-7

मनुष्य के पूर्ण, यहाँ तक कि पिता के रूप में भी पूर्ण होने का विज्ञान बताता है, क्योंकि आध्यात्मिक मनुष्य का आत्मा या मन, ईश्वर है, जो सभी का दिव्य सिद्धांत है, और क्योंकि यह वास्तविक व्यक्ति आत्मा के बजाय आत्मा के नियम द्वारा शासित है, न कि पदार्थ के तथाकथित नियमों द्वारा।

यहाँ तक की क्रिश्चियन साइंस में, आत्मा के व्यक्तिगत विचारों द्वारा प्रजनन लेकिन उन विचारों के दिव्य सिद्धांत की रचनात्मक शक्ति का प्रतिबिंब है। प्रतिबिंब, मानसिक अभिव्यक्ति के माध्यम से, माइंड के बहुपक्षीय रूपों के बारे में है जो लोगों के वास्तविक के मन को नियंत्रित करते हैं, प्रतिबिंब को नियंत्रित करने वाला सिद्धांत। परमेश्वर के बच्चों का गुणन किसी बात में प्रसार की शक्ति से नहीं होता है, यह आत्मा का प्रतिबिंब है।

7. 302 : 19-24, 31-7

The Science of being reveals man as perfect, even as the Father is perfect, because the Soul, or Mind, of the spiritual man is God, the divine Principle of all being, and because this real man is governed by Soul instead of sense, by the law of Spirit, not by the so-called laws of matter.

Even in Christian Science, reproduction by Spirit's individual ideas is but the reflection of the creative power of the divine Principle of those ideas. The reflection, through mental manifestation, of the multitudinous forms of Mind which people the realm of the real is controlled by Mind, the Principle governing the reflection. Multiplication of God's children comes from no power of propagation in matter, it is the reflection of Spirit.

8. 307 : 25 (यह)-13

दिव्य मन मनुष्य की आत्मा है, और यह मनुष्य को सभी चीजों पर प्रभुत्व प्रदान करता है। मनुष्य को भौतिक आधार से नहीं बनाया गया था, न ही उन भौतिक कानूनों का पालन करने पर प्रतिबंध लगाया गया है जो आत्मा ने कभी नहीं बनाए; उनका प्रांत मन की उच्च विधि में आध्यात्मिक विधियों में है।

त्रुटि के भयानक दिन, कालापन और अराजकता के ऊपर, सत्य की आवाज अभी भी कहती है: "एडम, तुम कहाँ हो? चेतना, तुम कहाँ हो? क्या आप इस विश्वास में निवास करते हैं कि मन भौतिक है, और यह बुराई मन है, या आप जीवित विश्वास में कला है कि एक ईश्वर है और उसकी आज्ञा रख सकता है?" जब तक सबक नहीं सीखा जाता है कि भगवान एकमात्र मन शासी आदमी है, तब तक नश्वर विश्वास डर जाएगा क्योंकि यह शुरुआत में था, और मांग से छिप जाएगा, "आप कहां हैं?" यह भयानक मांग, "एडम, तुम कहाँ हो?" सिर, हृदय, पेट, रक्त, नसों, आदि से प्रवेश द्वारा जुड़ा हुआ है: "लो, यहां मैं हूं, शरीर में खुशी और जीवन की तलाश कर रहा हूं, लेकिन केवल एक भ्रम ढूंढ रहा हूं, झूठे दावों का सम्मिश्रण, झूठी खुशी , दर्द, पाप, बीमारी और मृत्यु। "

8. 307 : 25 (The)-13

The divine Mind is the Soul of man, and gives man dominion over all things. Man was not created from a material basis, nor bidden to obey material laws which Spirit never made; his province is in spiritual statutes, in the higher law of Mind.

Above error's awful din, blackness, and chaos, the voice of Truth still calls: "Adam, where art thou? Consciousness, where art thou? Art thou dwelling in the belief that mind is in matter, and that evil is mind, or art thou in the living faith that there is and can be but one God, and keeping His commandment?" Until the lesson is learned that God is the only Mind governing man, mortal belief will be afraid as it was in the beginning, and will hide from the demand, "Where art thou?" This awful demand, "Adam, where art thou?" is met by the admission from the head, heart, stomach, blood, nerves, etc.: "Lo, here I am, looking for happiness and life in the body, but finding only an illusion, a blending of false claims, false pleasure, pain, sin, sickness, and death."

9. 260 : 24-7

स्वार्थ और संवेदना नश्वर मन में शिक्षित होते हैं, कभी किसी के स्वयं के प्रति आवर्ती विचारों से, शरीर के बारे में बातचीत से, और उससे सदा सुख या दर्द की अपेक्षा से; और यह शिक्षा आध्यात्मिक विकास की कीमत पर है। अगर हम नश्वर वेशभूषा में सोचते हैं, तो उसे अपनी अमर प्रकृति को खो देना चाहिए।

अगर हम शरीर को आनंद के लिए देखते हैं, तो हमें दर्द होता है; जीवन के लिए, हम मृत्यु को पाते हैं; सत्य के लिए, हम त्रुटि पाते हैं; आत्मा के लिए, हम इसके विपरीत, पदार्थ को पाते हैं। अब इस क्रिया को उल्टा कर दें। सत्य और प्रेम में शरीर से दूर देखो, सभी खुशी, सद्भाव और अमरता का सिद्धांत। धीरज, अच्छे और सच्चे विचार को दृढ़ता से पकड़ें, और आप अपने अनुभवों के अनुपात में इन्हें अपने अनुभव में लाएंगे।

9. 260 : 24-7

Selfishness and sensualism are educated in mortal mind by the thoughts ever recurring to one's self, by conversation about the body, and by the expectation of perpetual pleasure or pain from it; and this education is at the expense of spiritual growth. If we array thought in mortal vestures, it must lose its immortal nature.

If we look to the body for pleasure, we find pain; for Life, we find death; for Truth, we find error; for Spirit, we find its opposite, matter. Now reverse this action. Look away from the body into Truth and Love, the Principle of all happiness, harmony, and immortality. Hold thought steadfastly to the enduring, the good, and the true, and you will bring these into your experience proportionably to their occupancy of your thoughts.

10. 306 : 30-6

आध्यात्मिक रूप से बनाया गया ईश्वर का मनुष्य भौतिक और नश्वर नहीं है।

सभी मानव कलह के जनक एडम-स्वप्न थे, गहरी नींद, जिसमें इस भ्रम की उत्पत्ति हुई कि जीवन और बुद्धिमत्ता किस पदार्थ से आगे बढ़ी और गुजर गई। यह नास्तिक त्रुटि, या तथाकथित नाग, अभी भी सत्य के विपरीत पर जोर देता है, कह रहा है, “तुम परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे;” इसका मतलब है, मैं सत्य के रूप में वास्तविक और शाश्वत के रूप में त्रुटि करूंगा।

10. 306 : 30-6

God's man, spiritually created, is not material and mortal.

The parent of all human discord was the Adam-dream, the deep sleep, in which originated the delusion that life and intelligence proceeded from and passed into matter. This pantheistic error, or so-called serpent, insists still upon the opposite of Truth, saying, "Ye shall be as gods;" that is, I will make error as real and eternal as Truth.

11. 529 : 21-6

दिव्य प्रेम के बच्चों को लुभाने के लिए नागिन एक झूठ बोल रही है? सर्प केवल रूपक में प्रवेश करता है बुराई के रूप में। हमारे पास जानवरों के साम्राज्य में कुछ भी नहीं है जो वर्णित प्रजातियों का प्रतिनिधित्व करता है, - एक बात कर रहे नाग, - और उस बुराई को फिर से खुश करना चाहिए, जो भी आंकड़ा प्रस्तुत किया गया है, वह खुद को विरोधाभास करता है और न तो उसकी उत्पत्ति होती है और न ही सत्य और अच्छे में समर्थन। यह देखकर, हमें बुराई के सभी दावों से लड़ने के लिए विश्वास होना चाहिए, क्योंकि हम जानते हैं कि वे बेकार और असत्य हैं।

एडम, त्रुटि का पर्याय, भौतिक मन की धारणा के लिए खड़ा है। वह कुछ हद तक आदमी पर अपना शासन शुरू करता है, लेकिन वह झूठ में बढ़ जाता है और उसके दिन छोटे हो जाते हैं। इस विकास में, सत्य के अमर, आध्यात्मिक नियम को नश्वर, भौतिक अर्थ के विपरीत हमेशा के लिए प्रकट कर दिया जाता है।

दिव्य विज्ञान में, मनुष्य ईश्वर के द्वारा कायम है,होने का दिव्य सिद्धांत।

11. 529 : 21-6

Whence comes a talking, lying serpent to tempt the children of divine Love? The serpent enters into the metaphor only as evil. We have nothing in the animal kingdom which represents the species described, — a talking serpent, — and should rejoice that evil, by whatever figure presented, contradicts itself and has neither origin nor support in Truth and good. Seeing this, we should have faith to fight all claims of evil, because we know that they are worthless and unreal.

Adam, the synonym for error, stands for a belief of material mind. He begins his reign over man somewhat mildly, but he increases in falsehood and his days become shorter. In this development, the immortal, spiritual law of Truth is made manifest as forever opposed to mortal, material sense.

In divine Science, man is sustained by God, the divine Principle of being.

12. 323 : 19-27

जब बीमार या पापी अपनी आवश्यकता को महसूस करने के लिए जागते हैं, तो वे दिव्य विज्ञान के प्रति ग्रहणशील होंगे, जो जीवात्मा की ओर और भौतिक अर्थ से दूर, शरीर से विचार को हटाता है, और यहां तक कि मन को भी चिंतन के स्तर तक बढ़ा देता है। कुछ बात बीमारी या पाप से बेहतर है। भगवान का सही विचार जीवन और प्रेम की सच्ची समझ देता है, जीत की कब्र को लूटता है, सभी पाप और भ्रम को दूर करता है कि अन्य मन हैं, और मृत्यु दर को नष्ट कर देते हैं।

12. 323 : 19-27

When the sick or the sinning awake to realize their need of what they have not, they will be receptive of divine Science, which gravitates towards Soul and away from material sense, removes thought from the body, and elevates even mortal mind to the contemplation of something better than disease or sin. The true idea of God gives the true understanding of Life and Love, robs the grave of victory, takes away all sin and the delusion that there are other minds, and destroys mortality.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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