रविवार 10 दिसंबर, 2023



विषयभगवान मनुष्य के संरक्षक हैं

SubjectGod The Preserver Of Man

वर्ण पाठ: भजन संहिता 16: 1

"हेईश्वर मेरी रक्षा कर, क्योंकि मैं तेरा ही शरणागत हूं।"



Golden Text: Psalm 16 : 1

Preserve me, O God: for in thee do I put my trust.”




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भजन संहिता 16: 5-9, 11


5     यहोवा मेरा भाग और मेरे कटोरे का हिस्सा है; मेरे बाट को तू स्थिर रखता है।

6     मेरे लिये माप की डोरी मनभावने स्थान में पड़ी, और मेरा भाग मनभावना है॥

7     मैं यहोवा को धन्य कहता हूं, क्योंकि उसने मुझे सम्मत्ति दी है; वरन मेरा मन भी रात में मुझे शिक्षा देता है।

8     मैं ने यहोवा को निरन्तर अपने सम्मुख रखा है: इसलिये कि वह मेरे दाहिने हाथ रहता है मैं कभी न डगमगाऊंगा॥

9     इस कारण मेरा हृदय आनन्दित और मेरी आत्मा मगन हुई; मेरा शरीर भी चैन से रहेगा।

11     तू मुझे जीवन का रास्ता दिखाएगा; तेरे निकट आनन्द की भरपूरी है, तेरे दाहिने हाथ में सुख सर्वदा बना रहता है॥

Responsive Reading: Psalm 16 : 5-9, 11

5.     The Lord is the portion of mine inheritance and of my cup: thou maintainest my lot.

6.     The lines are fallen unto me in pleasant places; yea, I have a goodly heritage.

7.     I will bless the Lord, who hath given me counsel: my reins also instruct me in the night seasons.

8.     I have set the Lord always before me: because he is at my right hand, I shall not be moved.

9.     Therefore my heart is glad, and my glory rejoiceth: my flesh also shall rest in hope.

11.     Thou wilt shew me the path of life: in thy presence is fulness of joy; at thy right hand there are pleasures for evermore.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. निर्गमन 20: 2, 3

2     कि मैं तेरा परमेश्वर यहोवा हूं, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात मिस्र देश से निकाल लाया है॥

3     तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना॥

1. Exodus 20 : 2, 3

2     I am the Lord thy God, which have brought thee out of the land of Egypt, out of the house of bondage.

3     Thou shalt have no other gods before me.

2. भजन संहिता 78: 1, 2 (से 1st:), 4 (पर प्रगट होने), 5, 7, 8, 10, 11, 19, 22-25 (से :), 32, 33, 34 (तब)-38 (से 3rd,), 39

1     हे मेरे लोगों, मेरी शिक्षा सुनो; मेरे वचनों की ओर कान लगाओ!

2     मैं अपना मूंह नीतिवचन कहने के लिये खोलूंगा।

4     ... होनहार पीढ़ी के लोगों से, यहोवा का गुणानुवाद और उसकी सामर्थ और आश्चर्यकर्मों का वर्णन करेंगें॥

5     उसने तो याकूब में एक चितौनी ठहराई, और इस्त्राएल में एक व्यवस्था चलाई, जिसके विषय उसने हमारे पितरों को आज्ञा दी, कि तुम इन्हे अपने अपने लड़के बालों को बताना।

7     और ईश्वर के बड़े कामों को भूल न जाएं, परन्तु उसकी आज्ञाओं का पालन करते रहें।

8     और अपने पितरों के समान न हों, क्योंकि उस पीढ़ी के लोग तो हठीले और झगड़ालू थे, और उन्होंने अपना मन स्थिर न किया था, और न उनकी आत्मा ईश्वर की ओर सच्ची रही॥

10     उन्होंने परमेश्वर की वाचा पूरी नहीं की, और उसकी व्यवस्था पर चलने से इनकार किया।

11     उन्होंने उसके बड़े कामों को और जो आश्चर्यकर्म उसने उनके साम्हने किए थे, उन को भुला दिया।

19     वे परमेश्वर के विरुद्ध बोले, और कहने लगे, क्या ईश्वर जंगल में मेज लगा सकता है?

22     इसलिए कि उन्होंने परमेश्वर पर विश्वास नहीं रखा था, न उसकी उद्धार करने की शक्ति पर भरोसा किया।

23     तौभी उसने आकाश को आज्ञा दी, और स्वर्ग के द्वारों को खोला;

24     और उनके लिये खाने को मन्ना बरसाया, और उन्हे स्वर्ग का अन्न दिया।

25     उन को शूरवीरों की सी रोटी मिली।

32     इतने पर भी वे और अधिक पाप करते गए; और परमेश्वर के आश्चर्यकर्मों की प्रतीति न की।

33     तब उसने उनके दिनों को व्यर्थ श्रम में, और उनके वर्षों को घबराहट में कटवाया।

34     ... फिरकर ईश्वर को यत्न से खोजते थे।

35     और उन को स्मरण होता था कि परमेश्वर हमारी चट्टान है, और परमप्रधान ईश्वर हमारा छुड़ाने वाला है।

36     तौभी उन्होंने उससे चापलूसी की; वे उससे झूठ बोले।

37     क्योंकि उनका हृदय उसकी ओर दृढ़ न था; न वे उसकी वाचा के विषय सच्चे थे।

38     परन्तु वह जो दयालु है, वह अधर्म को ढांपता, और नाश नहीं करता।

39     उसको स्मरण हुआ कि ये नाशमान हैं, ये वायु के समान हैं जो चली जाती और लौट नहीं आती।

2. Psalm 78 : 1, 2 (to 1st :), 4 (shewing), 5, 7, 8, 10, 11, 19,

22-25 (to :), 32, 33, 34 (then)-38 (to 3rd ,), 39

1     Give ear, O my people, to my law: incline your ears to the words of my mouth.

2     I will open my mouth in a parable:

4     …shewing to the generation to come the praises of the Lord, and his strength, and his wonderful works that he hath done.

5     For he established a testimony in Jacob, and appointed a law in Israel, which he commanded our fathers, that they should make them known to their children:

7     That they might set their hope in God, and not forget the works of God, but keep his commandments:

8     And might not be as their fathers, a stubborn and rebellious generation; a generation that set not their heart aright, and whose spirit was not stedfast with God.

10     They kept not the covenant of God, and refused to walk in his law;

11     And forgat his works, and his wonders that he had shewed them.

19     Yea, they spake against God; they said, Can God furnish a table in the wilderness?

22     Because they believed not in God, and trusted not in his salvation:

23     Though he had commanded the clouds from above, and opened the doors of heaven,

24     And had rained down manna upon them to eat, and had given them of the corn of heaven.

25     Man did eat angels’ food:

32     For all this they sinned still, and believed not for his wondrous works.

33     Therefore their days did he consume in vanity, and their years in trouble.

34     …then they sought him: and they returned and inquired early after God.

35     And they remembered that God was their rock, and the high God their redeemer.

36     Nevertheless they did flatter him with their mouth, and they lied unto him with their tongues.

37     For their heart was not right with him, neither were they stedfast in his covenant.

38     But he, being full of compassion, forgave their iniquity,

39     For he remembered that they were but flesh; a wind that passeth away, and cometh not again.

3. होशे 4: 1

1     हेइस्राएलियों, यहोवा का वचन सुनो; इस देश के निवासियों के साथ यहोवा का मुकद्दमा है। इस देश में न तो कुछ सच्चाई है, न कुछ करूणा और न कुछ परमेश्वर का ज्ञान ही है।

3. Hosea 4 : 1

1     Hear the word of the Lord, ye children of Israel: for the Lord hath a controversy with the inhabitants of the land, because there is no truth, nor mercy, nor knowledge of God in the land.

4. होशे 14: 1, 2 (यहोवा) (से 2nd :), 4 (से:)

1     हेइस्राएल, अपने परमेश्वर यहोवा के पास लौट आ, क्योंकि तू ने अपने अधर्म के कारण ठोकर खाई है।

2     ... यहोवा की ओर फिर कर, उस से कह, सब अधर्म दूर कर; अनुग्रह से हम को ग्रहण कर; तब हम धन्यवाद रूपी बलि चढ़ाएंगे।

4     मैं उनकी भटक जाने की आदत को दूर करूंगा; मैं सेंतमेंत उन से प्रेम करूंगा, क्योंकि मेरा क्रोध उन पर से उतर गया है।

4. Hosea 14 : 1, 2 (turn) (to 2nd :), 4 (to :)

1     O Israel, return unto the Lord thy God; for thou hast fallen by thine iniquity.

2     …turn to the Lord: say unto him, Take away all iniquity, and receive us graciously:

4     I will heal their backsliding, I will love them freely:

5. नीतिवचन 3: 1, 2, 5, 6, 23, 24 (से:), 26 (से,)

1     हेमेरे पुत्र, मेरी शिक्षा को न भूलना; अपने हृदय में मेरी आज्ञाओं को रखे रहना।

2     क्योंकि ऐसा करने से तेरी आयु बढ़ेगी, और तू अधिक कुशल से रहेगा।

5     तू अपनी समझ का सहारा न लेना, वरन सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना।

6     उसी को स्मरण करके सब काम करना, तब वह तेरे लिये सीधा मार्ग निकालेगा।

23     और तू अपने मार्ग पर निडर चलेगा, और तेरे पांव में ठेस न लगेगी।

24     जब तू लेटेगा, तब भय न खाएगा, जब तू लेटेगा, तब सुख की नींद आएगी।

26     क्योंकि यहोवा तुझे सहारा दिया करेगा, और तेरे पांव को फन्दे में फंसने न देगा।

5. Proverbs 3 : 1, 2, 5, 6, 23, 24 (to :), 26 (to ,)

1     My son, forget not my law; but let thine heart keep my commandments:

2     For length of days, and long life, and peace, shall they add to thee.

5     Trust in the Lord with all thine heart; and lean not unto thine own understanding.

6     In all thy ways acknowledge him, and he shall direct thy paths.

23     Then shalt thou walk in thy way safely, and thy foot shall not stumble.

24     When thou liest down, thou shalt not be afraid:

26     For the Lord shall be thy confidence,

6. नीतिवचन 2: 8

8     वह न्याय के पथों की देख भाल करता, और अपने भक्तों के मार्ग की रक्षा करता है।

6. Proverbs 2 : 8

8     He keepeth the paths of judgment, and preserveth the way of his saints.

7. भजन संहिता 121: 5, 7

5     यहोवा तेरा रक्षक है; यहोवा तेरी दाहिनी ओर तेरी आड़ है।

7     यहोवा सारी विपत्ति से तेरी रक्षा करेगा; वह तेरे प्राण की रक्षा करेगा।

7. Psalm 121 : 5, 7

5     The Lord is thy keeper: the Lord is thy shade upon thy right hand.

7     The Lord shall preserve thee from all evil: he shall preserve thy soul.

8. यूहन्ना 13: 1-5, 11-15, 31 (अब), 34

1     फसह के पर्व से पहिले जब यीशु ने जान लिया, कि मेरी वह घड़ी आ पहुंची है कि जगत छोड़कर पिता के पास जाऊं, तो अपने लोगों से, जो जगत में थे, जैसा प्रेम वह रखता था, अन्त तक वैसा ही प्रेम रखता रहा।

2     और जब शैतान शमौन के पुत्र यहूदा इस्करियोती के मन में यह डाल चुका था, कि उसे पकड़वाए, तो भोजन के समय।

3     यीशु ने यह जानकर कि पिता ने सब कुछ मेरे हाथ में कर दिया है और मैं परमेश्वर के पास से आया हूं, और परमेश्वर के पास जाता हूं।

4     भोजन पर से उठकर अपने कपड़े उतार दिए, और अंगोछा लेकर अपनी कमर बान्धी।

5     तब बरतन में पानी भरकर चेलों के पांव धोने और जिस अंगोछे से उस की कमर बन्धी थी उसी से पोंछने लगा।

11     वह तो अपने पकड़वाने वाले को जानता था इसी लिये उस ने कहा, तुम सब के सब शुद्ध नहीं॥

12     जब वह उन के पांव धो चुका और अपने कपड़े पहिनकर फिर बैठ गया तो उन से कहने लगा, क्या तुम समझे कि मैं ने तुम्हारे साथ क्या किया?

13     तुम मुझे गुरू, और प्रभु, कहते हो, और भला कहते हो, क्योंकि मैं वही हूं।

14     यदि मैं ने प्रभु और गुरू होकर तुम्हारे पांव धोए; तो तुम्हें भी एक दुसरे के पांव धोना चाहिए।

15     क्योंकि मैं ने तुम्हें नमूना दिखा दिया है, कि जैसा मैं ने तुम्हारे साथ किया है, तुम भी वैसा ही किया करो।

31     जब वह बाहर चला गया तो यीशु ने कहा; अब मनुष्य पुत्र की महिमा हुई, और परमेश्वर की महिमा उस में हुई।

34     मै तुम्हें एक नई आज्ञा देता हूं, कि एक दूसरे से प्रेम रखो: जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा है, वैसा ही तुम भी एक दुसरे से प्रेम रखो।

8. John 13 : 1-5, 11-15, 31 (Now), 34

1     Now before the feast of the passover, when Jesus knew that his hour was come that he should depart out of this world unto the Father, having loved his own which were in the world, he loved them unto the end.

2     And supper being ended, the devil having now put into the heart of Judas Iscariot, Simon’s son, to betray him;

3     Jesus knowing that the Father had given all things into his hands, and that he was come from God, and went to God;

4     He riseth from supper, and laid aside his garments; and took a towel, and girded himself.

5     After that he poureth water into a bason, and began to wash the disciples’ feet, and to wipe them with the towel wherewith he was girded.

11     For he knew who should betray him; therefore said he, Ye are not all clean.

12     So after he had washed their feet, and had taken his garments, and was set down again, he said unto them, Know ye what I have done to you?

13     Ye call me Master and Lord: and ye say well; for so I am.

14     If I then, your Lord and Master, have washed your feet; ye also ought to wash one another’s feet.

15     For I have given you an example, that ye should do as I have done to you.

31     Now is the Son of man glorified, and God is glorified in him.

34     A new commandment I give unto you, That ye love one another; as I have loved you, that ye also love one another.

9. यूहन्ना 14: 6 (मैं हूँ), 23 (अगर) (से 2nd,)

6     मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता।

23     यदि कोई मुझ से प्रेम रखे, तो वह मेरे वचन को मानेगा, और मेरा पिता उस से प्रेम रखेगा।

9. John 14 : 6 (I am), 23 (If) (to 2nd ,)

6     I am the way, the truth, and the life: no man cometh unto the Father, but by me.

23     If a man love me, he will keep my words: and my Father will love him,

10. यूहन्ना 15: 9-12

9     जैसा पिता ने मुझ से प्रेम रखा, वैसा ही मैं ने तुम से प्रेम रखा, मेरे प्रेम में बने रहो।

10     यदि तुम मेरी आज्ञाओं को मानोगे, तो मेरे प्रेम में बने रहोगे: जैसा कि मैं ने अपने पिता की आज्ञाओं को माना है, और उसके प्रेम में बना रहता हूं।

11     मैं ने ये बातें तुम से इसलिये कही हैं, कि मेरा आनन्द तुम में बना रहे, और तुम्हारा आनन्द पूरा हो जाए।

12     मेरी आज्ञा यह है, कि जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो।

10. John 15 : 9-12

9     As the Father hath loved me, so have I loved you: continue ye in my love.

10     If ye keep my commandments, ye shall abide in my love; even as I have kept my Father’s commandments, and abide in his love.

11     These things have I spoken unto you, that my joy might remain in you, and that your joy might be full.

12     This is my commandment, That ye love one another, as I have loved you.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 340: 6 (“होने देना)-7 (से :), 10 (प्यार)-14

"... आइए सुनते हैं पूरे मामले का निष्कर्ष: परमेश्वर से प्रेम करो और उसकी आज्ञाओं का पालन करो: क्‍योंकि सारा मनुष्‍य अपने स्वरूप और समानता में यही है। ईश्वरीय प्रेम अनंत है। इसलिए जो कुछ भी वास्तव में मौजूद है वह ईश्वर में है और उनके प्रेम को प्रकट करता है।

1. 340 : 9-14

"Let us hear the conclusion of the whole matter: … love God and keep His commandments: for this is the whole of man in His image and likeness. Divine Love is infinite. Therefore all that really exists is in and of God, and manifests His love.

2. 308: 1-4

"... क्या आप इस विश्वास में निवास करते हैं कि मन भौतिक है, और यह बुराई मन है, या आप जीवित विश्वास में कला है कि एक ईश्वर है और उसकी आज्ञा रख सकता है?"

2. 308 : 1-4

“…Art thou dwelling in the belief that mind is in matter, and that evil is mind, or art thou in the living faith that there is and can be but one God, and keeping His commandment?"

3. 467: 3 (“तुम)-16

"दूसरों को ईश्वर करके न मानना॥" यह "मैं" आत्मा है। इसलिए आज्ञा का यह अर्थ है: आपके पास कोई बुद्धि नहीं है, कोई जीवन नहीं है, कोई पदार्थ नहीं है, कोई सत्य नहीं है, कोई प्रेम नहीं है, इसके अलावा जो आध्यात्मिक है। दूसरा उसके जैसा है, "तू अपने पड़ोसी से अपने जैसा प्रेम रखना।" यह अच्छी तरह समझा जाना चाहिए कि सभी पुरुषों का एक मन, एक ईश्वर और पिता, एक जीवन, सत्य और प्रेम होता है। यह तथ्य स्पष्ट होते ही मानव जाति अनुपात में परिपूर्ण हो जाएगी, युद्ध बंद हो जाएगा और मनुष्य का सच्चा भाईचारा स्थापित हो जाएगा। कोई अन्य देवता नहीं, कोई दूसरा नहीं, बल्कि एक ही मार्गदर्शक का मन, मनुष्य ईश्वर की समानता है, शुद्ध और शाश्वत है, और उसके पास वह मन है जो मसीह में भी था।

3. 467 : 3 (“Thou)-16

"Thou shalt have no other gods before me." This me is Spirit. Therefore the command means this: Thou shalt have no intelligence, no life, no substance, no truth, no love, but that which is spiritual. The second is like unto it, "Thou shalt love thy neighbor as thyself." It should be thoroughly understood that all men have one Mind, one God and Father, one Life, Truth, and Love. Mankind will become perfect in proportion as this fact becomes apparent, war will cease and the true brotherhood of man will be established. Having no other gods, turning to no other but the one perfect Mind to guide him, man is the likeness of God, pure and eternal, having that Mind which was also in Christ.

4. 286: 9-26

मास्टर ने कहा, "बिना मेरे द्वारा कोई पिता (होने का दिव्य सिद्धांत) के पास नहीं पहुंच सकता।" मसीह, जीवन, सत्य, प्रेम के बिना; क्योंकि मसीह कहता है: "मार्ग मैं हूं." इस मूल पुरुष, यीशु द्वारा पहले से लेकर आखिर तक शारीरिक कार्य को अलग रखा गया था। वह जानता था कि दिव्य सिद्धांत, प्रेम, वास्तविक सब कुछ बनाता और संचालित करता है।

सैक्सन और बीस अन्य जीभों में भगवान के लिए अच्छा शब्द है। पवित्रशास्त्र ने वह सब घोषित किया, जो उसने स्वयं के लिए अच्छा माना, जैसे - सिद्धांत में अच्छा और विचार में। इसलिए आध्यात्मिक ब्रह्मांड अच्छा है, और भगवान को दर्शाता है जैसे वह है।

ईश्वर के विचार परिपूर्ण और शाश्वत हैं, पदार्थ और जीवन हैं। भौतिक और लौकिक विचार मानव हैं, जिसमें त्रुटि है, और चूंकि भगवान, आत्मा, एकमात्र कारण है, उनके पास एक दिव्य कारण का अभाव है। लौकिक और भौतिक तत्त्व आत्मा की रचना नहीं हैं। वे आध्यात्मिक और शाश्वत के नकली हैं।

4. 286 : 9-26

The Master said, "No man cometh unto the Father [the divine Principle of being] but by me," Christ, Life, Truth, Love; for Christ says, "I am the way." Physical causation was put aside from first to last by this original man, Jesus. He knew that the divine Principle, Love, creates and governs all that is real.

In the Saxon and twenty other tongues good is the term for God. The Scriptures declare all that He made to be good, like Himself, — good in Principle and in idea. Therefore the spiritual uni-verse is good, and reflects God as He is.

God's thoughts are perfect and eternal, are substance and Life. Material and temporal thoughts are human, involving error, and since God, Spirit, is the only cause, they lack a divine cause. The temporal and material are not then creations of Spirit. They are but counterfeits of the spiritual and eternal.

5. 70: 6-9, 12-13

आत्मा एक ही है. मनुष्य कभी भी ईश्वर नहीं है, लेकिन आध्यात्मिक मनुष्य, ईश्वर की समानता में बना हुआ, ईश्वर को प्रतिबिंबित करता है। इस वैज्ञानिक चिंतन में अहंकार और पिता अविभाज्य हैं।

दिव्य मन सभी पहचानों को, घास के एक ब्लेड से लेकर एक तारे तक, विशिष्ट और शाश्वत के रूप में रखता है।

5. 70 : 6-9, 12-13

There is but one Spirit. Man is never God, but spiritual man, made in God's likeness, reflects God. In this scientific reflection the Ego and the Father are inseparable.

The divine Mind maintains all identities, from a blade of grass to a star, as distinct and eternal.

6. 151: 20-30

वास्तविक मनुष्य का प्रत्येक कार्य ईश्वरीय मन द्वारा संचालित होता है। मानव मन को मारने या ठीक करने की शक्ति नहीं है, और इसका परमेश्वर के मनुष्य पर कोई नियंत्रण नहीं है। जिस दिव्य मन ने मनुष्य को बनाया वह उसकी अपनी छवि और समानता को बनाए रखता है। मानव मन ईश्वर का विरोध करता है और इसे दूर किया जाना चाहिए, जैसा कि सेंट पॉल घोषित करते हैं। वह सब जो वास्तव में मौजूद है, वह है दिव्य मन और उसका विचार, और इस मन में संपूर्ण प्राणी सामंजस्यपूर्ण और शाश्वत पाया जाता है। सीधे और संकीर्ण तरीके से इस तथ्य को देखना और स्वीकार करना है, इस शक्ति से उपजें, और सच्चाई की अग्रणी का पालन करें।

6. 151 : 20-30

Every function of the real man is governed by the divine Mind. The human mind has no power to kill or to cure, and it has no control over God's man. The divine Mind that made man maintains His own image and likeness. The human mind is opposed to God and must be put off, as St. Paul declares. All that really exists is the divine Mind and its idea, and in this Mind the entire being is found harmonious and eternal. The straight and narrow way is to see and acknowledge this fact, yield to this power, and follow the leadings of truth.

7. 494: 5-11

क्या यह विश्वास करना बेवफाई की प्रजाति नहीं है कि मसीहा के रूप में इतना महान कार्य स्वयं या ईश्वर के लिए किया गया था, जिसे यीशु के उदाहरण से अनन्त सद्भाव को बनाए रखने के लिए किसी सहायता की आवश्यकता नहीं थी? लेकिन नश्वर लोगों को इस मदद की ज़रूरत थी, और यीशु ने उनके लिए रास्ता बताया। ईश्वरीय प्रेम हमेशा से मिला है और हमेशा हर मानवीय आवश्यकता को पूरा करेगा।

7. 494 : 5-11

Is it not a species of infidelity to believe that so great a work as the Messiah's was done for himself or for God, who needed no help from Jesus' example to preserve the eternal harmony? But mortals did need this help, and Jesus pointed the way for them. Divine Love always has met and always will meet every human need.

8. 25: 16-32

यीशु ने ईश्वर के आदर्श को किसी भी ऐसे व्यक्ति की तुलना में बेहतर प्रस्तुत किया जिसकी उत्पत्ति कम आध्यात्मिक थी। परमेश्वर की आज्ञाकारिता के द्वारा, उसने आध्यात्मिक रूप से सभी दूसरों के सिद्धांत का प्रदर्शन किया। अत: उसके पालन की शक्ति, "यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे।"

यद्यपि पाप और बीमारी पर अपने नियंत्रण का प्रदर्शन, किसी भी तरह से महान शिक्षक ने दूसरों को अपने स्वयं के पवित्रता के अपेक्षित प्रमाण देने से राहत नहीं दी। उन्होंने उनके मार्गदर्शन के लिए काम किया, ताकि वे इस शक्ति का प्रदर्शन कर सकें, जैसा कि उन्होंने किया और इसके दिव्य सिद्धांत को समझा। शिक्षक के प्रति विश्वास और सभी भावनात्मक प्रेम हम उस पर पूरा कर सकते हैं, कभी भी हमें उसका अनुकरण करने वाला नहीं बनाएंगे। हमें इसी तरह से जाना चाहिए और करना चाहिए, अन्यथा हम उन महान आशीषों में सुधार नहीं कर रहे हैं जो हमारे मास्टर ने काम किया था और हमारे लिए सबसे अच्छा था। मसीह की दिव्यता को यीशु की मानवता में प्रकट किया गया था।

8. 25 : 16-32

Jesus presented the ideal of God better than could any man whose origin was less spiritual. By his obedience to God, he demonstrated more spiritually than all others the Principle of being. Hence the force of his admonition, "If ye love me, keep my commandments."

Though demonstrating his control over sin and disease, the great Teacher by no means relieved others from giving the requisite proofs of their own piety. He worked for their guidance, that they might demonstrate this power as he did and understand its divine Principle. Implicit faith in the Teacher and all the emotional love we can bestow on him, will never alone make us imitators of him. We must go and do likewise, else we are not improving the great blessings which our Master worked and suffered to bestow upon us. The divinity of the Christ was made manifest in the humanity of Jesus.

9. 4: 3-16

हमें सबसे अधिक जरूरत है, अनुग्रह में वृद्धि, धैर्य, नम्रता, प्रेम, और अच्छे कार्यों में व्यक्त की गई इच्छा की प्रार्थना। हमारे मास्टर की आज्ञाओं को रखने के लिए और उनके उदाहरण का पालन करने के लिए, क्या वह हमारे लिए उचित ऋण है और उसने जो कुछ भी किया है, उसके लिए हमारी कृतज्ञता का एकमात्र योग्य प्रमाण है। बाहरी पूजा स्वयं के प्रति वफादार और हार्दिक आभार व्यक्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि उसने कहा है: "यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे।"

हमेशा अच्छा रहने की आदतन संघर्ष एक दैनिक प्रार्थना है। इसका मकसद उनके द्वारा लाए गए आशीर्वाद में प्रकट होना है, — वह आशीर्वाद, जो भले ही श्रव्य शब्दों में स्वीकार नहीं किया जाता है, हमारी योग्यता को प्यार का भागीदार बनाते हैं।

9. 4 : 3-16

What we most need is the prayer of fervent desire for growth in grace, expressed in patience, meekness, love, and good deeds. To keep the commandments of our Master and follow his example, is our proper debt to him and the only worthy evidence of our gratitude for all that he has done. Outward worship is not of itself sufficient to express loyal and heartfelt gratitude, since he has said: "If ye love me, keep my commandments."

The habitual struggle to be always good is unceasing prayer. Its motives are made manifest in the blessings they bring, — blessings which, even if not acknowledged in audible words, attest our worthiness to be partakers of Love.

10. 55: 16-26

मेरी थकी हुई आशा उस सुखद दिन को महसूस करने की कोशिश करती है, जब मनुष्य मसीह के विज्ञान को पहचान लेगा और अपने पड़ोसी को अपने जैसा प्यार करेगा, — जब वह ईश्वर की सर्वशक्तिमानता और उस परमात्मा की उपचार शक्ति का एहसास करेगा जो उसने किया है और मानव जाति के लिए कर रहा है। वादे पूरे होंगे। दिव्य चिकित्सा के प्रकट होने का समय हर समय है; और जो कोई भी दिव्य विज्ञान की वेदी पर अपने सांसारिक स्तर को रखता है, अब मसीह के प्याले को पीता है, और वह ईसाई उपचार की भावना और शक्ति से संपन्न है।

10. 55 : 16-26

My weary hope tries to realize that happy day, when man shall recognize the Science of Christ and love his neighbor as himself, — when he shall realize God's omnipotence and the healing power of the divine Love in what it has done and is doing for mankind. The promises will be fulfilled. The time for the reappearing of the divine healing is throughout all time; and whosoever layeth his earthly all on the altar of divine Science, drinketh of Christ's cup now, and is endued with the spirit and power of Christian healing.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6