रविवार 1 मार्च, 2020 |

रविवार 1 मार्च, 2020



विषयमसीह यीश

SubjectChrist Jesus

वर्ण पाठ: यूहन्ना 12 : 46

मैं जगत में ज्योति होकर आया हूं ताकि जो कोई मुझ पर विश्वास करे, वह अन्धकार में न रहे।”— मसीह यीशु



Golden Text: John 12 : 46

I am come a light into the world, that whosoever believeth on me should not abide in darkness.”— Christ Jesus




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यूहन्ना 3 : 16-21


16     क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।

17     परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिये नहीं भेजा, कि जगत पर दंड की आज्ञा दे परन्तु इसलिये कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए।

18     जो उस पर विश्वास करता है, उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती, परन्तु जो उस पर विश्वास नहीं करता, वह दोषी ठहर चुका; इसलिये कि उस ने परमेश्वर के एकलौते पुत्र के नाम पर विश्वास नहीं किया।

19     और दंड की आज्ञा का कारण यह है कि ज्योति जगत में आई है, और मनुष्यों ने अन्धकार को ज्योति से अधिक प्रिय जाना क्योंकि उन के काम बुरे थे।

20     क्योंकि जो कोई बुराई करता है, वह ज्योति से बैर रखता है, और ज्योति के निकट नहीं आता, ऐसा न हो कि उसके कामों पर दोष लगाया जाए।

21     परन्तु जो सच्चाई पर चलता है वह ज्योति के निकट आता है, ताकि उसके काम प्रगट हों, कि वह परमेश्वर की ओर से किए गए हैं।

Responsive Reading: John 3 : 16-21

16.     For God so loved the world, that he gave his only begotten Son, that whosoever believeth in him should not perish, but have everlasting life.

17.     For God sent not his Son into the world to condemn the world; but that the world through him might be saved.

18.     He that believeth on him is not condemned: but he that believeth not is condemned already, because he hath not believed in the name of the only begotten Son of God.

19.     And this is the condemnation, that light is come into the world, and men loved darkness rather than light, because their deeds were evil.

20.     For every one that doeth evil hateth the light, neither cometh to the light, lest his deeds should be reproved.

21.     But he that doeth truth cometh to the light, that his deeds may be made manifest, that they are wrought in God.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. लूका 2 : 14

14     कि आकाश में परमेश्वर की महिमा और पृथ्वी पर उन मनुष्यों में जिनसे वह प्रसन्न है शान्ति हो॥

1. Luke 2 : 14

14     Glory to God in the highest, and on earth peace, good will toward men.

2. यशायाह 11 : 1-5

1     तब यिशै के ठूंठ में से एक डाली फूट निकलेगी और उसकी जड़ में से एक शाखा निकल कर फलवन्त होगी।

2     और यहोवा की आत्मा, बुद्धि और समझ की आत्मा, युक्ति और पराक्रम की आत्मा, और ज्ञान और यहोवा के भय की आत्मा उस पर ठहरी रहेगी।

3     ओर उसको यहोवा का भय सुगन्ध सा भाएगा॥ वह मुंह देखा न्याय न करेगा और न अपने कानों के सुनने के अनुसार निर्णय करेगा;

4     परन्तु वह कंगालों का न्याय धर्म से, और पृथ्वी के नम्र लोगों का निर्णय खराई से करेगा; और वह पृथ्वी को अपने वचन के सोंटे से मारेगा, और अपने फूंक के झोंके से दुष्ट को मिटा डालेगा।

5     उसकी कटि का फेंटा धर्म और उसकी कमर का फेंटा सच्चाई होगी॥

2. Isaiah 11 : 1-5

1     And there shall come forth a rod out of the stem of Jesse, and a Branch shall grow out of his roots:

2     And the spirit of the Lord shall rest upon him, the spirit of wisdom and understanding, the spirit of counsel and might, the spirit of knowledge and of the fear of the Lord;

3     And shall make him of quick understanding in the fear of the Lord: and he shall not judge after the sight of his eyes, neither reprove after the hearing of his ears:

4     But with righteousness shall he judge the poor, and reprove with equity for the meek of the earth: and he shall smite the earth with the rod of his mouth, and with the breath of his lips shall he slay the wicked.

5     And righteousness shall be the girdle of his loins, and faithfulness the girdle of his reins.

3. मत्ती 9 : 35

35     और यीशु सब नगरों और गांवों में फिरता रहा और उन की सभाओं में उपदेश करता, और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और हर प्रकार की बीमारी और दुर्बलता को दूर करता रहा।

3. Matthew 9 : 35

35     And Jesus went about all the cities and villages, teaching in their synagogues, and preaching the gospel of the kingdom, and healing every sickness and every disease among the people.

4. मत्ती 10 : 1, 5-8, 16-20, 34-39

1     फिर उस ने अपने बारह चेलों को पास बुलाकर, उन्हें अशुद्ध आत्माओं पर अधिकार दिया, कि उन्हें निकालें और सब प्रकार की बीमारियों और सब प्रकार की दुर्बलताओं को दूर करें॥

5     इन बारहों को यीशु ने यह आज्ञा देकर भेजा कि अन्यजातियों की ओर न जाना, और सामरियों के किसी नगर में प्रवेश न करना।

6     परन्तु इस्राएल के घराने ही की खोई हुई भेड़ों के पास जाना।

7     और चलते चलते प्रचार कर कहो कि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।

8     बीमारों को चंगा करो: मरे हुओं को जिलाओ: कोढिय़ों को शुद्ध करो: दुष्टात्माओं को निकालो: तुम ने सेंतमेंत पाया है, सेंतमेंत दो।

16     देखो, मैं तुम्हें भेड़ों की नाईं भेडिय़ों के बीच में भेजता हूं सो सांपों की नाईं बुद्धिमान और कबूतरों की नाईं भोले बनो।

17     परन्तु लोगों से सावधान रहो, क्योंकि वे तुम्हें महासभाओं में सौपेंगे, और अपनी पंचायत में तुम्हें कोड़े मारेंगे।

18     तुम मेरे लिये हाकिमों ओर राजाओं के साम्हने उन पर, और अन्यजातियों पर गवाह होने के लिये पहुंचाए जाओगे।

19     जब वे तुम्हें पकड़वाएंगे तो यह चिन्ता न करना, कि हम किस रीति से; या क्या कहेंगे: क्योंकि जो कुछ तुम को कहना होगा, वह उसी घड़ी तुम्हें बता दिया जाएगा।

20     क्योंकि बोलने वाले तुम नहीं हो परन्तु तुम्हारे पिता का आत्मा तुम में बोलता है।

34     यह न समझो, कि मैं पृथ्वी पर मिलाप कराने को आया हूं; मैं मिलाप कराने को नहीं, पर तलवार चलवाने आया हूं।

35     मैं तो आया हूं, कि मनुष्य को उसके पिता से, और बेटी को उस की मां से, और बहू को उस की सास से अलग कर दूं।

36     मनुष्य के बैरी उसके घर ही के लोग होंगे।

37     जो माता या पिता को मुझ से अधिक प्रिय जानता है, वह मेरे योग्य नहीं और जो बेटा या बेटी को मुझ से अधिक प्रिय जानता है, वह मेरे योग्य नहीं।

38     और जो अपना क्रूस लेकर मेरे पीछे न चले वह मेरे योग्य नहीं।

39     जो अपने प्राण बचाता है, वह उसे खोएगा; और जो मेरे कारण अपना प्राण खोता है, वह उसे पाएगा।

4. Matthew 10 : 1, 5-8, 16-20, 34-39

1     And when he had called unto him his twelve disciples, he gave them power against unclean spirits, to cast them out, and to heal all manner of sickness and all manner of disease.

5     These twelve Jesus sent forth, and commanded them, saying, Go not into the way of the Gentiles, and into any city of the Samaritans enter ye not:

6     But go rather to the lost sheep of the house of Israel.

7     And as ye go, preach, saying, The kingdom of heaven is at hand.

8     Heal the sick, cleanse the lepers, raise the dead, cast out devils: freely ye have received, freely give.

16     Behold, I send you forth as sheep in the midst of wolves: be ye therefore wise as serpents, and harmless as doves.

17     But beware of men: for they will deliver you up to the councils, and they will scourge you in their synagogues;

18     And ye shall be brought before governors and kings for my sake, for a testimony against them and the Gentiles.

19     But when they deliver you up, take no thought how or what ye shall speak: for it shall be given you in that same hour what ye shall speak.

20     For it is not ye that speak, but the Spirit of your Father which speaketh in you.

34     Think not that I am come to send peace on earth: I came not to send peace, but a sword.

35     For I am come to set a man at variance against his father, and the daughter against her mother, and the daughter in law against her mother in law.

36     And a man’s foes shall be they of his own household.

37     He that loveth father or mother more than me is not worthy of me: and he that loveth son or daughter more than me is not worthy of me.

38     And he that taketh not his cross, and followeth after me, is not worthy of me.

39     He that findeth his life shall lose it: and he that loseth his life for my sake shall find it.

5. मत्ती 11 : 2-6, 28, 29

2     यूहन्ना ने बन्दीगृह में मसीह के कामों का समाचार सुनकर अपने चेलों को उस से यह पूछने भेजा।

3     कि क्या आनेवाला तू ही है: या हम दूसरे की बाट जोहें?

4     यीशु ने उत्तर दिया, कि जो कुछ तुम सुनते हो और देखते हो, वह सब जाकर यूहन्ना से कह दो।

5     कि अन्धे देखते हैं और लंगड़े चलते फिरते हैं; कोढ़ी शुद्ध किए जाते हैं और बहिरे सुनते हैं, मुर्दे जिलाए जाते हैं; और कंगालों को सुसमाचार सुनाया जाता है।

6     और धन्य है वह, जो मेरे कारण ठोकर न खाए।

28     हे सब परिश्रम करने वालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूंगा।

29     मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो; और मुझ से सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूं: और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे।

5. Matthew 11 : 2-6, 28, 29

2     Now when John had heard in the prison the works of Christ, he sent two of his disciples,

3     And said unto him, Art thou he that should come, or do we look for another?

4     Jesus answered and said unto them, Go and shew John again those things which ye do hear and see:

5     The blind receive their sight, and the lame walk, the lepers are cleansed, and the deaf hear, the dead are raised up, and the poor have the gospel preached to them.

6     And blessed is he, whosoever shall not be offended in me.

28     Come unto me, all ye that labour and are heavy laden, and I will give you rest.

29     Take my yoke upon you, and learn of me; for I am meek and lowly in heart: and ye shall find rest unto your souls.

6. मत्ती 12 : 14, 15

14     तब फरीसियों ने बाहर जाकर उसके विरोध में सम्मति की, कि उसे किस प्रकार नाश करें?

15     यह जानकर यीशु वहां से चला गया; और बहुत लोग उसके पीछे हो लिये; और उस ने सब को चंगा किया।

6. Matthew 12 : 14, 15

14     Then the Pharisees went out, and held a council against him, how they might destroy him.

15     But when Jesus knew it, he withdrew himself from thence: and great multitudes followed him, and he healed them all;

7. मत्ती 21 : 12-16, 31 (वास्तव में)

12     यीशु ने परमेश्वर के मन्दिर में जाकर, उन सब को, जो मन्दिर में लेन देन कर रहे थे, निकाल दिया; और सर्राफों के पीढ़े और कबूतरों के बेचने वालों की चौकियां उलट दीं।

13     और उन से कहा, लिखा है, कि मेरा घर प्रार्थना का घर कहलाएगा; परन्तु तुम उसे डाकुओं की खोह बनाते हो।

14     और अन्धे और लंगड़े, मन्दिर में उसके पास लाए, और उस ने उन्हें चंगा किया।

15     परन्तु जब महायाजकों और शास्त्रियों ने इन अद्भुत कामों को, जो उस ने किए, और लड़कों को मन्दिर में दाऊद की सन्तान को होशाना पुकारते हुए देखा, तो क्रोधित होकर उस से कहने लगे, क्या तू सुनता है कि ये क्या कहते हैं?

16     यीशु ने उन से कहा, हां; क्या तुम ने यह कभी नहीं पढ़ा, कि बालकों और दूध पीते बच्चों के मुंह से तु ने स्तुति सिद्ध कराई?

31     यीशु ने उन से कहा, मैं तुम से सच कहता हूं, कि महसूल लेने वाले और वेश्या तुम से पहिले परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करते हैं।

7. Matthew 21 : 12-16, 31 (Verily)

12     And Jesus went into the temple of God, and cast out all them that sold and bought in the temple, and overthrew the tables of the moneychangers, and the seats of them that sold doves,

13     And said unto them, It is written, My house shall be called the house of prayer; but ye have made it a den of thieves.

14     And the blind and the lame came to him in the temple; and he healed them.

15     And when the chief priests and scribes saw the wonderful things that he did, and the children crying in the temple, and saying, Hosanna to the Son of David; they were sore displeased,

16     And said unto him, Hearest thou what these say? And Jesus saith unto them, Yea; have ye never read, Out of the mouth of babes and sucklings thou hast perfected praise?

31     Verily I say unto you, That the publicans and the harlots go into the kingdom of God before you.

8. यूहन्ना 14 : 27

27     मैं तुम्हें शान्ति दिए जाता हूं, अपनी शान्ति तुम्हें देता हूं; जैसे संसार देता है, मैं तुम्हें नहीं देता: तुम्हारा मन न घबराए और न डरे।

8. John 14 : 27

27     Peace I leave with you, my peace I give unto you: not as the world giveth, give I unto you. Let not your heart be troubled, neither let it be afraid.

9. यूहन्ना 16 : 33

33     मैं ने ये बातें तुम से इसलिये कही हैं, कि तुम्हें मुझ में शान्ति मिले; संसार में तुम्हें क्लेश होता है, परन्तु ढाढ़स बांधो, मैं ने संसार को जीन लिया है॥

9. John 16 : 33

33     These things I have spoken unto you, that in me ye might have peace. In the world ye shall have tribulation: but be of good cheer; I have overcome the world.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 40 : 31-7

ईसाई धर्म की प्रकृति शांतिपूर्ण और धन्य है, लेकिन राज्य में प्रवेश करने के लिए, आशा के लंगर को शकीना में सामग्री के घूंघट से परे डाल दिया जाना चाहिए जिसमें यीशु हमारे जाने से पहले चला गया है; और सामग्री से परे यह उन्नति धर्मियों की खुशियों और विजय के साथ-साथ उनके दुखों और कष्टों से भी होनी चाहिए। अपने गुरु की तरह, हमें भौतिक अर्थों में होने के आध्यात्मिक अर्थ से प्रस्थान करना चाहिए।

1. 40 : 31-7

The nature of Christianity is peaceful and blessed, but in order to enter into the kingdom, the anchor of hope must be cast beyond the veil of matter into the Shekinah into which Jesus has passed before us; and this advance beyond matter must come through the joys and triumphs of the righteous as well as through their sorrows and afflictions. Like our Master, we must depart from material sense into the spiritual sense of being.

2. 19 : 12-16

मास्टर ने पूरी सच्चाई नहीं बोलने के लिए मना किया, यह घोषित करते हुए कि क्या बीमारी, पाप और मृत्यु को नष्ट कर देगा, हालांकि उनके शिक्षण ने घरों में विचरण किया, और भौतिक विश्वासों को शांति नहीं, बल्कि एक तलवार के रूप में लाया।

2. 19 : 12-16

The Master forbore not to speak the whole truth, declaring precisely what would destroy sickness, sin, and death, although his teaching set households at variance, and brought to material beliefs not peace, but a sword.

3. 20 : 6-13, 16-23

यीशु ने कर्मकांड के पुजारी और पाखंडी फरीसी से कहा, "कि महसूल लेने वाले और वेश्या तुम से पहिले परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करते हैं।" यीशु के इतिहास ने एक नया कैलेंडर बनाया, जिसे हम ईसाई युग कहते हैं; लेकिन उन्होंने कोई पूजा पाठ नहीं किया। वह जानता था कि पुरुषों को बपतिस्मा दिया जा सकता है, यूचरिस्ट का हिस्सा बन सकता है, पादरी का समर्थन कर सकता है, सब्त का पालन कर सकता है, लंबी प्रार्थना कर सकता है, और फिर भी कामुक और पापी हो सकता है।

"तुच्छ जाना जाता और मनुष्यों का त्यागा हुआ था," शाप के लिए आशीर्वाद वापस करके, उसने नश्वर को खुद के विपरीत, यहां तक कि भगवान की प्रकृति को सिखाया; और जब त्रुटि ने सत्य की शक्ति को महसूस किया, तो महापुरुष ने क्रॉस और क्रॉस का इंतजार किया। फिर भी उन्होंने यह नहीं कहा कि ईश्वरीय आदेश का पालन करना और ईश्वर पर भरोसा रखना, यह जानते हुए भी पाप से पवित्रता के मार्ग को बदलना और पीछे हटाना है।

3. 20 : 6-13, 16-23

To the ritualistic priest and hypocritical Pharisee Jesus said, “The publicans and the harlots go into the kingdom of God before you.” Jesus’ history made a new calendar, which we call the Christian era; but he established no ritualistic worship. He knew that men can be baptized, partake of the Eucharist, support the clergy, observe the Sabbath, make long prayers, and yet be sensual and sinful.

“Despised and rejected of men,” returning blessing for cursing, he taught mortals the opposite of themselves, even the nature of God; and when error felt the power of Truth, the scourge and the cross awaited the great Teacher. Yet he swerved not, well knowing that to obey the divine order and trust God, saves retracing and traversing anew the path from sin to holiness.

4. 133 : 19-28

यहूदी धर्म ईसाई धर्म का विरोधी था, क्योंकि यहूदी धर्म एक राष्ट्रीय या जनजातीय धर्म के सीमित रूप को दर्शाता है। यह एक परिमित और भौतिक प्रणाली थी, जो ईश्वर, मनुष्य, सेनेटरी विधियों और एक धार्मिक पंथ के विषय में विशेष सिद्धांतों पर आधारित थी। कि उसने "खुद को भगवान के बराबर बनाया", उसके खिलाफ यहूदी आरोपों में से एक था जिसने आत्मा की नींव पर ईसाई धर्म को लगाया, जिसने सिखाया कि वह पिता से प्रेरित था और भगवान के बाहर कोई जीवन, बुद्धि, और न ही पदार्थ को पहचानता था।

4. 133 : 19-28

Judaism was the antithesis of Christianity, because Judaism engendered the limited form of a national or tribal religion. It was a finite and material system, carried out in special theories concerning God, man, sanitary methods, and a religious cultus. That he made “himself equal with God,” was one of the Jewish accusations against him who planted Christianity on the foundation of Spirit, who taught as he was inspired by the Father and would recognize no life, intelligence, nor substance outside of God.

5. 26 : 28-9

हमारे मास्टर ने कोई विचार, सिद्धांत या विश्वास नहीं सिखाया। यह सभी वास्तविक लोगों का दिव्य सिद्धांत था जो उन्होंने सिखाया और अभ्यास किया। ईसाई धर्म का उनका प्रमाण धर्म और पूजा का कोई रूप या प्रणाली नहीं था, लेकिन क्रिश्चियन साइंस, जो जीवन और प्रेम के सामंजस्य को दर्शाता है। यीशु ने जॉन द बैप्टिस्ट को एक संदेश भेजा, एक प्रश्न से परे जो यह साबित करने के लिए था कि मसीह आया था: "कि जो कुछ तुम सुनते हो और देखते हो, वह सब जाकर यूहन्ना से कह दो। कि अन्धे देखते हैं और लंगड़े चलते फिरते हैं; कोढ़ी शुद्ध किए जाते हैं और बहिरे सुनते हैं, मुर्दे जिलाए जाते हैं; और कंगालों को सुसमाचार सुनाया जाता है।" दूसरे शब्दों में: जॉन को बताएं कि दैवीय शक्ति का प्रदर्शन क्या है, और वह तुरंत महसूस करेगा कि ईश्वर मसीहाई काम में एक शक्ति है।

5. 26 : 28-9

Our Master taught no mere theory, doctrine, or belief. It was the divine Principle of all real being which he taught and practised. His proof of Christianity was no form or system of religion and worship, but Christian Science, working out the harmony of Life and Love. Jesus sent a message to John the Baptist, which was intended to prove beyond a question that the Christ had come: “Go your way, and tell John what things ye have seen and heard; how that the blind see, the lame walk, the lepers are cleansed, the deaf hear, the dead are raised, to the poor the gospel is preached.” In other words: Tell John what the demonstration of divine power is, and he will at once perceive that God is the power in the Messianic work.

6. 27 : 17-21

यीशु के दृष्टांत जीवन को पाप और मृत्यु के साथ कभी भी मेल नहीं खाते के रूप में समझाते हैं। उन्होंने भौतिक ज्ञान के मूल में विज्ञान की कुल्हाड़ी को रखा, कि वह पैंटीवाद के झूठे सिद्धांत को काटने के लिए तैयार हो सकता है, - कि ईश्वर, या जीवन, सामग्री में है।

6. 27 : 17-21

Jesus’ parables explain Life as never mingling with sin and death. He laid the axe of Science at the root of material knowledge, that it might be ready to cut down the false doctrine of pantheism, — that God, or Life, is in or of matter.

7. 25 : 13-21

यीशु ने प्रदर्शन के द्वारा जीवन का मार्ग सिखाया, कि हम समझ सकते हैं कि यह दिव्य सिद्धांत कैसे बीमारों को चंगा करता है, त्रुटि को जन्म देता है, और मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है। यीशु ने ईश्वर के आदर्श को किसी भी ऐसे व्यक्ति की तुलना में बेहतर प्रस्तुत किया जिसकी उत्पत्ति कम आध्यात्मिक थी। परमेश्वर की आज्ञाकारिता के द्वारा, उसने आध्यात्मिक रूप से सभी दूसरों के सिद्धांत का प्रदर्शन किया। अत: उसके पालन की शक्ति, "यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे।"

7. 25 : 13-21

Jesus taught the way of Life by demonstration, that we may understand how this divine Principle heals the sick, casts out error, and triumphs over death. Jesus presented the ideal of God better than could any man whose origin was less spiritual. By his obedience to God, he demonstrated more spiritually than all others the Principle of being. Hence the force of his admonition, “If ye love me, keep my commandments.”

8. 28 : 15-6

न तो यीशु की उत्पत्ति, चरित्र, और न ही यीशु के कार्य को आम तौर पर समझा गया था। भौतिक दुनिया ने उनके स्वभाव के एक हिस्से को सही नहीं मापा। यहां तक कि उनकी धार्मिकता और पवित्रता ने भी पुरुषों को यह कहने में बाधा नहीं दी: वह एक अतिभक्षी और अशुद्ध का दोस्त है, और बिल्जेबब उसका संरक्षक है।

हे तुम क्रिश्चियन शहीद हो, याद रखो, यह पर्याप्त है यदि तुम अपने आप को अपने मास्टर के पैरों के फीते खोलने लायक पाते हो! यह धर्म की प्रकृति की गलती है कि यह विचार करना कि धार्मिकता के लिए उत्पीड़न अतीत से संबंधित है, और यह कि ईसाई धर्म आज दुनिया के साथ शांति पर है क्योंकि यह संप्रदायों और समाजों द्वारा सम्मानित किया जाता है। त्रुटि खुद को दोहराता है। पैगंबर, शिष्य, और प्रेरितों द्वारा सामना किए गए परीक्षणों, "जिनके लिए दुनिया योग्य नहीं थी", किसी न किसी रूप में जो सत्य के प्रत्येक अग्रणी का इंतजार करते हैं।

समाज में बहुत अधिक पशु साहस है और पर्याप्त नैतिक साहस नहीं है। ईसाईयों को देश और विदेश में त्रुटि के खिलाफ हथियार उठाने चाहिए उन्हें स्वयं में और दूसरों में पाप से जूझना चाहिए, और इस युद्ध को तब तक जारी रखें जब तक वे अपना कोर्स पूरा नहीं कर लेते। यदि वे विश्वास बनाए रखेंगे, तो उनके पास आनन्द का ताज होगा।

8. 28 : 15-6

Neither the origin, the character, nor the work of Jesus was generally understood. Not a single component part of his nature did the material world measure aright. Even his righteousness and purity did not hinder men from saying: He is a glutton and a friend of the impure, and Beelzebub is his patron.

Remember, thou Christian martyr, it is enough if thou art found worthy to unloose the sandals of thy Master’s feet! To suppose that persecution for righteousness’ sake belongs to the past, and that Christianity to-day is at peace with the world because it is honored by sects and societies, is to mistake the very nature of religion. Error repeats itself. The trials encountered by prophet, disciple, and apostle, “of whom the world was not worthy,” await, in some form, every pioneer of truth.

There is too much animal courage in society and not sufficient moral courage. Christians must take up arms against error at home and abroad. They must grapple with sin in themselves and in others, and continue this warfare until they have finished their course. If they keep the faith, they will have the crown of rejoicing.

9. 265 : 31-5

अर्थ की वेदनाएँ नमस्कार हैं, यदि वे झूठे सुखदायक विश्वासों को मिटा देते हैं और भावनाओं को आत्मा से आत्मा तक पहुँचाते हैं, जहाँ ईश्वर की रचनाएँ अच्छी हैं, "हृदय को आनन्दित करता है।" यह विज्ञान की तलवार है, जिसके साथ सत्य त्रुटि को नष्ट करता है, भौतिकता मनुष्य के उच्च व्यक्तित्व और भाग्य को स्थान देती है।

9. 265 : 31-5

The pains of sense are salutary, if they wrench away false pleasurable beliefs and transplant the affections from sense to Soul, where the creations of God are good, “rejoicing the heart.” Such is the sword of Science, with which Truth decapitates error, materiality giving place to man’s higher individuality and destiny.

10. 326 : 3-5, 12-22

यदि हम मसीह, सत्य का पालन करना चाहते हैं, तो यह भगवान की नियुक्ति के रास्ते में होना चाहिए। यीशु ने यह कहा: "कि जो मुझ पर विश्वास रखता है, ये काम जो मैं करता हूं वह भी करेगा।"

हमें भौतिक प्रणालियों की नींव का त्याग करना चाहिए, केवल समय-सम्मानित, अगर हम अपने एकमात्र उद्धारकर्ता के रूप में मसीह को प्राप्त करेंगे। आंशिक रूप से नहीं, लेकिन पूरी तरह से, नश्वर मन का महान उपचारक शरीर का उपचारकर्ता है।

जीवित रहने का उद्देश्य और मकसद अब हासिल किया जा सकता है। यह बिंदु जीत गया, जैसा कि आपको शुरू करना चाहिए, आपने किया है। आप क्रिश्चियन साइंस के अंक-तालिका में शुरू कर चुके हैं, और गलत इरादे के अलावा कुछ भी आपकी उन्नति में बाधा नहीं बन सकता है। सच्चे इरादों के साथ काम करने और प्रार्थना करने से, आपके पिता आपके लिए रास्ता खोलेंगे। "किस ने तुम्हें रोक दिया, कि सत्य को न मानो?"

10. 326 : 3-5, 12-22

If we wish to follow Christ, Truth, it must be in the way of God’s appointing. Jesus said, “He that believeth on me, the works that I do shall he do also.”

We must forsake the foundation of material systems, however time-honored, if we would gain the Christ as our only Saviour. Not partially, but fully, the great healer of mortal mind is the healer of the body.

The purpose and motive to live aright can be gained now. This point won, you have started as you should. You have begun at the numeration-table of Christian Science, and nothing but wrong intention can hinder your advancement. Working and praying with true motives, your Father will open the way. “Who did hinder you, that ye should not obey the truth?”


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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