रविवार 1 अक्टूबर, 2023



विषयकल्पना

SubjectUnreality

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: रोमियो 13: 11

"अब तुम्हारे लिये नींद से जाग उठने की घड़ी आ पहुंची है, क्योंकि जिस समय हम ने विश्वास किया था, उस समय के विचार से अब हमारा उद्धार निकट है।"



Golden Text: Romans 13 : 11

Now it is high time to awake out of sleep: for now is our salvation nearer than when we believed.




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उत्तरदायी अध्ययन: इफिसियों 6: 10-16


10     निदान, प्रभु में और उस की शक्ति के प्रभाव में बलवन्त बनो।

11     परमेश्वर के सारे हथियार बान्ध लो; कि तुम शैतान की युक्तियों के साम्हने खड़े रह सको।

12     क्योंकि हमारा यह मल्लयुद्ध, लोहू और मांस से नहीं, परन्तु प्रधानों से और अधिकारियों से, और इस संसार के अन्धकार के हाकिमों से, और उस दुष्टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं।

13     इसलिये परमेश्वर के सारे हथियार बान्ध लो, कि तुम बुरे दिन में साम्हना कर सको, और सब कुछ पूरा करके स्थिर रह सको।

14     सो सत्य से अपनी कमर कसकर, और धार्मीकता की झिलम पहिन कर।

15     और पांवों में मेल के सुसमाचार की तैयारी के जूते पहिन कर।

16     और उन सब के साथ विश्वास की ढाल लेकर स्थिर रहो जिस से तुम उस दुष्ट के सब जलते हुए तीरों को बुझा सको।

Responsive Reading: Ephesians 6 : 10-16

10.     My brethren, be strong in the Lord, and in the power of his might.

11.     Put on the whole armour of God, that ye may be able to stand against the wiles of the devil.

12.     For we wrestle not against flesh and blood, but against principalities, against powers, against the rulers of the darkness of this world, against spiritual wickedness in high places.

13.     Wherefore take unto you the whole armour of God, that ye may be able to withstand in the evil day, and having done all, to stand.

14.     Stand therefore, having your loins girt about with truth, and having on the breastplate of righteousness;

15.     And your feet shod with the preparation of the gospel of peace;

16.     Above all, taking the shield of faith, wherewith ye shall be able to quench all the fiery darts of the wicked.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. उत्पत्ति 1: 1-8, 14, 15

1     आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।

2     और पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी; और गहरे जल के ऊपर अन्धियारा था: तथा परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मण्डलाता था।

3     तब परमेश्वर ने कहा, उजियाला हो: तो उजियाला हो गया।

4     और परमेश्वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया।

5     और परमेश्वर ने उजियाले को दिन और अन्धियारे को रात कहा। तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहिला दिन हो गया॥

6     फिर परमेश्वर ने कहा, जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए।

7     तब परमेश्वर ने एक अन्तर करके उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया; और वैसा ही हो गया।

8     और परमेश्वर ने उस अन्तर को आकाश कहा। तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार दूसरा दिन हो गया॥

14     फिर परमेश्वर ने कहा, दिन को रात से अलग करने के लिये आकाश के अन्तर में ज्योतियां हों; और वे चिन्हों, और नियत समयों, और दिनों, और वर्षों के कारण हों।

15     और वे ज्योतियां आकाश के अन्तर में पृथ्वी पर प्रकाश देने वाली भी ठहरें; और वैसा ही हो गया।

1. Genesis 1 : 1-8, 14, 15

1     In the beginning God created the heaven and the earth.

2     And the earth was without form, and void; and darkness was upon the face of the deep. And the Spirit of God moved upon the face of the waters.

3     And God said, Let there be light: and there was light.

4     And God saw the light, that it was good: and God divided the light from the darkness.

5     And God called the light Day, and the darkness he called Night. And the evening and the morning were the first day.

6     And God said, Let there be a firmament in the midst of the waters, and let it divide the waters from the waters.

7     And God made the firmament, and divided the waters which were under the firmament from the waters which were above the firmament: and it was so.

8     And God called the firmament Heaven. And the evening and the morning were the second day.

14     And God said, Let there be lights in the firmament of the heaven to divide the day from the night; and let them be for signs, and for seasons, and for days, and years:

15     And let them be for lights in the firmament of the heaven to give light upon the earth: and it was so.

2. निर्गमन 20: 1-6

1     तब परमेश्वर ने ये सब वचन कहे,

2     कि मैं तेरा परमेश्वर यहोवा हूं, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात मिस्र देश से निकाल लाया है॥

3     तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना॥

4     तू अपने लिये कोई मूर्ति खोदकर न बनाना, न किसी कि प्रतिमा बनाना, जो आकाश में, वा पृथ्वी पर, वा पृथ्वी के जल में है।

5     तू उन को दण्डवत न करना, और न उनकी उपासना करना; क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर यहोवा जलन रखने वाला ईश्वर हूं, और जो मुझ से बैर रखते है, उनके बेटों, पोतों, और परपोतों को भी पितरों का दण्ड दिया करता हूं,

6     और जो मुझ से प्रेम रखते और मेरी आज्ञाओं को मानते हैं, उन हजारों पर करूणा किया करता हूं॥

2. Exodus 20 : 1-6

1 And God spake all these words, saying,

2     I am the Lord thy God, which have brought thee out of the land of Egypt, out of the house of bondage.

3     Thou shalt have no other gods before me.

4     Thou shalt not make unto thee any graven image, or any likeness of any thing that is in heaven above, or that is in the earth beneath, or that is in the water under the earth:

5     Thou shalt not bow down thyself to them, nor serve them: for I the Lord thy God am a jealous God, visiting the iniquity of the fathers upon the children unto the third and fourth generation of them that hate me;

6     And shewing mercy unto thousands of them that love me, and keep my commandments.

3. यशायाह 60: 1-4, 18-20

1     उठ, प्रकाशमान हो; क्योंकि तेरा प्रकाश आ गया है, और यहोवा का तेज तेरे ऊपर उदय हुआ है।

2     देख, पृथ्वी पर तो अन्धियारा और राज्य राज्य के लोगों पर घोर अन्धकार छाया हुआ है; परन्तु तेरे ऊपर यहोवा उदय होगा, और उसका तेज तुझ पर प्रगट होगा।

3     और अन्यजातियां तेरे पास प्रकाश के लिये और राजा तेरे आरोहण के प्रताप की ओर आएंगे॥

4     अपनी आंखें चारो ओर उठा कर देख; वे सब के सब इकट्ठे हो कर तेरे पास आ रहे हैं; तेरे पुत्र दूर से आ रहे हैं, और तेरी पुत्रियां हाथों-हाथ पहुंचाई जा रही हैं।

18     तेरे देश में फिर कभी उपद्रव और तेरे सिवानों के भीतर उत्पात वा अन्धेर की चर्चा न सुनाईं पड़ेगी; परन्तु तू अपनी शहरपनाह का नाम उद्धार और अपने फाटकों का नाम यश रखेगी।

19     फिर दिन को सूर्य तेरा उजियाला न होगा, न चान्दनी के लिये चन्द्रमा परन्तु यहोवा तेरे लिये सदा का उजियाला और तेरा परमेश्वर तेरी शोभा ठहरेगा।

20     तेरा सूर्य फिर कभी अस्त न होगा और न तेरे चन्द्रमा की ज्योति मलिन होगी; क्योंकि यहोवा तेरी सदैव की ज्योति होगा और तरे विलाप के दिन समाप्त हो जाएंगे।

3. Isaiah 60 : 1-4, 18-20

1     Arise, shine; for thy light is come, and the glory of the Lord is risen upon thee.

2     For, behold, the darkness shall cover the earth, and gross darkness the people: but the Lord shall arise upon thee, and his glory shall be seen upon thee.

3     And the Gentiles shall come to thy light, and kings to the brightness of thy rising.

4     Lift up thine eyes round about, and see: all they gather themselves together, they come to thee: thy sons shall come from far, and thy daughters shall be nursed at thy side.

18     Violence shall no more be heard in thy land, wasting nor destruction within thy borders; but thou shalt call thy walls Salvation, and thy gates Praise.

19     The sun shall be no more thy light by day; neither for brightness shall the moon give light unto thee: but the Lord shall be unto thee an everlasting light, and thy God thy glory.

20     Thy sun shall no more go down; neither shall thy moon withdraw itself: for the Lord shall be thine everlasting light, and the days of thy mourning shall be ended.

4. मत्ती 4: 1-4, 8-11

1     तब उस समय आत्मा यीशु को जंगल में ले गया ताकि इब्लीस से उस की परीक्षा हो।

2     वह चालीस दिन, और चालीस रात, निराहार रहा, अन्त में उसे भूख लगी।

3     तब परखने वाले ने पास आकर उस से कहा, यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियां बन जाएं।

4     उस ने उत्तर दिया; कि लिखा है कि मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है जीवित रहेगा।

8     फिर शैतान उसे एक बहुत ऊंचे पहाड़ पर ले गया और सारे जगत के राज्य और उसका विभव दिखाकर

9     उस से कहा, कि यदि तू गिरकर मुझे प्रणाम करे, तो मैं यह सब कुछ तुझे दे दूंगा।

10     तब यीशु ने उस से कहा; हे शैतान दूर हो जा, क्योंकि लिखा है, कि तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर।

11     तब शैतान उसके पास से चला गया, और देखो, स्वर्गदूत आकर उस की सेवा करने लगे॥

4. Matthew 4 : 1-4, 8-11

1     Then was Jesus led up of the Spirit into the wilderness to be tempted of the devil.

2     And when he had fasted forty days and forty nights, he was afterward an hungred.

3     And when the tempter came to him, he said, If thou be the Son of God, command that these stones be made bread.

4     But he answered and said, It is written, Man shall not live by bread alone, but by every word that proceedeth out of the mouth of God.

8     Again, the devil taketh him up into an exceeding high mountain, and sheweth him all the kingdoms of the world, and the glory of them;

9     And saith unto him, All these things will I give thee, if thou wilt fall down and worship me.

10     Then saith Jesus unto him, Get thee hence, Satan: for it is written, Thou shalt worship the Lord thy God, and him only shalt thou serve.

11     Then the devil leaveth him, and, behold, angels came and ministered unto him.

5. मत्ती 17: 14-21

14     जब वे भीड़ के पास पहुंचे, तो एक मनुष्य उसके पास आया, और घुटने टेक कर कहने लगा।

15     हे प्रभु, मेरे पुत्र पर दया कर; क्योंकि उस को मिर्गी आती है: और वह बहुत दुख उठाता है; और बार बार आग में और बार बार पानी में गिर पड़ता है।

16     और मैं उस को तेरे चेलों के पास लाया था, पर वे उसे अच्छा नहीं कर सके।

17     यीशु ने उत्तर दिया, कि हे अविश्वासी और हठीले लोगों मैं कब तक तुम्हारे साथ रहूंगा? कब तक तुम्हारी सहूंगा? उसे यहां मेरे पास लाओ।

18     तब यीशु ने उसे घुड़का, और दुष्टात्मा उस में से निकला; और लड़का उसी घड़ी अच्छा हो गया।

19     तब चेलों ने एकान्त में यीशु के पास आकर कहा; हम इसे क्यों नहीं निकाल सके?

20     उस ने उन से कहा, अपने विश्वास की घटी के कारण: क्योंकि मैं तुम से सच कहता हूं, यदि तुम्हारा विश्वास राई के दाने के बराबर भी हो, तो इस पहाड़ से कह स को गे, कि यहां से सरककर वहां चला जा, तो वह चला जाएगा; और कोई बात तुम्हारे लिये अन्होनी न होगी।

21     जब वे गलील में थे, तो यीशु ने उन से कहा; मनुष्य का पुत्र मनुष्यों के हाथ में पकड़वाया जाएगा।

5. Matthew 17 : 14-21

14     And when they were come to the multitude, there came to him a certain man, kneeling down to him, and saying,

15     Lord, have mercy on my son: for he is lunatick, and sore vexed: for ofttimes he falleth into the fire, and oft into the water.

16     And I brought him to thy disciples, and they could not cure him.

17     Then Jesus answered and said, O faithless and perverse generation, how long shall I be with you? how long shall I suffer you? bring him hither to me.

18     And Jesus rebuked the devil; and he departed out of him: and the child was cured from that very hour.

19     Then came the disciples to Jesus apart, and said, Why could not we cast him out?

20     And Jesus said unto them, Because of your unbelief: for verily I say unto you, If ye have faith as a grain of mustard seed, ye shall say unto this mountain, Remove hence to yonder place; and it shall remove; and nothing shall be impossible unto you.

21     Howbeit this kind goeth not out but by prayer and fasting.

6. 1 कुरिन्थियों 2: 9 (जैसा)-12

9     … जैसा लिखा है, कि जो आंख ने नहीं देखी, और कान ने नहीं सुना, और जो बातें मनुष्य के चित्त में नहीं चढ़ीं वे ही हैं, जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखने वालों के लिये तैयार की हैं।

10     परन्तु परमेश्वर ने उन को अपने आत्मा के द्वारा हम पर प्रगट किया; क्योंकि आत्मा सब बातें, वरन परमेश्वर की गूढ़ बातें भी जांचता है।

11     मनुष्यों में से कौन किसी मनुष्य की बातें जानता है, केवल मनुष्य की आत्मा जो उस में है? वैसे ही परमेश्वर की बातें भी कोई नहीं जानता, केवल परमेश्वर का आत्मा।

12     परन्तु हम ने संसार की आत्मा नहीं, परन्तु वह आत्मा पाया है, जो परमेश्वर की ओर से है, कि हम उन बातों को जानें, जो परमेश्वर ने हमें दी हैं।

6. I Corinthians 2 : 9 (as)-12

9     ...as it is written, Eye hath not seen, nor ear heard, neither have entered into the heart of man, the things which God hath prepared for them that love him.

10     But God hath revealed them unto us by his Spirit: for the Spirit searcheth all things, yea, the deep things of God.

11     For what man knoweth the things of a man, save the spirit of man which is in him? even so the things of God knoweth no man, but the Spirit of God.

12     Now we have received, not the spirit of the world, but the spirit which is of God; that we might know the things that are freely given to us of God.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 298: 2-12

जीवन, सत्य और प्रेम ईश्वरीय विज्ञान की वास्तविकता हैं। वे विश्वास में डूब जाते हैं और आध्यात्मिक समझ में पूर्ण चमक प्राप्त करते हैं। जिस प्रकार बादल सूर्य को छिपा लेता है, वह बुझ नहीं सकता, उसी प्रकार मिथ्या विश्वास अपरिवर्तनशील सद्भाव की आवाज को कुछ समय के लिए खामोश कर देता है, लेकिन मिथ्या विश्वास विश्वास, आशा और फल से लैस विज्ञान को नष्ट नहीं कर सकता।

जिसे भौतिक इन्द्रिय कहा जाता है, वह केवल वस्तुओं के नश्वर अस्थायी बोध की सूचना दे सकता है, जबकि आध्यात्मिक इन्द्रिय केवल सत्य की गवाही दे सकता है। भौतिक अर्थों के लिए, असत्य तब तक वास्तविक है जब तक कि इस भावना को ईसाई विज्ञान द्वारा ठीक नहीं किया जाता है।

1. 298 : 2-12

Life, Truth, and Love are the realities of divine Science. They dawn in faith and glow full-orbed in spiritual understanding. As a cloud hides the sun it cannot extinguish, so false belief silences for a while the voice of immutable harmony, but false belief cannot destroy Science armed with faith, hope, and fruition.

What is termed material sense can report only a mortal temporary sense of things, whereas spiritual sense can bear witness only to Truth. To material sense, the unreal is the real until this sense is corrected by Christian Science.

2. 505: 13-7

उत्पत्ति 1: 7. तब परमेश्वर ने एक अन्तर करके उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया; और वैसा ही हो गया।

आत्मा उस समझ को प्रदान करती है जो चेतना को बढ़ाती है और सभी सत्य की ओर ले जाती है। भजनहार कहता है: "महासागर के शब्द से, और समुद्र की महातरंगों से, विराजमान यहोवा अधिक महान है॥" आध्यात्मिक भावना आध्यात्मिक अच्छाई की समझ है। समझ वास्तविक और असत्य के बीच सीमांकन की रेखा है। आध्यात्मिक समझ मन, जीवन, सत्य और प्रेम को प्रकट करती है, — और क्रिश्चियन साइंस में ब्रह्मांड का आध्यात्मिक प्रमाण देते हुए, दिव्य भावना को प्रदर्शित करता है।

यह समझ बौद्धिक नहीं है, विद्वानों की प्राप्ति का परिणाम नहीं है; यह प्रकाश में लाई गई सभी चीजों की वास्तविकता है। भगवान के विचार अमर, बेदाग और अनंत को दर्शाते हैं। नश्वर, गलत और परिमित मानव विश्वास हैं, जो अपने लिए एक असंभव कार्य को विभाजित करते हैं, जिसका अर्थ है कि झूठे और सच्चे के बीच अंतर करना। मूल वस्तु से बिलकुल विपरीत वस्तुएँ उस मूल को प्रतिबिंबित नहीं करती हैं। इसलिए पदार्थ, आत्मा का प्रतिबिंब नहीं होने के कारण, कोई वास्तविक सत्ता नहीं है। समझ ईश्वर का एक गुण है, एक ऐसा गुण जो क्रिश्चियन साइंस को अनुमान से अलग करता है और सत्य को अंतिम बनाता है।

2. 505 : 13-7

Genesis i. 7. And God made the firmament, and divided the waters which were under the firmament from the waters which were above the firmament: and it was so.

Spirit imparts the understanding which uplifts consciousness and leads into all truth. The Psalmist saith: "The Lord on high is mightier than the noise of many waters, yea, than the mighty waves of the sea." Spiritual sense is the discernment of spiritual good. Understanding is the line of demarcation between the real and unreal. Spiritual understanding unfolds Mind, — Life, Truth, and Love, — and demonstrates the divine sense, giving the spiritual proof of the universe in Christian Science.

This understanding is not intellectual, is not the result of scholarly attainments; it is the reality of all things brought to light. God's ideas reflect the immortal, unerring, and infinite. The mortal, erring, and finite are human beliefs, which apportion to themselves a task impossible for them, that of distinguishing between the false and the true. Objects utterly unlike the original do not reflect that original. Therefore matter, not being the reflection of Spirit, has no real entity. Understanding is a quality of God, a quality which separates Christian Science from supposition and makes Truth final.

3. 586: 15-17

आसमान. आध्यात्मिक समझ; सत्य और त्रुटि के बीच, आत्मा और तथाकथित पदार्थ के बीच सीमांकन की वैज्ञानिक रेखा।

3. 586 : 15-17

Firmament. Spiritual understanding; the scientific line of demarcation between Truth and error, between Spirit and so-called matter.

4. 284: 28-3

क्रिश्चियन साइंस के अनुसार, मनुष्य की एकमात्र वास्तविक भावना आध्यात्मिक है, जो दिव्य मन से निकलती है। विचार ईश्वर से मनुष्य की ओर जाता है, लेकिन न तो संवेदना और न ही रिपोर्ट भौतिक शरीर से मन तक जाती है। अंतर्मन हमेशा ईश्वर से लेकर उसके विचार, मनुष्य तक होता है। पदार्थ संवेदनशील नहीं है और उसे अच्छे या बुरे, सुख या दुःख का ज्ञान नहीं हो सकता। मनुष्य का व्यक्तित्व भौतिक नहीं है.

4. 284 : 28-3

According to Christian Science, the only real senses of man are spiritual, emanating from divine Mind. Thought passes from God to man, but neither sensation nor report goes from material body to Mind. The intercommunication is always from God to His idea, man. Matter is not sentient and cannot be cognizant of good or of evil, of pleasure or of pain. Man's individuality is not material.

5. 209: 31-1

आध्यात्मिक ज्ञान ईश्वर को समझने की एक सचेत, निरंतर क्षमता है। यह शब्दों में विश्वास की तुलना में कार्यों द्वारा विश्वास की श्रेष्ठता को दर्शाता है।

5. 209 : 31-1

Spiritual sense is a conscious, constant capacity to understand God. It shows the superiority of faith by works over faith in words.

6. 294: 9-27 (से 2nd.)

यह विश्वास कि पदार्थ सोचता है, देखता है या महसूस करता है, इस विश्वास से अधिक वास्तविक नहीं है कि पदार्थ आनंद लेता है और कष्ट सहता है। यह नश्वर विश्वास, गलत नाम वाला मनुष्य, त्रुटि है, कह रहा है: "पदार्थ में बुद्धि और संवेदना होती है। नसें महसूस होती हैं. मस्तिष्क सोचता है और पाप करता है। पेट आदमी को पार लगा सकता है. चोट मनुष्य को पंगु बना सकती है और पदार्थ उसे मार सकता है।" तथाकथित भौतिक इंद्रियों का यह निर्णय नश्वर लोगों को पीड़ित करता है, जैसा कि उन्हें शरीर विज्ञान और विकृति विज्ञान द्वारा सिखाया जाता है, झूठी गवाही का सम्मान करने के लिए, यहां तक कि उन त्रुटियों को भी जो आध्यात्मिक अर्थ और विज्ञान के माध्यम से सत्य द्वारा नष्ट कर दी जाती हैं।

आत्मा और नश्वर मनुष्य का प्रतिनिधित्व करने वाले अमर मनुष्य के बीच सीमांकन की रेखाएँ, इस त्रुटि का प्रतिनिधित्व करती हैं कि जीवन और बुद्धि पदार्थ में हैं, मिथक होने के लिए पदार्थ के सुख और दर्द को दर्शाती हैं, और उनमें पौराणिक कथाओं के पिता होने के लिए मानव विश्वास है। किस पदार्थ को बुद्धिमान देवताओं में विभाजित किया गया है। मनुष्य का वास्तविक स्वार्थ केवल उसी में पहचाना जा सकता है जो अच्छा और सत्य है। मनुष्य न तो स्व-निर्मित है और न ही नश्वर द्वारा बनाया गया है। भगवान ने मनुष्य बनाया।

6. 294 : 9-27 (to 2nd .)

The belief that matter thinks, sees, or feels is not more real than the belief that matter enjoys and suffers. This mortal belief, misnamed man, is error, saying: "Matter has intelligence and sensation. Nerves feel. Brain thinks and sins. The stomach can make a man cross. Injury can cripple and matter can kill man." This verdict of the so-called material senses victimizes mortals, taught, as they are by physiology and pathology, to revere false testimony, even the errors that are destroyed by Truth through spiritual sense and Science.

The lines of demarcation between immortal man, representing Spirit, and mortal man, representing the error that life and intelligence are in matter, show the pleasures and pains of matter to be myths, and human belief in them to be the father of mythology, in which matter is represented as divided into intelligent gods. Man's genuine selfhood is recognizable only in what is good and true. Man is neither self-made nor made by mortals. God created man.

7. 325: 30-2

जब किसी भी युग में पहली बार बोला गया, सत्य, प्रकाश की तरह, "अंधेरे में चमकता है, और अंधेरा उसे समझ नहीं पाता।" जीवन, पदार्थ और मन की झूठी भावना दिव्य संभावनाओं को छुपाती है, और वैज्ञानिक प्रदर्शन को छुपाती है।

7. 325 : 30-2

When first spoken in any age, Truth, like the light, "shineth in darkness, and the darkness comprehended it not." A false sense of life, substance, and mind hides the divine possibilities, and conceals scientific demonstration.

8. 216: 11-25

यह समझ कि अहंकार मन है, और यह कि एक मन या बुद्धि है, एक बार में नश्वर अर्थ की त्रुटियों को नष्ट करने और अमर भावना की सच्चाई की आपूर्ति करने के लिए शुरू होता है। यह समझ शरीर को सामंजस्यपूर्ण बनाती है; यह तंत्रिकाओं, हड्डियों, मस्तिष्क इत्यादि को नौकरों के बजाय नौकर बनाता है। यदि मनुष्य दिव्य मन के नियम से संचालित होता है, तो उसका शरीर हमेशा की ज़िंदगी और सच्चाई और प्रेम को प्रस्तुत करने में है। मनुष्यों की महान गलती यह है कि उस आदमी को, भगवान की छवि और समानता को मानने के लिए, भौतिक और आत्मा दोनों अच्छाई और बुराई दोनों हैं।

यदि निर्णय भौतिक इंद्रियों पर छोड़ दिया जाता, तो बुराई अच्छाई का स्वामी प्रतीत होती, और बीमारी अस्तित्व का नियम, जबकि स्वास्थ्य अपवाद, मृत्यु अपरिहार्य और जीवन एक विरोधाभास प्रतीत होता।

8. 216 : 11-25

The understanding that the Ego is Mind, and that there is but one Mind or intelligence, begins at once to destroy the errors of mortal sense and to supply the truth of immortal sense. This understanding makes the body harmonious; it makes the nerves, bones, brain, etc., servants, instead of masters. If man is governed by the law of divine Mind, his body is in submission to everlasting Life and Truth and Love. The great mistake of mortals is to suppose that man, God's image and likeness, is both matter and Spirit, both good and evil.

If the decision were left to the corporeal senses, evil would appear to be the master of good, and sickness to be the rule of existence, while health would seem the exception, death the inevitable, and life a paradox.

9. 264: 20-27

आत्मा और उसके स्वरूप ही होने का एकमात्र यथार्थ हैं। आत्मा के माइक्रोस्कोप के तहत पदार्थ गायब हो जाता है। सत्य से पाप का नाश होता है, और बीमारी और मृत्यु को यीशु ने दूर किया, जिन्होंने उन्हें त्रुटि का रूप दिया। आध्यात्मिक जीवन और आशीर्वाद ही प्रमाण हैं, जिसके द्वारा हम सच्चे अस्तित्व को पहचान सकते हैं और उस अकथनीय शांति को महसूस कर सकते हैं जो आध्यात्मिक प्रेम को अवशोषित करने से आती है।

9. 264 : 20-27

Spirit and its formations are the only realities of being. Matter disappears under the microscope of Spirit. Sin is unsustained by Truth, and sickness and death were overcome by Jesus, who proved them to be forms of error. Spiritual living and blessedness are the only evidences, by which we can recognize true existence and feel the unspeakable peace which comes from an all-absorbing spiritual love.

10. 356: 4-5, 8-16

तथाकथित भौतिक अस्तित्व आध्यात्मिक अस्तित्व और अमरता का कोई सबूत नहीं देता है। … पदार्थ आत्मा का गर्भगृह नहीं है।

यीशु ने इस विषय पर व्यावहारिक रूप से तर्क किया और अपनी आध्यात्मिकता के आधार पर बीमारी, पाप और मृत्यु को नियंत्रित किया। भौतिक चीज़ों की शून्यता को समझते हुए, उन्होंने मांस और आत्मा को दो विपरीत चीज़ों के रूप में बताया, - त्रुटि और सत्य के रूप में, जो एक-दूसरे की खुशी और अस्तित्व में किसी भी तरह से योगदान नहीं दे रहे थे। यीशु जानता था, "आत्मा तो जीवनदायक है, शरीर से कुछ लाभ नहीं।"

10. 356 : 4-5, 8-16

So-called material existence affords no evidence of spiritual existence and immortality. ... Matter is not the vestibule of Spirit.

Jesus reasoned on this subject practically, and controlled sickness, sin, and death on the basis of his spirituality. Understanding the nothingness of material things, he spoke of flesh and Spirit as the two opposites, — as error and Truth, not contributing in any way to each other's happiness and existence. Jesus knew, "It is the spirit that quickeneth; the flesh profiteth nothing."

11. 481: 2-4, 5-6

मनुष्य ईश्वर, आत्मा, और कुछ नहीं के लिए सहायक है। ईश्वर का होना अनंत, स्वतंत्रता, सद्भाव और असीम आनंद है। ... योर के द्वीपसमूह की तरह, मनुष्य स्वतंत्र है "पवित्रतम में प्रवेश करने के लिए," - भगवान का क्षेत्र।

11. 481 : 2-4, 5-6

Man is tributary to God, Spirit, and to nothing else. God's being is infinity, freedom, harmony, and boundless bliss. ... Like the archpriests of yore, man is free "to enter into the holiest," — the realm of God.

12. 208: 20-24

आइए हम वास्तविक और शाश्वत के बारे में जानें, और आत्मा के राज्य, स्वर्ग के राज्य की तैयारी करें - सार्वभौमिक सद्भाव का शासन और शासन, जिसे खोया नहीं जा सकता और न ही हमेशा के लिए अनदेखा किया जा सकता है।

12. 208 : 20-24

Let us learn of the real and eternal, and prepare for the reign of Spirit, the kingdom of heaven, — the reign and rule of universal harmony, which cannot be lost nor remain forever unseen.

13. 218: 32-2

जब हम अस्तित्व के सत्य के प्रति जागते हैं, तो सभी रोग, दर्द, कमजोरी, थकावट, दुख, पाप, मृत्यु अज्ञात हो जाएंगे, और नश्वर स्वप्न हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा।

13. 218 : 32-2

When we wake to the truth of being, all disease, pain, weakness, weariness, sorrow, sin, death, will be unknown, and the mortal dream will forever cease.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6